आगामी आम चुनाव की तैयारियों में जुटे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के सुर इन दिनों बदले-बदले से नजर आ रहे हैं। बीते दिनों हुई एक बैठक में उन्होंने पार्टी नेताओं को नसीहत दी कि बहुजन समाज पार्टी पर विवादित बयानबाजी करने से बचें और उनका सम्मान करें। उनके इस अंदाज के बाद अटकलें लगाई जा रही थी कि उन्होंने बसपा के इंडिया अलायंस में शामिल होने पर अपना रुख बदल लिया है और बसपा की इंडिया में एंट्री पर लगाई अपनी नामंजूरी को हटा दिया है। ऐसे में सवाल रहे थे कि क्या अब उत्तर प्रदेश में गठबंधन की नई तस्वीर देखने को मिल सकती है। इस बात को बल हाल में दिए गए बसपा सुप्रीमो के बयानों से मिल भी रहा था। बसपा प्रमुख मायावती ने पिछले दिनों एक प्रेस कॉफ्रेंस में कहा कि विपक्ष के गठबंधन में बीएसपी सहित अन्य जो भी पार्टियां शामिल नहीं हैं, उनके बारे में किसी का भी टिप्पणी करना उचित नहीं है। मेरी उन्हें सलाह है कि वह इससे बचें, क्योंकि भविष्य में कब किसको, किसकी जरूरत पड़ जाए कुछ भी कहा नहीं जा सकता। मायावती के इस बयान के बाद माना जा रहा था कि उनका यह बयान अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी को केंद्रित करके दिया गया है। लेकिन 15 जनवरी यानी अपने जन्मदिन के मौके पर मायावती ने बड़ा एलान कर इंडिया और एनडीए दोनों अलायंस में जाने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि बसपा आम अकेले चुनाव लड़ेगी। अलायंस में वोट ट्रांसफर नहीं होता। हमारी पार्टी चुनाव अकेले इसलिए लड़ती है क्योंकि इसकी कमान एक दलित के हाथों में है। हम किसी गठबंधन में नहीं जाएंगे। साल 2007 की तरह हमारी पार्टी इस चुनाव में भी बेहतर परिणाम देगी। गठबंधन करने पर हमारा वोट तो उन्हें मिल जाता है मगर उनका वोट खासकर सवर्ण वोट हमें नहीं मिलता है। गठबंधन में चुनाव लड़ने से बसपा को फायदा कम नुकसान ज्यादा होता

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