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योगी की साख पर उठे सवाल

 

महाकुंभ

महाकुम्भ सरीखे विशाल धार्मिक आयोजनों के लिए व्यापक तैयारी और सुरक्षा प्रबंध आवश्यक होते हैं। प्रयागराज में चल रहे महाकुम्भ बाबत सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐसी व्यापक तैयारियों और सुरक्षा प्रबंधों का दावा किया था। 28 जनवरी को मौनी अमावस्या की रात मची भगदड़ में कम से कम 30 श्रद्धालुओं की मृत्यु, सैकड़ों के लापता होने और भारी संख्या में घायलों ने इन दावों का सच सामने ला दिया है। सरकारी व्यवस्थाओं की कमियां तो इस हादसे ने उजागर की ही हैं, स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की साख पर सवाल खड़े होने लगे हैं। गोदी कहलाए जाने वाले मीडिया का सच भी इस दुर्घटना ने एक बार फिर से सामने ला दिया है

बीते 13 जनवरी से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे महाकुम्भ का सबसे बड़ा स्नान पर्व 29 जनवरी को मौनी अमावस्या का था। इसी दिन के लिए प्रदेश से लेकर केंद्र तक में बैठे अफसरों की पिछले दो साल से की गई तैयारियां लेकिन धरी की धरी रह गई। मौनी अमावस्या के दिन संगम के पास भगदड़ मच गई जिसमें सरकारी आंकड़ों अनुसार 30 लोगों की जान चली गई। अब योगी सरकार की चारों तरफ किरकिरी हो रही है। यही नहीं महाकुम्भ में हुई इस भगदड़ की तुलना जहां 70 साल पहले 1954 के कुम्भ में हुई भगदड़ से की जा रही है, वहीं साधु-संतों की तरफ से घटना की जांच केंद्रीय एजेंसी से करवाने की मांग भी की गई है।

महंत दुर्गादास महाराज का कहना है कि ‘मौनी अमावस्या के दिन हुई भगदड़ की घटना बेहद दुखद है। लेकिन इतनी लम्बी तैयारी और बड़े-बड़े दावों के बावजूद इस तरह की घटना होना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।’ सीएम योगी द्वारा जांच के आदेश दिए जाने के बावजूद उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट के नेतृत्व वाली टीम से पूरे मामले की जांच करवाई जाए। साथ ही जांच को जल्द से पूरा करवाकर जो भी दोषी पाए जाएं उनके खिलाफ सख्त कार्यवाई कर मृतकों को सच्ची श्रद्धांजलि प्रदान करें।

हिंदू महासभा की राष्ट्रीय सचिव महामंडलेश्वर डॉ. अन्नपूर्णा भारती का मानना है कि ‘महाआयोजन को वीवीआईपी कल्चर ने पूरी तरह से अव्यवस्थित कर दिया है।’ जिसके कारण पूरे मेला क्षेत्र में आम श्रद्धालुओं के आने जाने पर पाबंदियां लगी रहती थी। मेला क्षेत्र में बनाए गए पीपा पुलों को बंद रखा जाता था, जिस कारण शुरू से लागू व्यवस्था मौनी अमावस्या तक लागू रही। शायद भगदड़ भी इसी अव्यवस्था के कारण हुई है। इतने दिनों से चल रही तैयारियों के बावजूद भगदड़ होना साबित करता है कि अफसरों की योजना और व्यवस्था में चूक हुई जिस कारण ऐसी दुखद घटना हुई है।’

विपक्ष ने जताया दुःख
हादसे के बाद विपक्ष ने प्रशासन पर लापरवाही के आरोप लगाए हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सरकार को घेरा और इस त्रासदी के लिए कुप्रबंधन और वीआईपी मूवमेंट को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि अभी महाकुम्भ का काफी समय बचा हुआ है और कई महास्नान शेष हैं। सरकार को व्यवस्थाओं में सुधार करना चाहिए ताकि इस तरह की घटनाएं आगे न हों। साथ ही, उन्होंने वीआईपी कल्चर पर लगाम लगाने की मांग की और सरकार से आम श्रद्धालुओं के लिए बेहतर इंतजाम करने का आग्रह किया।

आम आदमी पार्टी (आप) ने महाकुम्भ में भगदड़ जैसी स्थिति के लिए प्रशासनिक कुप्रबंधन को जिम्मेदार ठहराया तथा वीआईपी संस्कृति को समाप्त करने तथा भीड़ प्रबंधन के कड़े इंतजाम करने की मांग की।

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस घटना को लेकर सरकार को घेरा और युद्ध स्तर पर तैयारियां करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि पर्यटक बिना संघर्ष के अपनी यात्रा संपन्न करें इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। यही नहीं खुद भाजपा सांसद मुकेश राजपूत के मुख्य प्रतिनिधि अनूप कुमार मिश्रा ने प्रयागराज महाकुम्भ में पहुंचकर व्यवस्थाओं पर जमकर भड़ास निकाली। उन्होंने न सिर्फ महाकुम्भ की अव्यवस्थाओं पर सवाल उठाए, बल्कि पूरी स्थिति का लाइव प्रसारण भी अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर किया। अनूप मिश्रा ने आरोप लगाया कि महाकुम्भ में अव्यवस्था चरम पर है और आम जनता के लिए कोई सुविधाएं नहीं हैं।

सियासी दलों के बाद अब संतों और महंतों की ओर से भी प्रतिक्रियाएं आ रहीं हैं। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा है कि मौजूदा सरकार को सत्ता में रहने का अब नैतिक अधिकार नहीं है।

सरकारी इंतजामों की खुली पोल
भगदड़ की घटना ने सरकारी इंतजामों की पोल खोल दी है। अधिकारी महाकुम्भ में 40 करोड़ और मौनी अमावस्या पर 10 करोड़ श्रद्धालुओं के आने का दावा पहले ही कर रहे थे। इस हिसाब से उन्हें व्यापक तैयारी करके रखनी चाहिए थी। यह घटना बताती है कि तैयारी पूरी नहीं थी और लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया गया। यह ऐसी दुखद घटना है जिसने सनातनियों की सुरक्षा पर सवालिया निशान खड़े किए हैं। आने वाले दिनों में रोजाना लाखों करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु आएंगे। अगर इस घटना को लेकर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई तो आने वाले दिनों में इससे बड़ी घटना होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

ऐसे में शासन-प्रशासन की अव्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि इतने बड़े आयोजन में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए गए? अधिकारियों को इस घटना की जानकारी दो बजे तक भी नहीं थी या फिर वे इसे छिपाने में लगे थे? क्या प्रशासन पहले से ही असफल हो चुका था, या फिर यह पूरी तरह से लापरवाही का नतीजा था? आखिर कुम्भ मेले में भीड़ का प्रबंधन क्यों नहीं हो पाता? क्या लाखों-करोड़ों का बजट सिर्फ सरकारी ब्रांडिंग के लिए होता है? क्या इतिहास की त्रासदियों से कोई सबक नहीं लिया गया? उन परिवारों की पीड़ा को कौन समझेगा जिन्होंने अपनों को खो दिया? क्या वे दोबारा इस महाकुम्भ में आ पाएंगे? क्या इस बार भी यह हादसा कुछ दिनों में भुला दिया जाएगा?

कई धर्म गुरुओं और जानकारों का कहना है कि घटनास्थल पर प्रशासन न सिर्फ देर से पहुंचा, बल्कि कई जगहों पर पत्रकारों को कवरेज करने से भी रोका गया। पुलिस ने मौके पर कई मीडिया कर्मियों के मोबाइल से फोटो और वीडियो डिलीट करा दिए जिससे साफ है कि मामला दबाने की कोशिश की जा रही थी।

इस दौरान लोगों ने ‘‘डायल 112’ पर फोन कर पुलिस-प्रशासन से मदद की गुहार लगाई लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। जब लाखों की भीड़ एक जगह इकट्ठा होती है तो आपातकालीन सेवाएं कैसे ठप हो सकती हैं? इन सवालों के जवाब शायद प्रशासन के पास भी न हों लेकिन उन परिवारों की पीड़ा को कौन समझेगा जिन्होंने अपनों को खो दिया? यह हादसा किसी त्रासदी से कम नहीं था क्योंकि एक ही परिवार के कई सदस्यों ने अपनी जान गंवा दी। कुम्भ मेले में देशभर से श्रद्धालु आते हैं और यह हादसा उनके लिए एक भयावह अनुभव बन गया।

सरकार को कोस रहे हैं तीर्थयात्री
ज्यादतर उन लोगों की मौतें हुईं जो संगम नहाने आए लोगों के कपड़े और समानों की देखभाल कर रहे थे। कुछ खुद को सौभाग्यशाली मान रहे हैं कि वे बच गए लेकिन कई लोग अपनों को खोने के गम में टूट चुके हैं। कई तीर्थयात्री व्यवस्था को कोसते नजर आए। पीने के पानी का इंतजाम नहीं होने के कारण तमाम लोग बेसुध होकर जहां-तहां गिर पड़े। भीड़ पर नियंत्रण के लिए किए गए सरकारी दावों की सच्चाई उस भगदड़ में उजागर हो गई। यह एक बड़ी प्रशासनिक विफलता है। यह केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि यदि समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में ऐसे और भी हादसे हो सकते हैं। अब देखने वाली बात होगी कि सरकार इस हादसे पर क्या कदम उठाती है और क्या पीड़ितों को न्याय मिल पाता है या फिर यह मामला भी दबा या भुला दिया जाएगा?

भगदड़ का कारण क्या?
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार प्रशासन की ओर से पर्याप्त व्यवस्थाएं नहीं की गई थीं, जिससे श्रद्धालुओं के बीच अव्यवस्था फैल गई। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और सुरक्षाकर्मी मौजूद थे, लेकिन उनकी संख्या अपर्याप्त थी। घटना के दौरान वीआईपी मूवमेंट के कारण श्रद्धालुओं को रोक दिया गया, जिससे धक्का-मुक्की शुरू हो गई और भगदड़ मच गई। कई लोग जमीन पर गिर गए और कुचलने से गंभीर रूप से घायल हो गए।

प्रशासन की सफाई
प्रयागराज जिला प्रशासन ने इस हादसे पर खेद व्यक्त किया और जांच के आदेश दिए हैं। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि हादसे की जांच के बाद दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। प्रयागराज पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘हम वीआईपी मूवमेंट के दौरान भीड़ नियंत्रण के लिए कड़े कदम उठा रहे हैं। आगे की व्यवस्थाओं को लेकर समीक्षा बैठक बुलाई गई है ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।’

सरकार के कदम
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना का संज्ञान लेते हुए उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने प्रशासन को निर्देश दिया कि आगे के स्नान पर्वों के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों को 5 लाख रुपए की आर्थिक सहायता और घायलों को उचित चिकित्सा सुविधा प्रदान करने का आश्वासन दिया है।

राज्य सरकार ने भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष टीमों को तैनात करने और सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी के लिए एक टास्क फोर्स बनाने का निर्णय लिया है। इसके अलावा, वीआईपी मूवमेंट को नियंत्रित करने के लिए नई गाइड लाइंस जारी की है।

वीआईपी कल्चर के चलते हादसा
महाकुम्भ में हुई इस भगदड़ ने प्रशासन की कार्यप्रणाली और सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष इसे ‘प्रशासनिक विफलता’ और ‘वीआईपी कल्चर’ का नतीजा बता रहा है जबकि सरकार इसे ‘अनियंत्रित भीड़ और अफवाहों का असर’ कहकर बचाव कर रही है। लेकिन हकीकत यह है कि कई परिवारों ने अपने प्रियजनों को खो दिया है। कई लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। प्रशासनिक दावों के बावजूद प्रयागराज जंक्शन पर स्थिति भयावह है। लोगों को रेलवे स्टेशन की ओर नहीं जाने दिया जा रहा है। तेलियरगंज की ओर जाने वाले रास्तों को भी प्रशासन ने बंद कर दिया है।

आगे की कार्रवाई
1. घटना की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए गए हैं।
2. सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नए सिरे से रणनीति बनाई जा रही है।
3. अगले प्रमुख स्नान पर्वों के दौरान भीड़ नियंत्रण के लिए अतिरिक्त जवानों की तैनाती होगी।
4. श्रद्धालुओं से संयम बनाए रखने और प्रशासन के निर्देशों का पालन करने की अपील की गई है।

कुम्भ हादसों पर एक नजर
1. वर्ष 1954 में आजादी के बाद पहला कुम्भ मेला प्रयागराज (तब इलाहाबाद) में आयोजित किया गया। जिसमें 3 फरवरी को मौनी अमावस्या के दिन गंगा किनारे लाखों की भीड़ और अव्यवस्थित प्रशासन के कारण अफरा-तफरी मच गई जिसमें करीब 800 लोग मारे गए।
2. हरिद्वार में आयोजित साल 1986 कुम्भ मेले में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह और अन्य राजनेताओं की यात्रा के दौरान सुरक्षा प्रोटोकॉल के कारण आम श्रद्धालुओं को रोका गया था। इससे भीड़ उत्तेजित हो गई और भगदड़ मच गई जिसमें 200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।
3. 2003 नासिक कुम्भ मेले में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली। तब घटना भीड़ के असामान्य रूप से बढ़ने और व्यवस्थाओं की कमी के कारण 39 लोगों की मौत हो गई।
4. 10 फरवरी 2013 को इलाहबाद कुम्भ फिर से एक बड़े हादसे का गवाह बना। इसका कारण रेलवे स्टेशन पर पुल टूटने से भगदड़ मच गई जिसमें 42 लोगों की मौत हुई थी।
5. वर्तमान में चल रहे महाकुम्भ 2025 में संगम नोज पर मची भगदड़ से एक बार फिर संगम नोज पर दुखद हादसा हुआ है। घटना 28 जनवरी रात करीब 2 बजे हुई। कारण अमृत स्नान के लिए भीड़ का अचानक बढ़ना और बैरिकेडिंग का टूटना बताया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस हादसे में 30 लोगों की जान चली गई है।

गौरतलब है कि संगम नगरी में चल रहे महाकुम्भ या अन्य धार्मिक स्नानों के दौरान भक्तों और संतों के स्वागत की परंपरा वर्षों पुरानी है। इसी परम्परा के तहत इस बार भी मेला प्रशासन ने संतों के स्नान के दौरान उन पर पुष्प वर्षा करने के लिए बड़ी मात्रा में गुलाब की पंखुड़ियां मंगवाई थीं। उम्मीद थी कि जैसे ही साधु-संत स्नान के लिए बढ़ेंगे आसमान से गुलाब की पंखुड़ियां बरसाई जाएंगी, जिससे माहौल भक्तिमय हो उठेगा। लेकिन इस हादसे के बाद लाए गए फूल उपयोग में नहीं आ सके। साल 1954 से लेकर अब 2025-हर बार सरकारें बदलती रहीं। व्यवस्थाओं के वादे किए जाते रहे लेकिन नतीजा वही रहा। हजारों श्रद्धालुओं की बेबस चीखें, लाशों के ढेर और परिजनों की बिलखती आवाजें। इस बार भी कहा गया था कि कुम्भ में भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा को लेकर हाईटेक इंतजाम किए गए हैं, लेकिन नतीजा सबके सामने है।

‘‘मैंने देखा कि एक महिला अपने परिवार के सदस्य को बचाने के लिए अपने मुंह से ऑक्सीजन देने की कोशिश कर रही थी। यह दिल दहला देने वाला है। महामंडलेश्वर प्रेमानंद पुरी जी ने अधिकारियों से कार्यक्रम की व्यवस्था सेना को सौंपने का आग्रह किया था, लेकिन
उनका अनुरोध अस्वीकार कर दिया गया।’’
संजय सिंह, राज्यसभा सांसद

 

‘‘सरकार से निवेदन है कि हमारे अनुरोध को आलोचना न समझे, बल्कि आस्थापूर्ण आग्रह मानते हुए तीर्थयात्रियों की सुविधाओं के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास करें। भाजपा सरकार महाकुम्भ को आत्म- प्रचार का स्थान न मानकर, सेवाभाव से देखे जिससे शांति की कामना लेकर आए आध्यात्मिक पर्यटकों की यात्रा बिना किसी संघर्ष के शांतिपूर्ण रूप से सुसम्पन्न हो सके।’’
अखिलेश यादव, अध्यक्ष सपा

 

 

‘‘सुबह से शाम हो गई, ना खाने को खाना मिला, ना पीने को पानी। जब हमारी यह दुर्गति है तो आम जनमानस का क्या हाल होगा? यह महाकुम्भ नहीं, बल्कि किसी जेल जैसा लग रहा है। चारों तरफ नाकाबंदी है और किसी भी प्रकार की व्यवस्था समाज हित में नहीं है।’’
अनूप मिश्रा, मुख्य प्रतिनिधि , भाजपा सांसद मुकेश राजपूत

 

 

‘कुम्भ में जो दुर्घटना हुई है वह दुर्भाग्यपूर्ण है। उत्तर प्रदेश में यह पहली घटना नहीं घटी है, बल्कि यह 9वीं घटना है। इससे पहले 3 आगजनी और 6 भगदड़ की घटनाएं घट चुकी हैं। जिनमें कई हजार लोगों की मौत हो चुकी है। यह प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आत्मविश्वास और आत्ममुग्धता के कारण हुआ है। योगी में अहंकार है। कुम्भ की अव्यवस्थाओं को लेकर कई रिपोर्ट आई लेकिन किसी पर भी गौर नहीं किया गया। अगर इन पर ध्यान दिया जाता तो आज असमय सैकड़ों लोग नहीं मारे जाते। यही नहीं बल्कि कुम्भ मेले के प्रबंधन में 10 हजार करोड़ का घोटाला हुआ है। कुम्भ के लिए जो जरूरी पुल बनने थे वे नहीं बने। सफाई व्यवस्था चरमराई हुई है। लाईट तक नहीं लगाई गई है। सरकार इस हादसे में मृत लोगों के आंकड़ों को छिपा रही है। संवेदनहीनता की तो उस समय हद हो गई जब 29 जनवरी को लोग मरे थे लेकिन 29 की शाम को ही योगी सरकार द्वारा फूल बरसाए गए। इस सम्बंध में पूरे 20 घंटे बाद मुख्यमंत्री योगी का बयान आना उनकी गैर जिम्मेदाराना छवि को दर्शाता है। योगी को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ देनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी को उन्हें बर्खास्त कर देना चाहिए।’’
राजकुमार भाटी, प्रवक्ता, सपा

‘‘प्रयागराज कुम्भ के दौरान हुई इस दर्दनाक घटना के लिए पूरी तरह से भाजपा सरकार जिम्मेदार है। भाजपा सरकार ने कुम्भ शुरू होने से पहले व्यवस्थाओं को लेकर अखबारों, सोशल मीडिया आदि के माध्यम से बड़े-बड़े प्रचार किए थे, परंतु इस दुखद घटना के बाद सारी व्यवस्थाएं झूठी साबित हुईं। यदि सरकार द्वारा उचित व्यवस्थाएं की गई होतीं तो इतना बड़ा हादसा नहीं होता। भाजपा के नेता, चाहे स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, गृहमंत्री अमित शाह हों या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, श्रद्धालुओं के लिए कोई भी उचित बंदोबस्त नहीं कर पाए। सरकार को इस दुखद घटना की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए मृत श्रद्धालुओं के परिवारों को 50-50 लाख रुपए और परिवार के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी, साथ ही घायलों को 25-25 लाख रुपए की सहायता राशि देनी चाहिए।’’
अनिल यादव, प्रवक्ता उत्तर प्रदेश कांग्रेस

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