संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसंबर 1948 को मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा को अंगीकार करते हुए स्त्री-पुरुष को समान अधिकार दिए जाने की तरफ एक महत्वपूर्ण कदम उठाया था। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के पास कुछ ऐसे मूलभूत अधिकार होते हैं जो छीने नहीं जा सकते। ये अधिकार मानव की गरिमा है फिर चाहे वो स्त्री हो या पुरुष। इस घोषणा के विपरीत संयक्त राष्ट्र का सदस्य देश ईरान महिलाओं को जबरन पर्दे में रखने के लिए जी-तोड़ प्रयास में लगा है। इस्लामिक ड्रेस कोड का उलंघन करने पर महिलाओं पर कोड़े बरसाए जाते हैं, उन्हें अंधेरी सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है। लेकिन ईरानी थियोक्रेटिक सरकार द्वारा महिलाओं और बच्चियों पर 45 साल से लगाए गए ड्रेस कोड का महिलाएं लगातार विरोध कर रही हैं और सरकार द्वारा इनके विरोध को बर्बरता से कुचला जा रहा है। अब कई महिलाएं ‘हिजाब क्रांति’ लाने के उद्देश्य से बिना हिजाब के ही घर से बाहर निकलती हैं। हालांकि इनमें से कुछ महिलाएं अपने गले में हिजाब डाले रखती हैं ताकि मोरैलिटी पुलिस से आमना-सामना होने पर इस्तेमाल किया जा सके। इस मुल्क में हर पांच में से एक महिला रोजमर्रा के जीवन में बहादुरी, विरोध और सिद्धांत के आधार पर हिजाब बिल्कुल भी नहीं पहन रही है
किसी भी राष्ट्र में आजादी के असल मायने तब समझे जाते हैं जब मूलभूत अधिकारों से लेकर महिलाओं को हर क्षेत्र में अधिकार दिए जाए, फिर चाहे वो हिजाब पहनने या न पहनने का अधिकार ही क्यों न हो। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार के घोषणा पत्र में इन्हीं अधिकारों को बल दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसंबर 1948 को मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा को अंगीकार करते हुए स्त्री-पुरुष को समान अधिकार दिए जाने की तरफ एक कदम उठाया था। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के पास कुछ ऐसे मूलभूत अधिकार होते हैं जो छीने नहीं जा सकते। ये अधिकार मानव की गरिमा है फिर चाहे वो स्त्री हो या पुरुष। हिजाब मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले एक परिधान है, जो सिर, गर्दन और कंधे के चारों ओर लपेट कर पहना जाता है, जो बालों और गर्दन को ढकता है। कोई वस्त्र कैसे किस तरह धारण करना है या नहीं करना है इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति स्वंत्र है और यह उसके मानवाधिकारों में से एक है। लेकिन दुनिया भर के कई इस्लामिक मुल्कों में हिजाब से संबंधित कानून हैं, जिसका सीधा असर महिलाओं के मूलभूत अधिकारों पर पड़ता है उनकी रोजमर्रा की गतिविधियां भी इससे प्रभावित होती हैं। हिजाब अफगानिस्तान और ईरान में महिलाओं के लिए अनिवार्य है, वहीं फ्रांस में इस पर प्रतिबंध है तो तुर्की में इस पर से प्रतिबंध हटाए गए हैं।
मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 11 के मुताबिक कोई भी व्यक्ति किसी ऐसे अपराध का अपराधी नहीं माना जा सकता और उसको दंड नहीं दिया जा सकता जो अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार अपराध न माना जाए। इस इन अधिकारों के बावजूद महिलाओं के कई अधिकार कई मुल्कों में छीने जा रहे हैं। फिर चाहे वो अभिव्यक्ति का अधिकार हो शिक्षा का या मनपसंद वस्त्रों को धारण करने का। महिलाओं से उनके अधिकारों को छीनते हुए ईरान जैसे देशों में ‘जेल भरो’ की नीति अपनाई गई है। इसके अलावा हिजाब न पहनने पर महिलाओं के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जा रही है। संयक्त राष्ट्र का सदस्य देश ईरान महिलाओं को जबरन पर्दे में रखने के लिए जी तोड़ प्रयास में लगा है। इस्लामिक ड्रेस कोड का उल्लंघन करने पर महिलाओं पर कोड़े बरसाए जाते हैं, उन्हें अंधेरी सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है। लेकिन ईरानी थियोक्रेटिक सरकार द्वारा महिलाओं और बच्चियों पर 45 साल से लगाए गए ड्रेस कोड का लगातार विरोध कर रही हैं और सरकार द्वारा इनके विरोध को बर्बरता से कुचला जा रहा है। ईरान में कदम-कदम तैनात की गई मोरैलिटी पुलिस इसी का परिणाम है।
ईरानी महिलाओं की आपबीती
बीबीसी की एक रिपोर्ट अनुसार ज्यादातर ईरानी महिलाएं सरकार के खिलाफ विरोध प्रकट करते हुए बिना हिजाब के घर से बाहर निकल रही हैं। एक ईरानी छात्रा दोन्या का मानना है कि बिना हिजाब के घर से निकलना काफी डरावना है, क्योंकि पुलिस इसके लिए किसी भी वक्त गिरफ्तार कर जुर्माना लगा सकती है और आप पर कोड़े बरसाकर टॉर्चर कर सकती है, सामान्यतः गिरफ्तार किए जाने पर 74 कोड़े लगाए जाते हैं। ईरानी सोशल एक्टिविस्ट रोया हेश्माती ने पिछले महीने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि बिना हिजाब के उनकी एक तस्वीर सार्वजनिक होने के बाद उन्हें 74 कोड़े लगाए गए थे। ईरान में महिलाओं का शोषण और उन पर अत्याचार करने का प्रमुख हथकंडा ड्रेस कोड बिल को बनाया गया है।
हिजाब न पहनने पर महिलाओं को जेल में डाल देना, उन पर कोड़े बरसाना यहां तक कि उनकी गतिविधियों को सिर्फ इसलिए बाधित किया जाता है क्योंकि उन्होंने हिजाब नहीं पहना। ड्रेस कोड का पालन न करने पर आजाद नाम की एक महिला को साल 2022 में एक महीने तक कैद में रखा गया था। इसके बाद सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने पर उन्हें दोबारा हिरासत में लिया गया। उन्हें 120 दिनों तक जेल में रहना पड़ा था। इसमें से 21 दिन तक उन्हें कैद-ए-तन्हाई यानी सबसे अलग-थलग रखा गया। बीबीसी के अनुसार उन्होंने कहा है कि कैद-ए-तन्हाई इतनी बुरी जगह थी, इतनी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। कोठरी का दरवाजा हर वक्त बंद रहता था, इस कोठरी का आकार एक मीटर डेढ़ मीटर था। बाहर से रोशनी बिलकुल नहीं आती थी। अंदर लगी लाइट रात-दिन जलती रहती थी, जब हमें टॉयलेट ले जाया जाता था तो हमारी आंखों पर पट्टी बांधी जाती थी। ”आजाद इससे इतना परेशान हुईं कि उन्होंने कोठरी पर अपना सिर मारा और वह आज भी उसे लेकर सदमे में है। इतना कुछ झेलने के बाद भी आजाद आज भी हिजाब पहने बिना बाहर जाकर जेल जाने का जोखिम उठाने के लिए तैयार है।’’
महिलाओं के खिलाफ ईरान के कड़े कानून उनके रोजगार को प्रभावित कर रहे हैं। 39 वर्षीय रिपोर्टर और फिल्म आलोचक बहारेह को अपनी तनख्वाह में भारी कटौती का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि ऑफिस जाने पर उन्हें परदा करने के लिए मजबूर किया जाता है। बहारेह को बिना हिजाब पहने बाहर जाने की इजाजत नहीं है और वे इसे नहीं पहनना चाहती। इसीलिए उन्हें अपने पति की तनख्वाह पर निर्भर रहना पड़ता है। बिना हिजाब के गाडी चलाने पर पुलिस द्वारा उनकी गाड़ी को जब्त कर लिया गया था। पिछले साल ही बिना हिजाब पहने अपनी तस्वीर शेयर करने और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। एक रिवॉल्युशनरी कोर्ट ने उनके खिलाफ जुर्माना लगाने के साथ ही छह महीने की सजा सुनाई थी, लेकिन कारावास की सजा रद्द कर दी गई। गौरतलब है कि महसा अमीनी की मौत के बाद ईरान के जेल कैदियों से भरे पड़े हैं। ऐसे में मोरैलिटी पुलिस द्वारा महिलाओं को डराया धमकाया और अपमानित किए जाने का हथकंडा अपनाया जा रहा है। ईरान में अब कई महिलाएं ‘हिजाब क्रांति’ लाने के उद्देश्य से बिना हिजाब के ही घर से बाहर निकलती हैं, हालांकि इनमें से कुछ महिलाएं अपने गले में हिजाब डाले रखती हैं ताकि मोरैलिटी पुलिस से आमना-सामना होने पर इस्तेमाल किया जा सके। इस मुल्क में हर पांच में से एक महिला रोजमर्रा के जीवन में बहादुरी, विरोध और सिद्धांत के आधार पर हिजाब बिलकुल भी नहीं पहन रही है।
ईरान में कब आया ड्रेस कोड बिल
ईरान में महिलाओं के लिए यह ड्रेस कोड कानून 45 साल से लागू है। जिसे 1979 की क्रांति के बाद से ही महिलाओं के लिए लागू किया गया था। इस कानून के तहत महिलाएं टाइट कपड़े नहीं पहन सकती या ऐसे कपड़े पर रोक है जिससे शरीर का कोई भी अंग दिखता हो। नियमों का उल्लंघन करने पर दस दिन या दो महीने जेल या फिर 5 हजार से 50 हजार ईरानी रियाल या रुपए में कहें तो 9 रुपए से 984 रुपए तक जुर्माने का प्रावधान था। लेकिन पिछले साल ही प्रस्तावित कानून में सजा को बढ़ाकर दस साल किया गया है और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर तीन लाख से 6 लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। देश के शरिया नियमों पर आधारित नए कानून में प्रावधान में यह भी कहा गया है कि महिलाओं और लड़कियों को अपने बालों को हिजाब से ढंकना होगा और अपने शरीर के हिस्से को छिपाने के लिए लंबे-ढीले कपड़े पहनने होंगे। पुरुषों को ऐसा कपड़ा पहनने पर रोक होगी जिससे उनका सीना या फिर टखनों के ऊपर का हिस्सा दिखता हो। इसके अलावा मीडिया, एनजीओ या विदेशी सरकार के साथ मिलकर ‘नग्नता को बढ़ावा देने’ या हिजाब का मजाक उड़ाने वालों को तो जुर्माना और जेल तो होगी ही, साथ ही उन वाहन मालिकों पर भी जुर्माना लगेगा जिसमें बिना हिजाब के महिलाएं यात्रा कर रही होंगी।
ईरानी महिलाओं के दिलों से गिरी सरकार
ईरान में 45 साल से लागू इस ड्रेस कोड कानून में सरकार द्वारा सजा और महिलाओं के खिलाफ नियमों को तब बढ़ाया गया जब बिना हिजाब के महिलाओं की संख्या ज्यादा दिखने लगी। साल 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद ईरान में राष्ट्रीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। महसा अमीनी को हिजाब पहनने के नियम के उल्लंघन हेतु हिरासत में लिया गया था। जिस दौरान उनकी मौत हो गई थी जिसके बाद कई महिलाओं ने हिजाब का विरोध-प्रदर्शन करते हुए हेडस्कार्फ जलाए थे और उसे हवा में लहराया था। इस मुल्क में ऐसी महिलाओं और लड़कियों की संख्या बढ़ती जा रही है जो अब हिजाब नहीं पहनती हैं। इन महिलाओं को ईरानी मोरैलिटी पुलिस द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है। जिससे कई
महिलाओं की जान पर बन आई है। पिछले साल ही तेहरान मेट्रो स्टेशन के पास हिजाब न पहनने की वजह से मोरैलिटी पुलिस द्वारा की गई पिटाई के कारण 16 साल की लड़की कोमा में चली गई। यह मात्र एक ऐसी घटना नहीं है ऐसी न जाने कितनी ही खबरें सुर्खियों में रही हैं। भले ही अब ईरान में खुलकर प्रदर्शन नहीं किए जा रहे हैं लेकिन ईरानी महिलाओं के दिलों में से ये सरकार पूरी तरह खत्म हो चुकी है। आजाद नाम की महिला कहती हैं कि वो सरकार के किसी भी काम को स्वीकार नहीं करती। सरकार के कड़े रुख को देखते हुए 1 मार्च को हुए संसदीय चुनाव को नोबेल पुरस्कार विजेता नरगिस मोहम्मदी समेत कई लोगों ने बहिष्कृत किया है। बीबीसी के अनुसार कई महिलाएं इस चुनाव का बहिष्कार करने के लिए तैयार रही हैं। महसा अमीनी के पक्ष में हुए महिलाओं के विरोध प्रदर्शनों और सरकार की ओर से उन्हें कुचले जाने के बाद ईरान में यह पहला संसदीय चुनाव रहा है।
अफगानिस्तान में भी हिजाब अनिवार्य
इस्लामिक गणराज्य ईरान के अलावा अफगानिस्तान में भी महिलाओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। सत्ता काबिज होने के बाद तालिबान सरकार ने महिलाओं के खिलाफ कई फरमान सुनाए हैं। तालिबानी फरमान ने अफगानी महिलाओं को शिक्षा, रोजगार से वंचित कर दिया है। इसके अलावा बिना पति के सार्वजनिक स्थलों पर जाने तक को प्रतिबंधित कर दिया गया है। तालिबान राज में महिलाओं का हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया है। हाल ही में तालिबान सरकार के फरमान का शिकार टीवी चैनलों की महिला एंकर हुई हैं। तालिबान के मीडिया इन्फॉर्मेशन मंत्रालय यानी वॉइस और सदाचार मंत्रालय के अनुसार काबुल में मौजूद टीवी चैनलों को कड़े निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों के तहत कहा गया है कि जिस समय महिला एंकर समाचार पढ़ रही हो, उसका चेहरा टीवी पर ना दिखाई दें, चेहरा पूरी तरह से कपड़े से ढका रहे और केवल उसकी आंखें ही टीवी स्क्रीन पर दिखाई दें। मंत्रालय ने स्पष्ट तौर पर चेतावनी दी है कि जो मीडिया आउटलेट्स इसका उल्लंघन करेंगे, उन्हें उसके लिए कड़ी सजा दी जाएगी।

