स्मृति-शेष
रतन टाटा का जीवन संघर्ष, सफलता और समाज सेवा की एक ऐसी कहानी है, जिसे पीढ़ियों तक याद रखा जाएगा। उनका दृष्टिकोण और नेतृत्व कौशल उन्हें भारत के सबसे महान उद्योगपतियों में से एक बनाता है। रतन टाटा अपने सादगी भरे जीवन के लिए मशहूर रहे। उन्हें व्यक्तिगत रूप से बहुत ही सरल और विनम्र व्यक्ति माना जाता है। उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह से उद्योग और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया। रतन टाटा अपने जीवन और काम के प्रति इतने समर्पित थे कि उन्होंने उद्योग जगत में एक नया मानदंड स्थापित किया है। टाटा को न केवल व्यावसायिक सफलता के लिए बल्कि नैतिकता, परोपकार और सामाजिक जिम्मेदारी के लिए भी जाना जाता है
‘श्रीरतन टाटा जी एक दूरदर्शी बिजनेस लीडर, एक दयालु आत्मा और एक असाधारण इंसान थे। उन्होंने भारत के सबसे पुराने और सबसे प्रतिष्ठित व्यापारिक घरानों में से एक को स्थिर नेतृत्व प्रदान किया। साथ ही, उनका योगदान बोर्ड रूम से कहीं आगे तक गया। उन्होंने अपनी विनम्रता, दयालुता और हमारे समाज को बेहतर बनाने के लिए एक अटूट प्रतिबद्धता के कारण कई लोगों के बीच अपनी जगह बनाई।
श्री रतन टाटा जी का सबसे अनोखा पहलू था बड़े सपने देखने और दूसरों को कुछ देने का उनका जुनून। वे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छता, पशु कल्याण जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाने में सबसे आगे थे। श्री रतन टाटा जी के साथ मेरी अनगिनत मुलाकातें मुझे याद हैं। जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था, तब मैं उनसे अक्सर मिलता था। हम विभिन्न मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करते थे। मुझे उनके विचार बहुत उपयोगी लगते थे। दिल्ली आने पर भी ये मुलाकातें जारी रहीं। उनके निधन से मुझे बहुत कष्ट पहुंचा है। इस दुख की घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिवार, मित्रों और प्रशंसकों के साथ हैं, ओम शांति।’
सुप्रसिद्ध उद्योगपति रतन टाटा के नौ अक्टूबर को हुए निधन पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर कर उक्त उद्गार के जरिए उन्हें श्रद्धांजलि दी है।
देश के कई नेताओं, उद्योगपतियों और सेलेब्स ने रतन टाटा की मौत पर अपना दुःख जाहिर किया है। टाटा का अंतिम संस्कार मुंबई में हुआ और उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। दिग्गज उद्योगपति रतन टाटा का 86 साल की उम्र में निधन हो गया। वे नौ अक्टूबर को देर शाम तबीयत खराब होने के चलते मुंबई के कैंडी ब्रीच हॉस्पिटल में ले जाए गए थे। जहा उन्होंने अंतिम सांस ली।
रतन टाटा का नाम भारत के सबसे सम्मानित और प्रेरणादायक उद्योगपतियों में गिना जाता है। उनका जीवन संघर्ष, प्रतिबद्धता, और सफलता की मिसाल रहा है। उम्र अधिक हो जाने के चलते उन्हें कई तरह की परेशानियां हो रही थीं। अचानक उनका ब्लड प्रेशर कम होने के कारण उन्हें मुंबई के कैंडी ब्रीच हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था।
रतन टाटा का जीवन संघर्ष, सफलता, और समाज सेवा की एक ऐसी कहानी है, जिसे पीढ़ियों तक याद रखा जाएगा। उनका दृष्टिकोण और नेतृत्व कौशल उन्हें भारत के सबसे महान उद्योगपतियों में से एक बनाता है। उनकी सादगी, निष्ठा और मानवता के प्रति समर्पण ने उन्हें न केवल भारत में, बल्कि विश्व भर में सम्मान दिलाया है। अपने नेतृत्व में टाटा समूह को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले रतन टाटा ने भारतीय उद्योग जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई।
रतन टाटा का विजन मुनाफे से कहीं आगे तक फैला हुआ था। वह सामाजिक जिम्मेदारी और स्थिरता के लिए गहराई से प्रतिबद्ध थे। उनका फाउंडेशन टाटा ट्रस्ट भारत के सबसे बड़े धर्मार्थ संगठनों में से एक है। सरकार ने उद्योग और समाज में उनके योगदान को मान्यता दी और उन्हें वर्ष 2000 में पद्म भूषण और 2008 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। ये दोनों भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक हैं।
रतन नवल टाटा का जन्म 28 दिसंबर 1937 को मुंबई में हुआ था। वह जमशेदजी टाटा द्वारा स्थापित प्रसिद्ध टाटा परिवार से संबंधित हैं। उनके पिता नवल टाटा और माता सोनू टाटा थीं। रतन टाटा के बचपन के कुछ साल कठिनाई भरे थे क्योंकि उनके माता-पिता के बीच तलाक हो गया था, जिसके बाद उनकी परवरिश उनकी दादी नवाजबाई टाटा ने की। परिवार की यह चुनौतीपूर्ण स्थिति रतन टाटा के जीवन को गहराई से प्रभावित कर गई और उन्होंने जीवन के प्रारंभिक वर्षों में ही कठिन परिस्थितियों से जूझना सीख लिया।
रतन टाटा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के कैंपियन स्कूल से प्राप्त की और बाद में कैथेड्रल और जांन कांनन स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। इसके बाद, उन्होंने अमेरिका के कार्नेल विश्वविद्यालय से आर्किटेक्चर में बैचलर ऑफ आर्किटेक्चर की डिग्री हासिल की। अपनी पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने यह महसूस किया कि वे भारत लौटकर अपने परिवार के व्यवसाय में शामिल होना चाहते हैं। उन्होंने हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से 1975 में एडवांस्ड मैनेजमेंट प्रोग्राम भी किया, जो उनके नेतृत्व कौशल को विकसित करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
रतन टाटा ने 1961 में टाटा समूह में एक साधारण कर्मचारी के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। सबसे पहले, उन्हें टाटा स्टील की
जमशेदपुर इकाई में भेजा गया, जहां उन्होंने एक ब्लू-कालर कर्मचारी की तरह काम किया। यह उनके लिए एक महत्वपूर्ण अनुभव साबित हुआ, जिससे उन्हें व्यावसायिक जगत की बारीकियों को समझने में मदद मिली।
1971 में, रतन टाटा को टाटा ग्रुप की संघर्ष कर रही कंपनी, नेल्को का प्रभारी बनाया गया। उन्होंने इसके पुनरुद्धार के लिए कड़ी मेहनत की और इसे फिर से लाभकारी बनाने के लिए आधुनिक तकनीकों और प्रबंधकीय रणनीतियों का प्रयोग किया। इसके बाद 1981 में उन्हें टाटा इंडस्ट्रीज का अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जहां से उनके नेतृत्व की असली यात्रा शुरू हुई।
वर्ष 1991 में, जेआरडी टाटा के पद छोड़ने के बाद रतन टाटा को टाटा समूह का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यह वह दौर था जब भारत आर्थिक उदारीकरण के दौर से गुजर रहा था, और उद्योग जगत में भी बड़े बदलाव आ रहे थे। रतन टाटा ने इन बदलावों को अवसर के रूप में लिया और टाटा समूह को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा बनाने के लिए बड़े फैसले लिए। उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने नई तकनीकों का विकास किया और कई नई कंपनियों की स्थापना की।
रतन टाटा के कार्यकाल में टाटा समूह ने टेटली, कोरस, जगुआर लैंड रोवर और ब्रून जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों का अधिग्रहण किया, जो टाटा समूह को वैश्विक स्तर पर एक सम्मानित नाम बनाने में सहायक रहा। उनकी सोच हमेशा से ही दीर्घकालिक और समाजोन्मुखी रही है, यही कारण है कि उन्होंने उद्योग के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्रों में भी बड़े निवेश किए।
देश जब कोरोना महामारी से जूझ रहा था तब उन्होंने 1500 करोड़ रुपए की मदद का ऐलान किया था। साल 2014 में उन्होंने आईआईटी बॉम्बे में रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए 95 करोड़ रुपए दान किए थे ताकि वो जन सामान्य के लिए टेक्नोलॉजी डिजाइन कर सकें। इसके अलावा उन्होंने देश में कई चैरिटेबल हॉस्पिटल और मेडिकल सेंटर भी खोले थे जहां कई गंभीर बीमारियों का इलाज निःशुल्क में या सब्सिडाइज रेट पर किया जाता था। इनमें टाटा मेडिकल सेंटर और टाटा मेमोरियल सेंटर प्रमुख हैं। रतन टाटा को लोग इसलिए भी याद कर रहे हैं कि वो लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य और देश के विकास को लेकर काफी सोचते थे और जरूरत पड़ने पर मदद के लिए आगे आते थे।
भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति श्री रतन टाटा जी के निधन की खबर पाकर बहुत दुख हुआ। उन्होंने अपना पूरा जीवन देश की औद्योगिक प्रगति और सामाजिक विकास के लिए समर्पित कर दिया। उनकी दूरदर्शिता समर्पण और व्यावसायिक कौशल ने न केवल टाटा समूह को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया बल्कि राष्ट्र के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने रोजगार सृजन, सामाजिक सशक्तिकरण और नवाचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किए। उनका जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। भावभीनी श्रद्धांजलि!
पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड
सात समुंदर पार किया था प्यार
देश की मशहूर शख्सियत, नामी परिवार, अथाह पैसा फिर भी रतन टाटा अविवाहित रहे तो आखिर वजह क्या है? इससे जुड़े सवाल कई बार और बार-बार पूछे जाते रहे। तो हकीकत ये है कि रतन टाटा को प्यार हुआ था। एक बार नहीं चार बार। लॉस एंजिल्स में मिली लड़की से तो बात शादी तक पहुंच गई थी लेकिन वो हो न सका और प्यार अधूरा रह गया। एक इंटरव्यू में रतन टाटा ने बताया था कि लॉस एंजिल्स स्थित एक आर्किटेक्चर फर्म में काम करने के दौरान एक लड़की से वह मिले और देखते ही देखते उन्हें प्यार हो गया। उस लड़की के साथ शादी करके टाटा सेटल होना चाहते थे, लेकिन इसी बीच उन्हें अपनी बीमार दादी की देखभाल के लिए भारत आना पड़ा और फिर वह वापस नहीं जा सके। इस दौरान सोचा कि वो लड़की भारत आ जाए लेकिन तभी भारत-चीन के बीच जंग छिड़ गई और उस प्रेमिका के माता-पिता ने भारत नहीं भेजा। नतजीतन रिश्ता टूट गया। ऐसा टूटा कि फिर कभी जुड़ नहीं पाया।

