नमक की लड़ाई जिसके लिए गांधीजी ने एक ऐतिहासिक यात्रा निकाली थी। इस यात्रा की शुरुआत 12 मार्च, 1930 में हुई थी। इस मार्च को ‘दांडी मार्च’ और ‘नमक सत्याग्रह’ के नाम से भी जाना जाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आज के दिन अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से ‘नमक सत्याग्रह’ के लिए दांडी यात्रा शुरू की थी।
‘नमक सत्याग्रह’ के दौरान गांधीजी ने 24 दिनों तक रोज औसतन 16 से 19 किलोमीटर पैदल यात्रा की। गांधीजी ‘दांडी यात्रा’ से पहले बिहार के चंपारन में सत्याग्रह के दौरान भी बहुत पैदल चले थे। यह यात्रा समुद्र के किनारे बसे शहर दांडी के लिए थी जहां जाकर बापू ने औपनिवेशिक भारत में नमक बनाने के लिए अंग्रेजों के एकछत्र अधिकार वाला कानून तोड़ा और नमक बनाया था।

‘नमक सत्याग्रह’ महात्मा गांधी द्वारा चलाए गये प्रमुख आंदोलनों में से एक था। महात्मा गांधी मानते थे कि पैदल चलना व्यायाम का राजा है, इसलिए वे बहुत लंबी दूरी के लिए भी किसी साधन की बजाय पैदल चलने को तरजीह देते थे। गांधी जी ने नमक हाथ में लेकर कहा था कि इसके साथ मैं ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला रहा हूं। दुनिया के सर्वाधिक प्रभावशाली आंदोलनों में ‘नमक सत्याग्रह’ भी शामिल है। इस अभियान की शुरुआत करने से पूर्व गांधीजी ने 2 मार्च, 1930 को वायसराय के नाम एक ऐतिहासिक पत्र लिखा।

जिसमें उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के अधीन भारत की दुर्दशा का वर्णन करते हुए ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ की शुरुआत की अपनी मंशा व्यक्त की और इसके लिए सांकेतिक रूप से नमक कानून को तोड़ने का उन्होंने अपना मंतव्य जाहिर किया। क्योंकि उनकी नजर में यह ‘गरीब आदमी के दृष्टिकोण से सबसे अन्यायपूर्ण कानून’ था। गांधीजी ने मूल रूप से सात किताबें लिखीं और भगवद गीता का गुजराती में अनुवाद किया। उनकी शुरुआती तीन किताबें उनके आंदोलन, मानव जीवन और आर्थिक विचार को स्पष्ट करती हैं।

9 मार्च को 75,000 लोगों की एक विशाल भीड़ ने साबरमती की बालुकाओं पर एक विशालकाय जनसभा में भागीदारी की। यहां उन्होंने गांधीजी की उपस्थिति में व्रत के रूप में एक प्रस्ताव पारित किया, जिसका निष्कर्ष यह था कि हम उसी पथ पर अग्रसर होंगे जिस पथ पर सरदार वल्लभभाई पटेल चले व तब तक शांत नहीं बैठेंगे जब तक देश को स्वाधीन नहीं कर लेते। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा और न ही सरकार को शांत रहने देंगे। समूचे देश में इसकी प्रतिध्वनि गूंज उठी।

