- संजय चौहान
रूद्रप्रयाग जनपद के गुप्तकाशी में डॉ. जैक्स वीन नेशनल स्कूल के चेयरमैन लखपत सिंह राणा का जीवन खासा संघर्षमय रहा है। उन्हें आपदा ने बेघर किया, लेकिन उनके हौंसले कमजोर नहीं हुए और उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी कभी हार नहीं मानी। एक बार नहीं बल्कि तीन-तीन बार आपदा से सामना कर अपना मुकाम खुद हासिल किया। आज वे हजारों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं कि पहाड़ में रहकर भी पलायन के खिलाफ लड़ा जा सकता है। शिक्षा से लेकर लोक संस्कृति और रंगमंच को उन्होंने नई ऊंचाई दी है
रूद्रप्रयाग जनपद के कालीमठ गांव में स्व. मुकंदी सिंह राणा एवं श्रीमती यशोदा देवी के घर सन 1976 में जन्में लखपत सिंह राणा दो भाई व एक बहन में सबसे बड़े हैं। बस जैसे-तैसे खेती और मजदूरी से परिवार का भरण-पोषण होता था। आर्थिक स्थिति सही न होने पर उनके पिता ने कालीमठ मंदिर के पास एक चाय की दुकान खोली। अपने पिता के साथ लखपत राणा ने भी दुकान के कार्यों में भी हाथ बंटाना शुरू किया। साथ ही पढ़ाई भी जारी रखी। कई बार अपने आप पिताजी की इच्छा के विरुद्ध मजदूरी की एवं रेत-बजरी, ईंट ढोने का भी काम किया साथ ही चाय व खाने की दुकान में भी हमेशा हाथ बंटाते रहेे। उनके परिवार ने खेती कम होने के कारण 4 किमी. दूर अपने पंडितों के गांव ह्यूण में कई वर्षों तक खेती भी की। श्रीनगर में कॉलेज जीवन से ही लखपत ट्यूशन पढ़ाकर अपना व अपने भाई-बहन का खर्चा निकालते थे। उनके पिता अपनी छोटी-सी दुकान में हमेशा भूखे, जरूरतमंद आदि को भोजन एवं सहारा देते थे। इतना ही नहीं पिता ने अपनी भूमि विद्यालय, एएनएम सेंटर एवं साधन सहकारी समिति के लिए दान दे दी जबकि खुद उनके पास बहुत कम जमीन थी। फिर एक बार उनकी दुकान को किसी की नजर लग गई और पूरी दुकान जलकर राख हो गई। इस घटना से उबरे ही थे कि 1998 में मद्महेश्वर घाटी में हुए भारी भूस्खलन में लखपत राणा का सम्पूर्ण घर, पशु एवं जमीन तबाह हो गए। इस आपदा चलते पूरे परिवार को कालीमठ छोड़ गुप्तकाशी में सिंलोजा माता के मंदिर की धर्मशाला में शरण लेनी पड़ी।
माता-पिता ने दिया हौंसला
सब कुछ तबाह होने के बाद भी माता-पिता ने अपने पुत्र का हौंसला बढ़ाया। राणा ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र और कैथल में अनेक विद्यालयों व कोचिंग सेंटरों में 2004 तक अध्यापन कार्य किया। इस दौरान जीवन के कई उतार-चढ़ावों को पार करते हुए एक बार कुरुक्षेत्र में अध्यापन कार्य छोड़कर मजदूरी करने भी गए परंतु कोई भी काम नहीं मिला। फिर एक दुकानदार के साथ स्टेशनेरी के सामान की साइकिल पर फेरी लगाई। लेकिन पढ़ाने की इच्छा से इन कामों में मन नहीं लगा। फिर से ट्यूशन पढ़ाया और एक विद्यालय में अध्यापन कार्य शुरू किया।
पिता ने दी घर लौटने की सलाह
जुलाई 2004 में लखत सिंह राणा ने पिता की सलाह पर वापस घर लौटकर उत्कृष्ट शिक्षा के लिए कार्य करने का मन बनाया और कुरुक्षेत्र हरियाणा को छोड़ गुप्तकाशी में विद्यालय की स्थापना की। इस फैसले ने इनके जीवन की दिशा और दशा बदल कर रख दी। गुप्तकाशी में संचालित इनका डॉ. जैक्स वीन नेशनल स्कूल आज केदारघाटी ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखण्ड से लेकर देश के कोने-कोने तक लोगों के मध्य अपनी अलग पहचान बनाने में सफल सिद्ध हुआ है। चाहे वो गुणवत्तापरक शिक्षा को लेकर हो या लोक संस्कृति को संजोने के अभिनव प्रयास या फिर सृजनात्मक गतिविधियों का केंद्र। विगत 14 सालों में शिक्षा के इस मंदिर ने नए आयाम स्थापित किए हैं। विद्यालय के 35 से अधिक छात्रों का चयन नवोदय और सैनिक स्कूल घोड़ाखाल हेतु हो चुका है। जबकि खेलकूद प्रतियोगिता से लेकर सांस्कृतिक गतिविधियों में दर्जनों छात्रों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपना परचम लहराया है। ठेट पहाड़ में विषम परिस्थितियों में संचालित यह स्कूल न केवल गुणवत्तापरक शिक्षा मुहैया करवा रहा है अपितु शिक्षा के लिए पहाड़ों से हो रहे पलायन को रोकने में भी अहम भूमिका निभा रहा है।
रंगमंच और लोक संस्कृति के हैं मजबूत स्तम्भ!
विद्यार्थी जीवन से ही अपनी संस्कृति से और रंगमंच से लखपत राणा का गहरा लगाव रहा है। रामलीला से लेकर दशहरा, पाण्डव नृत्य, बगड्वाल नृत्य, नंदा की कथा, सुमाड़ी कू पंथ्या दादा, चक्रव्यूह, कमलव्यूह, गरुड़ व्यूह, नंदा राज जात आदि मंचीय अनुष्ठानों में स्वयं प्रतिभाग तो कर ही रहे हैं साथ ही विद्यालय के छात्र-छात्राओं को भी इन सभी कार्यक्रमों में प्रतिभाग करवा रहे हैं। 13 हजार फीट की ऊंचाई पर हिमालय की गोद में बसे मनणा बुग्याल में स्थित महिष मर्दिनी के मंदिर के लिए विशाल यात्रा के प्रयास भी राणा ने किए। गोपेश्वर के कैलाश भट्ट द्वारा बनाई गईं पहाड़ी टोपी के प्रचार-प्रसार और सैकड़ों टोपियांे को इनके द्वारा देश-विदेश की कई हस्तियों को भेंट की गई जो इनके लोक संस्कृति के प्रति लगाव को दर्शाता है।
केदारनाथ आपदा में लोगों के लिए बने मसीहा
लखपत राणा ने आपदा से अपने घर को तबाह होते देखा है इसलिए जब भी कोई परेशानी में होता है तो उसकी मदद करने को वे आगे आते हैं। केदारनाथ आपदा मे लोगों के लिए मसीहा बन उभरे थे। इस दौरान कई दिनों तक सैकड़ों यात्रियों की सेवा डॉ. जैक्स वीन नेशनल स्कूल में तो की ही है साथ ही कई सरकारी संगठनों को भी विद्यालय में ठहराकर राहत एवं बचाव कार्यों में सहयोग किया। साथ ही एनडीआरएफ, बीएसएफ आदि संगठनों के कार्यकर्ताओं को यहां उत्कृष्ट सेवा के दौरान ही सम्मानित कर उनका हौंसला बढ़ाया। आपदा से प्रभावित कई बच्चों को निशुल्क शिक्षा व छात्रावास की व्यवस्था की जिनमें बंगाल की दो बालिकाएं भी शामिल हैं जिनके पिता की एक हादसे में मृत्यु हो गई थी एवं परिवार के नकारात्मक रवैये के कारण उनकी मां के सामने उन्हें पालने की विकट समस्या आ गई थी। उन बालिकाओं को सहारा देकर न केवल राणा ने पढ़ाया-लिखाया, बल्कि उनके लिए बेहतर छात्रावास व्यवस्थाएं प्रदान की। इन जरूरतमंद बालिकाओं के ठेठ बंगाली परिवेश से आकर यहां के हिसाब से अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा तो दी ही खेलों में भी उनकी प्रतिभा को निखारा और दोनों बहनों ने प्रदेश स्तर तक विद्यालय का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा लखपत राणा गरीब कन्याओं की शादी में सहयोग करना, स्वच्छ भारत अभियान, पोलियो उन्मूलन, वृक्षारोपण, बालिका शिक्षा आदि पर निरंतर कार्य कर रहे हैं।
लखपत राणा कहते हैं कि ‘मेरी प्रेरणा मेरे पिताजी, माताजी, पत्नी और फ्रांस के डॉ. जैक्सवीन हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में हमेशा मुझे हौंसला दिया। मनुष्य को जीवन में कभी भी हार नहीं माननी चाहिए। अपनी माटी और संस्कृति को कभी भी नहीं भूलना चाहिए। यही हमारी असली पहचान है। बेहतर शिक्षा के आभाव में पहाड़ से पलायन हो रहा है। मेरी कोशिश है कि छात्रों को गुणवत्तापरक शिक्षा दे सकूं।’ वास्तव में देखा जाए तो लखपत राणा आज उन लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं जिन्हें पहाड़ आज भी पहाड़ लगता है। लखपत राणा ने पहाड़ में रहकर न केवल पलायन के खिलाफ चट्टान बने, अपितु रंगमंच और लोक संस्कृति को नई पहचान भी दिलाई है।

