उत्तराखण्ड सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा संचालित राजीव गांधी अवासीय नवोदय विद्यालय की अव्यवस्थाओं ने अभिभावकों को इतना परेशान कर दिया है कि 300 से अधिक बच्चों को उनके अभिभावक वापस ले गए और कुछ दिनों बाद मात्र एक छात्र विद्यालय के छात्रावास में बचा। इतनी बड़ी संख्या में छात्र/ छात्राओं का विद्यालय छोड़कर चले जाना प्रदेश के शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्री और अट्टिाकारियों के मुंह पर किसी तमाचे से कम नहीं है। खासकर उस मंत्री पर जो स्वयं को मुख्यमंत्री पद की दौड़ में हमेशा आगे रखते हैं। आनन-फानन में सरकारी तंत्र अपनी किरकिरी होते देख सक्रिय हुआ, वर्षों से सोए जनप्रतिनिधि भी विद्यालय पहुंच गए। प्रभारी प्रधानाचार्य सहित कुछ लोगों की व्यवस्था के साथ अपनी काहिली पर पैचवर्क करने की कोशिश जरूर की। लेकिन इस प्रकरण ने ये दिखा दिया कि सरकारों का अपने दायित्व निर्वहन में नाकाम होना, शासन और निदेशालय स्तर के अधिकारियों का निर्णयों को लटकाना एक अच्छे शैक्षिक संस्थान की परिकल्पना को कैसे पलीता लगा देता है

उत्तराखण्ड राज्य अपनी स्थापना के 25वें वर्ष में प्रवेश करने की ओर अग्रसर है। बीते 24 वर्षों में हर क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास के दावे उत्तराखण्ड की सरकारों द्वारा समय-समय पर किए जाते रहे हैं। मूलभूत ढ़ांचे के विकास के साथ शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में विकास के दावों की एक लंबी फेहरिस्त उत्तराखण्ड के राजनीतिज्ञ जनता के सामने अक्सर रखा करते हैं। खास कर स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सरकारें लंबी छलांग लगाने का दावा करती हैं। लेकिन सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकों और शिक्षकों की कमी सरकारों के इन दावों को वो आईना दिखाती हैं जिनसे हमारे उत्तराखण्ड के राजनेता रूबरू होना नहीं चाहते, शायद विकास के इन झूठे दावों पर आईना इन्हें सच्चाई दिखा देता है। शिक्षा के क्षेत्र की बात करें तो दावों का एक बड़ा कागजी पुलिंदा जनता के सामने रख जरूर दिया जाता है लेकिन जमीनी हकीकत सच्चाई से कोसों दूर है। उत्तराखण्ड सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है असल उत्तराखण्ड दुरूह ग्रामीण व पर्वतीय क्षेत्रों में बसता है जहां शिक्षा के क्षेत्र में सरकारों की नाकामी साफ नजर आती है। स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव, शिक्षकों की कमी उत्तराखण्ड को शिक्षा का हब बनाने के उत्तराखण्ड सरकार के दावों का माखौल उड़ाते नजर आते हैं। 3 अगस्त को जब रामनगर में कुमाऊं विश्वविद्यालय छात्र महासंघ के कार्यक्रम में राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी युवाओं के विकास के लिए उत्तराखण्ड सरकार की उपलब्धियां गिनवा रहे थे उसके अगले ही दिन रामनगर से महज 40 किलोमीटर दूर स्थित राजीव गांधी नवोदय विद्यालय स्यात कोटाबाग से अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय में व्याप्त अव्यवस्थाओं के चलते वापस ले जाने के लिए टीसी मांग रहे थे। उत्तराखण्ड सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा संचालित राजीव गांधी नवोदय विद्यालय जो कि आवासीय विद्यालय है, की अव्यवस्थाओं ने अभिभावकों को इतना परेशान कर दिया है कि 300 से अधिक बच्चों को उनके अभिभावक वापस ले गए और कुछ दिनों बाद मात्र एक छात्र विद्यालय के छात्रावास में बचा। 300 से अधिक छात्र/ छात्राओं का विद्यालय छोड़कर चला जाना उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्री और अधिकारियों के मुंह पर किसी तमाचे से कम नहीं है। खासकर उस मंत्री पर जो स्वयं को मुख्यमंत्री पद की दौड़ में हमेशा आगे रखते हैं। आनन-फानन में सरकारी तंत्र अपनी किरकिरी होते देख सक्रिय हुआ, वर्षों से सोए जनप्रतिनिधि भी विद्यालय पहुंच गए। प्रभारी प्रधानाचार्य सहित कुछ लोगों की व्यवस्था के साथ अपनी काहिली पर पैचवर्क करने की कोशिश जरूर की। लेकिन इस प्रकरण ने ये दिखा दिया कि सरकारों का अपने दायित्व निर्वहन में नाकाम होना, शासन और निदेशालय स्तर के अधिकारियों का निर्णयों को लटकाना एक अच्छे शैक्षिक संस्थान की परिकल्पना कैसे पलीता लगा देता है। कभी उत्तराखण्ड के सभी राजीव नवोदय विद्यालयों में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की इंटर हाईस्कूल की बोर्ड परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ रिजल्ट देने वाला कोटाबाग का राजीव गांधी नवोदय विद्यालय आज जिस स्थिति में पहुंच गया है वो सरकार के चेहरे को बदनुमा बना देता है।
पंडित नारायण दत्त तिवारी के उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रहते उत्तराखण्ड सरकार ने केंद्र सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा खोले गए जवाहर नवोदय विद्यालय की तर्ज पर प्रदेश के हर जिले में एक राजीव गांधी नवोदय विद्यालय के नाम से आवासीय विद्यालय खोले थे। इन विद्यालयों को खोले जाने का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब परिवारों के बच्चों के लिए ऐसे विद्यालय खोले जाना जो पूर्णतया आवासीय और उन सुविधाओं से युक्त हो जो आम तौर पर ग्रामीण परिवार वहन करने में असमर्थ हो। इनमें शैक्षिक सुविधाओं के साथ-साथ गुणवत्तापूर्वक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना था जिससे ग्रामीण परिवेश के छात्र शहरी छात्रों के समकक्ष शिक्षा हासिल कर सकें। किराए के भवनों से शुरुआत में संचालित राजीव गांधी नवोदय विद्यालय धीरे-धीरे अपने परिसर में बने भवनों से संचालित होने लगे। विद्यालयों के शुरुआती समय में शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति पर रखा गया लेकिन तय किया गया कि इसका शैक्षिक व प्रशासनिक ढांचा जवाहर नवोदय विद्यालय की तर्ज पर होगा। शिक्षकों के पद सीधी भर्ती के माध्यम से भरे जाएंगे और राजीव गांधी नवोदय विद्यालय का अपना एक अलग कैडर होगा जिसके लिए एक नियमावली बनाई जानी थी। शुरुआत में विद्यालय स्तर पर पद सृजन का जो प्रस्ताव था उसमें प्रत्येक विद्यालय में एक प्राचार्य, उपप्राचार्य, पीजीटी-14, लाइब्रेरियन-1, मैट्रन पुरुष 1, मैट्रन महिला-1, मुख्य सहायक और स्टोर कीपर प्रतिनियुक्ति तथा कैटरिंग सहायक, स्टाफ नर्स। न्यूट्रिशियन (महिला), कनिष्ठ सहायक, लैब अटेंडेंट, सुरक्षा गार्ड, प्लम्बर, स्वच्छक, कुक और मैस सहायक के पद आउटसोर्स से भरे जाने थे। 2016 में नवोदय विद्यालय में पद सृजन का शासनादेश जारी किया गया था जिसके आधार पर एक नियमावली बननी थी लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी उस नियमावली का कहीं कोई पता नहीं है। इन विद्यालयों का अब ये हाल है कि यहां पर प्रतिनियुक्ति पर आए शिक्षक सात या आठ हैं। शेष पदों पर अतिथि शिक्षकों से काम चलाया जा रहा है। उत्तराखण्ड में भाजपा की 2022 से पहले की सरकार में और अब 2022 के बाद की सरकार में डाॅ. धन सिंह रावत ही शिक्षा मंत्री रहे हैं। 2021 में डाॅ. धन सिंह रावत ने दावा किया था कि दो माह के भीतर नवोदय विद्यालय की नियमावली आ जाएगी। अब वो शिक्षा मंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल में हैं शायद उन्हें 2021 का अपना वक्तव्य याद नहीं है या फिर निदेशालय स्तर पर अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। 2016 के एक शासनादेश पर 8 साल तक अमल न होना सरकार के शिक्षा के प्रति रवैये को दर्शाता है।

राजीव गांधी नवोदय विद्यालय कोटबाग में फैली अव्यवस्था ने अभिभावकों को जिस प्रकार अपने बच्चों को घर वापस ले जाने के लिए मजबूर किया है उसके लिए विद्यालय प्रशासन कम जिले से लेकर देहरादून का तंत्र ज्यादा जिम्मेदार है, खासकर शिक्षा निदेशालय के अधिकारी। राजीव गांधी नवोदय विद्यालय के माध्यम से सरकार ग्रामीण क्षेत्र के मेट्टाावी बच्चों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने का दावा तो करता है लेकिन राजीव गांधी नवोदय विद्यालय कोटाबाग की हकीकत इससे कोसों दूर है। 2017 के बाद से यहां स्थाई प्राचार्य नहीं है। जबकि स्थाई प्राचार्य की नियुक्ति यहां नितांत आवश्यक है। जहां 349 छात्र/छात्राऐं छात्रावास में रह रहे हों वहां छात्रावास अधीक्षक के पद स्वीकृत होने के बावजूद दोनों पद खाली हों तो समझा जा सकता है कि हमारा तंत्र कितना निकम्मा है। 160 छात्राओं के छात्रावास में छात्राओं की सुरक्षा को सरकारें कैसे खतरे में डाल सकती हैं? इतना ही नहीं स्वच्छकों के अभाव में शौचालयों की सफाई खुद छात्र/छात्राओं को करनी पड़ रही है। मैस का संचालन ठेकेदार के पास है जिस चलते खाने की गुणवत्ता पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। कार्यालय भी एक संविदाकर्मी के सहारे चल रहा है, जबकि कार्यालय स्तर पर तीन पद स्वीकृत हैं। एक अभिभावक ललित कबड़वाल बताते हैं कि पर्याप्त स्टाफ न होने से अनुशासनहीनता बढ़ गई है। उनके बेटे के सिर पर छात्रों के दो गुटों के चलते चोट आ गई। इसी प्रकार कई अभिभावक विद्यालय की अव्यवस्थाओंके चलते अपने बच्चों के भविष्य के प्रति आशंकित नजर में आए। अभिभावकों का आक्रोश सार्वजनिक होते ही सोया तंत्र जागृत हुआ। खास बात है कि जिलाधिकारी राजीव गांधी नवोदय विद्यालय की प्रबंधन समिति पदेन अध्यक्ष होता है। लेकिन अभिभावकों का आक्रोश सामने आने से पहले किसी भी डीएम ने भी कभी विद्यालय की व्यवस्थाओं को परखने का प्रयास नहीं किया। नैनीताल की विधायक सरिता आर्य के विधानसभा क्षेत्र में यह विद्यालय आता है लेकिन उन्होंने भी कभी इस विद्यालय की समस्याओं को देखने की जहमत नहीं उठाई। मामला सामने आने के बाद जरूर वो 2 लाख रूपए छात्रावास के लिए और 2 लाख जनरेटर के लिए विधायक निधि से घोषणा कर आईं।
बड़े पैमाने पर छात्र-छात्राओं का पलायन देख शिक्षा विभाग थोड़ा जागा जरूर है। डाॅ. नीरजा पाण्डे की प्रभारी प्रधानाचार्य के रूप में नियुक्त कर व्यवस्थाओं को दुरूस्त करने की कोशिश की गई है। साथ ही प्रशासनिक सहायक और पीआरडी जवानों की नियुक्ति कर दी गई है। प्रधानाचार्य डाॅ. नीरजा पाण्डे का कहना है जल्दी ही सभी व्यवस्थाएं दुरुस्त कर ली जाएंगी। जहां अक्सर प्रशासनिकतंत्र ढ़ीला रहता है लेकिन यहां पर एसडीएम कालाढूंगी रेखा कोहली पूरी तरह सक्रिय दिखीं। शिक्षक अभिभावक संघ के निवर्तमान अध्यक्ष नवीन चन्द्र भट्ट, पूर्व अध्यक्ष मुकेश त्रिपाठी व प्रभाकर ढ़ौंडियाल ने सकारात्मक व रचनात्मक भूमिका निभाई।
राजीव गांधी नवोदय विद्यालय कोटबाग का प्रकरण तो एक बानगी है शिक्षा विभाग के नकारेपन का राज्य के अन्य नवोदय विद्यालय की कमोबेश यही हालत है जिनकी समस्याओं के मूल में निदेशालय स्तर के अधिकारी हैं जिनकी दिलचस्पी समस्याओं को सुलझाने में न होकर उन्हें लटकाए रखने में हैं। अगर यही हालत रहे तो ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिभाशाली छात्र/छात्राओं के लिए बने इन विद्यालयों में ताला लगते देर नहीं लगेगी।
बात अपनी-अपनी
हमारे जितने भी आवासीय विद्यालय हैं, जितने भी राजीव गांधी नवोदय विद्यालय हैं उनके लिए एसओपी जारी की गई है। अब मुझे नहीं लगता कहीं कोई दिक्कत है।
डाॅ. धन सिंह रावत, शिक्षा मंत्री, उत्तराखण्ड सरकार
राजीव गांधी नवोदय विद्यालय में अव्यवस्थाओं को सुधारने के लिए मैंने एक माह का वक्त दिया है। वहां सुरक्षा गार्ड नहीं थे। पीआरडी से दो सुरक्षाकर्मियों की वहां तैनाती कर दी गई है। एक माह बाद मैं वहां की व्यवस्थाओं को देखूंगा और किसी भी प्रकार की कमी पाए जाने पर सम्बंधित लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
दीपक रावत, कमिश्नर कुमाऊं
रिक्त पदों पर तैनाती के लिए शासन से पत्राचार किया है। महिला पीआरडी और स्वछक की तैनाती कर दी गई है।
रेखा कोहली, एसडीएम, कालाढूंगी
विद्यालय की अव्यवस्थाओं के चलते छात्र-छात्राओं का भविष्य अनिश्चित हो गया है। आवासीय विद्यालय को जिस गम्भीरता से लेना चाहिए। उस गम्भीरता से सरकार ले नहीं रही है। सरकार को यहां की व्यवस्थाओं को दुरुस्त कराने के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए।
कुलदीप तड़ियाल, कनिष्ठ ब्लाॅक प्रमुख, कोटाबाग

