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कांग्रेस की समस्या परिवारवाद नहीं उसका तैयार किया इतिहास है

कांग्रेस की समस्या परिवारवाद नहीं उसका तैयार किया इतिहास है

कांग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने गुरुवार को एक अजीबोगरीब बात कही जिसे आम आदमी के लिए समझना थोड़ा मुश्किल है। उन्होंने 2014 में कांग्रेस की हार के लिए संयुक्त प्रगितिशील गठबंधन यानी यूपीए पर कई तरह के सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की हार के लिए क्या 2014 में यूपीए जिम्मेदार थी, यह उचित सवाल है और इसका जवाब मिलना चाहिए? इसके बाद उन्होंने दूसरा सवाल किया कि क्या यूपीए के अंदर ही साजिश रची गई थी। तीसरा सवाल उनकी तरफ से पूछा गया कि 2019 की हार की भी समीक्षा होनी चाहिए। चौथा सवाल मनीष तिवारी ने पूछा कि पिछले 6 वर्षों में यूपीए पर किसी तरह का आरोप नहीं लगाया गया?

देखा जाए तो मनीष तिवारी ने ये सवाल पूछ कर ये दर्शा दिया कि कांग्रेस आज भी अपने गलतियों को मानने को तैयार नहीं है और दूसरे लोगों पर अपनी बर्बादी का ठिकरा फोड़ना चाहती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि उसके दूसरे दलों से कुछ चूक हुई होगी पर कांग्रेस से क्या छूटा इस पर शायद अभी भी विचार करने को तैयार नहीं है। ईमानदारी से कहा जाए तो भारतीय राजनीति में विपक्ष इतना नकारा और डरा हुआ कभी नहीं था जितना आज है। और ये बात भी उतना ही सच है कि सत्तापक्ष आज जितना मजबूत है उतना कभी नहीं था। पहली वजह ये है कि लोगों का विश्वास लोकतंत्र से कम हुआ है। और इसकी सबसे बड़ी दोषी कांग्रेस है। कांग्रेस इसलिए क्योंकि उसने सबसे अधिक समय तक देश पर ‘शासन’ किया और उसने जिस लोकतंत्र का सपना दिखाया उसे पूरा नहीं किया। नतीजा इसका ये हुआ कि लगातार जनता के दिमाग से जनतंत्र की तस्वीर मिटती चली गई।

कांग्रेस आज दोहरे संकट से गुजर रही है। एक अंदरूनी और दूसरा बाहरी। लेकिन उसके अंदरूनी संकट अधिक गहरे हैं। पहली बात तो ये कि कांग्रेस राजनीतिक संगठन के तौर पर काम करने में असक्षम है। इसका कारण यह है कि हर सियासी दल की एक विचारधारा होती है, विजन, लीडर और कैडर होता है। पर कांग्रेस के पास इन चारों में से कुछ भी नहीं हैं। इसका असल कारण आपातकाल के बाद का कांग्रेस की राजनीति रहा है। जब जेपी आंदोलन हुआ और लोग इंदिरा सरकार के खिलाफ सड़कों पर आए तो उसमें सबसे अधिक नौजवान थे। उसमें ज्यादातर वे लोग थे जो पहले कांग्रेस से जुड़े थे और पार्टी की नीतियों से नाराज थे। इसके बाद से कांग्रेस ने कैडर राजनीति को छोड़ प्रचार तंत्र पर ध्यान देने लगी।

जेपी आंदोलन के बाद से विश्वविद्यालयों में चुनाव धीरे-धीरे कम होने लगे। जब कॉलेज-यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति का पट्टाक्षेप हुआ तो युवाओं का राजनीति में आना भी कम होने लगा। क्योंकि अधिकतर नेता कैंपस से ही निकल कर आते थे और केंद्र और राज्य स्तरीय राजनीति तक जाते थे। इसके बाद जिस तरह से चीन में जनसंख्या कानून के बाद हुआ कि बुढ़ों की संख्या बढ़ने लगी और नौजवान कम होने लगे, उसी तरह से कांग्रेस में हुआ। नौजवानों का प्रतिनिधित्व कम हुआ तो पार्टी में बुढ़े नेताओं की संख्या बढ़ने लगी। ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे कुछ नेता आए भी तो वह भी परिवारवाद की वजह से। इंदिरा सरकार के बाद नीचले हिस्से से नेताओं का आना खत्म हो गया। ऐसे में कांग्रेस की पकड़ गांवों और कस्बों से खत्म होने लगी और जो भाजपा कभी शहरी राजनीति के लिए जानी जाती कि वह पंचायत स्तर पर घुसती चली गई। आगे चल कर कांग्रेस ने जो जनता और अपने बीच खाई पैदा किया था कि उसे भाजपा ने परिवारवाद के नाम पर भुनाया। हालांकि, अभी कांग्रेस इस बात के लिए तैयार नहीं है कि वो पलटकर अपने इतिहास का मुल्यांकन करे।

बीते चुनाव को कोई एक साल गुजर गए लेकिन अभी पार्टी में नेतृत्व को लेकर दुविधा की स्थिति बनी ही हुई है। राहुल गांधी ने 2019 की हार के बाद इस्तीफा देते वक्त कांग्रेस नेताओं से जवाबदेही लेने, पार्टी के पुनर्गठन करने लिए कठोर निर्णय लेने और गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने की बात कही थी पर भीतरी कलह की वजह से ऐसा अभी तक नहीं हुआ। एक तरह से उनका इस्तीफा देना भी बेकार चला गया। फिलहाल सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष हैं मगर सवाल उठता है कि कब तक? ऊपर से राजस्थान राजनीति के बाद से जनता के दिमाग में साफ संदेश गया है कांग्रेस से जुड़ना बेकार है क्योंकि पार्टी में नए लोगों को प्रतिनिधित्व करने नहीं मिलता।

कांग्रेस की एक बड़ी समस्या ये भी कि भले पार्टी के बुजुर्ग नेताओं के बच्चों का कोई राजनीतिक जनाधार न हो मगर चुनाव लड़ने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता। ताजा उदाहरण अशोक गहलोत और कमलनाथ हैं। दोनों नेताओं की जिद्द अवाम को साफ दिखती है। पूरा जोर लगाने के बावजूद भी गहलोत अपने बेटे को चुनाव नहीं जीता सके। हालांकि, कमलनाथ ने अपने बेटे सीट निकाल लिया पर बावजूद इसके वो अपनी सरकार नहीं बचा पाए। हालांकि, कमलनाथ ने सत्ता में आते ही नरम हिन्दुत्व का रास्ता अपनाया पर उसका कोई फायदा नहीं हुआ। कायदे से कहा जाए तो कांग्रेस अपने संगठनिक कमजोरी को हिन्दुत्व में तलाश रही है। जब बार-बार बाढ़ आने के कारण घर डूबने लगता है तो लोग अपनी नींव ऊपर कर लेते हैं लेकिन कांग्रेस है कि अपना घर डूबने की वजह पड़ोसी का नींव ऊंचा होना बता रही है। कांग्रेस अभी भी यही कह रही है कि मेरा घर इसलिए डूब गया क्योंकि पड़ोसी की नीव जलस्तर से ऊपर था।

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