लोकसभा चुनाव 2024 में देश की सत्ताधारी पार्टी भाजपा और पीएम मोदी को पटखनी देने के लिए बने विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन को एक के बाद एक झटके लग रहे हैं। बंगाल में ममता बनर्जी और पंजाब में आम आदमी पार्टी पहले ही अकेले चुनाव लड़ने की बात कर चुके हैं। ऐसे में गठबंधन के जनक नीतीश कुमार का एनडीए में शामिल होना इंडिया गठबंधन खासकर कांग्रेस की राह में अड़ंगा समान है
जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यकायक ही कलाबाजी मार एनडीए गठबंधन में शामिल हो गए हैं। नीतीश कुमार ने ‘इंडिया’ गुट ऐसे समय में छोड़ा है जब तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने घोषणा की है कि वे पश्चिम बंगाल और पंजाब में अकेले चुनाव लड़ेंगे। ऐसे में इस गठबंधन के आधार और उसके अस्तित्व पर सवाल उठने लगे हैं। कहा जा रहा है क्या ऐसी स्थिति में इंडिया गठबंधन भाजपा को मात दे पाएगा? क्या चुनाव तक यह बंधन रहेगा या फिर पूरी तरह बिखर जाएगा? इस घटनाक्रम का चुनाव पर कितना प्रभाव पड़ेगा?
राजनीतिक पंड़ितों का कहना है कि इंडिया गठबंधन के सामने चुनौती पहले से कहीं ज्यादा है, क्योंकि चुनाव से पहले ही इसके सूत्रधार का पाला बदलना कांग्रेस के लिए सहयोगियों को जोड़े रखना आसान नहीं है। कांग्रेस ने अगर हालिया विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया होता तो हालात ऐसे नहीं होते।
चौतरफा संकट में गठबंधन
महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे भी सीट शेयरिंग को लेकर संतुष्ट नहीं हैं। माना जा रहा है कि बात नहीं बनने की स्थिति में वो भी कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। यहां उद्धव गुट की शिवसेना और कांग्रेस में सीटों को लेकर मतभेद बताया जा रहा है। यहां तक कि दक्षिण मुंबई सीट पर दावेदारी ऐसी है कि अंत में मिलिंद देवड़ा जैसे नेता ने कांग्रेस को ही छोड़ दिया और शिंदे गुट में चले गए। अब कांग्रेस की अग्नि परीक्षा यह है कि कैसे वह उद्धव गुट को चुनाव तक साट्टो रहे। इसके अलावा बहुजन विकास अघाड़ी भी सीट शेयरिंग को लेकर मोल भाव कर रही है, जो प्रकाश आंबेडकर की पार्टी है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि उद्धव ठाकरे का खेमा कभी भी एनडीए में जा सकता है। ऐसी स्थिति कांग्रेस को असहज करने वाली होगी।
पश्चिम बंगाल में भी गठबंधन की कोई गुंजाइश नहीं बची है। ऐसे में नीतीश कुमार ने विपक्ष के गठन में अहम भूमिका निभाने के बाद भी जिस तरह रातों रात पाला बदला है, इंडिया गठबंधन की नींद उड़ गई है। कांग्रेस, आरजेडी, समाजवादी समेत गठबंट्टान के बड़े दलों को लगता था कि बिहार, महाराष्ट्र और बंगाल जैसे राज्यों में विपक्ष मजबूत रहेगा और भाजपा को 2024 में सत्ता से बेदखल कर देगा। लेकिन लड़ाई शुरू होने से पहले ही गठबंधन धराशाई होता नजर आ रहा है। हिंदी पट्टी में भाजपा पहले से ही बेहद मजबूत है। इसमें एकमात्र राज्य बिहार था, जहां से उसे चुनौती मिल सकती थी। मगर अब नीतीश कुमार के पालाबदल से भाजपा सीधे तौर पर फायदे की स्थिति में है।
कांग्रेस के लिए बंगाल और पंजाब में पहले ही स्थिति बेहद कठिन हो चुकी है। यहां टीएमसी और आप ने कांग्रेस से अलग ही चुनाव लड़ने की बात कही है। इसके अलावा वामदलों से भी अब तक सहमति नहीं बन पाई है। यूपी में भी अखिलेश यादव बेहद सख्त लाइन ले चुके हैं। ऐसे में कोई हैरानी की बात नहीं होगी यदि अगले कुछ समय में कुछ और दल इंडिया अलायंस ही छोड़कर चले जाएं। प्रकाश आंबेडकर को तो रामदास आठवले खुला ऑफर भी दे चुके हैं। उन्होंने पिछले दिनों कहा था कि यदि आंबेडकर एनडीए में आते हैं तो उन्हें अकोला सीट दी जा सकती है। यही नहीं उनके स्वागत में तो मैं अपना मंत्री पद भी दे सकता हूं। हालांकि प्रकाश आंबेडकर भाजपा के तीखे आलोचक रह चुके हैं। फिर भी महाराष्ट्र में कांग्रेस के लिए स्थिति मुश्किल है। इसकी एक वजह यह भी है कि एनसीपी बंटी हुई है। शरद पवार गुट सीटें तो ज्यादा चाहता है, लेकिन उसके पास ताकत कम है।
हालांकि कुछ राजनीतिक जानकार कहते हैं कि नीतीश के पाला बदलकर बीजेपी की ओर जाने का बिहार से बाहर बहुत कम प्रभाव पड़ेगा। छह बार सांसद और लंबे समय तक केंद्र सरकार में मंत्री रहने के बाद भी नीतीश एक ऐसे राष्ट्रीय नेता के रूप में नहीं उभर पाए, जो दूसरे राज्यों की राजनीति को प्रभावित कर सके। अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश, ममता बनर्जी को बंगाल और कांग्रेस को राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में नीतीश कुमार की बहुत कम जरूरत है। राजद, कांग्रेस और वाम दलों के महागठबंधन की सरकार की ओर से बिहार में जाति सर्वेक्षण कराने, अति पिछड़ा वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग,
अनुसूचित जाति-जनजाति का आरक्षण 65 फीसदी तक बढ़ाने और युवाओं को करीब चार लाख नौकरियां देने की पृष्ठभूमि में नीतीश कुमार ने पाला बदला है।
साल 2020 के चुनाव में राजद नेता तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरियां देने का वादा किया था। उनकी पार्टी जाति आधारित जनगणना और हाशिए के समाज को आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी देने के लिए दवाब डाल रही थी। तेजस्वी ने नौकरी देने का जो वादा किया था, महागठबंधन सरकार ने कम से कम उसे पूरा किया है। इतने बड़े आधार पर नौकरियां देने और वंचित तबके का आरक्षण बढ़ाने का श्रेय तार्किक रूप से लालू प्रसाद यादव की राजद को ही जाता है। ईसीबी, ओबीसी और एससी-एसटी का बढ़ा हुआ आरक्षण बीजेपी के आक्रामक हिंदुत्व के मुकाबले वंचित समाज और अल्पसंख्यकों को राजद के पीछे लामबंद कर सकता है। राजद के साथ सीपीआई-एमएल भी है, जिसका बिहार के कुछ इलाकों के गरीबों में अच्छा प्रभाव है। नीतीश कुमार के डिप्टी के रूप में तेजस्वी यादव ने अच्छा काम किया है और युवाओं में उन्होंने अच्छी साख भी कमाई है।
क्यों बदला नीतीश ने पाला?
गौरतलब है कि नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव में बीजेपी और एनडीए को चुनौती देने के लिए जिस गठबंधन की नींव रखी थी, कुछ महीने में ही नीतीश कुमार को गठबंट्टान में अपना और पार्टी का भविष्य नजर नहीं आया। इसके चलते नीतीश ने बिहार में महागठबंधन का साथ छोड़ एनडीए में जाना ठीक समझा। बिहार में हुए इस घटनाक्रम ने कांग्रेस नेतृत्व के लिए चुनौती खड़ी कर दी है, क्योंकि पार्टी का पूरा फोकस इस समय राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय’ यात्रा पर है। जेडीयू ने बिहार में विपक्षी गठबंट्टान ‘इंडिया’ के टूटने के लिए कांग्रेस की हठ और अहंकार को जिम्मेदार ठहराया है। जेडीयू ने कहा कि कांग्रेस नेता अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगे थे, विपक्षी गठबंधन को नहीं। नीतीश कुमार ने कहा कि उन्हें ‘इंडिया’ और ‘महागठबंधन’ में चीजें ठीक नहीं लग रही थीं, इसलिए उन्होंने बीजेपी के साथ नया गठबंधन और नई सरकार बनाने का निर्णय लिया।
इधर कांग्रेस पार्टी को पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी के साथ-साथ अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के दबाव का सामना करना पड़ रहा है। अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में गठबंट्टान के लिए अपनी बातचीत का समय तय कर दिया है। इसके अतिरिक्त, कांग्रेस को अपने कुछ बिहार विधायकों के दलबदल का डर भी सता रहा है। ऐसे में इंडिया गठबंट्टान की राजद-कांग्रेस-वाम दलों को बिहार की उन सीटों को फिर से बांटना होगा, जो मूल रूप से जदयू के लिए थीं। हालांकि यूपी से इंडिया गठबंधन के लिए राहत की खबर है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 11 सीट देने की घोषणा की है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी कांग्रेस को राज्य में नौ सीटें देने की बात कह डाली है। वर्तमान में कांग्रेस के तमिलनाडु से नौ सांसद हैं।
नीतीश के एनडीए में आने से भाजपा को क्या फायदा होगा
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो नीतीश कुमार का ‘इंडिया’ गठबधन से बाहर जाना उन घटनाओं की शृंखला में तीसरी घटना है, जो ‘आएगा तो मोदी ही’ के नैरेटिव को बढ़ा रहा है। सबसे पहले पिछले महीने
राजस्थान, मट्टय प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत हुई थी। इन सभी राज्यों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीट्टाी लड़ाई थी और बीजेपी की जीत को एक संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि वह एक बार फिर इन राज्यों में लोकसभा चुनावों में 2019 की तरह जीत हासिल कर सकती है।
वर्ष 2018 में भाजपा इन तीनों राज्यों में चुनाव हार गई थी। फिर भी कुछ महीने बाद लोकसभा चुनाव में पार्टी जीत हासिल करने में कामयाब रही। दूसरी बात, अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का होना है। इसे देश भर के कई हिंदुओं ने बड़े उत्साह के साथ स्वीकार किया और अनुमान लगाया जा रहा है कि इससे बीजेपी को फायदा हो सकता है। नीतीश कुमार की पारी अब एनडीए की गति को बढ़ाएगी। ऐसे में ‘इंडिया’ गुट को एनडीए से मुकाबला करने के लिए कुछ बड़े गेम चेंजर के साथ चुनाव में उतरना होगा।
एनडीए ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की थी। तब इसमें बीजेपी, जदयू और लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) शामिल थीं। अब नीतीश कुमार वापस एनडीए में आ गए हैं तो बीजेपी की बिहार में वही प्रदर्शन दोहराने की उम्मीद बढ़ गई है। बीजेपी के लिहाज से यह एक और कारण से अहम है। भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 400 का आंकड़ा पार करने का टारगेट सेट किया है। बिहार में पिछला प्रदर्शन दोहराए बगैर यह लक्ष्य हासिल कर पाना मुश्किल होगा।

