जिस बीजिंग को कभी सफलता, समृद्धि और अवसरों का प्रतीक माना जाता था, आज वहीं से बड़ी संख्या में युवा बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। महंगाई, घटते रोजगार, रियल एस्टेट संकट और आर्थिक सुस्ती ने चीन के उस विकास माॅडल पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसे कभी दुनिया का सबसे सफल माॅडल माना जाता था
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और कभी सबसे तेजी से बढ़ने वाले देशों में शामिल चीन आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां आर्थिक विकास की चमक के पीछे गहरे संकट की तस्वीर उभरने लगी है। एक समय था जब चीन की राजधानी बीजिंग हर महत्वाकांक्षी युवा का सपना हुआ करती थी। गांवों और छोटे शहरों से लाखों लोग इस उम्मीद के साथ बीजिंग पहुंचते थे कि यहां उन्हें बेहतर नौकरी, ऊंची आय और सम्मानजनक जीवन मिलेगा लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। सोशल मीडिया पर ‘एस्केपिंग बीजिंग’ यानी ‘बीजिंग छोड़ने’ का चलन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। बड़ी संख्या में युवा राजधानी को अलविदा कहकर अपेक्षाकृत छोटे शहरों की ओर रुख कर रहे हैं। यह केवल लोगों के रहने की जगह बदलने की कहानी नहीं है बल्कि चीन की अर्थव्यवस्था और उसके विकास माॅडल में आ रहे गहरे बदलाव का संकेत भी है।
सपनों की राजधानी से निराशा का शहर बीजिंग का महत्व केवल एक राजनीतिक राजधानी के रूप में नहीं रहा है। सदियों से यह चीन में सफलता और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता रहा है। प्राचीन काल में शाही परीक्षाएं देने वाले विद्वान यहां पहुंचते थे। आधुनिक चीन में भी यही शहर सबसे बड़ी कम्पनियों, प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, सरकारी संस्थानों और तकनीकी उद्योग का केंद्र बना। लम्बे समय तक यह माना जाता रहा कि यदि कोई व्यक्ति बीजिंग में अपना भविष्य बना लेता है तो उसने जीवन की सबसे बड़ी मंजिल हासिल कर ली।
इसी सोच के साथ लाखों युवाओं ने अपने गांवों और छोटे शहरों को छोड़कर राजधानी का रुख किया लेकिन अब वही बीजिंग युवाओं के लिए उम्मीद से अधिक तनाव का पर्याय बनता जा रहा है। ऊंचे किराए, महंगा जीवन, लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा और रोजगार के सीमित अवसरों ने युवाओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या बीजिंग में रहना वास्तव में सफलता है या केवल संघर्ष का दूसरा नाम।
आर्थिक चमत्कार की रफ्तार क्यों थमी?
करीब चार दशकों तक चीन ने अभूतपूर्व आर्थिक वृद्धि दर्ज की। कई वर्षों तक उसकी विकास दर 10 प्रतिशत के आस-पास रही। इसी अवधि में करोड़ों लोग गरीबी से बाहर आए और चीन दुनिया की विनिर्माण राजधानी बन गया। पिछले कुछ वर्षों में हालात बदल गए। आर्थिक विकास की रफ्तार लगातार धीमी हुई है। इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण रियल एस्टेट क्षेत्र का संकट है। चीन की अर्थव्यवस्था लम्बे समय तक निर्माण और सम्पत्ति बाजार पर आधारित रही। जब बड़े-बड़े डेवलपर वित्तीय संकट में फंसे और मकानों की कीमतें गिरने लगीं तो लाखों परिवारों की सम्पत्ति का मूल्य घट गया। जिन लोगों ने अपनी जीवनभर की बचत घर खरीदने में लगा दी थी, उन्हें अचानक आर्थिक असुरक्षा का सामना करना पड़ा। कोविड-19 महामारी और उसके दौरान लागू कठोर लाॅकडाउन ने भी आर्थिक गतिविधियों को बुरी तरह प्रभावित किया। महामारी के बाद अपेक्षित तेजी से आर्थिक सुधार नहीं हो पाया। उपभोक्ताओं ने खर्च कम कर दिया, कम्पनियों ने नई भर्तियां रोक दीं और निवेश की गति भी कमजोर पड़ गई।
युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती
चीन में युवाओं की बेरोजगारी पिछले कुछ वर्षों से गम्भीर चिंता का विषय बनी हुई है। विश्वविद्यालयों से हर वर्ष लाखों छात्र निकल रहे हैं लेकिन उनके अनुरूप रोजगार उपलब्ध नहीं हैं। जिन क्षेत्रों में पहले सबसे अधिक अवसर मिलते थे, जैसे रियल एस्टेट, इंटरनेट कम्पनियां और निजी शिक्षा, वे अब संकट का सामना कर रहे हैं। नतीजा यह है कि अच्छी डिग्री होने के बावजूद युवा अपेक्षित वेतन नहीं पा रहे। जो नौकरी मिल भी रही है, उसमें वेतन इतना कम है कि बीजिंग जैसे महंगे शहर में सम्मानजनक जीवन जीना कठिन हो गया है। कई युवाओं का कहना है कि उनकी पूरी कमाई किराए, भोजन और दैनिक खर्चों में समाप्त हो जाती है। बचत करना तो दूर, भविष्य की योजना बनाना भी मुश्किल होता जा रहा है।
‘996’ संस्कृति पर उठते सवाल
चीन की तेज आर्थिक प्रगति के पीछे लम्बे समय तक ‘996’ कार्य संस्कृति को सफलता का मंत्र माना गया। इसका अर्थ है सुबह नौ बजे से रात नौ बजे तक, सप्ताह में छह दिन काम करना। बड़ी तकनीकी कम्पनियों के कई प्रमुख उद्योगपतियों ने इस कार्य संस्कृति का समर्थन किया। इसे मेहनत और सफलता का प्रतीक बताया गया लेकिन अब युवा पीढ़ी इस माॅडल को चुनौती दे रही है। उनका तर्क है कि यदि इतनी मेहनत करने के बाद भी बेहतर जीवन नहीं मिल रहा तो ऐसी व्यवस्था का क्या लाभ? लगातार काम, मानसिक तनाव और निजी जीवन की कमी ने बड़ी संख्या में युवाओं को इस सोच से दूर कर दिया है।
‘तांग पिंग’ यानी ‘लेट जाना’
इसी पृष्ठभूमि में चीन में ‘तांग पिंग’ या ‘लाइंग फ्लैट’ जैसी सामाजिक अवधारणा सामने आई। इसका अर्थ है अत्यधिक प्रतिस्पर्धा से बाहर निकलकर अपेक्षाकृत सरल जीवन अपनाना। इसके समर्थक मानते हैं कि हर कीमत पर बड़ी नौकरी, महंगा घर और सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल करने की दौड़ अब व्यावहारिक नहीं रह गई है। इसके बजाय वे सीमित आय, कम खर्च और मानसिक शांति को प्राथमिकता देना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति चीन के पारम्परिक सामाजिक मूल्यों से अलग मानी जाती है जहां कठिन परिश्रम और लगातार आगे बढ़ना जीवन का आदर्श माना जाता रहा है।
सोशल मीडिया पर हजारों युवा अपनी कहानी साझा कर रहे हैं कि उन्होंने बीजिंग छोड़कर छोटे शहरों में बसने का निर्णय क्यों लिया। उनका कहना है कि छोटे शहरों में किराया कम है, जीवन की गति अपेक्षाकृत शांत है और कम आय में भी बेहतर जीवन सम्भव है। कई युवाओं का अनुभव है कि बीजिंग में हर दिन केवल काम और खर्च के बीच बीतता था जबकि छोटे शहरों में परिवार, मित्रों और व्यक्तिगत जीवन के लिए समय मिल रहा है।
क्या यह केवल आर्थिक संकट है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल आर्थिक मंदी का मामला नहीं है बल्कि सामाजिक बदलाव भी है। नई पीढ़ी अपने माता-पिता की तरह केवल आर्थिक सफलता को जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं मानती। वह मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता को भी उतना ही महत्व देती है। यही कारण है कि अब सफलता की परिभाषा बदल रही है। पहले सफलता का अर्थ बीजिंग, शंघाई या शेनझेन जैसे महानगरों में बसना था। अब कई युवाओं के लिए सफलता का अर्थ संतुलित जीवन जीना है।
चीन की अर्थव्यवस्था पर असर
यदि बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली युवा महानगरों से बाहर जाने लगते हैं तो इसका असर चीन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। महानगरों की उत्पादकता, उपभोक्ता खर्च और नवाचार क्षमता प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर छोटे शहरों में नई आर्थिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं लेकिन इससे यह भी स्पष्ट होता है कि चीन का पुराना विकास माॅडल, जो निरंतर शहरीकरण, निर्माण और तेज निवेश पर आधारित था, अब पहले जैसी गति नहीं दे पा रहा।
चीनी सरकार ने आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। ब्याज दरों में कमी, उपभोक्ता खर्च बढ़ाने के प्रयास, रियल एस्टेट क्षेत्र को राहत और निजी निवेश को प्रोत्साहन जैसी नीतियां अपनाई जा रही हैं। इसके बावजूद उपभोक्ता विश्वास पूरी तरह लौट नहीं पाया है। लोग अभी भी खर्च करने के बजाय बचत को प्राथमिकता दे रहे हैं। रोजगार सृजन भी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। यदि युवाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिले तो सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है।
दुनिया के लिए क्या संदेश?
चीन की वर्तमान स्थिति केवल चीन तक सीमित नहीं है। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ सकता है। चीन दुनिया की सबसे बड़ी विनिर्माण अर्थव्यवस्था और प्रमुख उपभोक्ता बाजार है। यदि वहां मांग कमजोर होती है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कच्चे माल की कीमतों और वैश्विक निवेश पर भी दिखाई देगा। भारत सहित कई देशों के लिए यह अवसर भी हो सकता है। यदि वैश्विक कम्पनियां चीन पर अपनी निर्भरता कम करती हैं तो वे वैकल्पिक बाजारों और उत्पादन केंद्रों की तलाश करेंगी। भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया और मैक्सिको जैसे देशों को इसका लाभ मिल सकता है।
क्या चीन फिर वापसी करेगा?
चीन की अर्थव्यवस्था अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उसके पास विशाल औद्योगिक आधार, आधुनिक बुनियादी ढांचा और मजबूत निर्यात क्षमता मौजूद है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि चीन का आर्थिक दौर समाप्त हो गया है। हालांकि इतना स्पष्ट है कि अब चीन को केवल निवेश और निर्माण आधारित विकास से आगे बढ़कर उपभोग, नवाचार और उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार पर अधिक ध्यान देना होगा। यदि वह युवाओं के लिए बेहतर अवसर, सस्ती आवास व्यवस्था और संतुलित कार्य संस्कृति विकसित कर पाता है तो उसकी अर्थव्यवस्था फिर से गति पकड़ सकती है।
कुल मिलाकर बीजिंग छोड़ते युवाओं की कहानी केवल कुछ व्यक्तियों की निजी पसंद नहीं है। यह उस बदलाव का प्रतीक है जो चीन के समाज और अर्थव्यवस्था दोनों में एक साथ दिखाई दे रहा है। जिस राजधानी को कभी महत्वाकांक्षा की अंतिम मंजिल माना जाता था वहीं आज हजारों युवा अपने सपनों की नई परिभाषा खोज रहे हैं।
यह बदलाव चीन के नीति-निर्माताओं के लिए चेतावनी भी है कि आर्थिक विकास केवल ऊंची जीडीपी वृद्धि दर से नहीं मापा जा सकता। यदि युवाओं को स्थिर रोजगार, सम्मानजनक आय, सुलभ आवास और संतुलित जीवन नहीं मिलेगा तो सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था भी सामाजिक असंतोष और प्रतिभा पलायन जैसी चुनौतियों का सामना करेगी। चीन के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है, क्या वह अपने आर्थिक माॅडल को बदलती पीढ़ी की आकांक्षाओं के अनुरूप ढाल पाएगा या फिर ‘एस्केपिंग बीजिंग’ जैसी प्रवृत्तियां भविष्य में और व्यापक होती जाएंगी। यही सवाल आने वाले वर्षों में चीन की आर्थिक और सामाजिक दिशा तय करेगा।