गजेंद्र कुमार पाठक
लेखक जंगल बचाओ – जीवन बचाओ
अभियान के संयोजक हैं।
समाज का बहुसंख्यक वर्ग जंगलों में हर साल गर्मियों में होने वाली वनाग्नि दुर्घटनाओं को सहज रूप से ले रहा है जैसे कि ये घटनाएं किसी और ग्रह में हो रही हैं,या फिर आग लगने से उसको कोई परेशानी या समस्या नहीं हो रही है। जबकि हकीकत यह है कि जंगलों में लग रही आग से सबसे ज्यादा परेशानी आम आदमी के लिए पैदा हो रही है। आग लगने से सबसे ज्यादा नुकसान जैवविविधता और जल स्त्रोतों को हो रहा है। जैवविविधता के नुकसान से कैसे आम आदमी या पारिस्थितिकी तंत्र, जिसका एक हिस्सा हम भी हैं, प्रभावित हो रहा है, यह समझने के लिए चींटी का उदाहरण प्रस्तुत है। चींटियां जमीन के नीचे कालोनियों में रहती हैं जो जमीन के अंदर दो तीन फीट की गहराई में होती हैं। चींटियां हर वर्ष बारिश के पूर्व अपने बिल में विभिन्न प्रकार के घास के बीजों का भविष्य के लिए संग्रह करती हैं। लेकिन बारिश के कुछ समय पूर्व अपना घर बदलकर ऊंचे स्थान पर चली जाती हैं और संग्रह किए बीजों में कुछ बिल में ही छोड़ जाती हैं। चींटी द्वारा बनाई गई कालोनियों के माध्यम से वर्षाजल भूजल में बदलता है अर्थात जिस जगह पर जितनी अधिक कालोनियां वहां पर वर्षा जल उतनी ही ज्यादा मात्रा में भूजल में बदलता है। साथ ही अनेक वर्ष तक सूखा पड़ने (अवर्षा) के बाद भी छोटे अन्न व घासफूस के बीज जो चींटीयों द्वारा अपनी काॅलोनियों में जमा किए गए थे, बचे रहेंगे और जब वर्षा होगी वे बीज पुनः उग आएंगे। हर साल जंगलों में लगने वाली आग में इस बेहद महत्वपूर्ण जीव चींटी के साथ नाना प्रकार के अन्य जीव जैसे केंचुए, गुबरैला आदि भी नष्ट हो रहे हैं और इनके साथ-साथ वह प्राकृतिक सिस्टम भी नष्ट हो रहा है जो वर्षाजल को भूजल में बदलता है।

जंगलों की आग जमीन के ऊपर जमा पत्तियों की परत जो नमी संरक्षण, वर्षा जल संरक्षण, जैवविविधता संरक्षण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है उसे भी जलाकर राख कर दे रही है। इस परत को जमा करने में कुदरत को सालों लग जाते हैं और आग एक झटके में इसे नष्ट कर जल स्त्रोतों, जैवविविधता को बहुत नुकसान कर रही है। यदि जंगलों की आग को यूं ही नजरअंदाज किया जाता रहा तो कुछ ही सालों में पर्वतीय इलाकों में जल संकट, जैवविविधता संकट होने के पूरे आसार हैं तब आम आदमी जिसके पास पहाड़ छोड़कर जाने की आर्थिक क्षमता भी नहीं है, जंगलों की आग के नुकसान के बारे में सचेत होगा मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। इसलिए अभी भी समय है जंगलों की आग को रोकने, बुझाने में वन विभाग को सहयोग दीजिए।