देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस वर्तमान में चारों तरफ आंतरिक कलह से जूझ रही है। पूरे देश में केवल तीन राज्यों में पार्टी अपने बलबूते पर सरकार में है। लेकिन इन तीनों राज्यों हिमाचल, तेलंगाना और कर्नाटक में पार्टी बुरी तरह आंतरिक कलह से जूझ रही है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री की कुर्सी की लड़ाई जगजाहिर है। केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद राज्य में सत्ता के बंटवारे का फॉर्मूला तय हुआ था। डीके शिवकुमार खेमा दावा करता है कि ढाई-ढाई साल के रोटेशनल सीएम का फॉर्मूला तय हुआ था। इस कारण बीते कुछ दिनों से डीके शिवकुमार खेमा बार-बार परोक्ष तौर पर सीएम की कुर्सी पर अपना दावा ठोकता रहा है। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि सिद्धारमैया अपनी कुर्सी कितने दिनों तक बचा पाएंगे? इस बीच मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के राजनीतिक सलाहकार वरिष्ठ नेता बीआर पाटिल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इससे राज्य कांग्रेस के बीच जारी तकरार एक बार फिर सामने आ गई है। पाटिल को सिद्धारमैया खेमा का नेता माना जाता है। लेकिन राज्य में कांग्रेस के कई खेमों में बंटे होने की वजह से उनके लिए कैबिनेट में जगह नहीं बनी। पिछले महीने ही सिद्धारमैया खेमे के नेताओं ने एक डिनर पार्टी की थी जिसके बाद यह ताजा राजनीतिक संकट पैदा हुआ है।

पाटिल कलाबुरगी जिले के अलांद से चार बार के विधायक हैं। उन्होंने सरकार और पार्टी में उचित महत्व नहीं मिलने के कारण इस्तीफा दिया है। कलाबुरगी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का इलाका है। यहीं से खड़गे के बेटे प्रियांक उनकी राजनीतिक विरासत सम्भाल रहे हैं। लेकिन पाटिल और प्रियांक का रिश्ता बहुत अच्छा नहीं है। यही कारण है कि एक वरिष्ठ नेता होने के बावजूद सिद्धारमैया सरकार में पाटिल को जगह नहीं मिली।

असल में कलाबुरगी में प्रियांक का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इस कारण पाटिल लगातार खुद को साइडलाइन महसूस कर रहे हैं। 2023 में सरकार बनने के बाद पाटिल को मंत्री बनाने की बात हुई थी लेकिन कलाबुरगी से प्रियांक और एक अन्य विधायक शरन प्रकाश को मंत्री पद मिल गया। यहां सिद्धारमैया की नहीं चली। इसके बाद सिद्धारमैया ने पाटिल को अपना राजनीतिक सलाहकार बना दिया था लेकिन पाटिल सरकार और प्रशासन में अपनी सीमित भूमिका की वजह से नाखुश थे। सीएम सिद्धारमैया भी उनसे कोई खास राजनीतिक सलाह मशविरा नहीं कर रहे थे। अब पाटिल के इस्तीफे के बाद कर्नाटक कांग्रेस के भीतर की तकरार सामने आ गई है। ऐसे में कर्नाटक कांग्रेस पर छाए संकट के बादल छटने के बजाय लगातार गहराते जा रहे हैं। देखना होगा कि पहले ही तकरार और खेमाबंदी की शिकार पार्टी आगे क्या फैसला लेती है। दूसरी तरफ तेलंगाना में मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी सरकार के दो मंत्रियों से नाराज विधायकों ने अहम बैठक की है। यही नहीं तेलंगाना कांग्रेस के एक सर्वे से भी पार्टी की आंतरिक कलह सामने आ गई है। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस के 10 विधायकों ने विधायक अनिरुद्ध रेड्डी के नेतृत्व में दो मंत्रियों के खिलाफ नाराजगी को लेकर डिनर पर बैठक की। नाराज विधायकों में ज्यादातर मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के जिले महबूबनगर से हैं इसलिए सीएम रेड्डी तुरंत एक्शन में आ गए हैं। रेवंत रेड्डी ने मामले को खत्म करने के लिए मंत्रियों और विधायकों से जल्द मिलने वाले हैं। बताया जा रहा है कि विधायकों की नाराजगी मुख्य तौर पर पी श्रीनिवास रेड्डी से है। विधायकों की नाराजगी है कि इनकी और इनके समर्थकों की जमीन को नियमित नहीं किया जा रहा है और मंत्री इसके लिए 40 फीसदी कमीशन मांग रहे हैं।

वित्त मंत्रालय की तरफ से पेंडिंग बिल क्लियर न होने की वजह से भी विधायक नाराज हैं। नाराज विधायकों की बैठक से पहले कांग्रेस की किरकिरी एक पोल सर्वे को लेकर हुई है। पोल सर्वे में लोगों से सवाल किया गया था कि फार्म हाउस शासन (केसीआर के लिए) या जनता के शासन (कांग्रेस के लिए) में से किसको तरजीह देते हैं। जिसमें 66 फीसदी से अधिक लोगों ने फार्म हाउस शासन को पसंद किया। इस घटनाक्रम के बाद मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष महेश कुमार नाराज हैं और जल्द इसकी गाज जिम्मेदार लोगों पर गिर सकती है। माना जा रहा है कि पोल सर्वे में कांग्रेस के खिलाफ नतीजे पार्टी के अंदर की अंदरूनी राजनीति का ही नतीजा है।

इसके अलावा हिमाचल कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह को बदलने की चर्चाओं के बीच पार्टी में सीधे-सीधे लकीर खिंचती दिख रही है। यहां सत्ता में आने के बाद से ही पार्टी में चल रहा शीतयुद्ध अब चरम पर होता दिखने लगा है। इसकी शुरुआत फतेहपुर में दिवंगत सुजान सिंह पठानिया के चतुर्थ श्राद्ध के दिन से हो चुकी है। हाशिए पर पड़े विप्लव ठाकुर,आशा कुमारी, ठाकुर सिंह भरमौरी सरीखे नेताओं की डिप्टी सीएम मुकेश अग्निहोत्री संग जुगलबंदी सबके सामने है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू यूं ही दिल्ली से फतेहपुर नहीं पहुंचे थे उन्हें भी इस बात की भनक लग चुकी थी। अगर कोई हलचल हुई तो दिक्कत बड़ी हो सकती है। विक्रमादित्य सिंह की मां प्रतिभा सिंह से प्रदेश अध्यक्ष का पद छिनने की राजनीति तो पिछले कई महीनों से चली आ रही थी जो अब तेज हुई तो विक्रमादित्य-मुकेश अग्निहोत्री गठजोड़ बनाने लग गए। आलम यह है कि कांग्रेस का एक खेमा प्रतिभा सिंह को हर सम्भव हटाना चाहता है।

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