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दोस्ती के नाम पर बांटे फ्री में हेलमेट 

रिश्तों में दोस्ती का रिश्ता सबसे ऊपर होता है | चाहे वह माता-पिता के साथ हो, भाई-बहन के साथ हो या फिर पति-पत्नी में दोस्ती का रिश्ता |  सभी में विश्वास जिससे की हर तरह की बात की जाए, दुःख-दर्द बांटा जाए |  ऐसे ही एक रिश्ते की चर्चा आजकल हो रही है बिहार के कैमूर जिले के एक छोटे से गांव बगाढ़ी के रहने वाले राघवेंद्र कुमार ने अब तक देशभर में 48 हजार से ज्यादा हेलमेट फ्री में बांट चुके हैं। ऐसा उन्होंने अपने एक दोस्त को बाइक हादसे में खो देने के बाद किया है | जी हाँ आज हम आपको बताने जा रहे हैं रियल लाइफ इंडियन सुपरहीरो ‘हेलमेट मैन’ के बारे में।
राघवेंद्र कुमार कैमूर जिले के गांव बगाढ़ी के रहने वाले हैं उनके पिता किसान है खेती कम होने के कारण अपना परिवार बड़ी मुश्किल मैं चला पा रहे हैं  राघवेंद्र अपने 4 भाईयों में सबसे छोटे हैं । राघवेंद्र का कहते हैं की  परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी। फिर भी मेरे माता पिता ने स्कूल
भेजा, लेकिन 12वीं की पढ़ाई के बाद मेरी मुश्किलें बढ़ गईं। परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि आगे की पढ़ाई का खर्च उठा सकें। ऐसे में मैंने
वाराणसी जाने का निर्णय लिया। यहां 5 सालों तक मैंने कई छोटे-मोटी नौकरियां की और पढ़ाई के लिए पैसा जुटाया।’और आगे की पढ़ाई शुरू की वर्ष ‘2009 में जब मैं लॉ की पढ़ाई करने दिल्ली गया, तो वहां मेरे कुछ दोस्त बने। इनमें से एक था कृष्ण कुमार ठाकुर। कृष्ण इंजीनियरिंग कर रहा था। हम लोगों के डिपार्टमेंट अलग थे, लेकिन हॉस्टल में हम साथ रहते थे।
वर्ष  2014 में जब वह ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस-वे पर बिना हेलमेट के बाइकचला रहा था, तो एक एक्सीडेंट में सिर में चोट लगने से उसकी मौत हो गई। अस्पताल में कृष्ण की मौत के बाद जब डॉक्टरों से मेरी बात हुई, तोउन्होंने कहा कि अगर तुम्हारे दोस्त ने हेलमेट पहना होता, तो शायद वह बच जाता। इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद मैंने तय किया कि अब अपने दोस्त की तरह किसी और को मरने नहीं देंगे। उनका मकसद है कि उनके दोस्त की तरह किसी और की मौत हेलमेट न होने की वजह से ना हो। इसके बाद मैंने एक सड़क सुरक्षा अभियान की शुरुआत की, जिसके तहत मैं किसी भी चौराहे पर खड़े होकर दोपहिया वाहन चालकों को नि:शुल्क हेलमेट बांटता था।’
राघवेंद्र बताते हैं, ‘ये सफर इतना आसान नहीं था। अपने मिशन के लिए पहले उन्हें अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। कुछ समय बाद जब हेलमेट खरीदने के लिए ज्यादा पैसों की जरूरत पड़ी तो उन्‍होंने पहले अपनी वाइफ की ज्वैलरी और फिर अपना घर तक बेच दिया।’

राघवेंद्र आगे बताते हैं ‘एक बार वह अपने दोस्त कृष्ण के माता-पिता से मिलने के लिए उसके घर गये , वहा से उन्होंने कुछ किताबे देखि जिससे वह
अपने साथ ले आये थे । उन  किताबें को उन्होंने एक जरूरतमंद बच्चे को दे दी थी । वर्ष 2017 में मुझे एक कॉल आया, ये कॉल उस बच्चे की मां का था ,
जिसे मैंने किताबें दी थीं। उन्होंने बताया कि आपके द्वारा दि गयी किताबों की मदद से उनका बेटा न सिर्फ ठीक से पढ़ सका, बल्कि उसने स्कूल
में टॉप भी किया है। उस बच्चे की मां की बातें सुनकर मेरे दिल को बहुत सुकून मिला।’

इस घटना ने मेरे मन में एक और विचार को जन्म दे दिया यदि जरूरतमंद बच्चे को समय पर किताबें मिलती रहें तो बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
इसके बाद माने एक संकल्प लिया की अब वह मुफ्त मैं  किसी को हेलमेट नहीं देंगे ,बल्कि किताबों के बदले देंगे। इस तरह एक नए मिशन को अपने साथ जोड़ लिया

राघवेंद्र बताते हैं, ‘जो भी मुझे पुरानी किताबें लाकर देता है, मैं उसे ही हेलमेट देता हूं। फिर इन किताबों को हम जरूरतमंद बच्चों में बांट देते
हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि अब मेरी इस मुहिम से स्कूल-कॉलेज के छात्र भी जुड़ने लगे हैं। इसके अलावा हमने करीब 40 से ज्यादा शहरों में ‘बुक
डोनेशन बॉक्स’ भी लगाए हैं। जो कोई भी इन शहरों में उनकी मदद करना चाहता है, इन बॉक्स में किताबें डाल जाता है।’ आज उनके साथ अलग-अलग जगहों के 200 से भी ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं और इस मुहिम में उनका साथ दे रहे हैं। इसके जरिए वो अब तक 6 लाख बच्चों तक नि:शुल्क किताबें पहुंचा चुके हैं।

अब अपनी मुहिम को एक कदम आगे बढ़ाते हुए राघवेंद्र ने स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी  के साथ मिलकर,हेलमेट के साथ 5 लाख रुपए का फ्री दुर्घटना बीमा भी देना शुरू किया है। इस अच्छे कार्य के  लिए केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी भी उनकी तारीफ कर चुके हैं। वहीं राघवेंद्र के इस निस्वार्थ काम से प्रभावित होकर बिहार सरकार ने उन्हें सम्मानित किया है और ‘हेलमेट मैन’ का टाइटल दिया है।

राघवेंद्र का कहना हैं कि चाहे 50 मीटर जा रहे हों या 50 किलोमीटर, हेलमेट पहनकर ही बाइक चलाएं। एक्सीडेंट कभी किसी को बोलकर नहीं आता है। मेरी गाड़ी के पीछे भी संदेश लिखा है- यमराज ने भेजा है बचाने के लिए, ऊपर जगह नहीं है जाने के लिए।’

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