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सत्ता पर काबिज होने के बाद अपेक्षाओं पर खरे उतरते बोरिस जॉनसन

सत्ता पर काबिज होने के बाद अपेक्षाओं पर खरे उतरते बोरिस जॉनसन

पिछले महीने ब्रिटेन की सत्ता में दूसरी बार काबिज हुए बोरिस जॉनसन जनादेश की अपेक्षा पर खरे उतरते दिख रहे हैं। जॉनसन के सत्ता संभालते ही ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो गया है। जाहिर है कि 47 साल की लंबी अवधि तक यूरोपीय संघ से जुड़े रहने के कारण ब्रिटेन का संघ से गहरा लगाव और भावनात्मक रिश्ते बने होंगे। ऐसे में यह जिज्ञासा बनती है कि आखिर से अब ब्रिटेन में क्या हालात हैं। किस तरह का बदलाव आया? एक सवाल और अहम है कि यूरोपीय संघ से अलग होने की मूल वजह क्या थी?

यूरोपीय संघ से अलग होते ही बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ और उसके सभी संस्थानों से ब्रिटेन के झंडे हटा दिए गए हैं। ब्रिटेन में प्रधानमंत्री कार्यालय और उनके आवास 10 डाउनिंग स्ट्रीट पर विशेष लाइट जलाई गई। इस मौके को ऐतिहासिक बनाने के लिए 50 पेंस का एक विशेष सिक्का भी जारी किया गया। लंदन के संसद स्क्वायर के पास सैकड़ों लोगों ने एकत्र होकर देशभक्ति के गीत गाए गए। इस मौके पर समर्थकों ने भाषण दिए। ब्रिटेन में जगह-जगह पार्टियां हुईं।

यूरोपीय संघ से अलग होने को लेकर आर्थिक चेतावनियां धीमे-धीमे शुरू हुईं, लेकिन फिर चेतावनियों की बाढ़ आ गई। ईएमएफ, ओईसीडी, आईएफएस, बिजनेस प्रमोशन से जुड़ी सीबीआई जैसी बड़ी-बड़ी वित्तीय संस्थाओं ने चेताया कि आर्थिक स्थिति खराब होगी, बेरोजगारी बढ़ेगी और ब्रिटेन अलग-थलग पड़ जाएगा। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और तब के ब्रिटेन वित्त मंत्रालय ने भी ईयू से अलग होने के नुकसान बताए।

ईयू के साथ रहने का समर्थन करने वाले कई लोग मानते हैं कि ये चेतावनियां कुछ ज्यादा ही हो गईं। इसने ब्रिटेन के स्वाभिमान को झकझोर दिया। यहीं से यूरोपीय संघ से अलग होने की जड़ पड़ी। ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने की प्रक्रिया चार साल पुरानी है। 2016 में इस प्रक्रिया की शुरुआत हुई। हालांकि यह चार साल का सफर काफी अवरोधों भरा रहा। एक जनमत संग्रह के साथ इसकी शुरुआत हुई। साल 2016 में ब्रेक्जिट के तहत फैसला लेने के लिए जनमत संग्रह कराया गया था।

जनमत संग्रह में यूरोपीय संघ से अलग होने का 52 फीसदी लोगों ने समर्थन किया था, जबकि 48 फीसदी ने ईयू के साथ रहने का समर्थन किया था। इसके चलते ब्रिटेन में दो बार प्रधानमंत्री भी बदले गए। ब्रेक्जिट पर आए फैसले के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरान को प्रधानमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा। इसके बाद टेरीजा में देश की प्रधानमंत्री बनीं। इनका मुख्य दायित्व ब्रेक्जिट को लागू करवाना था। आखिरकार उनको भी पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद यह जिम्मेदारी वर्तमान प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के पास आई।

बोरिस जॉनसन ने ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के एक घंटे पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश जारी किया जिसमें उन्होंने लिखा ‘‘बहुत सारे लोगों के लिए ये उम्मीद की एक बहुत बड़ी घड़ी है, ऐसी घड़ी जो उन्हें लगा था कि कभी नहीं आएगी। हालांकि बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो चिंतित हैं और नुकसान होने जैसा महसूस कर रहे हैं।

निश्चित रूप से एक तीसरा समूह भी है जो सबसे अधिक परेशान था कि आखिर ये राजनीतिक गतिरोध कभी खत्म भी होगा या नहीं। मैं सभी की भावनाओं को समझता हूं और बतौर सरकार ये मेरी जिम्मेदारी है कि मैं इस देश को साथ लेकर चलूं और इसे आगे बढ़ाऊं।’’ दिसंबर में ब्रिटेन में हुए ऐतिहासिक चुनाव में मतदाताओं ने प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को शक्तिशाली नया जनादेश दिया ताकि पार्टी संसद में यूरोपीय संघ (ईयू) से ब्रिटेन के अलग होने के करार (ब्रेक्जिट) को अंतिम रूप दे सके।

ब्रिटिश संसद के 650 सदस्यीय निम्न सदन हाउस ऑफ कॉमन्स में कंजर्वेटिव पार्टी को 365 सीटों पर जीत मिली जो बहुमत से 79 सीटें अधिक है। इस बार ब्रिटेन में दशकों बाद शीत ऋतु में हुए मतदान में 67 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। विजयी रैली को संबोधित करते हुए जॉनसन ने इसे ब्रेक्जिट को लेकर जारी गतिरोध के लिए ‘नयी सुबह करार’ दिया था और दावा किया कि वह मतदाताओं की ओर से जताए गए ‘पवित्र विश्वास’ को खंडित नहीं होने देंगे।

विजयी रैली में अपनी महिला मित्र कैरी सायमंड और पालतू कुत्ते डिलयेन के साथ मौजूद जॉनसन ने कहा, ‘‘हमने कर दिखाया, हमने उसे गिरा दिया, हमने गतिरोध को खत्म कर दिया, हमने बंदिशें तोड़ दीं, हमने रास्ते के अवरोधों को खत्म कर दिया। जोश से भरा विजयी भाषण देते हुए उन्होंने कहा, हम मानते हैं कि इस चुनाव के साथ हमने दूसरे जनमत के सभी खतरों का खात्मा कर दिया। इस दौरान उन्होंने लोगों से ‘ब्रेक्जिट होगा’ के बार-बार नारे लगवाए थे।

इस चुनाव में विपक्षी लेबर पार्टी को केवल 203 सीटें मिली थी। यह पार्टी का दशकों बाद सबसे खराब प्रदर्शन रहा। यह 1935 के बाद लेबर पार्टी की सबसे करारी हार थी। पार्टी को उत्तरी इंग्लैंड में भी हार मिली। इस चुनाव में मतदाताओं ने ब्रेग्जिट के मुद्दे पर मतदान किया। अब सरकार में आने के एक महीने के भीतर ही जॉनसन की सरकार ने यूरोपीय संघ को ब्रिटेन से अलग कर अपने वादों पर खरे उतरने की कोशिश की है।

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