Uttarakhand

क्या मसूरी एक और बड़े प्रयोग के लिए तैयार है?

उत्तराखण्ड सरकार पर्यटन नगरी मसूरी के लिए मेट्रो रोपवे जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना लेकर आई है। दावा है कि इससे वर्षों पुरानी जाम की समस्या का स्थायी समाधान मिलेगा और आधुनिक परिवहन व्यवस्था विकसित होगी लेकिन चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना, जोशीमठ धंसाव, सिलक्यारा सुरंग हादसे और केदारनाथ आपदा के अनुभवों के बाद यह परियोजना एक बड़ा प्रश्न भी खड़ा करती है, क्या उत्तराखण्ड ने हिमालय की संवेदनशीलता को लेकर अपनी पिछली गलतियों से वास्तव में कोई सबक लिया है या इतिहास खुद को दोहराने की ओर बढ़ रहा है?

उत्तराखण्ड सरकार पर्यटन नगरी मसूरी को जाम से राहत दिलाने के लिए मेट्रो रोपवे परियोजना को तेजी से आगे बढ़ा रही है। सचिव आवास डाॅ. आर. राजेश कुमार ने स्वयं प्रस्तावित स्थलों का निरीक्षण किया है और अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि प्रत्येक स्टेशन का स्थान जियो-टेक्निकल अध्ययन के आधार पर तय किया जाए। सरकार का दावा है कि यह परियोजना मसूरी में यातायात व्यवस्था को आधुनिक बनाएगी, पर्यटन को नई गति देगी और पर्यावरण के अनुकूल सार्वजनिक परिवहन का विकल्प उपलब्ध कराएगी।

पहली नजर में यह एक स्वागत योग्य पहल प्रतीत होती है। मसूरी वर्षों से जाम, पार्किंग संकट और अनियंत्रित यातायात की समस्या से जूझ रहा है। गर्मियों और छुट्टियों के मौसम में कई-कई किलोमीटर लम्बा जाम अब यहां की पहचान बन चुका है। ऐसे में यदि रोपवे निजी वाहनों पर निर्भरता कम करता है तो निश्चित रूप से इसका लाभ स्थानीय लोगों और पर्यटकों दोनों को मिल सकता है।

उत्तराखण्ड के पिछले एक दशक का अनुभव हमें एक महत्वपूर्ण सावधानी बरतने के लिए मजबूर करता है। हिमालय में बनने वाली हर बड़ी परियोजना का मूल्यांकन केवल उसके आर्थिक लाभ, पर्यटन वृद्धि या यातायात सुधार के आधार पर नहीं किया जा सकता। असली प्रश्न यह है कि क्या जिस पहाड़ पर यह परियोजना बनने जा रही है, वह इस अतिरिक्त हस्तक्षेप को सहन करने की क्षमता रखता है?

यही वह प्रश्न है जिसे अक्सर विकास की चमक के बीच नजरअंदाज कर दिया जाता है। उत्तराखण्ड ने पिछले दस वर्षों में विकास की कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं देखी हैं। चारधाम आॅल वेदर रोड, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं, नए होटल, पहाड़ों की कटिंग और लगातार बढ़ता पर्यटन लेकिन इन्हीं वर्षों में उत्तराखण्ड ने जोशीमठ धंसाव भी देखा, सिलक्यारा सुरंग हादसा भी देखा और बार-बार होने वाले भूस्खलनों की भयावहता भी महसूस की। इसलिए मसूरी रोपवे पर चर्चा करते समय इन घटनाओं को भूल जाना एक गंभीर भूल होगी। सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि मसूरी का भूगोल सामान्य नहीं है।

हिमालय दुनिया के सबसे युवा पर्वतों में गिना जाता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे यंग फोल्ड माउंटेन कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि हिमालय अभी भी भूगर्भीय रूप से विकसित हो रहा है। भारतीय प्लेट आज भी यूरेशियन प्लेट से लगातार टकरा रही है, जिसके कारण हिमालय में निरंतर भूगर्भीय गतिविधियां होती रहती हैं। यही कारण है कि उत्तराखण्ड भूकंप के लिहाज से भी संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है और अधिकांश भाग भूकम्पीय जोन-4 तथा जोन-5 में आता है।

मसूरी इसी लैसर हिमालय (Lesser Himalaya) का हिस्सा है, जहां की चट्टानें अत्यधिक दबाव, दरारों और मौसम के प्रभाव से पहले ही कमजोर हो चुकी हैं। मानसून के दौरान यहां भूस्खलन सामान्य घटना है। कई स्थानों पर सड़कें हर वर्ष टूटती हैं और पहाड़ लगातार अपनी अस्थिरता का संकेत देते रहते हैं। यानी जिस पहाड़ को हम बाहर से मजबूत देखते हैं, वैज्ञानिक दृष्टि से वह लगातार बदल रहा होता है।

यही कारण है कि मसूरी के भूगर्भीय स्वरूप पर वर्षों से अध्ययन होते रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी देहरादून ने किया। वैज्ञानिकों ने मसूरी और उसके आस-पास लगभग 84 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का विस्तृत विश्लेषण किया। इस अध्ययन में उपग्रह चित्रों, भूगर्भीय सर्वेक्षण, ढलानों, वर्षा, मिट्टी, चट्टानों और पुराने भूस्खलनों का संयुक्त अध्ययन किया गया। अध्ययन के निष्कर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण थे।

रिपोर्ट में बताया गया कि अध्ययन क्षेत्र का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा ‘वेरी हाई लैंडस्लाइड ससेप्टिबिलिटी जोन’, अर्थात अत्यधिक भूस्खलन सम्भावित क्षेत्र में आता है। लगभग एक बड़ा हिस्सा मध्यम और उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में है। सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि जिन क्षेत्रों में मानव हस्तक्षेप सबसे अधिक हुआ है, वहीं भूस्खलन का जोखिम भी अधिक पाया गया। यह निष्कर्ष केवल एक वैज्ञानिक टिप्पणी नहीं है। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि संवेदनशील ढलानों पर नई परियोजनाएं विकसित की जाती हैं तो उनके प्रभाव का आकलन अत्यंत सावधानी से करना होगा। इसके अलावा अनेक शोध-पत्रों में मसूरी की चट्टानों की प्रकृति का अध्ययन किया गया है। वैज्ञानिकों ने पाया कि यहां की चट्टानों में बड़ी संख्या में प्राकृतिक दरारें (Fractures) मौजूद हैं। कई ढलानों का झुकाव 65 से 77 डिग्री तक है। ऐसी ढलानों पर यदि गहरी खुदाई, भारी नींव या बड़े पैमाने पर कटिंग की जाती है तो प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है।

सरकार कह रही है कि रोपवे हवा में चलेगा। यह बात सही है लेकिन रोपवे केवल हवा में नहीं बनता। उसके लिए प्रत्येक टावर की मजबूत नींव बनानी पड़ती है। प्रत्येक स्टेशन के लिए जमीन चाहिए। निर्माण सामग्री पहुंचाने के लिए अस्थायी सड़कें बनती हैं। ड्रिलिंग होती है, कंक्रीट डाला जाता है, भारी मशीनें चलती हैं और पहाड़ की चट्टानों में हस्तक्षेप किया जाता है। यानी असली सवाल रोपवे का नहीं बल्कि उसके निर्माण की प्रक्रिया का है। यदि प्रत्येक टावर के नीचे की चट्टानों का स्वतंत्र भू- तकनीकी परीक्षण नहीं होगा, यदि जल स्रोतों के प्रवाह का अध्ययन नहीं होगा, यदि ढलानों की स्थिरता का वैज्ञानिक मूल्यांकन नहीं होगा तो भविष्य में छोटे- छोटे हस्तक्षेप भी बड़े संकट का कारण बन सकते हैं।

सचिव आवास डाॅ. आर. राजेश कुमार द्वारा निरीक्षण के दौरान अधिकारियों को यह निर्देश देना कि जहां स्थान उपयुक्त नहीं है वहां वैकल्पिक स्थल तलाशे जाएं और जियो-टेक्निकल अध्ययन के आधार पर ही अंतिम निर्णय लिया जाए, निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है लेकिन उत्तराखण्ड का अनुभव यह भी बताता है कि अध्ययन करा लेना और अध्ययन के निष्कर्षों का ईमानदारी से पालन करना, दो अलग-अलग बातें हैं।

चारधाम परियोजना के दौरान भी अनेक वैज्ञानिक संस्थानों ने हिमालय की संवेदनशीलता को लेकर चिंता जताई थी। पेड़ों की कटाई, पहाड़ों की चौड़ी कटिंग, मलबे के निस्तारण और ढलानों की स्थिरता पर कई सवाल उठे थे। सर्वोच्च न्यायालय तक इस परियोजना पर विस्तृत सुनवाई हुई। विशेषज्ञ समितियों ने अपनी रिपोर्टें दीं लेकिन विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की बहस आज भी जारी है। मसूरी रोपवे के मामले में भी वही प्रश्न सामने खड़ा है कि क्या इस बार उत्तराखण्ड अपने पुराने अनुभवों से कुछ सीखेगा या फिर विकास की जल्दबाजी वैज्ञानिक चेतावनियों पर भारी पड़ेगी?

जोशीमठ भुलाए नहीं भूलता
यदि उत्तराखण्ड में किसी एक घटना ने विकास माॅडल पर सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाया है तो वह है
जोशीमठ का धंसाव। जनवरी 2023 में जब घरों की दीवारों में दरारें दिखाई देने लगीं, सड़कें फटने लगीं और सैकड़ों परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े, तब यह केवल एक स्थानीय संकट नहीं था। यह पूरे हिमालय के लिए एक चेतावनी थी कि प्रकृति की अपनी सीमाएं होती हैं और उन सीमाओं की अनदेखी का परिणाम कभी भी सामने आ सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जोशीमठ की त्रासदी अचानक नहीं आई थी। 1976 में एम.सी. मिश्रा समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा था कि जोशीमठ पुराने भूस्खलन (Old Landslide Debris) के मलबे पर बसा हुआ है। रिपोर्ट ने बड़े पैमाने पर निर्माण, विस्फोट, भारी यातायात और अनियंत्रित विकास को लेकर गम्भीर चेतावनी दी थी। बाद में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलाॅजी, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान और अनेक स्वतंत्र भूवैज्ञानिकों ने भी समय-समय पर ऐसे ही संकेत दिए लेकिन विकास की गति चेतावनियों से तेज निकली। सड़कें बनीं, होटल बने, सुरंग परियोजनाएं आगे बढ़ीं, आबादी बढ़ती गई और अंततः पूरा शहर भूगर्भीय अस्थिरता का प्रतीक बन गया। आज भी विशेषज्ञ इस बात पर अलग-अलग मत रखते हैं कि जोशीमठ धंसाव में कौन-सा कारण कितना जिम्मेदार था लेकिन लगभग सभी इस बात पर सहमत हैं कि अत्यधिक मानवीय हस्तक्षेप ने प्राकृतिक संवेदनशीलता को और बढ़ाया। यही कारण है कि मसूरी रोपवे पर चर्चा करते समय जोशीमठ का उल्लेख केवल भावनात्मक संदर्भ नहीं बल्कि वैज्ञानिक संदर्भ भी है।
सिल्क्यारा का सच
इसके बाद नवम्बर 2023 में सिलक्यारा सुरंग हादसे ने एक और सवाल खड़ा किया। चारधाम परियोजना के अंतर्गत बन रही सिलक्यारा-बड़कोट सुरंग का एक हिस्सा अचानक ढह गया और 41 मजदूर भीतर फंस गए। लगभग 17 दिनों तक पूरा देश राहत अभियान देखता रहा। अंततः सभी मजदूर सुरक्षित बाहर निकाल लिए गए लेकिन इस दुर्घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि हिमालय के भीतर इंजीनियरिंग कार्य करना किसी मैदान में निर्माण करने जैसा नहीं है।

विशेषज्ञों ने बाद में कहा कि हिमालय की चट्टानें एक समान नहीं होतीं। कुछ हिस्से बेहद मजबूत होते हैं तो कुछ हिस्से अत्यधिक दरार युक्त और कमजोर। कई बार कुछ मीटर की दूरी पर ही भूगर्भीय संरचना पूरी तरह बदल जाती है। यही कारण है कि यहां किसी भी परियोजना के लिए विस्तृत माइक्रो-लेवल जियो-टेक्निकल इन्वेस्टिगेशन आवश्यक माना जाता है।
मसूरी रोपवे में भले सुरंग नहीं बन रही हो लेकिन टावरों की नींव, स्टेशन भवन, एंकरिंग सिस्टम और निर्माण गतिविधियां उसी संवेदनशील भूगर्भीय क्षेत्र में होंगी। इसलिए यदि भूवैज्ञानिक परीक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह गया तो भविष्य में जोखिम पैदा हो सकता है।

केदारनाथ त्रासदी का दंश बाकी है
यदि हम 2013 की केदारनाथ आपदा को देखें तो वहां भी प्रकृति ने यही संदेश दिया था कि हिमालय की वहन क्षमता असीमित नहीं है। केदारनाथ त्रासदी का मुख्य कारण अत्यधिक वर्षा, ग्लेशियल झील का टूटना और अचानक आई बाढ़ थी लेकिन बाद के अनेक अध्ययनों में यह भी सामने आया कि नदी किनारे अनियोजित निर्माण, ढलानों पर अत्यधिक दबाव और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी ने नुकसान को कई गुना बढ़ाया। आपदा के बाद गठित विशेषज्ञ समितियों ने बार-बार कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास की योजना बनाते समय केवल इंजीनियरिंग नहीं बल्कि पारिस्थितिकी और आपदा विज्ञान को भी बराबर महत्व देना होगा। आज स्थिति पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण है क्योंकि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) हिमालय को तेजी से प्रभावित कर रहा है।

भारतीय मौसम विभाग और विभिन्न जलवायु अध्ययनों के अनुसार उत्तराखण्ड में अत्यधिक वर्षा (Extreme Rainfall Events) की घटनाएं बढ़ रही हैं। कम समय में बहुत अधिक बारिश होने से ढलानों पर अचानक दबाव बढ़ता है और भूस्खलन की सम्भावना कई गुना बढ़ जाती है। यदि पहाड़ पहले से ही कटिंग, निर्माण और भारी संरचनाओं के कारण कमजोर हो चुका हो तो खतरा और बढ़ जाता है। इसलिए मसूरी रोपवे के संदर्भ में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि यह पर्यावरण-अनुकूल परिवहन होगा। प्रश्न यह है कि क्या इसका पूरा जीवन चक्र (Life Cycle) पर्यावरण के अनुकूल होगा?

परियोजना के निर्माण के दौरान कितने पेड़ कटेंगे? कितनी चट्टानों की कटिंग होगी? कितनी ड्रिलिंग होगी? निर्माण सामग्री कहां से आएगी? मलबा कहां जाएगा? क्या जल स्रोत प्रभावित होंगे? क्या वन्यजीवों के आवागमन पर असर पड़ेगा? क्या निर्माण के बाद ढलानों की दीर्घकालिक निगरानी होगी? इन सभी प्रश्नों के उत्तर परियोजना की सफलता तय करेंगे।

क्या मसूरी झेल पाएगा रोपवे का दबाव
मसूरी की एक और गंभीर चुनौती उसकी कैरिंग कैपेसिटी (Carrying Capacity) है। कैरिंग कैपेसिटी का अर्थ है कि किसी शहर या क्षेत्र की वह अधिकतम क्षमता, जितना वह अपने प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाए बिना लोगों का भार सहन कर सकता है। मसूरी आज पहले से ही अपनी क्षमता से कहीं अधिक दबाव झेल रहा है। गर्मियों में पानी की कमी सामान्य बात हो जाती है। कई इलाकों में पेयजल संकट पैदा हो जाता है। सीवरेज प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। ठोस कचरे के निस्तारण की समस्या बढ़ जाती है। पार्किंग की कमी के कारण सड़कें स्थायी पार्किंग में बदल जाती हैं। ऐसे में यदि रोपवे हर घंटे हजारों अतिरिक्त पर्यटकों को शहर तक पहुंचाने लगे तो क्या मसूरी के पास उनके लिए आवश्यक आधारभूत सुविधाएं मौजूद होंगी? यदि उत्तर ‘नहीं’ है तो रोपवे ट्रैफिक कम कर सकता है लेकिन शहर पर कुल दबाव बढ़ा सकता है।

यूरोप के पर्वतीय शहरों में रोपवे इसलिए सफल हुए क्योंकि वहां रोपवे के साथ-साथ पर्यटकों की संख्या का प्रबंधन, निजी वाहनों पर नियंत्रण, पार्किंग नीति, जल प्रबंधन और पर्यावरणीय निगरानी भी लागू की गई। केवल परिवहन व्यवस्था बदलने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। इसलिए दुनिया भर में अब पर्वतीय विकास की नई अवधारणा सामने आई है, जिसे प्रकृति आधारित विकास (Nature-based Development) कहा जाता है। इसका अर्थ है कि विकास प्रकृति के अनुरूप हो, प्रकृति पर हावी होकर नहीं।

उत्तराखण्ड में अब तक विकास का माॅडल
अधिकतर पहाड़ को बदलने का रहा है। शायद समय आ गया है कि माॅडल बदलकर पहाड़ के अनुसार विकास का हो। यही मसूरी रोपवे परियोजना की सबसे बड़ी परीक्षा भी है। यदि सरकार वास्तव में इस परियोजना को भविष्य का माॅडल बनाना चाहती है तो उसे केवल इंजीनियरों की परियोजना नहीं रहने देना चाहिए। इसमें भूवैज्ञानिक, पर्यावरण वैज्ञानिक, जलवायु विशेषज्ञ, वन विशेषज्ञ, आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ और स्थानीय समुदाय, सभी की समान भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। अन्यथा उत्तराखण्ड का इतिहास बार-बार यही कहता है कि हिमालय चेतावनी पहले देता है और सबक बाद में।

विरोध विकास का नहीं, विकास के मॉडल का है
यह भी उतना ही सच है कि किसी भी विकास परियोजना का विरोध केवल इसलिए नहीं किया जा सकता कि वह पहाड़ पर बन रही है। उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्य में बेहतर परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन के लिए आधुनिक आधारभूत संरचना आवश्यक है। प्रश्न यह नहीं है कि रोपवे बनना चाहिए या नहीं बल्कि प्रश्न यह है कि रोपवे कैसे बने, कितना बने और किस वैज्ञानिक प्रक्रिया के साथ बने।

दुनिया के अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में रोपवे आज सार्वजनिक परिवहन का सफल माध्यम है। स्विट्जरलैंड के जरमैट, ऑस्ट्रिया के इंसब्रुक, फ्रांस के शैमाॅनिक्स और दक्षिण अमेरिका के मेडेलिन जैसे शहरों में रोपवे ने यातायात का दबाव कम किया है लेकिन इन उदाहरणों को केवल तकनीक के आधार पर नहीं देखा जा सकता। इन शहरों में पर्यावरणीय नियम अत्यंत कठोर हैं, निजी वाहनों पर नियंत्रण है, निर्माण की निरंतर निगरानी होती है और प्रत्येक परियोजना के साथ दीर्घकालिक पर्यावरणीय मूल्यांकन जुड़ा रहता है।

उत्तराखण्ड में चुनौती अलग है। यहां पहाड़ अपेक्षाकृत युवा और अधिक संवेदनशील हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का स्वरूप बदल चुका है। बादल फटना, अचानक अत्यधिक वर्षा और भूस्खलन अब अपवाद नहीं रहे। इसलिए यूरोप के मॉडल को बिना स्थानीय परिस्थितियों के अध्ययन के लागू करना उचित नहीं होगा। यदि मसूरी रोपवे को वास्तव में भविष्य की परियोजना बनाना है तो सरकार को कुछ बुनियादी प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर सार्वजनिक करने चाहिए। सबसे पहले, क्या पूरे रोपवे कॉरिडोर का स्वतंत्र भू-वैज्ञानिक (Independent Geological Audit) कराया जाएगा? केवल निर्माण एजेंसी की रिपोर्ट पर्याप्त नहीं मानी जानी चाहिए। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलाॅजी, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI), आईआईटी रुड़की और अन्य स्वतंत्र विशेषज्ञ संस्थानों की संयुक्त समीक्षा परियोजना को अधिक विश्वसनीय बनाएगी। दूसरा, क्या परियोजना की पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट पूरी तरह सार्वजनिक होगी? उत्तराखण्ड में अक्सर परियोजनाओं पर विवाद इसलिए भी बढ़ते हैं क्योंकि स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों को पूरी जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं होती। यदि रिपोर्ट सार्वजनिक होगी तो वैज्ञानिक समुदाय भी उसकी समीक्षा कर सकेगा और परियोजना पर भरोसा बढ़ेगा।

तीसरा, क्या मसूरी की कैरिंग कैपेसिटी का नया अध्ययन कराया गया है? यदि रोपवे के कारण प्रतिदिन हजारों अतिरिक्त पर्यटक पहुंचेंगे तो क्या शहर के जल स्रोत, सीवरेज नेटवर्क, पार्किंग, ठोस कचरा प्रबंधन और आपदा निकासी की व्यवस्था भी उसी अनुपात में विकसित की जाएगी? यदि नहीं तो जाम भले कम हो जाए लेकिन शहर पर समग्र दबाव बढ़ सकता है। चैथा, क्या निर्माण के बाद भी ढलानों की निरंतर निगरानी होगी? आज दुनिया में ऐसी तकनीक उपलब्ध है जो पहाड़ों की सूक्ष्म गतिविधियों को भी रिकाॅर्ड कर सकती है। सैटेलाइट आधारित प्दै।त् तकनीक, सेंसर आधारित स्लोप माॅनिटरिंग और भूजल प्रवाह की निगरानी से समय रहते खतरे की पहचान की जा सकती है। यदि उत्तराखण्ड सरकार इस परियोजना के साथ ऐसी आधुनिक निगरानी प्रणाली लागू करती है तो यह पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकती है।

मसूरी का सामाजिक पक्ष
मसूरी रोपवे का एक सामाजिक पक्ष भी है। मसूरी केवल पर्यटकों का शहर नहीं है। यह हजारों स्थानीय परिवारों का घर है। यहां छोटे व्यापारी, होटल कर्मचारी, टैक्सी चालक, घोड़ा संचालक, दुकानदार और स्थानीय समुदाय अपनी आजीविका पर्यटन से चलाते हैं। इसलिए किसी भी नई परिवहन व्यवस्था का प्रभाव उनके रोजगार पर भी पड़ेगा। परियोजना की योजना बनाते समय स्थानीय समुदाय की भागीदारी और उनकी आशंकाओं का समाधान उतना ही महत्वपूर्ण है जितना इंजीनियरिंग डिजाइन।
यहां यह भी स्वीकार करना होगा कि यदि रोपवे के कारण निजी वाहनों की संख्या वास्तव में कम होती है, कार्बन उत्सर्जन घटता है, सड़क पर दबाव कम होता है और पर्यावरणीय मानकों का कठोर पालन किया जाता है तो यह परियोजना सकारात्मक परिणाम भी दे सकती है लेकिन इसके लिए केवल रोपवे पर्याप्त नहीं होगा। शहर में निजी वाहनों के प्रवेश को नियंत्रित करना होगा, पार्किंग नीति बदलनी होगी, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना होगा और पर्यटकों की संख्या का वैज्ञानिक प्रबंधन करना होगा। उत्तराखण्ड के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न किसी एक परियोजना का नहीं बल्कि विकास माॅडल का है। क्या विकास का अर्थ केवल अधिक सड़कें, अधिक होटल, अधिक पर्यटक और अधिक निर्माण है? या विकास का अर्थ यह भी है कि पहाड़ की प्राकृतिक संरचना सुरक्षित रहे, जल स्रोत जीवित रहें, जंगल बचे रहें और आने वाली पीढ़ियां भी उसी हिमालय को देख सकें जिसे आज हम देख रहे हैं?

जोशीमठ ने बताया कि वैज्ञानिक चेतावनियों की अनदेखी कितनी महंगी पड़ सकती है। सिलक्यारा ने बताया कि हिमालय के भीतर काम करना केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं बल्कि भूविज्ञान की गहरी समझ का प्रश्न है। केदारनाथ ने सिखाया कि जब प्रकृति और मानवीय लापरवाही एक साथ आती हैं तो विनाश कई गुना बढ़ जाता है और मसूरी आज उसी चैराहे पर खड़ा है।

रोपवे बने या न बने, यह निर्णय सरकार और सम्बंधित संस्थाओं को करना है लेकिन यदि यह परियोजना आगे बढ़ती है तो उसकी सफलता का पैमाना उद्घाटन समारोह, फीता काटने या पर्यटन के शुरुआती आंकड़े नहीं होंगे। उसकी वास्तविक सफलता इस बात से मापी जाएगी कि दस, बीस और तीस वर्ष बाद भी क्या मसूरी की पहाड़ियां स्थिर हैं? क्या वहां के जल स्रोत सुरक्षित हैं? क्या भूस्खलन नहीं बढ़े? क्या स्थानीय समुदाय को लाभ हुआ? क्या विकास ने प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखा?
हिमालय कभी विकास का विरोध नहीं करता। वह केवल अपनी सीमाओं का सम्मान चाहता है। उत्तराखण्ड ने पिछले एक दशक में कई बार प्रकृति की चेतावनी सुनी है। अब यह सरकारों, योजनाकारों और समाज पर निर्भर करता है कि वे उन चेतावनियों को भविष्य की नीति बनाते हैं या अगली आपदा का इंतजार करते हैं।
मसूरी मेट्रो रोपवे परियोजना इसलिए केवल एक परिवहन परियोजना नहीं है, यह उत्तराखण्ड के विकास दर्शन की भी परीक्षा है। यदि इस बार विज्ञान, पर्यावरण और स्थानीय समुदाय को केंद्र में रखकर निर्णय लिया गया तो यह देश के लिए एक आदर्श मॉडल बन सकती है लेकिन यदि विकास की वही पुरानी जल्दबाजी दोहराई गई तो इतिहास यह बताता है कि हिमालय अपनी कीमत अवश्य वसूलता है।

बात अपनी-अपनी

मसूरी पर्वतों की रानी कही जाती है। यह दून घाटी क्षेत्र में आता है। इसको बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार खनन को लेकर पीआईएल का स्वरूप दिया था। पहले यहां लाईम स्टोन का खनन होता था तब इसको सुप्रीम कोर्ट ने बंद करवाया क्योंकि इससे मसूरी और उसके आस-पास के दून घाटी क्षेत्र का पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा था। इस संतुलन को हमारी भारतीय सेना के इको फोर्स ने मसूरी में जंगल उगाकर इसे हरा-भरा किया लेकिन राज्य गठन के बाद विशेषकर 20 सालों में जो यहां अंधाधुंध, नियम विरुद्ध, अवैध बड़े-बड़े निर्माण कार्य हुए हैं, जगलों को बगैर फाॅरेस्ट एनओसी, बगैर फाॅरेस्ट क्लीयरेंस के लिंक रोड काट दी गई उससे मसूरी और समूची दून घाटी का पर्यावरण खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। पूरा सिस्टम ही कोलैप्स हो चुका है। आज उत्तराखण्ड भूकम्प के जोन 5 में है और मसूरी भी भूकम्प डेंजर जोन में है लेकिन इसको नजरअंदाज करके बड़े-बड़े निर्माण कार्य हो रहे हैं। मसूरी की धारण क्षमता तो वैसे ही बहुत कम है अगर इसको देखे बगैर हजारों लोगों को यहां पंहुचने दिया जाएगा तो मसूरी बचेगी कैसे? अब रोपवे की बात करें तो पुरूकुल मसूरी रोपवे बन रहा है। हमारी चिंता इसकी सुरक्षा को लेकर है। हमने इस बात को शासन में उठाया तो अब इसकी सुरक्षा ऑडिट के आदेश हो गए हैं और जो अनियोजित तरीके से जंगलों का कटान करके सड़कें बनाई गई, चारागाह की भूमि पर प्लाॅटिंग हो रही है उसकी भी जांच के आदेश हो गए हैं।
रविंद्र जुगराण, पूर्व राज्य मंत्री और वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी

मसूरी केवल एक पर्यटन स्थल ही नहीं, यह हिमालय की संवेदनशील परिस्थिति का हिस्सा है। विकास उसकी वहन क्षमता के अनुरूप होना चाहिए। अनियंत्रित पर्यटन वर्तमान और भविष्य के लिए खतरा है। अंधाधुंध निर्माण पर रोक जरूरी है। जल, जंगल और पहाड़ों की रक्षा करनी होगी। स्थानीय लोगांे की जीवन गुणवत्ता सर्वोच्च होनी चाहिए। वैज्ञानिक नियोजन ही आगे का रास्ता है। प्रकृति और विकास साथ-साथ चलने चाहिए। यही मसूरी के भविष्य का एकमात्र सही रोडमैप है।
अनूप नौटियाल, अध्यक्ष, एसडीसी फाउंडेशन, देहरादून

हर जगह की धारणीय क्षमता यानी केयरिंग कैपेसिटी होती है। यह केवल मसूरी की ही नहीं है, समूचे उत्तराखण्ड के प्रमुख पहाड़ी क्षेत्रों, नगरों और खासतौर पर पर्यटक नगरों की बड़ी समस्या हो गई है। केदारनाथ पर इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पड़ रहा है। सैकड़ों हेलिकॉप्टरों की उड़ानों से इसका इम्पैक्ट भूगर्भीय हलचलों के साथ-साथ पर्यावरण और इको सिस्टम पर पड़ चुका है। केदारनाथ में अब रोपवे बनाया जा रहा है, मसूरी में रोपवे बना रहे हैं इसका इम्पैक्ट दोनों ही जगह समान पड़ना तय है जबकि दोनों ही जगहों के केयरिंग कैपेसिटी का मामला है, इसे कंसीडर किया जाना चाहिए। इन रोपवे से कितने लोग अतिरिक्त मसूरी पहुंचेंगे और उनके पहुंचने से वहां के संसाधनों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, जब तक इसका सही तरीके से अध्ययन नहीं किया जाएगा तब तक कोई फायदा नहीं होगा बल्कि इसका बैड इम्पैक्ट ही होगा। इसका एक ही समाधान है कि सड़कों को सुधारा जाए और इसके लिए ठोस व्यवस्था अपनाई जाए। सबसे पहले निजी वाहनों पर रोक लगाई जाए और सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा दिया जाए। ऐसा ही केदारनाथ या चारधाम यात्रा में भी करना चाहिए। देहरादून से मसूरी के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट से हीपर्यटकों को भेजा जाए। मसूरी हो या अन्य जगहों पर आज हैवी कंस्ट्रशन बढ़े हैं। डी फाॅरेस्ट का सवाल भी इसमें आता है। ऑललरेडी पहले ही बहुत डी फाॅरेस्टेशन हो चुका है। अब आप रोपवे के लिए इतने भारी और बड़े पोल लगाएंगे तो इसका इम्पैक्ट हर चीज पर पड़ेगा। पहले ही हमारे पहाड़ भूस्खन और भूकम्प से प्रभावित रहे हैं। हम आज भूकम्प के जोन-5 में आ चुके हैं अब इसकी जियोलाॅजी भी देखने की सबसे ज्यादा जरूरत है। रोपवे इसका कोई बेहतर हल नहीं है।
प्रो. एस.पी. सती, भरसार विश्वविद्यालय पर्यावरण विभाग

देखिए, बात सिर्फ मसूरी की नहीं रह गई है। वाडिया इंस्टीटयूट ने मसूरी और इसके आस-पास के क्षेत्र में भूस्खलन का अध्ययन किया था जिसमें आबादी क्षेत्र में सबसे ज्यादा भूस्खलन होने की आशंका जताई थी लेकिन यह अध्ययन हमारे यहां भूस्खलन विभाग द्वारा किया गया था। मैं भूकम्प विभाग से हूं और मैं यह कह सकता हूं कि पूरा उत्तराखण्ड भूकंप जोन-4 और जोन-5 में है लेकिन प्रदेश में निर्माण कार्य, विकास कार्य होने ही हैं, बगैर इसके तो काम नहीं चलेगा। इसके लिए पहले से नाॅम्स बने हुए हैं। सरकारी निर्माण तो सभी नाॅम्स को पूरा करके ही बनाए जाते हैं लेकिन निजी निर्माण में इसकी अनदेखी होती रही है। अब सवाल यह है कि क्या हम भूकम्प और भूस्खन के डर से विकास को छोड़ सकते हैं? जवाब है नहीं छोड़ सकते। हमें विकास चाहिए लेकिन इसके लिए हमें सबसे ज्यादा अवेरनेस और सतर्कता बरतने की जरूरत है। सबसे पहले क्षेत्रों की केयरिंग कैपेसिटी को देखना होगा और फिर भूगर्भीय स्थिति को देखकर हमें कैटेगेराईज करने की जरूरत है। धराली की आपदा हम सबने देखी है, जोशीमठ की बड़ी आपदा भी देख चुके हैं। इसका एक ही समाधान है कि हम जगहों को कैटेगैरी में शामिल करें और नई तकनीक से निर्माण करें। आपने देखा होगा कि वेनेजुएला में भूकम्प आया लेकिन जो इमारते भूकम्प रोधी तकनीक से बनी थी उनको कुछ नहीं हुआ। जो नई इमारतें या पुरानी इमारतें थी जिसमें भूकंपरोधी तकनीक का प्रयोग नहीं किया गया वह सभी खत्म हो गई। अब मसूरी की बात करें तो ऐसा नहीं है कि मसूरी को विकास से दूर कर दिया जाए। आज नई तकनीक का समय है। जापान जैसे देश जो हमेशा भूकंप से प्रभावित रहा है, वहां नई तकनीक को अपना कर जापान ने पर्यावरण और निर्माण के बीच सामंजस्य बनाकर बहुत विकास किया है। मसूरी में भी ऐसा ही होना चाहिए। मसूरी में रोपवे की बहुत जरूरत भी है लेकिन इसके लिए नाॅम्स को पूरा करके रोपवे बनाए जा सकते हैं। पुरानी इमारतों की ऊंचाई तभी बढ़ाई जाए जब उसे पूरी तरह खत्म करके नया निर्माण हो लेकिन ज्यादातर देखा जा रहा है कि नियमों की अनदेखी हो रही है।
डाॅ. नरेश वरिष्ठ, वैज्ञानिक, वाडिया इंस्टीट्यूट देहरादून, भूकम्प विभाग

You may also like