हाल ही में संपन्न हुए आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का 240 सीटों पर सिमट जाने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक सक्रिय नहीं थे? क्या इस चुनाव में भाजपा को आरएसएस का सहयोग नहीं मिला? जबकि संघ के स्वयंसेवक बीजेपी के लिए एक मजबूत कड़ी रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या भाजपा-आरएसएस में मतभेद पैदा हो गए हैं। क्या आरएसएस नड्डा के बयान से नाराज है? क्या आरएसएस के पीछे हटने से भाजपा का वोट घटा।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आरएसएस के स्वयंसेवक चुनाव में भले ही बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए सीट्टो काम नहीं करते हैं लेकिन यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी संघ हमेशा निभाता रहा है कि कम से कम बीजेपी के समर्थक और ऐसे मतदाता मतदान के दिन वोट देने जरूर पोलिंग बूथ तक पहुंचे जो बीजेपी के संभावित वोटर हैं। लेकिन इस बार चुनाव में संघ के स्वयंसेवक सक्रिय नहीं दिखे। सूत्रों की मानें तो शुरुआत के पांच चरणों में संघ के अलग-अलग स्तर के पदाट्टिाकारियों ने चुनाव को लेकर कोई बैठक ही नहीं ली और स्वयंसेवकों को कोई संदेश भी नहीं गया कि उन्हें काम करना है।

लेकिन पांचवें दौर के मतदान के बाद संघ की एक मीटिंग बुलाई गई जिसमें आगे काम करने के लिए बातचीत भी हुई। लेकिन छठे दौर की वोटिंग से पहले बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का बयान आ गया कि बीजेपी को पहले संघ की जरूरत होती थी लेकिन अब बीजेपी सक्षम हो गई है। यह बयान संघ के भीतर चर्चा में रहा और इसका असर ये हुआ कि संघ के स्वयंसेवक फिर निष्क्रिय हो गए। गौरतलब है कि हर चुनाव में संघ के कामकाज का एक तरीका होता था। संघ के स्वयंसेवक घर-घर जाकर मतदाताओं से मिलते थे और उन्हें पर्ची देते थे। पर्ची मतलब मतदाता सूची में उनका क्या क्रमांक है, यह पर्ची में लिखकर दिया जाता था। यह मतदाताओं तक पहुंचने का एक तरीका था। इसके साथ ही मतदान वाले दिन संघ के स्वयंसेवक अपने एरिया में यह सुनिश्चित करते थे कि मतदाता वोट देने पोलिंग बूथ तक जाएं। लंच टाइम तक अगर मतदाता पोलिंग बूथ तक नहीं पहुंचे तो स्वयंसेवक उन्हें फोन कर मतदान करने के लिए प्रेरित करते थे। लेकिन इस चुनाव में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। संघ के कुछ लोगों ने इस पर भी नाराजगी जाहिर की कि उम्मीदवारों के चयन में भी संघ की नहीं सुनी गई थी।

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