Uttarakhand

ऊर्जा प्रदेश में गहराता ऊर्जा संकट

उत्तराखण्ड में चल रहे बिजली संकट ने सरकार की नींद उड़ा रखी है। राज्य में इस साल बारिश कम होने और गैस से चलने वाले बिजली उत्पादन केंद्रों के बंद होने से बिजली संकट गहराता ही जा रहा है। इससे उबरने के लिए प्रदेश सरकार केंद्र से मदद मांग रही है। उत्तराखण्ड ने केंद्र से सस्ती दर पर बिजली उपलब्ध कराने और सेंटर पूल से मिलने वाला कोटा बढ़ाने की मांग की है। उधर राज्य में बिजली संकट से निजात पाने के लिए सरकार की तरफ से तेजी से काम किए जा रहे हैं। जिसके लिए कई बंद पड़ी विद्युत परियोजनाओं को शुरू करने का काम करने की योजना है

 

प्रदेश की पहचान भले ही ऊर्जा प्रदेश के रूप में हो लेकिन राज्य लगातार ऊर्जा संकट से जूझता रहा है। बाहरी राज्यों से किसी तरह बिजली खरीद कर काम चलाया जा रहा है। इन दिनों प्रदेश में बिजली का संकट गहराया हुआ है। केंद्रीय पूल से जो विशेष कोटे की 300 मेगावाट बिजली प्रदेश को मिलती थी उसकी मियाद पूरी हो चुकी है। हांलाकि मार्च तक के लिए 72 लाख यूनिट बिजली केंद्र सरकार ने अपने गैर आवंटित कोटे से दे दी है लेकिन आने वाले समय में प्रदेश को बिजली संकट से बचाना काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है। दूसरी तरफ कोटे की बिजली के बावजूद भी यूपीसीएल को रोजाना तीन-चार मिलियन यूनिट बिजली बाजार से खरीदनी पड़ रही है। कोटा खत्म होने के बाद यूपीसीएल को बाजार से 10 से 12 मिलियन यूनिट बिजली खरीदनी पड़ेगी। वहीं पंजाब व दिल्ली से प्रदेश को मिलने वाली 250 मेगावाट बिजली भी अब नहीं मिल रही है। हालांकि बिजली संकट से निपटने के लिए राज्य सरकार मार्च 2024 तक 400 मेगावाट यानी 96 लाख यूनिट बिजली की मांग केंद्र से लगातार कर रही है। इसके लिए बातचीत का दौर जारी है। प्रदेश में ऊर्जा की किल्लत को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खुद कमान संभाली हुई है। केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने उन्हें अतिरिक्त बिजली देने का आश्वासन दिया है। साथ ही प्रदेश की लंबित जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पीएमओ ने बैठक करने का संकेत भी दिया है।

 

बिजली संकट को लेकर केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह संग धामी

दूसरी तरफ कम बर्फबारी से बिजली उत्पादन अपने निम्न स्तर में है। कम बर्फबारी का प्रभाव जल विद्युत गृहों पर दिख रहा है। इसके चलते नदियों का जल स्तर कम हुआ है जिससे कुल उत्पादन क्षमता से कम उत्पादन हो रहा है। बढ़ती गर्मी से मांग बढ़ रही है। जिससे मांग व पूर्ति का संतुलन भी गड़बड़ा रहा है। प्रदेश में बिजली की वर्तमान मांग को देखें जो 38 से 40 मिलियन यूनिट है। प्रदेश को जो बिजली उपलब्ध होती है वह यूजेवीएनएल से मिलने वाली 11 मिलियन यूनिट, केंद्रीय पूल से मिलने वाली 22 मिलियन यूनिट है। इस तरह प्रदेश के पास 33 मिलियन यूनिट बिजली उपलब्ध है लेकिन जो मांग के सापेक्ष 03 से 04 मिलियन यूनिट कम है। बिजली की कमी का मतलब है कि बिजली में कटौती होना। अगर कटौती होती है तो इससे कई तरह की दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। समस्या यहीं तक सिमट कर नहीं रह गई है बल्कि बढ़ते तापमान ने भी स्थिति को जटिल बना दिया है। बढ़ते तापमान ने बिजली की खपत को बढ़ा दिया है तो पूर्ति कैसे हो? यह बड़ा सवाल बना हुआ है। वहीं बड़ी जल विद्युत परियोजनाएं पूरी नहीं हो पा रही हैं। पर्यावरणीय कारणों से कई परियोजनाएं रुकी पड़ी हैं। गंगा और इसकी सहायक नदियों पर प्रस्तावित बांध परियोजनाओं के साथ रन ऑफ रिवर परियोजनाओं पर भी रोक लगी हुई है।

ऐसे में ऊर्जा प्रदेश का सपना पूरा करने के लिए प्रदेश सरकार लघु जल विद्युत परियोजनाओं से उम्मीद कर रही है। 2 मेगावाट से लेकर 25 मेगावाट परियोजनाओं को विकसित कर 500 मेगावाट बिजली पैदा करने की प्रदेश सरकार की मंशा है। अब प्रदेश सरकार का लक्ष्य है कि छोटी जल विद्युत परियोजनाओं का जाल बिछाया जाए। अब उत्तराखण्ड सरकार हाइड्रो पावर एवं सोलर पावर से जुड़ी पालिसी में बदलाव करने जा रही है। अब घर की छत पर सोलर प्लांट लगाना आसान होगा। दोनों पॉलिसी को बनाने की जिम्मेदारी स्वतंत्र संस्था काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरमेंट एंड वाटर को दी गई है। इससे पूर्व 2008 में आईआईटी रूड़की ने पॉलिसी बनाई थी लेकिन जो पॉलिसी बनी उसके तहत प्रोजेक्ट कम लगे। यूं तो प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाओं की अपार संभावनाएं हैं। सुप्रीम कोर्ट व गंगा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने रोक लगा रखी है। इसके अलावा 10 से ज्यादा परियोजनाएं ऐसी हैं जिन पर विवाद नहीं है। लेकिन इन परियोजनाओं पर काम नहीं हो पाया है, इसके चलते ऊर्जा प्रदेश को बिजली के लिए बाहरी राज्यों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। अगर ये परियोजनाएं बनती हैं तो खर्च होने वाला राजस्व भी बचेगा व साथ ही राजस्व भी सरकार के खाते में आएगा। कई योजनाओं को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भी मंजूरी दे चुका है। प्रदेश में 769 मेगावाट के प्रोजेक्टों के लिए कोई विवाद नहीं हैं। भिलंगना, आईआईसी, बोवाला, नंदप्रयाग, देवसारी, लगांसू, भिलंगना आईआईए, भिलंगना आईआईबी, मिलखेत, पिंडर, देवी, काली गंगा, कोटाबूढ़ाकेदार में काम शुरू नहीं हो पा रहा है। इनमें से सात को जल शक्ति मंत्रालय से मंजूरी मिल चुकी है कई का काम सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद बंद है। उत्तराखण्ड में हाइड्रो प्रोजेक्ट के जरिए करीब दस हजार मेगावाट बिजली उत्पादन संभव है। इसके लिए आठ परियोजनाएं चिÐत की गई हैं। जिससे तीन हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन हो सकता है। इनमें से कुमाऊं की धौली व काली गंगा क्षेत्र में चार व गढ़वाल में यमुना वैली में चार परियोजनाएं बनेंगी। इन परियोजनाओं में टीएचडीसी की हिस्सेदारी 74 प्रतिशत व राज्य सरकार का हिस्सा 26 प्रतिशत होगा। साथ ही टीएचडीसी हाइड्रो प्रोजेक्ट की तकनीक भी उत्तराखण्ड सरकार को देगा। इन परियोजनाओं पर 20 हजार करोड़ रुपए खर्च इस समय देश में थर्मल पावर से 60 प्रतिशत, वैकल्पिक ऊर्जा से 30 प्रतिशत व हाइड्रो से लगभग 10 प्रतिशत बिजली बन रही हैं जबकि हाइड्रो में उत्तराखण्ड में अपार संभावनाएं हैं। प्रदेश में हाइड्रो पावर
जेनरेशन की काफी क्षमता है। वर्तमान में यूजेवीएनएल की करीब 35 छोटी व बड़ी हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट चल रहे हैं। लेकिन 40 प्रोजेक्ट ऐसे हैं जो किसी न किसी नियमों की वजह से लटके पड़े हैं।

वहीं तांकुल में 118 करोड़ की लागत से बनने वाली जल विद्युत परियोजना से राज्य सरकार को काफी उम्मीद है। जिसमें 12 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। यह केंद्र सरकार से अनुमोदित हो गई हैं। पिथौरागढ़ के धारचूला के व्यास वैली के तांकुल गांव में बहने वाली सिमखोला नोले में यह योजना बनेगी। दो वर्ष पूर्व इसकी डीपीआर केंद्र को सौंपी गई है। इस समय देश में थर्मल पावर से 60 प्रतिशत, वैकल्पिक ऊर्जा से 30 प्रतिशत व हाइड्रो से लगभग 10 प्रतिशत बिजली बन रही हैं जबकि हाइड्रो में उत्तराखड में अपार संभावनाएं हैं। ऊर्जा प्रदेश में बिजली की लाइनें क्षमता से अधिक भार ढो रही हैं। जो लाइनें है उनमें क्षमता से अधिक वोल्टेज करंट हो रही हैं इससे उपभोक्ताओं के विद्युत उपकरण खराब हो रहे हैं। शॉर्ट सर्किट की घटनाएं बढ़ रही हैं इसके अलावा संयोजनों में बिजली की खपत भी बढ़ रही है इसका भार उपभोक्ताओं की जेब में पड़ रहा है। अकेले पिथौरागढ़ जिले में यूपीसीएल 132, 33, 11 केवीए की लाइनों की जरिए सप्लाई होती हैं जिले को बिजली चंडाक स्थित पावर ग्रिड से दी जाती है। घरेलू और व्यावसायिक संयोजनों में बिजली की आपूर्ति का मानक एक फेस में 220 व तीन फेस में 440 वोल्ट है। लेकिन यहां की बिजली लाइनों में अधिक करंट दौड़ रहा है। रात में लाइनों पर दबाव कम होने के बाद वोल्टेज बढ़कर 300 वोल्ट तक पहुंच जाती है। जबकि बिजली की लाइन से अधिक या कम वोल्टेज की आपूर्ति करना उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग के विनियम के प्रावधानों में गुणवत्ता के खिलाफ है।

हरित ऊर्जा की पहल : उत्तराखण्ड में अब 2027 तक 2500 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन होगा। इसके लिए प्रदेश सरकार ने नई सौर ऊर्जा नीति तैयार की है। हालांकि प्रदेश में 2013 में यह नीति लागू की गई थी जिसमें 2015 व 2017 में संशोधन भी किया गया था। नई नीति में कहा गया है कि उत्पादित सौर ऊर्जा को ग्रिड के माध्यम से ऊर्जा निगम अनिवार्य रूप से खरीदेगा। माना जा रहा है कि नई नीति में बेहतर प्रक्रियाओं, प्रोत्साहनों व व्यापार मॉडल पर बल देकर सौर ऊर्जा में निवेश को बढ़ावा दिया जाएगा। ग्रामीण आजीविका को बढ़ाने व समावेशी विकास में इसका उपयोग होगा। इस नीति को बनाने में ऊर्जा विभाग ने काउंसिल ऑफ एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर की सहायता ली है। उत्तराखण्ड को हरित प्रदेश बनाने के संकल्प के साथ धामी मंत्रिमंडल उत्तराखण्ड राज्य सौर ऊर्जा नीति 2023 को स्वीकृति प्रदान कर चुका है।

धामी सरकार का मानना है कि सौर ऊर्जा उत्पादन के जरिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। उम्मीद है कि नई पॉलिसी आने के बाद इनकी राह आसान हो जाएगी। दो किलोवाट तक के सोलर प्रोजेक्ट लगाने पर यूपीसीएल को बिजली बेचने के प्रावधान में कई नियम हैं जो सौर ऊर्जा की राह में रोड़ा हैं। वर्ष 2013 में जो सोलर एनर्जी पॉलिसी लागू की गई थी उसका मकसद प्रदेश में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना था लेकिन यह घर-घर का विकल्प नहीं बन पाया था। छोटी जल विद्युत परियोजनाओं पर बातें तो बहुत होती रही हैं लेकिन धरातल पर काम नहीं हो पा रहा है। इसके अलावा हाल में पारित 77,407 करोड़ रुपए का जो बजट धामी सरकार ने पास किया है उसमें से ऊर्जा विभाग के लिए 1231.33 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया है। इसमें जमरानी बांध एवं सौंग बांध परियोजनाओं के निर्माण को भी प्राथमिकता दी गई है।

दस मार्च को मुख्यमंत्री जी केंद्रीय ऊर्जामंत्री श्री आरके सिंह जी से इस संबंध में मिले थे। मैं भी साथ में था। तब केंद्रीय मंत्री के समक्ष प्रदेश में बिजली की समस्या पर गहनता से विचार किया गया। श्री सिंह ने मार्च 2023 के लिए प्रदेश को 300 मेगावाट अतिरिक्त विद्युत प्रदान किए जाने का आश्वासन दिया है। जिससे हमें बिजली का संकट नहीं होगा। प्रदेश में बंद पड़ी दो गैस आधारित विद्युत परियोजनाएं भी शुरू होने की उम्मीद है।
आर. मिनाक्षी सुंदरम, सचिव, ऊर्जा उत्तराखण्ड

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