उत्तराखण्ड के राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी की एक याचिका पर नैनीताल हाईकोर्ट का फैसला भाजपा के लिए देशभर में मुश्किल खड़ी कर सकता है। बलूनी की याचिका पर हाईकोर्ट ने कॉर्बेट पार्क से वन गुर्जरों के 78 परिवारों को बेदखल करने और उन्हें कोई मुआवजा न देने के आदेश दिए हैं। वन गुर्जर आक्रोशित हैं कि बलूनी को आगे कर भाजपा ने उनके खिलाफ एक साजिश के तहत अदालत में याचिका दाखिल कर कहा है कि वन गुर्जर पार्क में अतिक्रमण कर रहे हैं, जबकि वन गुर्जरों और जंगलों के बीच पीढ़ियों से परस्पर सहजीवन का रिश्ता है। गुर्जर मानते हैं कि राज्य की भाजपा सरकार न्यायपालिका की आड़ में उन्हें दर-बदर करना चाहती है। लिहाजा अब वे देश भर के गुर्जर समाज को अपने पक्ष में लामबंद कर भाजपा के खिलाफ आंदोलन के मूड में हैं
पिछले पांच वर्षों में राजा जी नेशनल पार्क और कार्बेट नेशनल पार्क में कुल 186 अपराधिक घटनाएं हुई हैं। इन सभी घटनाओं में से सिर्फ एक मामले में ही एक वन गुर्जर से माल जब्ती दिखायी गई। जबकि चार लोग वन्य जीव अधिनियम के खिलाफ कार्य करते हुए पकड़े गए। ये लोग किसी के द्वारा दिए गए सामान को नियत स्थान पर पहुंचा रहे थे। तभी इन्हें पकड़ लिया गया। इन लोगों को यह तक पता नहीं था कि जिस सामान को वे ले जा रहे हैं वह क्या है। इस आधार पर पूरे वन गुर्जर समाज को अपराधी घोषित करके उन्हें वनों से बेदखल करने की साजिश रची जा रही है। यह साजिश कोई और नहीं, बल्कि प्रदेश की भाजपा सरकार और राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी कर रहे हैं। बलूनी की नैनीताल हाईकोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायालय ने वन गुर्जरों के खिलाफ फैसला सुनाया है। उसमें वन गुर्जरों को पार्टी तक नहीं बनाया जाना सिद्ध कर रहा है कि राज्य और केंद्र सरकार मिलकर जंगल के वाशिंदों के साथ साजिश रच रही है। हमें अतिक्रमणकारी घोषित करते समय यह भी नहीं देखा गया कि हमारी तीन चार पीढ़ियां इन्हीं जंगलों में रहकर अपना परिवार पाल चुकी हैं। हम जंगलों और जानवरों के लिए रक्षक की भूमिका में वनों में रहते आए हैं। जिस दिन हम जंगलों से निकल गए उस दिन शिकारी जंगली जानवरों का भक्षण करने लगेंगे। आज अगर जंगलों में जानवरों की सुरक्षा हो रही है तो हमारे कारण। वह हम ही हैं जो किसी भी व्यक्ति की अवैध गतिविधियों पर तुरंत वन विभाग के अधिकारियों को सूचित करते हैं। दशकों से जंगलों में रक्षक की भूमिका में अपना फर्ज निभा रहे वन गुर्जरों को भक्षक बनाकर बलि का बकरा बनाना ठीक नहीं है। यह भाजपा की ओछी राजनीति है।
यह कहना है कि वन गुर्जुरों के नेता शमशेर भड़ाना का। भड़ाना कार्बेट पार्क में रह रहे 78 परिवारों को गत दिनों नैनीताल हाईकोर्ट के समक्ष अनिल बलूनी द्वारा अपनी याचिका में अतिक्रमणकारी बताए जाने से दुखी हैं। वन गुर्जरों को अतिक्रमणकारी बताने से ही हाईकोर्ट ने उन्हें कार्बेट पार्क से बेदखल करने और पुनर्वास के लिए कोई भी मुआवजा न देने के आदेश दिए हैं। भड़ाना का आक्रोश इस बात को लेकर भी है कि एक तरफ तो राज्य सरकार वनमंत्री के नेतृत्व में मीटिंग कराकर वन गुर्जरों के लिए योजना बनाने की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ हाईकोर्ट में वन गुर्जरों को अतिक्रमणकारी बताती है। अगर वन गुर्जर अतिक्रमणकारी हैं तो पूर्व की सरकारों ने उन्हें दो-दो एकड़ जमीन क्यों दी? क्यों उनके लिए 10-10 लाख रुपये दिए? क्यों उन्हें मकान बनाकर दिए गए। वन गुर्जरों में सरकार के प्रति रोष गहराता जा रहा है। अब वह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के गुर्जरों को भी भाजपा सरकार द्वारा किए जा रहे अन्याय के खिलाफ एकजुट कर रहे हैं। वन गुर्जरों के नेता शमशेर भड़ाना दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव के गुर्जरों के साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा एवं राजस्थान के गुर्जरों को भी अपनी लड़ाई में लामबंद कर रहे हैं। हालांकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के गुर्जर हिंदू हैं, जबकि उत्तराखण्ड के वन गुर्जर मुस्लिम हैं जो हिन्दुओं से ही परिवर्तित बताए जाते हैं।
मेरी यह पीआईएल बहुत पहले की है। पीआईएल दाखिल करने का मेरा मकसद यह था कि नेशनल पार्क सिर्फ जानवरों के रहने के लिए हैं। इनमें कोई भी मानवीय गतिविधियां नहीं होनी चाहिए, तभी जानवर पूरी तरह सुरक्षित रह सकते हैं। इस पर कोर्ट का फैसला सर्वमान्य होना चाहिए।
अनिल बलूनी, राज्यसभा सांसद
वन गुर्जरों के बारे में न्यायालय में राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी द्वारा दायर की गई याचिका के पैरा संख्या-5बी में कहा गया है कि वन गुर्जर 100 वर्ष पूर्व जम्मू-कश्मीर से तराई भाबर में आए थे। लेकिन वे भूल गए कि वनाधिकार कानून 2006 देश के वनों में तीन पीढ़ियों से रहने वाले वनवासियों को 4 हेक्टेयर भूमि पर मालिकाना हक तथा आस-पास की वन उपज पर सामूहिक मालिकाना हक का अधिकार देता है। ऐसे में न्यायालय में वन गुर्जरों को अतिक्रमणकारी बताना देश के स्थापित कानूनों का उल्लंघन है।
भाजपा दलित, पिछड़े आदिवासी और अल्पसंख्यक के हमेशा खिलाफ रही है। केवल वन गुर्जरों को ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के गुर्जरों को भी विमुक्ति जाति का दर्जा दिया गया था। इसके तहत सहारनपुर, मुजफ्फरनगर सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में गुर्जरों को 2 प्रतिशत आरक्षण मिलता था। लेकिन राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते ही यह आरक्षण खत्म कर दिया। भाजपा आदिवासियों-अल्पसंख्यकों के खिलाफ ऐसे ही साजिश रचती रहती है।
राजकुमार भाटी, प्रवक्ता समाजवादी पार्टी
याचिकाकर्ता और भाजपा के राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी ने अपनी याचिका में वन गुर्जरों को वनों एवं वन्य जीवों के लिए घातक बताया है। इसके लिए उन्होंने वन गुर्जरों के खिलाफ दर्ज चार मुकदमों का जिक्र भी किया है। उन्होंने अपनी याचिका के पैरा संख्या-4सी में कहा है कि राजाजी नेशनल पार्क एवं कार्बेट पार्क के बाहरी और भीतरी क्षेत्र में कुल मिलाकर एक हजार से भी अधिक वन गुर्जर परिवार रहते हैं जो अपराध में संलिप्त हैं, जबकि वन गुर्जरों पर अभी तक अपराध के सिर्फ चार मामले दर्ज कराए गए हैं। मात्र चार मामलों को उठाकर समूचे वन गुर्जर समुदाय को अपराधी एवं अतिक्रमणकारी बता देना न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। इससे पूर्व भी 19 सितंबर 2016 को नैनीताल हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि वन भूमि पर बसे गुर्जरों को सरकार वनों के भीतर से एक वर्ष की समय सीमा में बाहर करे। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के इस आदेश पर देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। इस रोक के बावजूद उच्च न्यायालय द्वारा पुनः वन गुर्जरों को हटाने की बात कहना कानून के जानकारों की समझ से परे है। हालांकि भाजपा सांसद अनिल बलूनी ने ग्राम सुंदर खाल के निवासियों को भी अतिक्रमणकारी एवं मानव-वन्य जीव संघर्ष के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें हटाए जाने के लिए प्रार्थना की है। अपने अंतरिम आदेशों में सुंदर खाल के 1800 निवासियों को हटाने को लेकर न्यायालय ने कोई बात नहीं की है। लेकिन याचिका का हिस्सा होने के कारण देर सबेर सुंदर खाल को लेकर भी न्यायालय कोई फैसला अवश्य सुनाएगा। सुंदर खाल के निवासी भी न्यायालय के रुख से सहमे हुए हैं।
सर्व विदित है कि वर्ष 1979 में अविभाजित उत्तर प्रदेश के वन पंचायत मंत्री तेज सिंह भाटी के प्रयासों से वन गुर्जरों के लिए एक महत्वपूर्ण योजना बनी थी। जिसको तत्कालीन आईएफएस सीएल भसीन ने अमली जामा पहनाया था। इस योजना का नाम ‘वन गुर्जर पुनर्वास योजना’ था। इस योजना के तहत वन गुर्जरों को पुनर्वासित करने के लिए 24 कॉलोनियां स्वीकृत की गई। इन कॉलोनियों में वन गुर्जरों को जंगलों से बाहर निकालकर बसाना था। बाद में जब उत्तराखण्ड बना तो दो कॉलोनियां इस प्रदेश में दर्ज हो गई। दो कॉलोनियां हरिद्वार में हैं। हरिद्वार में गुर्जर बस्ती गैंडी खाता और गुर्जर बस्ती पथरी है। इन कॉलोनियों में कुल 1390 परिवरों को बसाया गया था। इसके बाद 250 और परिवारों को यहां बसाया गया। तब गुर्जर बस्ती गैंडी खाता और गुर्जर बस्ती पथरी में सरकार ने प्रत्येक वन गुर्जर परिवार को दो-दो एकड़ जमीन खेतीबाड़ी करने के लिए दी थी, जबकि 500 वर्ग गज जमीन मकान बनाने के लिए दी गई। यही नहीं, बल्कि गुर्जर बस्ती पथरी में 512 मकान भी वनगुर्जरों को बनाकर दिए गए हैं। भाजपा सांसद अनिल बलूनी की वनगुर्जरों पर दायर याचिका की जब सुनवाई हो रही थी तो न्यायालय ने अतिक्रमणकारी पर पूरा ध्यान केंद्रित कर दिया। नैनीताल हाईकोर्ट ने वनविभाग के अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि एक तरफ तो इन्हें याचिकाकर्ता अतिक्रमणकारी मान रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ आप इनके विस्थापन की बात भी कर रहे हैं और मुआवजे के तौर पर दो-दो एकड़ जमीन या 10-10 लाख रुपया देने की बात भी कर रहे हैं। यह कैसे संभव है? अगर वन गुर्जर अतिक्रमणकारी हैं, तो उन्हें बतौर मुआवजा दो-दो एकड़ जमीन और 10-10 लाख रुपये क्यों? कॉर्बेट पार्क में रह रहे आलम के अनुसार यह सरकार की सोची-समझी साजिश है। वन गुर्जर क्योंकि मुस्लिम हैं इसलिए हमारे साथ भाजपा सरकार ने ऐसा सुनियोजित षड्यंत्र किया है। साथ ही वह यह भी दावा करते हैं कि पिछले 70 सालों से वह कार्बेट पार्क और राजा जी नेशनल पार्क में रह रहे हैं। वह कहते हैं जंगलों में हमारा पुश्तैनी रहना है। यहीं रहकर हम अपने पशु पालते हैं और उनका दूध बेचकर जीवोकोपार्जन करते हैं।
हालांकि अभी भी राजा जी नेशनल पार्क और कॉर्बेट पार्क के करीब 700-800 लोग ऐसे हैं जो धक्के खा रहे हैं। यह लोग न घर के रहे और न घाट के। पार्क प्रशासन इन्हें जंगल में नहीं बसने दे रहा है। ये लोग सरकार से कई वर्षों से मांग कर रहे हैं कि वन गुर्जरों को पूर्व में पुनर्वास योजना के तहत जो सुविधाएं दी गई वह इन्हें भी दी जाएं।
कार्बेट पार्क में फिलहाल 78 वन गुर्जर परिवार निवास कर रहे हैं। जिनके पुनर्वास की सरकार के पास योजना थी। गत वर्ष जब भाजपा सांसद अनिल बलूनी की वन गुर्जरों वाली याचिका पर सुनवाई हो रही थी तो सरकार की तरफ से कहा गया कि वन गुर्जरों को विस्थापित करने के लिए दो-दो एकड़ जमीन या 10-10 लाख रुपए की व्यवस्था की जा रही है।
वन गुर्जरों का वनों से गहरा रिश्ता
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता रविंद्र गडिया के अनुसार भाजपा सांसद अनिल बलूनी को सोचना चाहिए था कि वनवासी अधिकार कानून के जरिए लंबे संघर्ष के बाद वनवासियों और वनों के सहजीवन सहस्त्वि और परस्पर निर्भरता को मान्यता मिली। मगर वनगुर्जरों का वनों के साथ पारस्पिरिक रिश्ता है। इस रिश्ते से नजरअंदाज कर वन गुर्जरों को अतिक्रमणकारी कह देने से अधिक क्रूरता कोई और नहीं है। बलूनी को समझना चाहिए था कि पूर्व में उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड की सरकारें इन वन गुर्जरों के पुनर्वास की जरूरत को रेखांकित कर चुकी हैं। ऐसे में न्यायालय में वन गुर्जरों को अतिक्रमणकारी अपराधी कह सरकार प्रशासन पर उन्हें तुरंत खदेड़ने का दबाव बनाता दिखता है, तो यह निश्चित ही चिंता का विषय है। यह वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान की मुस्लिम विरोधी मुहिम जैसी प्रक्रिया प्रतीत होती है। बलूनी को न्यायालय में जाने से पहले देखना और अध्ययन करना चाहिए था कि वन गुर्जरों का वनों से क्या रिश्ता रहा और पूर्व में उनका किस तरह पुनर्वास किया गया।

बात अपनी-अपनी
जब अनिल बलूनी ने याचिका दायर की थी तब कांग्रेस की सरकार थी। उस समय उन्हें अंदेशा नहीं था कि कोर्ट का फैसला जब आएगा तब उनकी सरकार होगी। आज केंद्र और राज्य में उनकी ही सरकार है। ऐसे में वन गुर्जरों को जंगलों से बेदखल करने के साथ ही सुंदर खाल के लोगों को भी बेघर किया जाएगा। इनके लिए कोई पुनर्वास की योजना सरकार नहीं बना रही है।
आशा बिष्ट, सदस्य उत्तराखण्ड मानवाधिकार आयोग
ऐसा लगता है कि भाजपा सरकार अपना एजेंडा न्याय पालिका के माध्यम से आगे बढ़ा रही है। वन एवं पर्यावरण की सुरक्षा के नाम पर जनता के हक हकूक को ताक पर रख दिया गया है। सुनवाई करने वाली पीठ फैसले सुनाते वक्त शायद यह भूल गई है कि उत्तराखण्ड में वन्य जीवों, जंगलों, पहाड़ एवं नदियों के साथ-साथ इंसान भी रहते हैं। इंसानियत को खदेड़ कर पर्यावरण बचने वाला नहीं है।
मुनीष कुमार, समाजसेवी