उत्तराखण्ड सरकार पर्यटन नगरी मसूरी को जाम से राहत दिलाने के लिए मेट्रो रोपवे परियोजना को तेजी से आगे बढ़ा रही है। सचिव आवास डाॅ. आर. राजेश कुमार ने स्वयं प्रस्तावित स्थलों का निरीक्षण किया है और अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि प्रत्येक स्टेशन का स्थान जियो-टेक्निकल अध्ययन के आधार पर तय किया जाए। सरकार का दावा है कि यह परियोजना मसूरी में यातायात व्यवस्था को आधुनिक बनाएगी, पर्यटन को नई गति देगी और पर्यावरण के अनुकूल सार्वजनिक परिवहन का विकल्प उपलब्ध कराएगी।
जोशीमठ का धंसाव। जनवरी 2023 में जब घरों की दीवारों में दरारें दिखाई देने लगीं, सड़कें फटने लगीं और सैकड़ों परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े, तब यह केवल एक स्थानीय संकट नहीं था। यह पूरे हिमालय के लिए एक चेतावनी थी कि प्रकृति की अपनी सीमाएं होती हैं और उन सीमाओं की अनदेखी का परिणाम कभी भी सामने आ सकता है।
मसूरी पर्वतों की रानी कही जाती है। यह दून घाटी क्षेत्र में आता है। इसको बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार खनन को लेकर पीआईएल का स्वरूप दिया था। पहले यहां लाईम स्टोन का खनन होता था तब इसको सुप्रीम कोर्ट ने बंद करवाया क्योंकि इससे मसूरी और उसके आस-पास के दून घाटी क्षेत्र का पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा था। इस संतुलन को हमारी भारतीय सेना के इको फोर्स ने मसूरी में जंगल उगाकर इसे हरा-भरा किया लेकिन राज्य गठन के बाद विशेषकर 20 सालों में जो यहां अंधाधुंध, नियम विरुद्ध, अवैध बड़े-बड़े निर्माण कार्य हुए हैं, जगलों को बगैर फाॅरेस्ट एनओसी, बगैर फाॅरेस्ट क्लीयरेंस के लिंक रोड काट दी गई उससे मसूरी और समूची दून घाटी का पर्यावरण खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। पूरा सिस्टम ही कोलैप्स हो चुका है। आज उत्तराखण्ड भूकम्प के जोन 5 में है और मसूरी भी भूकम्प डेंजर जोन में है लेकिन इसको नजरअंदाज करके बड़े-बड़े निर्माण कार्य हो रहे हैं। मसूरी की धारण क्षमता तो वैसे ही बहुत कम है अगर इसको देखे बगैर हजारों लोगों को यहां पंहुचने दिया जाएगा तो मसूरी बचेगी कैसे? अब रोपवे की बात करें तो पुरूकुल मसूरी रोपवे बन रहा है। हमारी चिंता इसकी सुरक्षा को लेकर है। हमने इस बात को शासन में उठाया तो अब इसकी सुरक्षा ऑडिट के आदेश हो गए हैं और जो अनियोजित तरीके से जंगलों का कटान करके सड़कें बनाई गई, चारागाह की भूमि पर प्लाॅटिंग हो रही है उसकी भी जांच के आदेश हो गए हैं।
रविंद्र जुगराण, पूर्व राज्य मंत्री और वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी
मसूरी केवल एक पर्यटन स्थल ही नहीं, यह हिमालय की संवेदनशील परिस्थिति का हिस्सा है। विकास उसकी वहन क्षमता के अनुरूप होना चाहिए। अनियंत्रित पर्यटन वर्तमान और भविष्य के लिए खतरा है। अंधाधुंध निर्माण पर रोक जरूरी है। जल, जंगल और पहाड़ों की रक्षा करनी होगी। स्थानीय लोगांे की जीवन गुणवत्ता सर्वोच्च होनी चाहिए। वैज्ञानिक नियोजन ही आगे का रास्ता है। प्रकृति और विकास साथ-साथ चलने चाहिए। यही मसूरी के भविष्य का एकमात्र सही रोडमैप है।
अनूप नौटियाल, अध्यक्ष, एसडीसी फाउंडेशन, देहरादून
हर जगह की धारणीय क्षमता यानी केयरिंग कैपेसिटी होती है। यह केवल मसूरी की ही नहीं है, समूचे उत्तराखण्ड के प्रमुख पहाड़ी क्षेत्रों, नगरों और खासतौर पर पर्यटक नगरों की बड़ी समस्या हो गई है। केदारनाथ पर इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पड़ रहा है। सैकड़ों हेलिकॉप्टरों की उड़ानों से इसका इम्पैक्ट भूगर्भीय हलचलों के साथ-साथ पर्यावरण और इको सिस्टम पर पड़ चुका है। केदारनाथ में अब रोपवे बनाया जा रहा है, मसूरी में रोपवे बना रहे हैं इसका इम्पैक्ट दोनों ही जगह समान पड़ना तय है जबकि दोनों ही जगहों के केयरिंग कैपेसिटी का मामला है, इसे कंसीडर किया जाना चाहिए। इन रोपवे से कितने लोग अतिरिक्त मसूरी पहुंचेंगे और उनके पहुंचने से वहां के संसाधनों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, जब तक इसका सही तरीके से अध्ययन नहीं किया जाएगा तब तक कोई फायदा नहीं होगा बल्कि इसका बैड इम्पैक्ट ही होगा। इसका एक ही समाधान है कि सड़कों को सुधारा जाए और इसके लिए ठोस व्यवस्था अपनाई जाए। सबसे पहले निजी वाहनों पर रोक लगाई जाए और सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा दिया जाए। ऐसा ही केदारनाथ या चारधाम यात्रा में भी करना चाहिए। देहरादून से मसूरी के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट से हीपर्यटकों को भेजा जाए। मसूरी हो या अन्य जगहों पर आज हैवी कंस्ट्रशन बढ़े हैं। डी फाॅरेस्ट का सवाल भी इसमें आता है। ऑललरेडी पहले ही बहुत डी फाॅरेस्टेशन हो चुका है। अब आप रोपवे के लिए इतने भारी और बड़े पोल लगाएंगे तो इसका इम्पैक्ट हर चीज पर पड़ेगा। पहले ही हमारे पहाड़ भूस्खन और भूकम्प से प्रभावित रहे हैं। हम आज भूकम्प के जोन-5 में आ चुके हैं अब इसकी जियोलाॅजी भी देखने की सबसे ज्यादा जरूरत है। रोपवे इसका कोई बेहतर हल नहीं है।
प्रो. एस.पी. सती, भरसार विश्वविद्यालय पर्यावरण विभाग
देखिए, बात सिर्फ मसूरी की नहीं रह गई है। वाडिया इंस्टीटयूट ने मसूरी और इसके आस-पास के क्षेत्र में भूस्खलन का अध्ययन किया था जिसमें आबादी क्षेत्र में सबसे ज्यादा भूस्खलन होने की आशंका जताई थी लेकिन यह अध्ययन हमारे यहां भूस्खलन विभाग द्वारा किया गया था। मैं भूकम्प विभाग से हूं और मैं यह कह सकता हूं कि पूरा उत्तराखण्ड भूकंप जोन-4 और जोन-5 में है लेकिन प्रदेश में निर्माण कार्य, विकास कार्य होने ही हैं, बगैर इसके तो काम नहीं चलेगा। इसके लिए पहले से नाॅम्स बने हुए हैं। सरकारी निर्माण तो सभी नाॅम्स को पूरा करके ही बनाए जाते हैं लेकिन निजी निर्माण में इसकी अनदेखी होती रही है। अब सवाल यह है कि क्या हम भूकम्प और भूस्खन के डर से विकास को छोड़ सकते हैं? जवाब है नहीं छोड़ सकते। हमें विकास चाहिए लेकिन इसके लिए हमें सबसे ज्यादा अवेरनेस और सतर्कता बरतने की जरूरत है। सबसे पहले क्षेत्रों की केयरिंग कैपेसिटी को देखना होगा और फिर भूगर्भीय स्थिति को देखकर हमें कैटेगेराईज करने की जरूरत है। धराली की आपदा हम सबने देखी है, जोशीमठ की बड़ी आपदा भी देख चुके हैं। इसका एक ही समाधान है कि हम जगहों को कैटेगैरी में शामिल करें और नई तकनीक से निर्माण करें। आपने देखा होगा कि वेनेजुएला में भूकम्प आया लेकिन जो इमारते भूकम्प रोधी तकनीक से बनी थी उनको कुछ नहीं हुआ। जो नई इमारतें या पुरानी इमारतें थी जिसमें भूकंपरोधी तकनीक का प्रयोग नहीं किया गया वह सभी खत्म हो गई। अब मसूरी की बात करें तो ऐसा नहीं है कि मसूरी को विकास से दूर कर दिया जाए। आज नई तकनीक का समय है। जापान जैसे देश जो हमेशा भूकंप से प्रभावित रहा है, वहां नई तकनीक को अपना कर जापान ने पर्यावरण और निर्माण के बीच सामंजस्य बनाकर बहुत विकास किया है। मसूरी में भी ऐसा ही होना चाहिए। मसूरी में रोपवे की बहुत जरूरत भी है लेकिन इसके लिए नाॅम्स को पूरा करके रोपवे बनाए जा सकते हैं। पुरानी इमारतों की ऊंचाई तभी बढ़ाई जाए जब उसे पूरी तरह खत्म करके नया निर्माण हो लेकिन ज्यादातर देखा जा रहा है कि नियमों की अनदेखी हो रही है।
डाॅ. नरेश वरिष्ठ, वैज्ञानिक, वाडिया इंस्टीट्यूट देहरादून, भूकम्प विभाग