उत्तराखण्ड की राजनीति में अजय भट्ट एक बड़ा नाम हैं। नेता प्रतिपक्ष रहते तत्कालीन कांग्रेस सरकार को हर छोटे-बड़े मुद्दे पर बैकफुट में डालने वाले भट्ट अब खुद बैकफुट पर हैं। पार्टी में बढ़ती अनुशासनहीनता के खिलाफ कठोर कार्रवाई से बचने की भट्ट की नीति और सीएम त्रिवेंद्र से कम होता जा रहा तालमेल उनके विरोधियों को मुखर कर रहा है। नैनीताल से सांसद अजय भट्ट की संगठन में कमजोर पकड़ का एक उदाहरण विधानसभा चुनाव में उनकी हार का कारण रहे भाजपा के बागी नेता प्रमोद नैनवाल की पार्टी में वापसी है

 

13 नवंबर 2018 : भाजपा नेता संजय अग्रवाल ने ऋषिकेश में एक जनसभा में कहा कि भाजपा के कुछ लोग शराब के दम पर अपने आपको विजयी घोषित करना चाहते हैं। विधायक रितू खण्डूड़ी ने इस सभा के कुछ दिन पहले ही अग्रवाल को कांग्रेस से भाजपा में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

12 अक्टूबर 2019 : रुद्रपुर के भाजपा विधायक राजकुमार ठुकराल ने एक सभा को संबोधित करते हुए एक समुदाय विशेष को लेकर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि उनका एक वोट उन्हें नहीं चाहिए। वे खुली किताब हैं। वे उनके यहां पानी तक नहीं पीएंगे। जब तक वे जिंदा हैं उस समुदाय विशेष के घर पर नहीं जाएंगे, उनके धार्मिक स्थल में भी नहीं जाएंगे। वे जनता की ओर इशारा करके कहते हैं कि उनकी जिंदगी उनके हाथों में है। मेरा सिर झुकेगा तो आपके पैरों में झुकेगा। किसी समुदाय विशेष के व्यक्ति या धार्मिक स्थल में नहीं झुकेगा।

1 अक्टूबर 2019 : रामलीला में रावण बने रुद्रपुर के भाजपा विधायक ने सीता को कहा ‘मेरी जान’। देश के साधु-संत समाज ने इसको लेकर विरोध-प्रदर्शन किया।

जून 2019 : लोकसभा चुनाव के दौरान खानपुर के विधायक कुंवर प्रणव चैम्पियन और झबरेड़ा के विधायक देशराज कर्णवाल के बीच जमकर विवाद हुआ। विवाद इतना बढ़ा कि कर्णवाल को चैलेंज देते हुए चैंपियन उनसे दो-दो हाथ करने स्टेडियम पहुंच गए। पहले चैम्पियन द्वारा कर्णवाल के जाति प्रमाण पत्र को लेकर सवाल खड़े किए गए। इसके बाद पलटवार करते हुए कर्णवाल ने कुंवर प्रणव को कह दिया कि वह नकली चैम्पियन हैं। बाद में पार्टी ने हस्तक्षेप करते हुए दोनों के हाथ मिलाकर विवाद खत्म करा दिया। लेकिन फिर भी बयानबाजी जारी रही। यूके प्रकरण पर प्रदेश महामंत्री खजान दास के अधीन एक कमेटी गठित कर जांच के आदेश दे दिए। कमेटी ने जांच रिपोर्ट तैयार कर प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को सौंप दी। लेकिन भट्ट ने जांच के बाद भी कोई उचित निर्णय नहीं लिया।


ये सब मामले ऐसे हैं जिनमें भाजपा विधायकों ने पार्टी संविधान के विपरीत कार्य किया। पार्टी की गरिमा को तार-तार कर दिया। ये विवादास्पद मामले उस समय सामने आए हैं, जब प्रदेश संगठन की कमान नैनीताल के सांसद अजय भट्ट के हाथों में है। वह अजय भट्ट जिन्हें वर्ष 2015 में नेता प्रतिपक्ष रहते भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली थी। 31 दिसंबर 2015 को अजय भट्ट ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पर का जिम्मा संभाला। भट्ट ने नेता प्रतिपक्ष रहते हुए कांग्रेस सरकार पर जमकर हमले बोले थे। तब वह अपनी सक्रियता और सजगता के लिए भी जाने जाते रहे। इसी दौरान अजय भट्ट ने नेता प्रतिपक्ष रहते हुए कांग्रेस सरकार की एफएलटू शराब नीति, नैनीसार कांड, छात्रवृत्ति घोटाला, खाद्यान और एनएच घोटाले को सदन में पुरजोर तरीके से उठाया था। इसके चलते ही भट्ट ने 2017 के विधानसभा चुनाव में काफी जोश-खरोश के साथ काम किया। इस विधानसभा चुनाव में वह पार्टी के मुख्य रणनीतिकारों में भी शामिल रहे। हालांकि वह इस चुनाव में रानीखेत से अपनी सीट गंवा बैठे थे। लेकिन बावजूद इसके भाजपा को 57 सीटों पर ऐतिहासिक विजय दिलाने में भट्ट की महत्वपूर्ण भागीदारी रही। भट्ट के इसी सांगठनिक कौशल को देखते हुए पिछले साल दिसंबर में हाईकमान ने बतौर प्रदेश अध्यक्ष उनका कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया। इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव में केंद्रीय संगठन ने भट्ट को नैनीताल सीट से टिकट भी दिया। जबकि इस सीट से पूर्व में सांसद रहे भगत सिंह कोश्यारी अपने शिष्य और खटीमा विधायक पुष्कर सिंह धामी को टिकट दिलाने के पक्षधर थे।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में नैनीताल सीट से भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने तीन लाख 35 हजार 570 वोटों से मैदान मार लिया। उन्होंने अपने विपक्षी पूर्व ‘सीएम हरीश रावत को हराकर यह रण जीता। इस जीत से अजय भट्ट के कद में निश्चित तौर पर वृद्धि हुई। दिन-प्रतिदिन उनकी लोकप्रियता बढ़ी। लेकिन दूसरी तरफ उनका पार्टी में रुतबा भी कम होता गया। उदाहरण के तौर पर प्रमोद नैनवाल की उनके अध्यक्ष रहते ही भाजपा में वापसी हो गई। 2017 के विधानसभा चुनाव में जब अजय भट्ट हारे तो पार्टी में इसका ठीकरा रानीखेत से निर्दलीय चुनाव लड़े प्रमोद नैनवाल के सर फूटा था। दरअसल, भट्ट को हराने के पीछे नैनवाल की मुख्य भूमिका रही। नैनवाल कभी भट्ट का खास हुआ करते थे। लेकिन रानीखेत से चुनाव लड़ने की जिद ने उन्हें बागी बना दिया।

भट्ट की मर्जी के खिलाफ नैनवाल को पार्टी ज्वाईन कराने वाले पार्टी के अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सांसद अजय टम्टा रहे। इस तरह देखा जाए तो एक अजय पर दूसरा अजय भारी पड़ा। इसी के साथ पार्टी विधायकों द्वारा आए दिन जारी किए जाने वाले विवादास्पद बयानों के चलते भी पार्टी अध्यक्ष अजय भट्ट की किरकिरी हुई है। भट्ट बार-बार चेतावनी देने और कारण बताओ नोटिस जारी करने के बाद भी विधायकों पर लगाम लगाने में नाकाम रहे हैं। अगर कुंवर प्रणव चैम्पियन को छोड़ दें तो किसी भी विधायक पर अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं हुई। इसे क्या कहा जाए? पार्टी के ही नेताओं की मानें तो अब अजय भट्ट का प्रदेश में पहले जैसा कद नहीं रहा। पार्टी नेता खासकर विधायक उन्हें कमतर आंकने लगे हैं। यहां तक कि प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी अब भट्ट को पहले की तरह अहमियत नहीं देते। बताया जा रहा है कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को सीएम मिलने तक का समय नहीं देते हैं। इससे सरकार और संगठन का आपसी तालमेल भी कमजोर होता दिखाई दे रहा है।

अजय भट्ट जब लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे, तब पार्टी का कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष नरेश बंसल को बनाया गया था। भट्ट का पार्टी में कम होता महत्व उस समय सामने आया था जब पार्टी के प्रदेश मुख्यालय से उनके नाम का बोर्ड तक उखाड़कर फेंक दिया गया था। प्रदेश की सत्ता में नेताओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो अजय भट्ट को पसंद नहीं करता है। पार्टी के नेताओं का यहां तक कहना है कि जब से भट्ट नैनीताल के सांसद बने हैं, तब से वह जनता से दूरी बनाने लगे हैं। पार्टी के पदाधिकारियों को भी समय नहीं दे पा रहे हैं। शायद उन्हें प्रदेश अध्यक्ष के बजाय सांसदी रास आने लगी है। इस दौरान वह पूरे प्रदेश में दौरे करने के बजाय नैनीताल संसदीय क्षेत्र की परिक्रमा तक ही सीमित हो रहे हैं।

फिलहाल अजय भट्ट के कार्यकाल में एक साल का एक्सटेंशन दिसंबर में पूरा हो रहा है। गत वर्ष दिसंबर माह में उन्हें एक साल का एक्सटेंशन लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मिला था। अब तो राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव भी संपन्न हो गए हैं। पार्टी की अब चिंता है कि संगठन के मुखिया के लचीलेपन का फायदा कहीं विपक्षी दल कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव 2022 में न उठा ले। कहीं पार्टी विधानसभा चुनाव में पिछड़ न जाए। केंद्रीय नेतृत्व तक अजय भट्ट की दिनों दिन कम होती प्रशासनिक क्षमता का संदेश पहुंचाया जा चुका है। केंद्रीय नेतृत्व भट्ट के फैसलों और आगामी योजनाओं पर नजर गड़ाए हुए है। थोड़ी सी चूक भी उन्हें इस बार बैकफुट पर डाल सकती हैं। हालांकि भट्ट के नेतृत्व में ही पार्टी ने विगत विधानसभा चुनाव में बंपर जीत हासिल की थी लेकिन अब उनकी नेतृत्व क्षमता पर उठ रहे सवाल आने वाले समय में भट्ट के लिए बड़ी चुनौती की तरह इशारा कर रहे हैं।

पटवारी पिटाई प्रकरण पर मौन क्यों

प्रदेश संगठन की हीलाहवाली और कमजोर होते अनुशासन का नाजायज फायदा न केवल विधायक ही उठा रहे हैं, बल्कि पार्टी के नेता भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के दौरान यह बखूबी देखने को मिला। सल्ट-भिकिया सैंण क्षेत्र में जिला बदर रहा भाजपा नेता हनसा नेगी खुलेआम न केवल चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन कर रहा था, बल्कि कानून की भी धज्जियां उड़ाता दिखा। इस दबंग नेता ने राजस्व अधिकारियों पर न केवल दादागिरी दिखाई, बल्कि उनके साथ बदतमीजी भी की। सरकारी काम में बाधा डालने और सरकारी अधिकारियों के साथ गलत व्यवहार करने वाला हनसा नेगी भाजपा के एक विधायक के द्वारा बचा लिया गया। मामला 13 अक्टूबर का है, जब जाख गांव में एक व्यक्ति ने एक प्रत्याशी द्वारा शराब बहाने की शिकायत की थी। राजस्व अधिकारी की टीम जब निरीक्षण करके लौट रही थी तो हनसा नेगी ने उन्हें रोक लिया। बताते हैं कि इस दौरान हनसा नेगी ने राजस्व टीम के अधिकारियों के साथ गाली-गलौच की और वह बदतमीजी पर उतर आया। इसमें पीड़ित पटवारी सुभाष सिंह शाह ने इसकी शिकायत सल्ट के उप जिलाधिकारी राहुल शाह से की। उपजिलाधिकारी ने हनसा नेगी को पूरी रात न्यायिक हिरासत में रखा। अगले दिन नेगी को उप जिलाधिकारी ने बांड भराकर छोड़ा। हालांकि उपजिलाधिकारी नेगी को जेल पहुंचाना चाहते थे, लेकिन भाजपा के एक विधायक ने उसकी पैरवी की और उसे जेल जाने से बचाने के लिए एडीचोटी का जोर लगा दिया। इस मामले की चर्चा पूरे प्रदेश में है। चारों तरफ भाजपा के इस दबंग नेता की चर्चा है। लोग कह रहे हैं कि नेता के दबंग होने के चलते भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट उस पर कार्यवाही करने से बच रहे हैं।

 

मोदी जी ने कहा है कि सबका साथ, सबका विकास। इसी पैटर्न को लेकर पार्टी चल रही है। इसके बाद कोई गुंजाइश नहीं रहती है। हालांकि फिलहाल पार्टी नेताओं की अनाप-शनाप बयानबाजी से लोगों का विश्वास कम हो रहा है। पार्टी नेताओं की विवादास्पद बयानबाजी पर बैन नहीं लगा पा रही है। हाईकमान से सीधा आदेश है कि कोई भी नेता नहीं बोले, सिर्फ प्रवक्ता को ही बोलने का हक है। रही अनुशासन समिति की बात तो उसके पास मामले सीधे नहीं आते, बल्कि प्रदेश अध्यक्ष के माट्टयम से आते हैं। समिति सीट्टो अपने आप कुछ नहीं कर सकती है। सब पार्टी फोरम पर ही होता है।
केदार जोशी, अध्यक्ष कुमाऊं मंडल विकास निगम

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