गत् वर्ष संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार ने नयार नदी के नाम पर बनाई गई लघु फिल्म को देश का प्रथम पुरस्कार दिया था। यह फिल्म गंगा की सहायक नदियों को स्वच्छ रखने की थीम पर बनाई गई है। लेकिन उत्तराखण्ड का लोक निर्माण और वन विभाग इस थीम के उलट काम कर रहे हैं। सड़क निर्माण का मलबा सीधे नयार नदी में डालकर डंपिंग जोन के नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यह तब है जब सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट भी इस संबंध में सख्त निर्देश दे चुके हैं। नियमों और निर्देशों को वन विभाग कितनी गंभीरता से लेता है इसे एक अधिकारी की उस टिप्पणी से भी समझा जा सकता है जिसमें वह विकास की दुहाई दे नयार में मलबा डालने को जायज ठहरा रहे हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराखण्ड से खास लगाव रहा है। इसी लगाव के चलते उनके विजन में प्रदेश के विकास के लिए बड़ी-बड़ी परियोजनाएं और कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इनमें ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना और गंगा को स्वच्छ तथा निर्मल करने के लिए नमामि गंगे कार्यक्रम प्रदेश में चलाए जा रहे हैं। नमामि गंगे कार्यक्रम में गंगा और उसकी सहायक नदियों को इससे जोड़ा गया है जिससे इन गैर ग्लेशियर नदियों के सांस्कृतिक, आर्थिकी और जैव विविधता को बरकरार रखते हुए इन नदी घाटियों में विकास के कार्यों की रूपरेखा बनाई जा सके। इन सबके बावजूद दुर्भाग्य से उत्तराखण्ड प्रदेश के सरकारी विभागों के अधिकारियों द्वारा ही प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट को असफल करने का काम किया जा रहा है।

ताजा प्रकरण गंगा की सहायक नदी नयार से जुड़ा है। पौड़ी जिले के सतपुली बांघाट क्षेत्र में सड़क निर्माण के मलवे को सीधे नयार नदी में फेंका जा रहा है जिससे नदी को भारी नुकसान तो हो ही रहा है, साथ ही करीब 500 मीटर का हरा-भरा जंगल भी मलवे की भेंट चढ़ चुका है। इसके चलते नयार नदी में प्रदूषण बढ़ रहा है, साथ ही जलीय जीवांे को खतरा पैदा हो चुका है। उल्लेखनीय है कि जिले के बंघाट के समीप लंगूर पट्टी के सीला ग्रामसभा के गूईन गाड़ से नैनी मोटर मार्ग के लिए डेढ़ किमी सड़क काटी जा रही है। यह सड़क नयार नदी के ठीक ऊपर सैकड़ों फीट ऊंचाई में बनाई जा रही है। ‘दि संडे पोस्ट’ ने स्थलीय निरीक्षण के दौरान पाया कि इसके निर्माण में निकाले गए बड़े-बड़े बोल्डर और मलवे को सीधे नयार नदी में फेंका जा रहा है जिससे मलवे और बोल्डर के कारण यहां लगभग आधा किलोमीटर का वन क्षेत्र पूरा का पूरा समाप्त होकर लैंड स्लाईडिंग जोन में तब्दील हो चुका है। इसके कारण न सिर्फ नयार नदी में मलवे के गिराए जाने से प्रदूषण बढ़ा है, साथ ही ‘हिमालयन ट्राउड’ और ‘महाशीर’ जैसी नदियों को स्वच्छ रखने वाली मछली की प्रजाति पर भी भारी संकट पैदा हो चुका है।

यही नहीं सीला ग्रामसभा के गूईन गाड़ से बडेल गांव के साथ -साथ करीब दो दर्जन गांवों का आवागमन का एक मात्र पैदल मार्ग में सड़कों के बोल्डर और मलवे गिराए जाने से कई स्थानों पर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया है। हैरत की बात यह है कि महज एक-डेढ़ माह पूर्व लाखांे की लागत से इसकी मरम्मत का काम लोक निर्माण विभाग पोैड़ी द्वारा करवाया गया है। ऐसा नहीं है कि पौेड़ी लोक निर्माण विभाग और वन विभाग के अधिकारियों की घोर उदासीनता के चलते नयार नदी को मलवे का डंपिग जोन बनाए जाने का मामला पहली बार देखने में आया है। तकरीबन हर सड़क जो नयार नदी घाटी में बनाई गई है उसके द्वारा मलवे को नयार नदी में ही डाला जाता रहा है। देवप्रयाग सतपुली मोटर मार्ग हो या ब्यासघाट से डांडा नागराजा को जोड़ने वाली सड़क मार्ग के निर्माण का मामला हो, हर सड़क का मलवा डंपिंग जोन में फेके जाने की बजाय सीधे नयार नदी में ही डाला गया है। आज भी देवप्रयाग सतपुली मोटर मार्ग के निर्माण के घाव इस 42 किमी लंबी सड़क पर साफ देखे जा सकते हैं कि किस तरह से इन सड़कों के निर्माण में ठेकदारों को लाभ पहुंचाने के लिए नयार नदी को तो बर्बाद किया ही है, साथ ही हजारों हेक्टेयर वन भूमि को भी वृक्षविहीन किया गया है।

सबसे दिलचस्प बात यह हैे कि इस मामले की रिपोर्टिंग कर रहे ‘दि संडे पोस्ट’ संवाददाता को ठेकेदार के कर्मचारी द्वारा सीधे फोन किया गया और बताया गया कि पौेड़ी लोक निर्माण विभाग द्वारा ठेकेदार को कहा गया है कि वे संवाददाता से बात कर ले क्योंकि वे इस मामले में कुछ शिकायत कर रहे हैं। इससे साफ है कि पौड़ी लोक निर्माण विभाग द्वारा सड़क निर्माण के ठेकेदार पर नियमानुसार काम करने का आदेश देनेे की बजाय सवांददाता से बात करने का आदेश दिया गया जो कि स्पष्ट तौर पर यह बताने के लिए काफी है कि लोक निर्माण विभाग किस तरह से निर्माण के कार्य करने वाले ठेकेदारों के हित में काम कर रहा है।
अब नयार नदी जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नमामि गंगे प्रोजेक्ट में शामिल है, की बात करंे तो पौराणिक नारद गंगा नदी जिसे नयार नदी कहा जाता है। देव प्रयाग में भगीरथी और अलकनंदा नदी के संगम के बाद गंगा नदी बनती है। इसी गंगा नदी की सबसे पहली गैर हिमानी सानी ग्लेश्यिर सदानीरा नयार नदी सबसे बड़ी सहायक नदी है। दुधातोली पर्वत श्ंाृखला से एक साथ दो नदियां पूर्वी नयार और पश्चिमी नयार नदी निकलती है जो सतपुली के बड़खोलू दुनाव में एक साथ मिलकर बड़ी नदी का स्वरूप लेकर करीब तीस किमी ़की यात्रा करके ब्यास घाट में गंगा में मिल जाती है।

प्राचीनकाल से ही नयार नदी गढ़वाल क्षेत्र की सबसे बड़ी जीवन रेखा मानी जाती रही है। इसके तटों और घाटियों में बेहद उपजाऊ कृषि भूमि के साथ-साथ घने जंगल और अनेक जड़ी- बूटियों की भरमार रही है। ब्रिटिशकाल में नयार नदी को खास महत्व इसीलिए मिला कि तत्कालीन बिटिश गढ़वाल समूचे जिले को खाद्यान्न की आपूर्ति इन्हीं दोनों नयार नदियों की उपजाऊ जमीनों से होती थी। नयार नदी के तट पर बांघाट प्राचीनकाल से ही एक ढाकर मार्ग प्रचलित रहा है जिसका उल्लेख एटकिन्सन ने भी अपने हिमालयन गजेटियार में किया है। नयार नदी अपनी जैव विविधता और विशेष क्षेत्र के लिए कितनी महत्वपूर्ण है इसका प्रमाण इस बात से ही मिल जाता है कि इस नदी में ‘हिमालयन ट्राउड’ प्रजाति और ‘महाशीर’ मछलियों की प्रजातियों का सबसे बड़ा केंद्र है। जबकि यह नदी अन्य बड़ी नदियों के समान किसी ग्लेशियर से उत्पन्न नहीं है
बावजूद इसके जल में जलीय जीवों की प्रचुर भरमार रही है। स्वयं मतस्य विभाग द्वारा इसमें हिमालयन ट्राउड को प्रजनन के लिए सफल प्रोजेक्ट चलाया जिसके चलते अब इस क्षेत्र में ट्राउड मछली का भरा पूरा संसार है। पर्यटन विभाग नयार नदी में हिमालयन ट्राउड के लिए एंगलिंग के लाइसंेस भी जारी हुए हैं।

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा 26 सितंबर 2023 को ‘नदी गौरव कार्यक्रम’ के तहत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय संस्कृति एवं कला केंद्र नई दिल्ली में गंगा नदी और इसकी सहायक नदियों की बाबत स्वच्छता, पर्यावरण, जेैव विविधता और आर्थिकी आजीविका तथा संस्कृति विषयक तीन दिवसीय सेमिनार आयोजित किया था जिसमें उत्तराखण्ड में चल रहे गंागा नदी की स्वच्छता के लिए चलाए जा रहे नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत भारत की विभिन्न नदियों के ऊपर बनाए गए भित्ती चित्रों, लघु फिल्मों को प्रसारण किया गया। इन प्रसारित लघु फिल्मों में पौड़ी के युवा प्रणेश असवाल एव प्रज्ञा सिंह रावत द्वारा नयार नदी पर बनाई गई 7 मिनट की लघु फिल्म को प्रथम पुरस्कार दिया गया। इस फिल्म की थीम गंगा नदी को स्वच्छ रखने से पहले गंगा की सहायक नदियों को स्वच्छ रखने और इन नदियों की आर्थिकी, सामाजिकी तथा जैव विधिता का अक्षुण्ण रखते हुए योजनाएं बनाने पर जोर दिया गया, साथ ही जब तक सहायक नदियों को स्वच्छा नहीं रखा जाएगा तब तक गंगा नदी को स्वच्छ नहीं रखा जा सकता को प्रमुखता से उठाया गया।

हैरत की बात यह है कि सितंबर 2023 को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा गंगा की सहायक नदियों को स्वच्छ रखने की थीम पर लघु फिल्म नयार नदी को प्रथम पुरस्कार तो देती है लेकिन उसी उत्तराखण्ड प्रदेश का लोक निर्माण और वन विभाग महज दो माह में ही नयार नदी को ही बर्बाद करने के काम में जुट जाता है। सड़क निर्माण का मलवा सीधे नयार नदी में डाले जाने पर लोक निर्माण विभाग हैरतनाक चुप्पी साधे हुए है और इसके लिए जिला योजना के बजट को दोष दे रहा है जबकि वन विभाग जिसका आधा किमी ़का वन क्षेत्र पूरी तरह से बर्बाद हो रहा है, वह भी इसे सामान्य बात मान चुप्पी साधे हुए है। जबकि इस क्षेत्र में ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल मार्ग का काम भी दु्रत गति से चल रहा है और रेलवे द्वारा मलवे को यानित डंपिंग जोन में ही गिराया जा रहा है। इसके विपरीत लोक निर्माण विभाग वर्षों से नयार नदी को डंपिंग जोन बनाने का काम कर रहा है। जानकारों का कहना है कि हाईकोर्ट के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्माण का मलवा किसी भी सूरत में नदी-नालों में नहीं गिराया जा सकता, अगर कोई ऐसा करता है तो वह सीधे तौर पर कोर्ट की अवमानना का मामला बन जाता है।

बात अपनी-अपनी
आप बता रहे हैं कि लोक निर्माण विभाग पौड़ी इस सड़क जिला योजना की सड़क है, तो इसके बारे में डीएम पौड़ी से आपको बात करनी चाहिए। मैं तो राज्य योजना से संबंधित सड़कों के बारे में बता सकता हूं, लेकिन अगर सड़क निर्माण का मलवा नदी में डाला जा रहा है तो यह गलत है, बगैर अनुमति के इस प्रकार से मलवा नदियों में नहीं डाला जा सकता।
पंकज कुमार पांडे, सचिव, लोक निर्माण विभाग, उत्तराखण्ड

आपने मेरे संज्ञान में ये मामला दिया है, मैं इसकी जानकारी लेता हूं। अगर मामला ऐसा है कि नयार नदी में सड़क कटिंग का मलवा डाला जा रहा है तो निश्चित ही नियम अनुसार कार्यवाही होगी। नमामि गंगे प्रोजेक्ट में गंगा नदी के साथ-साथ गंगा की सहायक नदियों को भी शामिल किया गया है। इसलिए ऐसी नदियों को भी स्वच्छ और निर्मल करने के लिए कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
रणवीर सिंह चौहान, प्रोजेक्ट डायरेक्टर, नमामि गंगे, उत्तराखण्ड

मैं छुट्टी पर हूं। बाद में बात करूंगा।
सुशांत पटनायक, मुख्य वन संरक्षक, गढ़वाल

इस प्रकरण की जांच कराई जाएगी और यथोचित कार्यवाही भी होगी।
आशीष चौहान, जिलाधिकारी, पौड़ी

यह सड़क जिला योजना से स्वीकृत है और जिला योजना में ज्यादा बजट नहीं होता है इसलिए जिला योजना के कामों को ठेकेदार मनमर्जी से काम करते हैं। हर सड़क की डीपीआर में डंपिंग जोन आवश्यक है लेकिन जिला योजना में डंपिंग जोन का नियम नहीं होता और मलवा जहां सुविधा हो वहीं डाल दिया जाता है।
विवेक कुमार, सहायक अभियंता लोक निर्माण विभाग पौड़ी

जब सड़क बनेगी तो मलवा तो निकलेगा ही और उसे कहीं न कहीं तो फेका ही जाएगा। विकास चाहिए तो यह होगा ही। जरूरी नहीं है कि वह वन क्षेत्र हो।
नलिन पंत, लैंसडॉन वन प्रभाग के प्रभागीय वन अधिकारी

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