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ओपीएस पर गोलबंद होने लगे कर्मचारी

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देश मे पुरानी और नई पेंशन योजना को लेकर रार बढ़ती जा रही है। एक तरफ कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों की राज्य सरकारें पुरानी पेंशन बहाल कर रही हैं या करने की योजना बना रही हैं तो केंद्र की भाजपा और उसकी राज्य सरकारें इसे सिरे से खारिज़ कर रही हैं ।

इस बीच सरकारी कर्मचारी एक बार फिर इसे बहाल करने को लेकर गोलबंद होने लगे हैं। गत सप्ताह दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘पेंशन शंखनाद महारैली’ का आयोजन किया गया। इस रैली में देश के 20 से ज्यादा राज्यों के लाखों कर्मचारी शामिल हुए ।

 

इनकी इस मांग को किसानों और राजनीतिक दलों का भी समर्थन मिलता नजर आ रहा है। इन कर्मचारियों की मांग है कि नई पेंशन योजना ( राष्ट्रीय पेंशन योजना ) के स्थान पर पुनः पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) को लागू किया जाये। कर्मचारियों का कहना है कि नई पेंशन योजना की वजह से वह अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं।दूसरी ओर इस मामले में सियासत भी गरमाने लगी है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने भी ओपीएस को वापस लागू करने की मांग शुरू कर दी है।

रिपोर्ट्स के अनुसार जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है वहां पर नई पेंशन योजना लागू है, लेकिन कुछ गैर-बीजेपी राज्यों में पुरानी योजना ही चल रही है। जिसमें राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब , हिमाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे गैर भाजपा शासित राज्य शामिल हैं।

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राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नई दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई एक अक्टूबर की रैली में सरकारी कर्मियों की इतनी अधिक भीड़ जुटी, जिसने केंद्र सरकार को सोचने पर मजबूर कर माहौल बदल दिया है। अब ओपीएस पर भाजपा को सियासी चोट का डर नजर आने लगा है। विपक्षी दलों ने इन रैलियों को सियासत की पिच पर लपक लिया। अब इसके राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए केंद्र सरकार डैमेज कंट्रोल की तैयारी में है।

केंद्र सरकार के सूत्र बताते हैं कि ओपीएस पर लगातार चर्चा हो रही है। यह गुणा भाग लगाया जा रहा है कि पुरानी पेंशन को अगर पहले वाले स्वरूप में लागू करते हैं, तो सरकारी खजाने पर कितना भार पड़ेगा। रिटायरमेंट के समय बेसिक सैलरी का पचास फ़ीसदी हिस्सा पेंशन के तौर पर देते हैं तो कितनी राशि खर्च होगी। अगर इसमें बेसिक सैलरी का तीस से चालीस फीसदी हिस्सा, पेंशन के तौर पर देते हैं तो कितना आर्थिक भार पड़ेगा।

इसके अलावा यह भी देखा जा रहा है कि एक तय पेंशन दे दी जाए, लेकिन उसमें किसी तरह की बढ़ोतरी का प्रावधान हो। यानी महंगाई राहत व दूसरे भत्ते, पेंशन में शामिल नहीं होंगे। सूत्रों का कहना कि सरकार फिलहाल ओपीएस देने के लिए तैयार नहीं है, लेकिन पुरानी पेंशन (ओपीएस ) से मिलते-जुलते फायदे एनपीएस में ही दे सकती है। सरकार ने वित्त मंत्रालय की जो कमेटी गठित की है, उसमें ओपीएस का ज़िक्र ही नहीं है। उसमें एनपीएस में सुधार की बात कही गई है।

 

सियासत के मोर्चे पर करेंगे चोट

 

 

नई दिल्ली में 20 सितंबर को हुई राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) स्टाफ साइड की बैठक के एजेंडे में ‘ओपीएस’ का मुद्दा टॉप पर रहा था। कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करते हुए अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (एआईडीईएफ) के महासचिव सी. श्रीकुमार ने कहा था, हमने सरकार के समक्ष एक बार फिर अपनी मांग दोहराई है। एनपीएस को खत्म किया जाए और ओपीएस को जल्द से जल्द बहाल करें।

अगर सरकार नहीं मानती है तो देश में कलम छोड़ हड़ताल होगी, रेल के पहिये रोक दिए जाएंगे। दूसरे चरण में सरकार को सियासत के मोर्चे पर चोट की जाएगी। केंद्र एवं राज्यों के सरकारी कर्मियों और उनके परिजनों व रिश्तेदारों को मिलाकर वह संख्या दस करोड़ के पार चली जाती है। अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में जब यही संख्या वोट में बदलेगी तो केंद्र सरकार को कर्मियों की ताकत का अहसास होगा।

 

भारत बंद जैसे कई कठोर कदम

 

श्रीकुमार के मुताबिक, जेसीएम की बैठक में बताया गया है कि केंद्र सरकार में 20 लाख से ज्यादा कर्मचारी एनपीएस में हैं। 10 अगस्त को नई दिल्ली के रामलीला मैदान एक विशाल रैली आयोजित की गई थी। इसमें केंद्र और राज्य सरकार के लाखों कर्मियों ने हिस्सा लिया था। कर्मचारियों ने बिना गारंटी वाली एनपीएस योजना को खत्म करने की मांग की थी। इसके बाद कर्मचारी पक्ष ने जेसीएम की बैठक में अब एक बार फिर अपनी मांग दोहराई है।

केंद्र सरकार से आग्रह किया गया है कि पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस ) को जल्द से जल्द बहाल किया जाना चाहिए। सरकार, पुरानी पेंशन लागू नहीं करती है, तो ‘भारत बंद’ जैसे कई कठोर कदम उठाए जाएंगे। ओपीएस के लिए कर्मचारी संगठन, राष्ट्रव्यापी अनिश्चितकालीन हड़ताल कर सकते हैं। इसके लिए 20 और 21 नवंबर को देशभर में स्ट्राइक बैलेट होगा। कर्मचारियों की राय ली जाएगी। अगर बहुमत हड़ताल के पक्ष में होता है, तो केंद्र एवं राज्यों में सरकारी कर्मचारी, अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे। उस अवस्था में रेल थम जाएंगी तो वहीं केंद्र एवं राज्यों के कर्मचारी ‘कलम’ छोड़ देंगे।

 

अनिश्चितकालीन हड़ताल एक मात्र विकल्प

 

सी. श्रीकुमार के मुताबिक, पुरानी पेंशन बहाली के लिए केंद्र एवं राज्यों के कर्मचारी एक साथ आ गए हैं। लगभग देश के सभी कर्मचारी संगठन इस मुद्दे पर एकमत हैं। केंद्र और राज्यों के विभिन्न निगमों और स्वायत्तता प्राप्त संगठनों ने भी ओपीएस की लड़ाई में शामिल होने की बात कही है। कर्मचारियों ने हर तरीके से सरकार के समक्ष पुरानी पेंशन बहाली की गुहार लगाई है, लेकिन उनकी बात सुनी नहीं गई। अब उनके पास अनिश्चितकालीन हड़ताल ही एक मात्र विकल्प बचता है। दस अगस्त और एक अक्तूबर की रैली में देशभर से आए लाखों कर्मियों ने ‘ओपीएस’ को लेकर हुंकार भरी थी।

कर्मचारियों ने दो टूक शब्दों में कहा था कि वे हर सूरत में पुरानी पेंशन बहाल कराकर ही दम लेंगे। सरकार को अपनी जिद्द छोड़नी पड़ेगी। कर्मचारियों ने कहा था कि वे सरकार को वह फार्मला बताने को तैयार हैं, जिसमें सरकार को ओपीएस लागू करने से कोई नुकसान नहीं होगा। अगर इसके बाद भी सरकार, पुरानी पेंशन लागू नहीं करती है तो ‘भारत बंद’ जैसे कई कठोर कदम उठाए जाएंगे।

ऐसे में अहम सवाल यह है कि ऐसे क्या कारण हैं जिसकी वजह से सरकारी कर्मचारी नई पेंशन योजना से नाखुश क्यों हैं, और क्यों केंद्र सरकार पुरानी पेंशन योजना को लागू करने से कतरा रही है ? लेकिन इससे पहले नई और पुरानी पेंशन योजना में अंतर को समझने की जरूरत है।

क्या हैं नई पेंशन योजना

 

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नई पेंशन योजना ( राष्ट्रीय पेंशन योजना ) की शुरुआत 1 जनवरी 2004 कोहुई । जिसके तहत 2004 या उसके बाद सेवा में शामिल होने वाले केंद्र सरकार और केंद्रीय इकाइयों में काम करने वाले सभी कर्मचारियों के लिए गारंटीशुदा पेंशन प्रणाली की जगह एनपीएस प्रणाली की शुरुआत की गई ।

जिसके तहत नई योजना में रिटायरमेंट के बाद निश्चित पेंशन की गारंटी नहीं होती और कर्मचारी की बेसिक सैलरी प्लस डीए का 10 फीसद हिस्सा कटता है। साथ ही नई पेंशन योजना में एनपीएस शेयर बाजार पर आधारित है, इसलिए यहां टैक्स का भी प्रावधान है। इसमें कर्मचारियों को जनरल प्रोविडेंट फंड (जीपीएफ ) लाभ भी प्राप्त नहीं होता।

 

पुरानी पेंशन योजना अधिक फायदेमंद

 

नई पेंशन व्यवस्था जहाँ शेयर बाजार पर आधारित है वहीं पुराने नियमों के अनुसार पेंशन राशि सरकारी खजाने में से दी जाती थी। पुरानी पेंशन प्रणाली, कमर्चारियों की सर्विस के कुल वर्षों पर आधारित थी। उनकी पेंशन का निर्धारण उनके अंतिम मूल वेतन और महंगाई भत्ते को जोड़कर तय की जाती थी। ओपीएस में समय-समय पर वेतन संशोधन के मुताबिक पेंशन दिए जाने का भी प्रावधान था।

उस पुरानी व्यवस्था में, यदि किसी कर्मचारी की सेवावधि 10 वर्षों से कम नहीं है तो उन्हें पिछले मूल वेतन का आधा और सेवानिवृत्ति के समय महंगाई भत्ते की कुल राशि को जोड़कर पेंशन दिए जाने का गारंटीशुदा हक था और सेवा के दौरान या सेवानिवृत्ति के बाद किसी कर्मचारी की मृत्यु के मामले में, परिवार-पेंशन का भी प्रावधान था, जो उनके अंतिम मूल वेतन और महंगाई भत्ता (डीए) के योगफल का आधा हिस्सा होता था।

 

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साथ ही, सेवानिवृत्ति के समय और सेवा के दौरान मृत्यु के मामले में, एक कर्मचारी या उसके परिवार को आर्थिक सहायता दी जाती थी, जिसे ‘डेथ कम रिटायरमेंट ग्रेच्युटी’ कहा जाता है। साथ ही इस योजना के तहत कर्मचारियों को जनरल प्रोविडेंट फंड (जीपीएफ ) का लाभ भी प्राप्त होता है। जो एक पीपीएफ अकाउंट की तरह है लेकिन यह भारत में सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए है। जीपीएफ सभी सरकारी कर्मचारियों को अपनी सैलरी के एक निश्चित प्रतिशत में जनरल प्रोविडेंट फंड में योगदान करने की अनुमति देता है। कोई भी सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरी के दौरान इस फंड में निवेश करता है और रिटायरमेंट के समय यह पैसा निकाल सकता है।

 

आरबीआई ने दी चेतावनी

 

कुछ समय पहले राष्ट्रीय बैंक ऑफ़ इंडिया ( आरबीआई ) ने एक लेख जारी किया था। जिसमें कहा गया था कि पुरानी पेंशन योजना के मामले में राजकोषीय बोझ नई पेंशन योजना से 4.5 गुना तक अधिक हो सकता है। आरबीआई के इस लेख में चेतावनी दी गई है, ‘राज्यों का पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस ) पर लौटना एक बड़ा कदम होगा जो मध्यम से दीर्घावधि में उनके राजकोषीय दबाव को ‘अस्थिर स्तर’ तक बढ़ा सकता है।

साथ ही ओपीएस में वापस जाने वाले राज्यों के लिए तात्कालिक लाभ यह है कि उन्हें वर्तमान कर्मचारियों के राष्ट्रीय पेंशन योजना योगदान पर खर्च नहीं करना पड़ेगा, लेकिन भविष्य में गैर-वित्तपोषित पुरानी पेंशन योजना के उनके वित्त पर ‘गंभीर दबाव’ डालने की आशंका है।’

 

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इस लेख के अनुसार राज्यों के पुरानी पेंशन योजना पर वापस लौटने से वार्षिक पेंशन व्यय में साल 2040 तक सकल घरेलू उत्पाद का सालाना 0.1 प्रतिशत बचाएंगे, लेकिन उसके बाद उन्हें वार्षिक जीडीपी के 0.5 प्रतिशत के बराबर पेंशन पर अधिक खर्च करना होगा। इसमें कहा गया है कि पूर्व में डीबी योजनाओं वाली कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं को अपने नागरिकों की बढ़ती जीवन प्रत्याशा के कारण बढ़ते सार्वजनिक व्यय का सामना करना पड़ा है।

बदलते जनसांख्यिकीय परिदृश्य और बढ़ती राजकोषीय लागत ने दुनियाभर में कई अर्थव्यवस्थाओं को अपनी पेंशन योजनाओं की फिर से समीक्षा करने के लिए मजबूर किया है। लेख में कहा गया है कि, राज्यों द्वारा ओपीएस में कोई भी वापसी राजकोषीय रूप से अस्थिर होगी। हालांकि इससे उनके पेंशन व्यय में तत्काल गिरावट हो सकती है।

 

पुरानी पेंशन योजना से सरकार को क्या समस्या है ?

 

केंद्र सरकार द्वारा पुरानी पेंशन योजना पुनः लागू किये जाने में एक मुख्य समस्या यह है कि पेंशन की देनदारी अनफंडेड रही। मतलब आय का कोई जरिया नहीं था और भुगतान की राशि में लगातार बढ़ोत्तरी होती जा रही थी। पुरानी पेंशन योजना के तहत भारत सरकार के बजट में हर साल पेंशन के लिए प्रावधान किया जाता है। लेकिन भविष्य में साल दर साल ये भुगतान कैसे किया जाए, इस पर कोई स्पष्ट योजना नहीं थी। वहीं दूसरी ओर पेंशन की देनदारियां बढ़ती जा रही थीं साथ ही हर साल पेंशनर्स को दी जाने वाली सुविधाओं में भी बढ़ोतरी भी हो रही थी। मतलब महंगाई भत्ता, डीए से पेंशन भुगतान की राशि में और भी इजाफा होने लगा था।

आंकड़ों के अनुसार पिछले तीन दशकों में केंद्र और राज्यों के लिए पेंशन देनदारियां कई गुना बढ़ गई। वर्ष 1990-91 में केंद्र का पेंशन बिल 3 हजार 272 करोड़ रुपये था और सभी राज्यों के लिए कुल व्यय 3 हजार 131 करोड़ रुपये था। जो साल 2020-21 तक 58 गुना बढ़कर 1लाख 90 हजार 886 करोड़ रुपये हो गया। राज्यों के लिए यह 125 गुना बढ़कर 3 लाख 86 हजार 1 करोड़ रुपये हो गया।

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