नगर निकाय चुनावों के मद्देनजर अनंतिम आरक्षण उत्तराखण्ड के उन नेताओं को नहीं भा रहा है जो पिछले कई सालों से मेयर बनने का ख्वाब पाले हुए थे। कुछ नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में इस पर सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर ही असहमति के स्वर गूंज रहे हैं। हल्द्वानी में ओबीसी सीट घोषित हुई है लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के लिए यहां अपना उम्मीदवार उतारना चुनौती बना हुआ है। ऐसे में एक कांग्रेस समर्थित व्यापारी नेता की भाजपा में जॉइनिंग भी चर्चाओं में है
उत्तराखण्ड नगर निकाय चुनावों के लिए मेयर, नगर पालिका अध्यक्ष और नगर पंचायत अध्यक्ष पदों के लिए आरक्षण की अनंतिम अधिसूचना जारी होने के साथ ही नगर निकाय चुनावों की शीघ्र होने की संभावना के साथ राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों ने चुनाव के लिए कमर कस ली है। उत्तराखण्ड में नगर निकायों का कार्यकाल 2023 में पूरा हो गया था। उसके बाद इन निकायों पर सरकार ने प्रशासक बैठा दिए हैं। एक वर्ष पूरा हो जाने के बाद भी सरकार नगर निकाय चुनाव सम्पन्न नहीं करा पाई है। अन्य पिछड़ा वर्ग की स्थिति स्पष्ट न हो पाना इस देरी की वजह बताई गई। राजभवन से अन्य पिछड़ा वर्ग से सम्बंधित अध्यादेश की मंजूरी के साथ नगर निकाय चुनावों की राह तो खुल गई लेकिन नगर निकायों में आरक्षण का जो स्वरूप सामने आया है उसने कई दावेदारों के अरमानों पर पानी फेर दिया है, विशेष रूप से सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए। उत्तराखण्ड में वर्तमान में 100 नगर निकाय हैं जिनमें 11 नगर निगम हैं। इनमें रूद्रपुर, काशीपुर, देहरादून, कोटद्वार और श्रीनगर सामान्य, हरिद्वार ओबीसी महिला, हल्द्वानी ओबीसी, रूड़की, पिथौरागढ़ अल्मोड़ा महिला और ऋषिकेश नगर निगम में मेयर पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किए गए हैं। नगर पालिका अध्यक्ष पदों की बात करें तो 43 नगर पालिकाओं में 16 पद सामान्य हैं 8 महिलाओं, 6 अनुसूचित जाति 1 अनुसूचित जनजाति, 8 अन्य पिछड़ा वर्ग तथा 4 अन्य पिछड़ा वर्ग (महिला) के लिए आरक्षण का प्रस्ताव है। नगर पंचायत अध्यक्षों की 46 सीटों में 16 अनारक्षित, 15 ओबीसी, 8 महिला, 6 अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रखने का प्रस्ताव है। आपत्तियों को सुनने के बाद अंतिम सूची जारी होगी इसमें बड़े फेरबदल की संभावना कम ही है। लेकिन इस बार इतना जरूर है कि बड़ी संख्या में ओबीसी आरक्षण ने चुनावों की तस्वीर काफी हद तक बदल दी है।
नगर निकाय चुनावों में आरक्षण की अनंतिम सूची ने राजनीतिक हल्कों में एक तूफान सा खड़ा कर दिया है। खासकर हल्द्वानी और ऋषिकेश के आरक्षण ने सभी को चौंकाया है। विपक्षी दलों का इस आरक्षण का विरोध तो समझ आता है लेकिन जब विरोध के स्वर सत्तारूढ़ दल के अंदर से उभरने लगे तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। भाजपा के मुखर विधायक मुन्ना सिंह चौहान उन लोगों में प्रमुख हैं जिन्होंने इस आरक्षण पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि ये भी सच है कि भाजपा के अंदर उठने वाले विरोध के सुरों में उतनी ताकत अब बची नहीं है कि वो बगावत का रूप ले सकें। अनुशासित दल के नाम पर विरोध के सुर अब प्रभावी नहीं रहते। भाजपा ने आरक्षण पर आपत्ति जताने वालों के शहरी विकास विभाग में अपनी आपत्ति दर्ज करने को कहा है। ऋषिकेश, हल्द्वानी, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ नगर निगमों के आरक्षण पर भाजपा के अंदर से ही असंतोष की आवाजें आ रही हैं। वहीं नगर पालिका और नगर पंचायतों में प्रस्तावित आरक्षण ने भाजपा और तैयारी कर रहे कई चेहरों को असहज कर दिया है। अब अनंतिम आरक्षण की स्थिति क्या होगी ये आपत्तियों की सुनवाई के बाद ही पता चलेगा लेकिन इसने नगर निकायों में सपना संजोए कई नेताओं के सपनों को तोड़ दिया है।
हल्द्वानी नगर निगम की बात करें तो यहां मेयर की सीट अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित होने ने सबको चौंकाया है। भारतीय जनता पार्टी के अंदर किसी को ये अंदेशा नहीं था कि हल्द्वानी मेयर का पद पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित कर दिया जाएगा वो भी उन परिस्थितियों में जब भाजपा के पास ओबीसी का कोई स्थापित नेता या कहें बड़ा चेहरा नहीं है। हालांकि आंकड़ों के आधार पर इसे सही ठहराने की कोशिश की जा सकती है लेकिन इसे भाजपा की अंदरूनी राजनीति से भी जोड़ा जा रहा है। आंकड़ों की बात करें तो 2018 में हल्द्वानी के 60 वार्डों में 2 लाख 13 हजार के आस-पास जनसंख्या थी जिनमें लगभग 47 हजार ओबीसी मतदाता थे जो 22 प्रतिशत के आस-पास होते हैं। 2024 में हल्द्वानी नगर निगम क्षेत्र में आने वाली संख्या लगभग 2 लाख 80 हजार है जबकि ओबीसी मतदाता 52 हजार के लगभग हैं जोकि 19 प्रतिशत होते हैं। हालांकि ओबीसी आबादी बढ़ने के साथ ओबीसी आरक्षित वार्डों की संख्या 8 से बढ़कर 11 हो गई। आंकड़ों के इतर राजनीतिक दृष्टि से आकलन करें तो इसमें भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी राजनीति से भी इनकार नहीं किया जा सकता। ये सवाल भारतीय जनता पार्टी के अंदर भी तैर रहा है कि जब आपके पास ओबीसी का बड़ा चेहरा कोई नहीं है तो फिर इसे अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित करने का औचित्य क्या है। इस नए आरक्षण की कल्पना भाजपा के अंदर शायद इसलिए किसी ने नहीं की होगी क्योंकि भाजपा के अंदर सामान्य पुरुष और महिला प्रत्याशियों ने जो तैयारियां की थीं उनको देखकर लगता है कि भाजपा के अंदर भी इस प्रकार का पूरा भरोसा था कि या तो हल्द्वानी सीट सामान्य होगी या फिर महिला आरक्षित। निवर्तमान मेयर जोगेंद्र रौतेला, प्रदेश कार्यालय सचिव कौस्तुभानंद जोशी, प्रमोद टोलिया, बेला टोलिया, विजय लक्ष्मी चौहान, कल्पना बोरा सहित कई नेता मेयर की दौड़ में थे। भाजपा से 25 और कांग्रेस के अंदर 31 लोग मेयर के दावेदार थे। खास बात ये है कि इनमें से मुश्किल से ही कोई दावेदारी अन्य पिछड़ा वर्ग के दावेदार के रूप में हुई होगी। शायद यही कारण है कि प्रमुख व्यापारी नेता नवीन चंद्र वर्मा के रूप में भाजपा को एक चेहरा बाहर से लाना पड़ा जो भाजपा से मेयर पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। कभी डॉ. इंदिरा हृदयेश के निकटतम रहे नवीन चंद्र वर्मा का भाजपा में जाना कांग्रेस के लिए एक झटका जरूर हो सकता है लेकिन इसने भाजपा के अंदर दबी गुटबाजी की परतें जरूर उधेड़ दी हैं।
नवीन चंद्र वर्मा द्वारा स्वयं भाजपा में शामिल होने की जानकारी देने के बाद अचानक सदस्यता ग्रहण कार्यक्रम रूक जाना और अगले दिन एक सादे समारोह में उनका भाजपा की सदस्यता ग्रहण करना भाजपा के अंदर के हालातों को बयां कर देता है। खास बात ये है कि नवीन चंद्र वर्मा के भाजपा में शामिल होते समय कई बड़े चेहरे नदारद थे जैसे निवर्तमान मेयर जोगेंद्र रौतेला पूर्व कैबिनेट मंत्री व कालाढूंगी से विधायक बंशीधर भगत की अनुपस्थिति कई सवाल खड़े करती है। दरअसल पुष्कर सिंह धामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद हल्द्वानी में ऐसे नेताओं का एक वर्ग खड़ा हुआ है उसका भले ही जमीनी आधार न हो लेकिन वो कई मायनों में पार्टी के अंदर अपनी बड़ी भूमिका निभा रहा है। नवीन चन्द्र वर्मा को भाजपा में शामिल करना उसकी रणनीति का परिणाम है जिसमें भाजपा के अंदर उठ रहे असंतोष को दरकिनार कर दिया गया। नवीन चन्द्र वर्मा हल्द्वानी के प्रतिष्ठत व्यापारी होने के साथ समाज सेवी भी हैं जिनकी छवि साफ सुथरी है। निश्चित तौर पर वो मेयर के लिए एक मजबूत चेहरा हैं। जहां कांग्रेस का सवाल है उसके लिए चेहरा ढूंढ़ना आसान नहीं होगा हालांकि कांग्रेस, भाजपा के एक नेता से संपर्क होने की बात जरूर कह रही है लेकिन उसमें वो कितना सफल हो पाएगी ये देखना होगा। पूर्व दर्जा राज्य मंत्री सुहेल अहमद सिद्दीकी और पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष लाल सिंह पंवार ने कांग्रेस से दावेदारी की बात कही है। नगर निकायों में आरक्षण की अंतिम सूची जारी होने के बाद ही निकाय चुनावों की अधिसूचना दिसम्बर माह के अंत में जारी होने की उम्मीद है। चुनावों की घोषणा होने तक सभी राजनीतिक पार्टियों और अन्य दावेदारों के बीच ऊहापोह की स्थिति रहेगी असली तस्वीर चुनावों की घोषणा के बाद ही नजर आएगी।

