पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-105
 

‘आसू’ के अलावा बोडोलैंड की मांग कर रही बोडो जनजाति भी गैर-असमी मुद्दे को लेकर राज्य में सक्रिय थी। विधानसभा चुनाव कराए जाने के निर्णय की ‘आसू’ और ‘बोडो लिबरेशन प्रंफट’ ने मुखालिफत करते हुए चुनाव बहिष्कार का फैसला ले लिया। बोडो जनजाति के लोग बड़े पैमाने पर हिंसा पर उतर आए थे। 18 फरवरी, 1983 के दिन असम में नरसंहार को अंजाम दे दिया गया। प्रदेश के नौगांव जिले के नेल्सी गांव में शरण लिए
गैर-असमियों जिनमें से अधिकांश मुसलमान थे, को दंगाइयों ने चारों तरफ से घेरकर मार डाला था। गैर-सरकारी आंकडों के अनुसार, लगभग 5000 निर्दोष शरणार्थी इस हमले में मारे गए। इस नरसंहार की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया गया था, जिसकी रिपोर्ट कभी भी सार्वजनिक नहीं की गई। एक भी आरोपी को इस जघन्य नरसंहार के लिए न तो आरोपित किया गया, न ही कोई मुकदमा चलाया गया। इस नरसंहार के तार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जोडे जाते हैं। अंग्रेजी पत्रिका ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार अरुण शौरी ने अपनी रिपोर्ट में यह बात कही थी। शौरी के अनुसार, ‘स्थानीय प्रशासन को पहले से ही इस प्रकार के नरसंहार होने की बाबत खुफिया जानकारी मिल गई थी लेकिन पुलिस प्रशासन ने कोई भी कदम नहीं उठाया था।’

1983 भारत के लिए चौतरफा समस्याएं पैदा करने वाला वर्ष रहा। पंजाब, कश्मीर और असम के साथ-साथ समुद्रपार एक विदेशी मुल्क की आन्तरिक घटनाओं का बडा असर दक्षिण भारत में अशांति पैदा करने लगा था। यह देश था श्रीलंका, जहां 1983 में अल्पसंख्यक तमिलों और बहुसंख्यक सिंहलियों के मध्य जातीय संघर्ष शुरू हो चला था। बौद्ध धर्म को मानने वाली बहुसंख्यक सिंहली और तमिलभाषी हिंदू अल्पसंख्यक आबादी के मध्य लम्बे अर्से से तनाव रहता आया था। 70 के दशम में श्रीलंकाई तमिलों ने अलग राष्ट्र की मांग उठाते हुए एक सशस्त्र संगठन ‘लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम’ (लिट्टे) की स्थापना कर श्रीलंका की सरकार के खिलाफ बगावत का ऐलान कर दिया। भारत के तटीय तमिल बाहुल्य राज्य तमिलनाडु में ‘लिट्टे’ समर्थकों का प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा था। 80 का दशक लिट्टे उग्रवादियों द्वारा सिंहलियों की हत्या के नाम रहा। जुलाई, 1983 में लिट्टे ने श्रीलंका सेना की एक टुकडी पर हमला कर 13 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था। इस घटना से बौखलाई श्रीलंका सेना ने तमिलों के नरसंहार को अंजाम दे डाला। लगभग 300 तमिल मारे गए और लाखों की तादाद ने भारत में शरण ले ली। भारत सरकार इस घटनाक्रम से बहुत पहले से ही ‘लिट्टेे’ को गुप्त रूप से समर्थन देने लगा था। तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. रामाचंद्रन श्रीलंका के तमिल अल्पसंख्यकों को खुला समर्थन दिया करते थे। कहा जाता है कि भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) ने ‘लिट्टे’ आतंकियों को हथियार और प्रशिक्षण देने का काम किया था। आने वाले समय में यही संगठन ‘लिट्टे’ भारत के लिए बडी समस्या बनकर उभरा था। इंदिरा गांधी सरकार की गलत नीतियों का खामियाजा 1991 में राजीव गांधी की ‘लिट्टे’ आतंकवादियों द्वारा हत्या किए जाने के रूप में सामने आता है।

31 अक्टूबर, 1984
‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के बाद खुफिया एजेंसियों ने प्रधानमंत्री को आगाह किया था कि उन पर जानलेवा हमला होने की प्रबल सम्भावना है। इंदिरा गांधी को स्वयं भी एहसास गहराने लगा था कि उनकी मृत्यु का समय नजदीक आता जा रहा है। सोनिया गांधी के अनुसार, ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के बाद गांधी परिवार के जीवन में एक साया-सा चिपक गया था। इंदिरा ने अपनी हत्या की आशंका का जिक्र राजीव और सोनिया के साथ करते हुए राहुल और प्रियंका की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की थी। पुपुल जयकर के अनुसार ‘इंदिरा को भी लगने लगा था कि उनके दिन नजदीक आ रहे हैं। यह एहसास उनके द्वारा अपने जीवन के अंतिम महीने में किए गए हर काम में व्याप्त था। एक धर्मनिरपेक्ष तीर्थयात्री के तौर पर वह देश के चारों कोनों में गईं, भारतीय उपमहाद्वीप के हर हिस्से की उन्होंने यात्रा की। अखबारों को दिए साक्षात्कारों में जिस तरीके से खुद की बाबत बात करती थीं और अपने धर्मानुसार धर्मस्थानों का दौरा करने लगी थी, वह उनके अंतिम वसीयतनामे के समान था। वे अपने जीवन को अर्थ देने का प्रयास कर रही थीं, अपने लोगों को बुद्धि मानी पूर्वक भविष्य के प्रति आगाह करने लगी थीं और यह भी बताने लगी थीं कि वे कैसे याद किया जाना चाहती हैं।’

बकौल पुपुल जयकर, उन्होंने इस दौरान एक बार कहा था-‘What ever happens to me-I feel I have paid all my debts.’हालांकि प्रधानमंत्री की सुरक्षा में बढोतरी कर दी गई, लेकिन खुफिया एजेंसियों की आशंकाएं गहराने लगी थीं। तत्कालीन रक्षामंत्री ने इंदिरा को सुझाव दिया था कि ‘उनकी सुरक्षा-व्यवस्था को फौज के हवाले कर दिया जाए। इस सुझाव को प्रधानमंत्री ने सिरे से यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसका खयाल तक अपने दिमाग में मत लाना। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, सैन्य राष्ट्र नहीं।’

उन्होंने खुफिया एजेंसियों के इस आग्रह को भी अस्वीकार कर दिया था कि उनकी सुरक्षा में तैनात सिख पुलिसकर्मियों को हटा लिया जाए।

30 अक्टूबर, 1984 को इंदिरा एक चुनावी रैली को सम्बोधित करने उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर पहुंची। भुवनेश्वर से उनका पुराना रिश्ता था। यहीं उनके पिता जवाहरलाल नेहरू को जनवरी, 1963 में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक के दौरान पहली बार दिल का दौरा पड़ा था। 1967 में हुए आम चुनाव के समय भुवनेश्वर में ही एक चुनावी सभा में इंदिरा पर पत्थर बरसाए गए थे, जिसमें उनकी नाक टूट गई थी। इसी शहर में उन्होंने अपना अंतिम चुनावी भाषण 30 अक्टूबर की देर शाम को देते हुए कहा ‘मैं आज यहां हूं, कल शायद यहां न रहूं। मुझे चिंता नहीं कि मैं रहूं या न रहूं। मेरा लम्बा जीवन रहा और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है। मैं अपनी अंतिम सांस तक ऐसा करती रहूंगी और जब मरूंगी तो मेरे खून का एक-एक कतरा भारत को मजबूत करने में लगेगा।’

यह उनका आखिरी चुनावी भाषण था। वे रात में ही दिल्ली वापस लौट आई थीं। अगली सुबह उनका बी.बी.सी. के लिए एक वृत्तचित्र तैयार कर रहे प्रसिद्ध अभिनेता पीटर उस्तीनोव के साथ सुबह साक्षात्कार तय था। इंदिरा ठीक 9ः10 पर अपने आवास से अपने घर वाले दफ्तर जाने के लिए बाहर निकलीं। उनका घर और कार्यालय अगल-बगल जुडे हुए बंगले थे, जिनके मध्य आने-जाने के लिए रास्ता बना हुआ था। इन दो बंगलों के मध्य में उनकी सुरक्षा में 1980 से तैनात रहा सिख पुलिसकर्मी बेअंत सिंह मौजूद था। बेअंत के ठीक पीछे एक नया सिख पुलिसकर्मी सतवंत सिंह खडा था। प्रधानमंत्री का अभिवादन करने के बाद बेअंत सिंह ने उन पर अपनी रिवॉल्वर से गोलियां दागनी शुरू कर दीं। बेअंत सिंह की रिवॉल्वर से निकली पांच गोलियों के तुरंत बाद सतवंत सिंह ने अपनी स्टेनगन से 25 गोलियां इंदिरा गांधी पर दाग दीं। इंदिरा गांधी को तत्काल ही उनकी पुत्रवधु सोनिया गांधी अखिल भारतीय चिकित्सा संस्थान (एम्स) लेकर गईं, जहां डॉक्टरों के अथक प्रयास के बाद भी उन्हें बचाया न जा सका। उनकी मृत्यु के कुछ समय बाद उनका लिखा एक पत्र उनके कागजातों में मिला था, जिसमें उन्होंने अपनी हत्या की आशंका का जिक्र करते हुए लिखा था-‘मुझे कभी भी मरने से भय नहीं लगा है। यह मेरे मन की शांति ही है, जो मुझे वसीयत सरीखा कुछ लिखने के लिए प्रेरित कर रही है। यदि मेरी हिंसक मृत्यु होती है, जैसी कुछ को आशंका है और कुछ ऐसा करने का षड्यंत्र रच रहे हैं तो हिंसा हत्यारे की सोच और उसके उठाए कदम में होगी, मेरी मृत्यु में नहीं, क्योंकि कोई भी नफरत इतनी स्याह नहीं हो सकती कि अपने लोगों और अपने देश के प्रति मेरे प्यार को कमजोर कर सके। कोई ऐसी ताकत नहीं, जो इस देश को आगे बढाने के मेरे संकल्प को डिगा सके।’ प्रेम की बाबत एक कवि ने लिखा है- ‘मैं तुम्हारे साथ रहते कैसे खुद को विनम्र रख सकता हूं। मैं कुछ ऐसा ही भारत के बारे में कहना चाहती हूं।’

इंदिरा गांधी का भारत-प्रेम अद्भुत और अटूट था। उन्होंने अप्रैल, 1984 में सोवियत संघ के अंतरिक्ष विमान सोयूज टी-11 दो अन्य सोवियत अंतरिक्ष यात्रियों के साथ आठ दिन तक अंतरिक्ष- भ्रमण करने वाले पहले भारतीय स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा से उनके अंतरिक्ष कक्ष में रहने के दौरान पूछा था- ‘अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है?’ तो राकेश शर्मा का उत्तर था- ‘सारे जहां से अच्छा।’ इंदिरा इस उत्तर को सुनकर भावुक हो उठी थीं। इंदिरा ने हर क्षेत्र में भारत को आगे बढाने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए हर सम्भव प्रयास किए थे। अपने पिता के नक्शे-कदमों पर चलते हुए उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में भारत को विषम आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद संसाधन उपलब्ध कराने में कोई कसर नहीं छोडी थी।

1969 में इंदिराकाल के दौरान ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) का गठन ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक विक्रम साराभाई ने किया था। भारत द्वारा निर्मित पहला उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ 1975 में प्रक्षेपित किया गया था। इंदिरा सरकार के समक्ष देशवासियों की मूलभूत आवश्यकता ‘रोटी, कपड़़ा और मकान’ का प्रबंध करना सबसे बडी प्राथमिकता और चुनौती थी। ‘इसरो’ के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष विज्ञानी डॉ. यू.आर. राव के नेतृत्व में भारत के पहले उपग्रह की कार्ययोजना को तो तैयार कर लिया था, लेकिन आर्थिक संसाधनों की भारी कमी के चलते इस अभियान को प्रधानमंत्री की मंजूरी मिल पाना लगभग असम्भव-सा था। प्रधानमंत्री के सामने जब इसका प्रस्ताव रखा गया तो उनका पहला प्रश्न बजट की बाबत था। ‘इसरो’ के तत्कालीन अध्यक्ष एम.जी.के. मेनन ने उपग्रह की कीमत अमेरिकी डॉलर 40 लाख और उसका सोवियत संघ की मदद से प्रक्षेपण की अनुमानित लागत 13 लाख डॉलर बताई थी। प्रधानमंत्री की सहमति लेने के लिए ‘इसरो’ के वैज्ञानिकों ने इस उपग्रह के तीन नाम सुझाएµपहला 5वीं सदी के महान गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम पर ‘आर्यभट्ट’, दूसरा सोवियत संघ और भारत की मित्रता के दृष्टिगत ‘मैत्री’ और तीसरा नाम प्रधानमंत्री को लुभाने के लिए उनके पिता और देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम पर ‘जवाहर’। इंदिरा गांधी ने सीमित संसाधनों के बावजूद न केवल परियोजना को मंजूरी दी, बल्कि उपग्रह का नाम भी ‘आर्यभट्ट’ रखने के निर्देश ‘इसरो’ को दिए थे। आर्यभट्ट का अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक स्थापित होना विश्व- शक्तियों के लिए बडा अचम्भा और भारतीय वैज्ञानिकों के लिए बडी उपलब्धि रहा।

इंदिरा ने 60 के मध्य में भारत की कमान संभाली थी। यह वह दौर था, जब 1962 में चीन के हाथों पराजित होने के बाद और 1965 में पाकिस्तान के साथ लड़ाई के बाद भारत की आर्थिकी पूरी तरह तबाह होने के कगार पर पहुंच चुकी थी। लगातार दो बरस से खराब मानसून के चलते सूखे की स्थिति पैदा हो गई थी, जिसका सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ने लगा था। महंगाई की मार और अन्न की कमी के चलते अकाल का खतरा मंडराने लगा था। अमेरिकी सरकार ने भारत को अन्न देने की राह में नाना प्रकार की अड़चनें डालकर इस संकट को गहराने का काम किया। ऐसे में इंदिरा सरकार ने ‘हरित क्रांति’ के जरिए आत्मनिर्भरता पाने का लक्ष्य सफलतापूर्वक तय कर देश को अन्न के उत्पादन में शानदार सफलता दिलाई। 1974 में किया गया पोखरण परमाणु परीक्षण भी इंदिरा गांधी के प्रखर नेतृत्व के चलते सम्भव हो पाया था।

क्रमशः

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