पश्चिम बंगला में लंबे समय तक वामपंथी पार्टियों की सरकार रही थी। विधानसभा के साथ-साथ संसद में वामपंथी पार्टियों का सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व इसी प्रदेश से रहा है। लेकिन आज इस प्रदेश में वामपंथ का लालगढ़ ढह गया है। इसके बावजूद पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में वामपंथी नेताओं के कद को भुलाया नहीं जा सकता। इनमें से सीपीएम के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी को भी कोई नहीं भूल सकता। उन्हें मार्क्सवादी विचारकों के साथ-साथ दक्षिणपंथी विचार भी सम्मान देते हैं। वामपंथी नेताओं में वे अकेला चेहरा हैं, जो अब तक के भारतीय संसद के इतिहास में लोकसभा अध्यक्ष बने।
सोमनाथ चटर्जी मूलतः अधिवक्ता थे। वकालत से वे राजनीति में आए थे। सोमनाथ चटर्जी का राजनीतिक जीवन विरोधाभाषों के साथ शुरू हुआ। उनके पिता जहां दक्षिणपंथी राजनीति से थे तो सोमनाथ ने करियर की शुरुआत वामपंथी माकपा के साथ 1968 में की। 1971 में पहली बार वह सांसद चुने गए। 1971 से वे लगातार 10 बार लोकसभा के सांसद निर्वाचित होते रहे। राजनीति में सोमनाथ चटर्जी को एक बहुत ही सम्मानित नेता के तौर पर देखा जाता है। 1971 से सांसद चुने जाने के बाद वह हर लोकसभा के लिये चुने गये। साल 2004 में वह 10वीं बार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे। उन्होंने 35 साल तक सांसद के तौर पर देश की सेवा की और 1996 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साल 2004 में 14वीं लोकसभा के लिए वे सभी दलों की सहमति से लोकसभा का अध्यक्ष बने थे।
अपने राजनीतिक कैरियर में उन्होंने तीन संसदीय क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व किया। सबसे पहली बार वे वर्धमान से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे। उसके बाद जादवपुर से संसद पहुंचे। यहां से वे 1984 तक संसद रहे। लेकिन उनके राजनीतिक जीवन में एक मात्र हार यहीं से मिली। इसलिए जादवपुर सोमनाथ चटर्जी के लिए एतिहासिक सीट मानी जाने लगी। जादवपुर लोकसभा क्षेत्र पश्चिम बंगाल का एक महत्वपूर्ण संसदीय क्षेत्र है। यह 24 परगना जिले में आता है। इस सीट से सीपीएम के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी चुनाव लड़ा करते थे। लेकिन इंदिरा गांधी की मौत के बाद 1984 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने यहां से ममता बनर्जी को टिकट दिया। ममता बनर्जी ने उन्हें हरा दिया। 1977 के चुनाव से पहले यह संसदीय सीट अस्तित्व में आई थी। यह सीट सीपीएम का गढ़ रही है। मगर अब इस पर तृणमूल कांग्रेस ने कब्जा कर लिया है।
राजनीतिक करियर में एक के बाद एक जीत हासिल करने वाले सोमनाथ चटर्जी अपने जीवन का एक चुनाव हार गए थे। वह भी एक नए नेता से। हालांकि सोमनाथ चटर्जी को हराने वाली वही नेता आज पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से ही सोमनाथ चटर्जी हारे थे। 1984 में जादवपुर सीट पर हुए लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने तब सीपीएम के इस कद्दावर नेता को हराया था। इसके बाद ही वे अपना लोकसभा क्षेत्र बदल कर बोलवुर चले गए जहां से वह 2009 के लोकसभा चुनाव के पहले तक सांसद रहे।
सोमनाथ चटर्जी का जन्म 25 जुलाई 1929 को असम के तेजपुर में हुआ था। उनके पिता का निर्मल चंद्र चटर्जी विख्यात अधिवक्ता थे और मां का नाम वीणापाणि देवी था। सोमनाथ चटर्जी के पिता अखिल भारतीय हिंदू महासभा के संस्थाकों में से एक थे। सोमनाथ चटर्जी ने कोलकाता और ब्रिटेन में पढ़ाई की। ब्रिटेन के मिडिल टैंपल से लॉ की पढ़ाई करने के बाद वे कलकत्ता हाईकोर्ट में वकील हो गये। लेकिन इसके बाद उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया। वह एक प्रखर वक्ता के तौर पर लोगों की नजरों में आ चुके थे।
साल 2004 में यूपीए की सरकार बनने के बाद कांग्रेस की ओर से उनके नाम स्पीकर के रूप में आगे आया। कांग्रेस सहित यूपीए के बाद एनडीए ने भी इनके नाम पर सहमति जता दी थी। इस तरह भारतीय संसद के इतिहास में पहली बार कोई वामपंथी नेता लोकसभा अध्यक्ष बना। वह भी निर्विरोध रूप से। मगर उनके राजनीतिक कैरियर में एक ऐसा मोड़ भी आया, जिसे उन्हें बहुत धक्का लगा। वर्ष 2008 में भारत- अमेरिका परमाणु समझौता विधेयक के विरोध में माकपा ने तत्कालीन मनमोहन सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। तब सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष थे। पार्टी ने उन्हें स्पीकर पद छोड़ देने के लिए कहा लेकिन वह नहीं माने। इसके बाद पार्टी ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया था। जीवन भर वामपंथ की विचारधारा पर चलने वाले इस व्यक्ति को अंतिम समय में अपनी ही पार्टी ने निकाल बाहर कर दिया।
पहला आम चुनाव
आजादी के बाद देश में पहली बार 1952 में आम चुनाव हुए। पहले आम चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 364 सीटों पर जीत दर्ज की। पंडित नेहरू ने एकतरफा जीत दर्ज की थी। उनके सामने तब कोई विपक्ष नहीं था। नेहरू बड़ी जीत दर्ज कर सत्ता पर काबिज हुए थे। प्रथम आम चुनाव में 44 .87 प्रतिशत वोट पड़े थे। पहले चुनाव में नेहरू का करिश्माई चेहरा, नेतृत्व, विपक्ष का न होना, पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन की अगुवाई करने वाली कांग्रेस की तूती बोलने के बाद भी क्या आप जानते हैं कि सबसे अधिक वोटों से संसद पहुंचने वाला नेता कांग्रेस का नहीं था। बहुत कम लोगों को पता होगा कि वो कौन शख्स था, जिसने सबसे ज्यादा वोटों से अपने प्रतिद्वंद्वी को हराया था।
पहले लोकसभा चुनाव (1952) में कांग्रेस को करीब 76 फीसदी (4,76,65,951) यानी दो तिहाई से ज्यादा वोट मिले थे। आज तो देश में तीस फीसदी वोट मिलकर भी पूर्ण बहुमत की सरकार केंद्र में बन जाती है। साल 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार करीब तीस फीसदी वोट से ही बनी थी। पिछले चुनाव को मोदी की सुनामी का नाम दिया गया। यदि 30 फीसदी वोट सुनामी हो सकता है तो दो तिहाई वोट को क्या नाम दिया जाए। खैर, दो तिहाई से ज्यादा वोट प्राप्त कर कांग्रेस ने पहले आम चुनाव में विरोधियों को स्पष्ट रूप से हरा दिया। 17 अप्रैल, 1952 को गठित हुई लोकसभा ने 4 अप्रैल, 1957 तक का अपना कार्यकाल पूरा किया। लेकिन उस चुनाव का सबसे रोचक तथ्य यह है कि बंपर वोटों से विजयश्री हासिल करने वाला नेता न तो कांग्रेस से था और न ही दूसरी बड़ी पार्टी सोशलिस्ट पार्टी से। जी हां, उस समय बस्तर मध्य प्रदेश में हुआ करता था। वहां से मुचकी कोसा निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सबसे ज्यादा मार्जिन से चुनाव जीते और संसद पहुंचे थे। कोसा ने अपने प्रतिद्वंद्वी को 1,41,331 वोटों से हराया था।
पहली लोकसभा में सबसे कम वोटों से जीतकर संसद पहुंचने वाले नेता थे बसंत कुमार। पश्चिम बंगाल की कोंताई सीट पर कांग्रेस उम्मीवदवार के रूप में कुमार अपने प्रतिद्वंद्वी को मात्र 127 वोटों से हरा पाए थे। इस तरह सबसे कम वोट से जीत दर्ज करने वाला सांसद कांग्रेस पार्टी से था। पहले लोकसभा चुनाव में कुल 489 निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव कराए गए थे। इनमें 26 भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व किया गया था।

