देहरादून और ऋषिकेश नगर निगमों में मतदाता किसको अपना वोट देकर मेयर बनाएंगे यह तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही तय होगा लेकिन दोनों ही निगमों में सत्ताधारी भाजपा के लिए चुनाव में जीत हासिल करना बड़ी चुनौती है। यह चुनाव भाजपा और कांग्रेस के कई नेताओं की कड़ी परीक्षा होगा। देहरादून में मंत्री गणेश जोशी तो वहीं कांग्रेस के बड़े नेताओं के लिए भी अपना जनाधार साबित करने का सवाल बन चुका है। ऋषिकेश सीट पर भी भाजपा के चार बार से लगातार विधायक का चुनाव जीतने वाले कैबिनेट मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल और हरिद्वार सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के लिए भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है
उत्तराखण्ड के सबसे बड़े नगर निगम देहरादून और योग नगरी ऋषिकेश नगर निगम भाजपा-कांग्रेस दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन रहे हैं तो दूसरी तरफ धामी सरकार में वित्त और शहरी विकास मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल के लिए ऋषिकेश नगर निगम प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। 20 वर्षों से भी ज्यादा समय से राजनीतिक सूखा झेल रही कांग्रेस के लिए दोनों नगर निगमों में जीत दर्ज कराने के लिए एक अवसर के तौर पर भी देखा जा रहा है।
देहरादून नगर निगम पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद 2003 में देहरादून पालिका को नगर निगम का दर्जा दिया गया। पहले चुनाव में कांग्रेस से मनोरमा शर्मा डोबरियाल प्रथम मेयर निर्वाचित हुई। 2008 और 2013 में भाजपा के विनोद चमोली मेयर बने। 2018 में भाजपा के सुनील उनियाल गामा ने मेयर की जीट पर कब्जा किया। इस तरह से लगातार तीन बार भाजपा ने देहरादून सीट पर हैट्रिक लगाई।
मौजूदा चुनाव में भाजपा ने युवा नेता सौरभ थपलियाल को मेयर का उम्मीदवार बनाकर चुनाव मैदान में उतारा है तो वहीं कांग्रेस ने सहकारी बाजार समिति के अध्यक्ष और पार्टी के महामंत्री विरेंद्र पोखरियाल को मेयर का प्रत्याशी बनाया है। खास बात यह है कि दोनांे ही देहरादून के डीएवी कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष रहे हैं। साथ ही पर्वतीय मूल के होने से चुनावी माहौल खासा दिलचस्प नजर आ रहा है। जबकि मेयर पद के लिए 8 निर्दलीय और अन्य राजनीतिक दलों के उम्मीदवार भी चुनावी मैदान में ताल ठोक कर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के प्रयास में हैं लेकिन हमेशा की तरह मुख्य मुकाबला भाजपा-कांग्रेस के बीच ही होता हुआ नजर आ रहा है।
विरेंद्र पोखरियाल: कांग्रेस ने 2018 में मैदानी मूल के पूर्व कैबिनेट मंत्री दिनेश अग्रवाल को अपना उम्मीदवार बनाया था जिसका पार्टी भीतर विरोध देखने को मिला था। भाजपा ने पर्वतीय मूल के सुनील उनियाल गामा को टिकट दिया तो पूरा चुनाव पहाड़ी बनाम मैदानी में तब्दील हुआ फलस्वरूप कांग्रेस को चुनाव में बड़ी हार का सामना करना पड़ा। जबकि दिनेश अग्रवाल कई बार के विधायक रह चुके थे और कांग्रेस सरकार मे कैबिनेट मंत्री भी रहे। बावजूद इसके वह पहाड़ी और मैदानी मतदाताओं के नैरेटिव में ऐसे फंसे कि ढाई लाख से ज्यादा मतों से चुनाव हार गए। इस बार कांग्रेस ने वह गलती नहीं की और पर्वतीय मूल के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विरेंद्र पोखरियाल को उम्मीदवार बनाकर कड़ी टक्कर दे दी है।
विरेंद्र पोखरियाल छात्र राजनीति से निकले नेता रहे हैं। राजनीति की बड़ी पाठशाला के तौर पर पहचान रखने वाला विख्यात डीएवी कॉलेज में 1993 में छात्र संघ अध्यक्ष रहे विरेंद्र पोखरियाल वरिष्ठ राज्य आंदोलनकरी भी रहे हैं। 1994 मंे पांच बार राज्य आंदोलन में जेल भी गए हैं। राज्य बनने तक पोखरियाल अनेक अंादोलनांे में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं। राज्य बनने के बाद कांग्रेस में किसान और सहकारिता के क्षेत्र में काम कर चुके हैं। 2004 में सहकारिता बाजार देहरादून के अध्यक्ष पद के चुनाव जीते और तब से लेकर अब तक अध्यक्ष पद पर बरकरार हैं। अपने विनम्र और मिलनसार व्यक्तित्व के चलते विरेंद्र पोखरियाल का देहरादून के मतदाताओं में एक खास वर्ग है, साथ ही पर्वतीय मूल के मतदाताओं में उनकी पकड़ है।
सौरभ थपलियाल: 2001 में डीएवी कॉलेज से छात्रसंघ का चुनाव जीत कर सक्रिय राजनीति मंे अपना कदम रखने वाले सौरभ थपलियाल एबीवीपी में कई पदांे पर रहे हैं, साथ ही 2013 में भाजपा युवा मार्चा के प्रदेश अध्यक्ष की कमान सम्भाल चुके हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में विधायक के टिकट की मजबूत दावेदारी कर चुके थपलियाल नगर निगम चुनाव में भाजपा के कई बड़े दावेदारों पर भारी पड़े। भाजपा का एक बड़ा वर्ग पूर्व मेयर सुनील उनियाल गामा को फिर से उम्मीदवार बनाने के पक्ष में था लेकिन गामा पर अपने कार्यकाल में अनेक भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोपों के चलते पार्टी किसी नए और पर्वतीय मूल के चेहरे पर दांव लगाने का मन बना चुकी थी जिसका दोहरा लाभ थपलियाल को मिला और पार्टी ने आधा दर्जन से भी अधिक दावेदारांे को नकारते हुए सौरभ थपलियाल को चुनावी समर मे उतार दिया। सौरभ थपलियाल युवा नेता के तौर पर तो पहचान रखते ही हैं, साथ ही उनका अपना एक व्यक्तिगत जनाधार भी है जिसका लाभ उनको चुनाव में मिल सकता है। नगर निगम देहरादून में भाजपा को वर्षों से मतदाताओं का भरपूर समर्थन भी मिलता रहा है उसका फायदा भी सौरभ थपलियाल को मिलने की सम्भावना है।
राजनीतिक जानकार भी मान रहे हैं कि कांग्रेस ने पर्वतीय मूल के नेता विरेंद्र पोखरियाल को चुनाव में उतार कर भाजपा के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। पोखरियाल के टिकट दिए जाने पर ही भाजपा को सौरभ थपलियाल को चुनाव मंे उतारने के लिए मजबूर होना पड़ा जबकि पार्टी में कई बड़े चेहरे दावेदारी कर रहे थे। इससे साफ है कि नगर निगम के चुनाव में पहाड़ी मूल का मतदाता बड़ा असर डाल सकता है। अब भाजपा- कांग्रेस दोनों ही मतदाताओं को किस तरह से अपने पक्ष में करने की रणनीति अपनाती है यह तो चुनावी परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा लेकिन इतना तो तय माना जा रहा है जो पहाड़ी मतदाताओं को अपने पक्ष में बेहतर तरीके से कर पाएग वही महापौर की कुर्सी पर काबिज होगा।
ऋषिकेश नगर निगम
राज्य के सर्वाधिक चर्चित नगर निगम चुनाव के तौर उभर चुका ऋषिकेश त्रिकोणीय मुकाबले में बदलता दिखाई दे रहा है। पहली बार अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किया गया। ऋषिकेश नगर निगम में भाजपा ने मुनि की रेती नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष और बिहार प्रदेश के निवासी शम्भू पासवान को उम्मीदवार बनाया है तो कांग्रेस ने युवा नेता दीपक जाटव को चुनावी मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस से बागी होकर पर्वतीय मूल के मास्टर दिनेश भी निदर्लीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव को त्रिकोणीय मुकाबले में बदलते दिख रहे हैं।
ऋषिकेश नगर निगम भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इस सीट पर भाजपा के तमाम दावेदार उम्मीद लगाए हुए थे लेकिन आरक्षण के चलते उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल को ही इसका जिम्मेदार माना जा रहा है। पूर्व मेयर अनिता ममगाई जो कि भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर मेयर बनीं लेकिन उनके रिश्ते प्रेमचंद अग्रवाल से कभी मधुर नहीं रहे। शहरी विकास मंत्री बनने के बाद अग्रवाल पर नगर के विकास की योजनाओं पर अडंगा लगाने के आरोप ममगाई द्वारा गाहे-बगाहे लगाए जाते रहे।
माना जा रहा है कि अनिता ममगाई को नगर निगम चुनाव से दूर करने के लिए ही आरक्षण का पासा फेंका गया है जो कि भाजपा के ही कई
नेताओं को रास नहीं आ रहा है। साथ ही पार्टी के कई स्थानीय दावेदारों के होने के बावजूद मुनि की रेती नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष रहे शम्भू पासवान को भी मेयर का टिकट दिलावने में मंत्री अग्रवाल की ही सबसे बड़ी भूमिका मानी जाती है। इसी को लेकर कांग्रेस पार्टी द्वारा मतदाताओं में स्थानीय और बाहरी का नारा दिया जा रहा है जो भाजपा को परेशान कर रहा है। हालांकि भाजपा का ऋषिकेश सीट पर 20 वर्षों से कब्जा बना हुआ है और इसमें यहां के मतदाताओं का भी एक बड़ा योगदान रहा है।
शम्भू पासवान: मूलतः ठेकेदार रहे शम्भू पासवान दूसरे प्रदेश बिहार से आकर ऋषिकेश में कारोबारी के तौर पर स्थापित हुए हैं। ऋषिकेश और मुनि की रेती क्षेत्र में बिहार और पूर्वांचल से आए निवासियों की अच्छी- खासी आबादी होने के चलते पासवान को राजनीति में कुछ ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा और वे मुनि की रेती नगर पंचायत में अध्यक्ष पद पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जीत कर पहली बार सक्रिय राजनीति में उतरे। हालांकि उनका महज 8 माह का ही कार्यकाल रहा। लेकिन इस चुनाव ने पासवान के लिए राजनीति की राह आसान कर दी। मौजूदा वन मंत्री सुबोध उनियाल के खास माने जाने वाले पासवान भाजपा में शामिल हो गए। फिलहाल वे प्रेमचंद अग्रवाल के सबसे खास नेताओं में अपना स्थान बना चुके हैं। इसी का असर रहा कि कई दलित नेताओं के होने के बावजूद पासवान को ही चुनाव में भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया।
दीपक जाटव: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मदनलाल जाटव के पुत्र दीपक जाटव ऋषिकेश के निवासी हैं। युवाओं में दीपक को पहली पसंद माना जाता है। पूर्व में नगर पालिका चुनाव में सभासद का चुनाव लड़ चुके दीपक के लिए कांग्रेस में कोई खास विरोधी नहीं होने से उनको पार्टी ने टिकट देने में देर नहीं की। यहां पर गौर करने वाली बात यह है कि भले ही नगर निगम या नगर पालिका में कांग्रेस का अध्यक्ष तथा मेयर नहीं जीता हो लेकिन बोर्ड में पार्टी का मजबूत दखल रहा है। पहली बार ऋषिकेश में कांग्रेस पाटी में चुनाव को लेकर एकजुटता दिख रही है जिसका प्रभाव चुनाव में देखने को मिल सकता है। नगर के विकास के लिए और अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर चले लम्बे आंदोलन में दीपक जाटव की खासी भूमिका रही है। सरकार और सत्ता के खिलाफ कई मामलांे में कांग्रेस पार्टी खासी मुखर रही है जिसमें दीपक जाटव को एक बड़े चेहरे के तौर पर देखा गया है। इसी को लेकर ऋषिकेश में स्थानीय और बाहरी मुद्दा तेजी से मतदाताओं के बीच गूंज रहा है जिसका फायदा दीपक को मिलने की सम्भावनाएं जताई जा रही हैं।
मास्टर दिनेशः देवप्रयाग से ऋषिकेश में रोजगार के लिए आए मास्टर दिनेश आजीविका के लिए ऑटो चलाते रहे हैं। उच्च शिक्षित दिनेश स्थानीय बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं जिसके चलते उनको मास्टर जी उप नाम मिला है। कांग्रेस के पूर्व कार्यकर्ता रहे दिनेश मास्टर ने ऋषिकेश नगर निगम को अनुसूचित जाति आरक्षण होने पर अपनी दावेदारी की लेकिन उनको टिकट नहीं मिला तो वे निर्दलीय ही चुनाव में उतर गए। तमाम सामाजिक और राजनीतिक संगठनों और आंदोलनकारियों द्वारा मास्टर दिनेश को भरपूर सर्मथन मिल रहा है। यहां तक कि भू-कानून और मूल निवास आंदोलन समिति मोहित डिमरी का संगठन भी मास्टर दिनेश के साथ चुनाव प्रचार में उतर चुका है।
चुनाव में पहाड़ी और मैदानी का नारा भी जमकर गूंज रहा है जिसका सबसे बड़ा फायदा मास्टर दिनेश को मिलने की सम्भावना जताई जा रही है। मौजूदा समय में नगर निगम क्षेत्र में पहाड़ी मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा है जिस पर मास्टर दिनेश का पूरा दारोमदार बना हुआ है। राजनीतिक जानकार भी मानते हैं कि अगर पहाड़ी मतदाता एक होकर दिनेश मास्टर के पक्ष में वोट करता है तो उनकी जीत की सबसे ज्यादा सम्भावना बनी हुई है। जबकि मैदानी मूल के मतदाताओं की भी खासी तादात होने के चलते चुनाव दिलचस्प बन गया है। उक्रांद ने भी ऋषिकेश के विद्युत विभाग से सेवानिवृत्त एसडीओ महेंद्र सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया है लेकिन उक्रांद का एक बड़ा वर्ग मास्टर दिनेश के समर्थन में दिख है।

