हिंदी-उर्दू के मशहूर लेखक राही मासूम रजा ने आपातकाल के दौरान एक उपन्यास ‘कतरा बी आरजू’ लिखा जिसमें संजय गांधी के ‘सौंदर्यीकरण’ और ‘नसबंदी अभियान’ से उपजी परिस्थितियों और आमजन की पीड़ा का जीवंत वर्णन किया गया था। यह उपन्यास भी लेकिन आपातकाल के बाद ही प्रकाशित हुआ इसलिए इसे प्रतिरोध का स्वर नहीं माना जा सकता। 70 के दशक के पूर्वार्ध में श्रणव कुमार गोस्वामी ने आपातकाल सरीखे आसन्न संकट को भांपते हुए ‘जंगलतंत्रम’ नाम से 1973 में एक सशक्त उपन्यास लिखा। इसका प्रकाशन भी आपातकाल के बाद 1979 में ही किया जा सका था।
सत्तर के शुरुआती साल भारतीय सिनेमा में सत्ता और शोषण के खिलाफ एक आक्रोश भरे नायक के नाम रहे। ऐसा नायक जो भूख, भय और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाता है और अकेले दम पर अत्याचारियों को सजा देता है। जाहिर है चौतरफा पसर चुके अनाचार को भारतीय सिनेमा अपने तरीके से सामने लाने का काम कर रहा था। 1973 में प्रदर्शित ‘जंजीर’ और ‘दीवार’ सरीखी बॉलीवुड फिल्में लेकिन यथार्थ से नजदीक होते हुए भी कोसों दूर थीं। ये फिल्में सफल रहीं क्योंकि आम जनता को इनसे इतना तो सुकून हासिल होता था कि अन्याय को समाप्त करने वाला कोई न कोई तो है। दूसरी तरफ यथार्थवादी सिनेमा भी इस दौर के काले रूप को सामने पूरे यथार्थवादी तरीके से ला रही थी। ऐसी फिल्मों को आपातकाल के दौरान सेंसरशिप का सामना करना पड़ा। श्याम बेनेगल की ‘निशांत’ बमुश्किल 1975 में प्रदर्शित हो पाई थी। कांग्रेस नेता और फिल्मकार अमृत नाहटा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ अप्रैल, 1975 में सेंसर बोर्ड के समक्ष प्रदर्शित की गई थी। संजय गांधी तब तक सत्ता का केंद्र बन उभरने लगे थे। सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया। बोर्ड के सदस्यों के अनुसार फिल्म संजय गांधी और उनके करीबियों -स्वामी धीरेंद्र ब्रह्माचारी, आरके धवन और रुखसाना सुलतान को निशाने पर रखकर बनाई गई है। आपातकाल के दौरान इस फिल्म के सभी प्रिंट संजय गांधी की कम्पनी मारुति उद्योग के गोदाम में जला दिए गए थे। यह मामला इतना विवादित रहा कि जनता सरकार के समय में आपातकाल के दौर की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग ‘शाह कमीशन’ के समक्ष भी इसे रखा गया। कमीशन ने इस फिल्म के प्रिंट्स जलाने का दोषी संजय गांधी को करार दिया था। यह फिल्म भी आपातकाल लागू होने से पहले की थी। आपातकाल के दौर में सिनेमा भी मूक और बधिर ही रहा। वामपंथी विचारधारा के संगठन ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ और ‘इप्टा’ (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन) इस दौरान सक्रिय नहीं रहे। सत्ता के खिलाफ रंगमंच के सक्रिय चेहरे जिनमें फिल्म अभिनेता उत्पल दत्त सरीखे शामिल थे, आपातकाल के दौरान मानो कहीं दुबक गए थे। वृत्त चित्र फिल्म निर्माता आनंद पटवर्धन, गीतकार किशोर कुमार सरीखे बिरले ही थे जिन्होंने प्रतिरोध के स्वर को इस दौर में जिन्दा रखा था। 1974 में जेपी आन्दोलन पर बनाया उनका वृत्त चित्र ‘क्रांति की लहरें’ तत्कालीन सत्ता को खासा अखरा था। पटवर्धन आपातकाल के दौरान गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गए थे। उन्हें आशंका थी कि केंद्र सरकार ‘क्रांति की लहरें’ के प्रिंट नष्ट कर देगी। वे भूमिगत हो अपने मित्र फिल्म निर्देशक मणिकौल के साथ मिलकर इस वृत्त चित्र को गुप्त बैठकों में दिखाते रहे। गीतकार किशोर कुमार को भी संजय गांधी के कोप का शिकार होना पड़ा था। संजय चाहते थे कि किशोर कुमार ‘नसबंदी अभियान’ के समर्थन में प्रचार गीत गाएं। किशोर ने ऐसा करने से स्पष्ट मना कर दिया जिसका नतीजा रहा सरकारी रेडियो और दूरदर्शन द्वारा उनके गीतों को पूरी तरह से प्रतिबंधित करना। लेखकों और साहित्यकारों में अधिकतर इस दौर में खामोश ही रहे थे। नागार्जुन, गिरधर राठी और मुरली मनोहर प्रसाद सिंह चंद नाम ही हैं जिन्होंने अपने जमीर से समझौता नहीं किया जिसका खामियाजा रहा इन सभी की गिरफ्तारी। दुर्गा भागवत ने जब आह्वान किया कि जिस प्रकार गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा दिए गए सम्मान को जलियावाला बाग कांड का विरोध करते हुए वापस कर दिया था, ठीक उसी तर्ज पर हमें भी सरकारी सम्मानों को आपातकाल का विरोध करते हुए वापस कर देने चाहिए और सरकारी कार्यक्रमों का बहिष्कार कर देना चाहिए तो उन्हें भारी निराशा हाथ लगी थी। केवल हिंदी के साहित्यकार फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने उन्हें मिले सम्मान ‘पद्मश्री’ को वापस लौटाने का साहस तब दिखाया था। विजय तेंदुलकर, सत्यजीत रे, राजकपूर और उत्पल दत्त जैसे फिल्मकार और रंगकर्मी जो अपनी राजनीतिक चेतना के लिए पहचाने जाते थे, आपातकाल के डर से चुप्पी साधे रहे। प्रेस का हाल तो सबसे ज्यादा निन्दनीय रहा। रतन कलरानी, कुलदीप नैय्यर, दीनानाथ मिश्रा, वीरेंद्र कपूर और के. विक्रमराव चंद पत्रकार थे जिन्होंने आपातकाल का जमकर विरोध किया और जेल गए। अंग्रेजी दैनिक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अकेला प्रतिरोध करता रहा जिसका खामियाजा उसे उठाना पड़ा था। ‘एक्सप्रेस समूह के विज्ञापन पूरी तरह बंद कर दिए गए और समूह के मालिक उद्योगपति रामनाथ गोयनका को नाना प्रकार की सरकारी जांचों का सामना करना पड़ा। लघु पत्रिकाओं में ‘उत्तरार्ध’, ‘लहर’, ‘पहल’, ‘अंततः’ और अभिरुचि’ चंद ऐसे नाम हैं जिन्होंने आपातकाल के दौर में भी प्रतिरोध के स्वर को बुलन्द रखा था। बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों द्वारा प्रकाशित और अधिक प्रसार वाली पत्रिकाओं- ‘धर्मयुग’, ‘दिनमान’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ आदि सभी सरकार के पक्ष में इस दौर में जा खड़ी हुई थीं। अंग्रेजी पत्रकार खुशवंत सिंह तो इस दौर में खुलकर इंदिरा और संजय गांधी के समर्थन में चाटुकारिता के स्तर पर उतर गए थे। सेंसरशिप से बचने और अपनी बात कहे जाने के प्रयास कुछेक ने जरूर किए जिनमें वी. बालासुब्रमण्यम द्वारा ‘इस्टर्न इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका के लिए लिखा गया एक आलेख शामिल है। ‘भारत में पशुओं की समस्या’ (Livestock problems in India) शीर्षक से लिखे गए इस आलेख की शुरुआत बोल सुब्रमण्यम ने कुछ यूं की थी- “There are at present 580 milion sheep in the country” देश में इस समय 58 करोड़ भेड़ें हैं। इसी प्रकार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ अंग्रेजी दैनिक में किसी ने एक विज्ञापन प्रकाशित करवाया था जिसमें लोकतंत्र की मृत्यु का ऐलान करते हुए कहा गया था- ‘लोकतंत्र की मृत्यु हो गई है। शोकाकुल पत्नी सत्य, पुत्र स्वतंत्रता, बेटियां विश्वास, उम्मीद और न्याय।’
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आपातकाल के दौर में प्रतिरोध की आवाज बनने में प्रेस, सिनेमा, रंगमंच, सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्य आदि सभी अपनी भूमिका निभा पाने में खासे असफल रहे थे। जनसंघ के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जो कुछ पत्रकारों की आपातकाल में भूमिका को लेकर कहा था वह असल में उपरोक्त सभी पर सटीक लागू होता है कि ‘आप लोगों को झुकने के लिए कहा गया था लेकिन आप तो रेंगने लगे।’
आजादी बाद का भारत और आपातकाल
तमाम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को स्थगित कर 25 जून, 1975 को आपातकाल की घोषणा के पीछे तात्कालिक कारण भले ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय रहा हो, लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलने की शुरुआत जो 1947 से ही देखने को मिलती है, एक बड़ा और महत्वपूर्ण कारण है जो अंततोगत्वा तानाशाही के दरवाजे पर देश को ले आया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय यदि इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला न भी देता तब भी शायद देर-सबेर हालात 25 जून वाले बनते ही बनते। आजादी अपने साथ विभाजन, धर्म आधारित विभाजन की त्रासदी लेकर आई थी। 1947-48 में धर्म के नाम पर सड़कों पर आम आदमी का खून बहा था। डॉ. भीमराव अम्बेडकर धर्म के बाद का संकट पहचान रहे थे। 25 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा की बैठक में उन्होंने इस संकट को रेखांकित करते हुए कहा- ‘हजारों जातियों में विभाजित लोग एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं …26 जनवरी 1950 को हम एक विरोधाभासी जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता है लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता। राजनीति में हम एक व्यक्ति-एक वोट-एक मूल्य के सिद्धांत को मान्यता देंगे। अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचना के चलते एक व्यक्ति- एक मूल्य के सिद्धांत को नकारते रहेंगे। कब तक हम इन विरोधाभासों का जीवन जिएंगे?’
अम्बेडकर ने भारतीय समाज के विरोधाभासों से उत्पन्न होने वाले संकट को सही भांपा था। सदियों से वर्ण व्यवस्था चलते दबाए गए समाज के बड़े वर्ग में उच्च जातियों के प्रति गहरी वितृष्णा उग्र रूप कभी भी ले सकती थी। अम्बेडकर दलित जातियों को वामपंथ की तरफ जाते देखने लगे थे। अम्बेडकर का मानना था कि ‘वामपंथ हिंसा के सहारे पैदा हुई सर्वहारा वर्ग की तानाशाही है जो नागरिकों के समस्त अधिकारों को समाप्त कर देती है। जनप्रतिनिधि चुनने का अधिकार, वोट देने का अधिकार आम नागरिक से छीन वामपंथी शासन में उसे दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया जाता है।’ अपनी मृत्यु से कुछ अर्सा पहले 1956 में वे दलित और शोषित समाज में पनप रहे आक्रोश से चिंतित हो रहे थे।
अपनी मृत्यु से पहले, ‘मैं अपने लोगों के लिए एक निश्चित राजनीतिक दिशा स्थापित करना चाहता हूं। वे लोग गरीब, शोषित और वंचित बने हुए हैं और अब उनके भीतर एक नई चेतना, नया क्रोध उबाल मार रहा है। यह स्वाभाविक है कि इस प्रकार का समाज वामपंथ की तरफ आकर्षित होने लगे। मैं नहीं चाहता कि मेरे लोग वामपंथ के बहकावे में आए।’
संविधान निर्माताओं ने भारतीय समाज में व्याप्त विडम्बनाओं को समझते हुए यह भरपूर प्रयास किया कि एक समृद्ध और न्यायशाली राष्ट्र का निर्माण के लिए ऐसा संविधान बनाया जाए जो लोकतंत्र को भीड़तंत्र में न परिवर्तित होने दे। मौलिक अधिकार, व्यस्क मताधिकार, राज्य के लिए नीति-निदेशक तत्व आदि के जरिए सामाजिक विसंगतियों को दूर करने का प्रयास लेकिन मूर्त रूप नहीं ले सका। ये विसंगतियां इतनी व्यापक और इतने प्रकार की थी कि लोकतंत्र का लोक किसी न किसी कारण चलते आजादी मिलने के बाद भी सड़कों पर उतरने को मजबूर और उतावला रहा। इतिहासकार प्रो. ज्ञानप्रकाश हिंदी-उर्दू के मशहूर लेखक मंटो को उद्धृत करते हुए इस विडम्बना की व्याख्या करते हैं-सदाउत हसन मंटो विभाजन चलते मजबूर हो पाकिस्तान चले गए थे लेकिन भारत हमेशा उनके दिल में रहा। 1951 में उन्होंने ‘मुरली की धुन’ शीर्षक से अपनी मन की व्यथा कही। वे लिखते हैं ‘…14 अगस्त का दिन मेरे सामने बॉम्बे में मनाया गया। पाकिस्तान और हिंदुस्तान दो आजाद मुल्क करार दिए गए थे। लोग बहुत मसरुर थे। मगर कत्ल और आग की वारदातें बाकायदा जारी थी। हिंदुस्तान जिंदाबाद के साथ-साथ पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे भी लगते थे। …समझ में नहीं आता था कि हिंदुस्तान अपना वतन है या पाकिस्तान और वह लहू किसका है जो रोज इतनी बेदर्दी से बहाया जा रहा है। यह हड्डियां कहां जलाई या दफन की जाएंगी जिन पर से मजहब का गोश्त-पोस्त, चीलें और गिद्ध नोच-नोच कर खा गए थे। अब कि हम आजाद हुए, हमारा गुलाम कौन होगा? जब गुलाम थे तो आजादी का तसब्बुर कर सकते थे। अब सवाल ये है कि हम आजाद हुए हैं या नहीं।’

