Editorial

हर चमकने वाली वस्तु…

मेरी बात  

भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कह पुकारा जाता है। भगवान विष्णु के तेईस अवतारों में से एक राम सातवें अवतार के रूप में कौशल नरेश दशरथ के पुत्र रूप में धरती पर अवतरित हुए थे। एक चक्रवर्ती सम्राट के यहां जन्म लेने वाले राम आमतौर पर राजपुरुषों के भीतर मौजूद तमाम चारित्रिक कमजोरियों से कोसों दूर एक ऐसे जननायक बतौर सामने आते हैं जिसने कम उम्र में ही खुद को आमजन की पीड़ा के साथ जोड़ लिया था और बतौर राजकुमार हाशिए में पड़े दलितों, आदिवासियों-वनवासियों और स्त्रियों को मुख्यधारा में लाने का काम किया। स्मरण रहे राम राजपुत्र अवश्य थे लेकिन वे राजभवन में उपेक्षित और उत्पीड़ित रहे। पटरानी का पुत्र होने के बावजूद पिता दशरथ का प्रेम उनके हिस्से कभी नहीं आया। सम्राट दशरथ अपनी सबसे छोटी रानी केकयी के प्रभाव में रहते थे और कौशल के राजपाठ में केकयी का पूरा प्रभाव था। संभवतः पिता से मिलने तिरस्कार और उपेक्षा ने ही बालक राम को संवेदनशील और मर्यादित बनाने का काम किया। बतौर निर्वासित राजकुमार और बाद में कौशल सम्राट बनने पर भी राम हमेशा मर्यादा के दायरे में रहे और अपनी इसी विशेषता के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। ऐसे महान जननायक, विष्णु के सातवें अवतार की नाम राशि कलयुग में कलयुगी सफलता के शिखर पर विराजमान एक महानुभाव लेकिन अपने नाम का कभी सम्मान न कर पाए। गत् दिनों देश की शीर्ष अदालत द्वारा भगवान राम के नाम राशि वाले इन महानुभाव पर अप्रत्यक्ष रूप से की गई कठोर टिप्पणी ने अंग्रेजी की कहावत  ‘All that glitters is not gold’ (हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती) को सही प्रमाणित कर दिखाया। उच्चतम् न्यायालय की टिप्पणी ने यह भी सिद्ध किया है कि राम भगवान का नाम रखने भर से कोई व्यक्ति उनके समान नहीं हो सकता है। राम बनने के लिए सबसे अनिवार्य शर्त मर्यादित और नैतिक तल पर उच्च आचरण है। कलयुग का सबसे बड़ा संकट यह कि हर चमकने वाली वस्तु को आमजन आंखमूंद कर सोना मान लेती है और अंततः ठगी जाती है। शायद पीतल को सोना मानने का यह दौर वर्तमान में हम (हम से तात्पर्य उनसे है जो पीतल को परखे बिना सोना नहीं मानते हैं) चौतरफा पसरा देख रहे हैं और इस पीतली व्यवस्था का दंश भोगने को अभिशप्त हैं। बहरहाल मैं बात उच्चतम न्यायालय द्वारा गत् 27 फरवरी के दिन योग गुरु रामदेव की संस्था पतंजलि आयुर्वेद को जारी किए गए अवमानना नोटिस की कर रहा हूं। यह अवमानना नोटिस उच्चतम न्यायालय ने अपने समक्ष पतंजलि आयुर्वेद द्वारा दायर शपथ पत्र का पालन नहीं किए जाने से नाराज हो जारी किया है। समरण रहे कि भारतीय चिकित्सक संघ ने वर्ष 2022 में पतंजलि के खिलाफ याचिका दायर कर मांग की थी कि रामदेव की संस्था द्वारा जारी किए जा रहे झूठे विज्ञापनों पर रोक लगाई जाए। संघ का आरोप है कि पतंजलि अपनी आयुर्वेदिक दवाओं के प्रचार एवं बिक्री बढ़ाने की कुनियत चलते भ्रामक दावे करती है और आयुर्वेद से इतर अन्य चिकित्सीय प्रणालियों को दोयम दर्जे का साबित करने का गलत प्रचार करती है। भारतीय चिकित्सीय संघ ने अगस्त 2022 में दायर अपनी इस याचिका में कहा था कि ‘रामदेव ऐलोपेथी को बकवास और भ्रष्ट विज्ञान रहते हैं और कोविड-19 के दौरान हुई मृत्यों के लिए एलोपेथी को जिम्मेदार ठहराते हैं। ‘संघ का आरोप है कि आधुनिक चिकित्सीय विज्ञान पर अनाप-शनाप आरोप लगाने के पीछे पतंजलि का उद्देश्य अपनी आयुर्वेदिक दवाओं की बिक्री बढ़ाना है। चिकित्सीय संघ के अनुसार रामदेव द्वारा निर्मित इन दवाओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। पतंजलि द्वारा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के बारे में किए जा रहे दावों को अपनी याचिका में भारतीय चिकित्सा संघ ने इसे ‘ड्रग्स एंड अवर मेडिकल रेमिडिज एक्ट, 1954’ तथा ‘कन्ज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019’ के अंतर्गत एक अपराध बताते हुए उच्चतम न्यायालय से कार्यवाही करने को कहा था। उच्चतम न्यायालय में इस मामले की सुनवाई नवंबर 2023 में हुई थी। इस सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पतंजलि को भ्रामक दावे न करने के लिए चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि पतंजलि ने कोई भी ऐसा गलत प्रचार अपनी दवाओं की बाबत भविष्य में किया तो उस पर प्रति दवा एक करोड़ का जुर्माना लगाया जाएगा। तब न्यायालय के कड़े रूख को देख पतंजलि की तरफ से ऐसे भ्रामक विज्ञापन जारी न करने की बात न्यायालय से कही गई थी। जनवरी, 2024 में लेकिन उच्चतम न्यायालय को भेजे एक गुनाम पत्र में प्रमाण दिए गए कि पतंजलि न्यायालय को दिए शपथपत्र के बावजूद अपनी दवाओं की बाबत भ्रामक विज्ञापन प्रकाशित करवा रही है। उच्चतम न्यायालय ने इस पत्र की प्राप्ति के बाद गत् सप्ताह सुनवाई के दौरान कड़ा रुख अपनाते हुए पतंजलि को कोई भी विज्ञापन जारी करने से रोक दिया है। पतंजलि ने ऐसा न करने का शपथ पत्र इस याचिका की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय को दिया था लेकिन भ्रामक विज्ञापन उसके द्वारा लगातार जारी किए जाते रहे। इसी से खिन्न हो न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की खंडपीठ ने गत् सप्ताह पतंजलि आवुर्येद की दवाओं के विज्ञापनों पर अस्थाई प्रतिबंध तो लगाया ही लगाया, बेहद कठोर रुख अपनाते हुए इस प्रकार के विज्ञापनों पर रोक लगाने में असफल रही केंद्र सरकार को भी आड़े हाथों लिया। पीठ ने कहा कि ‘पतंजलि भ्रामक दावे करके देश को धोखा दे रही है कि उसकी दवाएं कुछ असाध्य बीमारियों को ठीक कर देंगी जबकि इसके लिए उसके पास कोई साक्ष्य नहीं हैं।’ न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा कि ‘पूरे देश को धोखा दिया गया है। दो बरस से आप इंतजार कर रहे हैं कि कब ड्रग्स एक्ट कहे कि यह प्रतिबंधित है।’बाबा रामदेव वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान के बेहद करीबी हैं। उनके पतंजलि विश्वविद्यालय में केंद्र सरकार के मंत्रियों, उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री, मंत्रियों समेत गणमान्य व्यक्तियों को आना जाना लगा रहता है। जाहिर है बाबा की अकूत आर्थिक शक्ति भी उनके गणमान्य अतिथियों को आकर्षित करती होगी। अन्यथा बीते डेढ़ दशक के दौरान नाना प्रकार के आरोपों से विभूषित रामदेव और उनके सहयोगी बालकृष्ण सार्वजनिक मंचों पर हमारे राजपुरुषों संग विराजमान रहते नजर नहीं आते और हमारे जनप्रतिनिधि उनका सार्वजनिक अभिनंदन न करते। यह कलयुगी माया है। यहां सोने और पीतल के मध्य का अंतर समाप्त हो चला है। यदि ऐसा नहीं है तो भला क्योंकर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का दिन-रात स्मरण करने, उनका उनकी जन्मस्थली में भव्य मंदिर निर्माण करने, देश में रामराज्य स्थापित करने की बात कहने वाली, भारतीय जनता पार्टी के नेता, केंद्र और राज्य सरकारों के मुखिया इत्यादि रामदेव की संस्तुति करते हैं? क्या हमारे इन ‘मान्यवरों’ को नहीं पता कि रामदेव पर अपने कर्मचारियों के शोषण का, जबरन हरिद्वार में जमीन कब्जाने का, बिक्रीकर की चोरी का, अपनी दवाओं में जानवरों की हड्डी मिलाने इत्यादि गंभीर आरोप हैं, ऐसे आरोप जिनमें से कई प्रमाणित भी हो चुके हैं। क्या हमारे सत्ताधीशों को नहीं पता कि पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलाधिपति बालकृष्ण की नागरिकता संदेह के घेरे में है। उन्हें केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा फर्जी तरीके से भारतीय पासपोर्ट बनवाने का दोषी मान गिरफ्तार किया जा चुका है और वर्तमान में उन पर मुकदमा चल रहा है। यदि नहीं मालूम अथवा हमारे राजपुरुष स्मृति दोष का शिकार हैं तो मैं उन्हें याद दिला देता हूं कि इस समाचार पत्र ने ही सर्वप्रथम बालकृष्ण के नेपाली मूल का सच उजागर किया था। इस समाचार पत्र ने ही पतंजलि के श्रमिकों के शोषण का सच सबसे पहले सामने रखा था। इस समाचार पत्र ने ही रामदेव के सच को, उनके सहयोगी बालकृष्ण के सच को और उनकी कंपनी के सच को सामने लाने का काम मय प्रमाण किया था। हमारी खबरों ने कुछ समय गंधला चुके तालाब में हलचल पैदा करने का काम जरूर किया लेकिन कलयुगी माया के आगे हमारे क्या बिसात? रामदेव आगे बढ़ते चले गए और आज का सच यही है कि उन्हें सोना मान यथोचित सम्मान दिया जा रहा है। आप मेरे लिखे को मेरी निराशा, मेरा फ्रस्टेशन करार दे सकते हैं। ऐसा ही है भी। अपने 24-25 बरस पत्रकारीय जीवन में, मैंने सत्य को अधिकांशतः पराजित होते देखा है। कभी-कभार जब न्यायपालिका हस्तक्षेप करती है तो मुझ सरीखों को उम्मीद जग जाती है कि शायद अब न्याय होगा और ‘कानून के लंबे हाथ’ उन तक पहुंच पाऐंगे जो इस देश के, इस देश की जनता के गुनहगार हैं। पतंजलि और उसके संस्थापकों की बाबत उच्चतम न्यायालय की कठोर दृष्टि ने एक बार फिर से कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। उम्मीद की किरण जगी है कि शायद भगवान राम को आदर्श मानने वाली शासन व्यवस्था के पैरोकार अपनी कुंभकर्णी नींद से उठ कुछ ऐसा करेंगे जिससे उनकी कथनी और करनी का फर्क मिटेगा। शायद …

You may also like

MERA DDDD DDD DD