बारह अक्टूबर, 1993 को मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत देश में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई थी। इस आयोग को मानवाधिकारों की रक्षा करने के लिए असीमित अधिकार दिए गए हैं। केंद्रीय कानून की तर्ज पर देश के सभी राज्यों में विधानसभा द्वारा राज्य मानवाधिकार आयोग बनाए गए हैं। 9 जनवरी 2003 को उत्तराखण्ड में भी राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया। केंद्रीय आयोग की भांति राज्य आयोग भी संवैधानिक संस्था है और इसे मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामलों की जांच के लिए असीमित अधिकार प्राप्त हैं। उत्तराखण्ड में यह आयोग लेकिन सफेद हाथी बनकर रह गया है। देवभूमि में हालात इतने विकट हैं कि राज्य की नौकरशाही इस आयोग द्वारा जारी निर्देशों और नोटिसों का जवाब तक देना पसंद नहीं करती है। देहरादून-मसूरी विकास प्राधिकरण से जुड़ा एक प्रकरण साबित करता है कि नौकरशाही पूरी तरह बेलगाम और राज्य की संवैधानिक संस्थाएं पूरी तरह बेअसर हो चली हैं

उत्तराखण्ड में मानव अधिकार आयोग के आदेश आम जनता पर ही लागू होते रहे हैं जबकि नौकरशाही और सरकारी संस्थाओं की नजर में मानवाधिकार आयोग की कोई अहमियत नहीं है और न ही आयोग के आदेशों का पालन किया जाता है। यहां तक कि आयोग द्वारा जारी नोटिसों को भी महत्व नहीं दिया जाता। जी हां, इस पहाड़ी प्रदेश में ऐसा ही होता आया है जिसमें राज्य मानवाधिकार आयोग को नकारने का काम प्रदेश का सरकारी सिस्टम कर रहा है। राज्य मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी किए गए नोटिसों पर कोई जवाब तक देने से परहेज करने वाले देहरादून-मसूरी विकास प्राधिकरण के अधिकारियों पर आखिरकार आयोग ने अपना सख्त रुख अपनाते हुए प्राधिकरण के सचिव और उपाध्यक्ष के साथ-साथ गढ़वाल कमीश्नर को भी नोटिस जारी किया है। आयोग द्वारा यह नोटिस दो वर्ष से चली आ रही सुनवाई पर आख्या प्रस्तुत करने के लिए जारी 6 नोटिसों के बाद भी जवाब दाखिल न करने पर उठाया गया कदम है।

क्या है मामला

अप्रैल 2022 में तत्कालीन नगर निगम पार्षद भूपेंद्र सिंह कठैत के नेतृत्व में 17 पार्षद एमडीडीए के सचिव से मिले थे। उन्होंने एक ज्ञापन प्राधिकरण के सचिव को सौंपा जिसमें मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकारण पर आरोप लगाया गया था कि देहरादून के घोरण क्षेत्र में नगर निगम की स्वामित्व वाली भूमि एमडीडीए के अधिकारियों ने एक एनजीओ को दे दी है। पार्षदों ने यह भी दावा किया कि देहरादून में आवासीय जमीनों पर बड़े-बड़े व्यवसायिक मॉल और होटल, कॉम्प्लेक्सों का निर्माण प्राधिकरण के अधिकारियों की मिलीभगत से सभी नियम-कानूनांे को ताक पर रखकर किया जा रहा है।

यही नहीं पार्षदों ने तो यह भी आरोप लगाया है कि कई आवासीय क्षेत्रों में अवैध मॉल, फ्लैट और भूमि की प्लॉटिंग का काम खुलेआम किया जा रहा है जिसके कारण इन क्षेत्रों में पेयजल, सीवर और बरसाती पानी की निकासी तक बुरी तरह से प्रभावित हो रही है, साथ ही पार्किंग की व्यवस्था न होने से सड़कों और गलियों में वाहनों की पार्किंग होने से समस्या होने लगी है। तत्कालीन सचिव और पार्षदों के बीच इस मामले को लेकर खासी बहस और हंगामा तक हुआ था। एमडीडीए ने लेकिन पार्षदों के ज्ञापन पर कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया।

देहरादून के आरटीआई एक्टिविस्ट भूपेंद्र कुमार लक्ष्मी ने नगर निगम के पार्षदों के ज्ञापन बाद कई मामलों की जानकारियां एकत्र कर इन सभी मामलों की शिकायत 11 अप्रैल 2022 को राज्य मानवाधिकार आयोग में प्रमाणों के साथ की। आयोग द्वारा इस मामले को गंभीर मानते हुए 21 अप्रैल 2022 को सचिव एमडीडीए को नोटिस जारी किया कि ‘एमडीडीए के अधिकारियांे द्वारा सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा कराने तथा गलत तरीके से नक्शे पास कराने के सम्बंध में शिकायत प्रस्तुत की गई है। इस सम्बंध में सचिव मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण अपनी आख्या 4 सप्ताह में आयोग के समक्ष प्रस्तुत करे। पत्रावली 6 जुलाई 2022 को प्रस्तुत हो।’

राज्य मानवाधिकार आयोग के 21 अप्रैल 2022 को जारी नोटिस को एमडीडीए प्रशासन ने कोई महत्व देना तो दूर आयोग के नोटिस का जवाब तक देना उचित नहीं समझा और न ही मामले की पत्रावली आयोग को प्रस्तुत की। इस पर आयोग ने फिर से 28 सिंतबर 2022 को सुनावाई की तिथि तय करते हुए पत्रावली प्रस्तुत करने का आदेश दिया। 28 सितम्बर 2022 को भी एमडीडीए प्रशासन द्वारा आयोग की सुनवाई में कोई पत्रावली प्रस्तुत नहीं की। तीसरी बार आयोग ने एमडीडीए सचिव को नोटिस जारी किया जिसका एमडीडीए सचिव ने कोई भी जवाब नहीं दिया।

आयोग द्वारा 22 दिसम्बर 2022 और उसके बाद 5 अप्रैल 2023 को भी एमडीडीए सचिव को पत्रावली आयोग के समक्ष प्रस्तुत करने के आदेश दिए। अप्रैल 2022 से लेकर अप्रैल 2023 तक एक वर्ष का समय आयोग की सुनवाई में ही बीत गया लेकिन एमडीडीए सचिव द्वारा आयोग में पत्रावली कभी प्रस्तुत नहीं की गई।

राज्य मानवाधिकार आयोग द्वारा इस मामले में फिर से 2 अगस्त 2023 को पांचवा नोटिस जारी किया जिसकी खुली अवहेलना करते हुए एमडीडीए द्वारा आयोग में फिर कोई पत्रावली प्रस्तुत नहीं की। मानवाधिकार आयोग द्वारा 5 दिसंबर 2023 को छटवां नोटिस जारी किया और 15 अप्रैल 2024 को सुनवाई की तारीख तय की गई। इस बार भी सुनवाई पर एमडीडीए सचिव आयोग के समक्ष उपस्थित नहीं हुए।
गौर करने वाली बात यह है कि पूर्व में आयोग द्वारा दिए गए चार नोटिस में एमडीडीए सचिव को स्वयं या अपने प्रतिनिधि द्वारा पत्रावली आयोग के समक्ष प्रस्तुत करने का उल्लेख किया लेकिन चारों नोटिस के बाद भी जब सचिव साहब ने कोई जवाब तक नहीं दिया तो आयोग ने सीधे सचिव एमडीडीए को ही पत्रावली स्वयं प्रस्तुत करने का आदेश दिया। बावजूद इसके एमडीडीए सचिव द्वारा 15 अप्रैल को आयोग के छठे आदेश का भी पालन नहीं किया।

अपने छठे नोटिस के बाद भी एमडीडीए सचिव द्वारा आदेशों की उलाहना करने पर आयोग के अध्यक्ष गिरधर सिंह धर्मशक्तू द्वारा सचिव एमडीडीए की आयोग समक्ष उपस्थिति सुनिश्चित कराने के लिए एमडीडीए के अध्यक्ष को नोटिस जारी किया जिसमें उल्लेख किया गया है कि सचिव एमडीडीए को नोटिस गढ़वाल मंडल आयुक्त द्वारा तामील करवाया जाए तथा वह आवश्यक रूप से आख्या पत्रावली 21 अगस्त 2024 को तय तिथि तक आयोग के समक्ष प्रस्तुत करें। गौरतलब है कि गढ़वाल आयुक्त ही एमडीडीए के अध्यक्ष भी हैं।

राज्य मानवाधिकार आयोग के आदेश और नोटिस को रद्दी की टोकरी में डालने वाला एमडीडीए प्रशासन अब 21 अगस्त 2024 को मामले की आख्या और पत्रावली आयोग के समक्ष प्रस्तुत करता है या नहीं यह तो सुनवाई की तारीख में ही पता चलेगा लेकिन इस मामले में एक बात तो साफ हो चुकी है कि प्रदेश का सरकारी तंत्र और नौकरशाही संवैधानिक संस्थाओं के मान-सम्मान को भी ताक पर रखकर काम कर रहे हैं। हालांकि सवाल राज्य मानवाधिकार आयोग पर भी खड़े हो रहे हैं कि राज्य सरकार के एक प्राधिकरण के सचिव को लगातार 6 बार नोटिस जारी होते रहे और आयोग अगली सुनवाई की तिथि तय करता रहा और सचिव को अगली तिथि पर पत्रावली प्रस्तुत करने का आदेश देता रहा। जबकि इस मामले में सचिव एमडीडीए को राज्य मानवाधिकार आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की गरिमा के साथ खिलवाड़ करने के लिए कठोर निर्णय लेना चाहिए था।

आरटीआई एक्टिविस्ट भूपेंद्र कुमार का कहना है कि एमडीडीए आकंठ तक भ्रष्टाचार और नियमों के साथ खिलवाड़ करने का संस्थान बन चुका है। सरकारी सिस्टम और इसके अधिकारी इतने निरंकुश हो चुके हैं कि राज्य मानवाधिकार आयोग के नोटिसों और आदेशों का भी पालन नहीं कर रहे हैं। वे कहते हैं ‘मेरे द्वारा दी गई शिकायत के प्रकरण में एमडीडीए अपनी आख्या देने पर बुरी तरह से फंस सकता है क्योंकि एमडीडीए के अधिकारियों द्वारा ही सांठ-गांठ करके शहर का न सिर्फ पर्यावरण बिगड़ा है, बल्कि अवैध निर्माणों की बाढ़-सी आई है। इनको सरकारी तंत्र से पूरा सरंक्षण मिलता रहा है। आवासीय क्षेत्रों में बड़े-बड़े व्यवसायिक निर्माण मिलीभगत से ही हुए हैं और सरकारी जमीनो ंपर कब्जे भी एमडीडीए प्रशासन के संरक्षण में हो रहे हैं। अगर राज्य मानवाधिकार आयोग में मामलों की पत्रावली प्रस्तुत की जाती तो निश्चित ही अधिकारियों पर कार्यवाही तय है। इसी से बचने के लिए आयोग के नोटिसों का जवाब नहीं दिया जा रहा है।’

प्रदेश में नौकरशाही के निरंकुशता के कई मामले पहले भी सामने आ चुके हैं जिनको लेकर समय-समय पर मुख्य सचिव स्तर से भी कड़े आदेश जारी हो चुके हैं। आज हालात यहां पहुंच चुके हैं कि अपने प्रमोशन को लेकर विभागीय अधिकारी स्वयं ही अपने हित में निर्णय ले रहे हैं। पूर्व में लोक निर्माण विभाग के मुखिया और विभागीय मंत्री सतपाल महाराज के बीच हुआ विवाद इस प्रदेश की अफसरशाही की कार्यशैली का सबसे बड़ा प्रमाण है जिसमें प्रमोशन की फाइल पर मंत्री के फर्जी हस्ताक्षर कर दिए गए थे। हैरत की बात यह है कि इस मामले में मुकदमा तक दर्ज किया गया लेकिन हुआ कुछ नहीं और आरोपित अधिकारी आसानी से सेवानिवृत भी हो गया।

अब देखना दिलचस्प होगा कि 21 अगस्त 2024 को इस मामले की सुनवाई में एमडीडीए सचिव पत्रावली आयोग के समक्ष रखते हैं या नहीं या फिर मानवाधिकार आयोग को फिर से 7वां नोटिस जारी करना पड़ेगा। दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा समय में एमडीडीए में सचिव का पद रिक्त ही चल रहा है। लोकसभा चुनाव से पूर्व मोहन सिंह वर्निया एमडीडीए के सचिव थे जिनका स्थानांतरण कर दिया गया था लेकिन कई माह बीत जाने के बाद भी एमडीडीए में सचिव की तैनाती नहीं हो पाई है। वर्तमान में एमडीडीए के उपाध्यक्ष बंशीधर तिवारी हैं और गढ़वाल मंडल आयुक्त विनय शंकर पाण्डे पदेन अध्यक्ष हैं।

बात अपनी-अपनी
जो तारीख मिली है उसमें कोर्ट जाएंगे, जवाब दिया जाएगा। आप इस बारे में मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण के वी.सी. से बात कीजिए।
विनय शंकर पांडे, आयुक्त गढ़वाल मंडल मेरे संज्ञान में यह मामला नहीं है और न ही मेरे कार्यकाल में ये हुआ, मैं सितंबर 2022 को एमडीडीए मंे आया था। आप कह रहे हैं कि मानवाधिकार आयोग ने 6 नोटिस भेजे हैं तो ये भी मेरे संज्ञान में कभी आया ही नहीं है तो मैं क्या कमेंट्स दूं।
मोहन सिंह वार्निंया, पूर्व सचिव, मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण हमने जो शिकायत की थी वह पूरी तरह से सच है। आज भी आप देख सकते हैं कि एमडीडीए ने क्या किया हुआ है। बेहिसाब आवासीय कॉलोनियां, मॉल, होटलों का निर्माण हो चुका है लेकिन इनमें न तो सीवर लाइनें हैं और न ही पेयजल लाइनें। पार्किंग के नाम पर सड़कांे पर गाड़ियां खड़ी हो रही हैं जिनका पैसा तक लिया जा रहा है। निगम की जमीन को एमडीडीए ने ही खुर्द-बुर्द किया हुआ है। 21 अगस्त को मानवाधिकार आयोग में तारीख है, हम भी आयोग में जाएंगे।
भूपेंद्र सिंह कठैत, निवर्तमान पार्षद, नगर निगम देहरादून

एमडीडीए ने समूचे देहरादून की आबोहवा में जहर घोल दिया है। कभी रहने के लिए विख्यात यह नगर अब कंक्रीट के जंगल में बदल गया है। जिस एमडीडीए को इस नगर के विकास और आवासीय योजना के लिए बनाया गया था वही अब इसे उजाड़ने पर तुला हुआ है। बिल्डरांे, भूमि के कारोबारियों साथ सांठ-गांठ करके जिन स्थानों पर नक्शे स्वीकृत नहीं हो सकते उन्हीं स्थानों पर बड़े-बड़े मॉल, होटल, शापिंग कॉम्पलेक्स, आवासी सोसायटी, विल्डर्स फ्लैट आसानी से खड़े हो रहे हैं। आवासीय भूमि पर व्यवसायिक निर्माण तो सामान्य बात हो चुकी है। मैंने कई मामले सूचना के अधिकार कानून से उजागर किए हैं लेकिन कार्यवाही के नाम पर कुछ नहीं होता। रही-सही कसर एमडीडीए ने स्मार्ट सिटी के नाम पर नगर की हरियाली को ही खत्म कर दिया है। मैं इस मामले में रूकने वाला नहीं हूं। 21 अगस्त को देखता हूं कि मानावधिकार आयोग में एमडीडीए पत्रावली प्रस्तुत करता है या नहीं। अगर नहीं होता तो मैं इस मामले को हईकोर्ट में भी लेकर जाउंगा।
भूपेंद्र कुमार लक्ष्मी, आरटीआई एक्टिविस्ट, देहरादून

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