पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-110

राजीव गांधी शुरुआत में इस फैसले के पक्ष में थे। संसद में उन्होंने अपने करीबी मंत्री आरिफ मोहम्मद खान को सरकार की तरफ से इस फैसले की पैरोकारी का जिम्मा सौंपा था। राजीव सरकार में गृह राज्यमंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने ऐसा ही किया भी, लेकिन कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों की बढ़ती मुखालिफत ने राजीव को भ्रमित करने काम कर दिखाया। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सदस्य और संसद सदस्य जी.एम. बनातवाला सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के पश्चात् लोकसभा में एक निजी बिल लेकर आए, जिसमें भारतीय मुसलमानों को भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 से बाहर रखने का प्रावधान था। आरिफ मोहम्मद खान ने संसद में राजीव गांधी के निर्देश पर इस प्राइवेट मेम्बर बिल का जोरदार विरोध किया था। यह बिल कांग्रेस के पुरजोर विरोध के चलते लोकसभा की सहमति पाने में विफल रहा था, लेकिन संसद के बाहर कांग्रेस को मुसलमान विरोधी कहकर प्रचारित किया जाने लगा। बिहार के सीवान शहर में इस निर्णय के खिलाफ एक विशाल सभा का आयोजन किया गया, जिसमें दो से तीन लाख लोगों ने भाग लिया। इस सभा की सफलता ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समेत अन्य मुस्लिम संगठनों को एकजुट करने का काम कर दिखाया। देशभर में मुसलमान संगठनों द्वारा उच्चतम न्यायालय के फैसले के खिलाफ जनसभाएं और धरने-प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया। 75 वर्षीय शाहबानो को समाज से बहिष्कृत कर दिया गया था, जिसके चलते नवम्बर, 1985 में दबाव में आकर उन्होंने अपने पक्ष में आए निर्णय की ही मुखालिफत कर डाली। 1985 के अंत में उत्तर भारत में कई सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पडा था। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इस हार का ठीकरा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर डालते हुए राजीव गांधी को सलाह दी कि वे संसद के जरिए इस निर्णय को बदल डाले, अन्यथा मुसलमान कांग्रेस के खिलाफ हो जाएंगे। बकौल आरिफ मोहम्मद खान ‘ऐसे नेताओं में वरिष्ठ कांग्रेसी अर्जुन सिंह, नारायणदत्त तिवारी, नजमा हेपतुल्लाह और जेड.ए. अंसारी शामिल थे।’

फरवरी, 1886 में केंद्र सरकार ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नई इबारत लिखते हुए संसद में बिल पेश कर दिया, जिसमें मुसलमानों को भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 से बाहर किए जाने का प्रावधान था। यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के शाहबानो प्रकरण में दिए गए फैसले को निष्प्रभावी करने की नीयत से किया गया था, जिसे मई, 1986 में संसद की मंजूरी मिल गई। अपनी पार्टी और केंद्र सरकार के रुख से अपमानित और आहत आरिफ मोहम्मद खान ने राजीव सरकार से इस्तीफा देते हुए इसे मुसलमान महिलाओं के हितों पर कुठाराघात करार दिया था। शाहबानो प्रकरण भारतीय राजनीति और राजनेताओं के दोहरे चरित्र को सामने लाने का काम करता है। इस प्रकरण के 31 बरस बाद 2017 में नरेंद्र मोदी सरकार ने मुसलमानों में प्रचलित तीन तलाक प्रथा को समाप्त करने के उद्देश्य से ‘मुस्लिम महिला विधेयक (विवाह अधिकार संरक्षण) संसद में पेश किया। तब मोदी सरकार में मंत्री और ख्यातिप्राप्त पत्रकार एम.जे. अकबर ने इस विधेयक के पक्ष में जमकर पैरोकारी करते हुए कहा- ‘यह कानून नौ करोड़ मुस्लिम महिलाओं की पीड़ा और तनाव से जुड़ा है। इसके चलते उन सभी को भारी आघात पहुंचेगा, जो महिलाओं को तलाक के नाम पर आतंकित करने का काम करते हैं। अकबर ने मुस्लिम पर्सनल कानून में व्यापक सुधार नहीं किए जाने के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन 1986 में शाहबानो प्रकरण पर उच्चतम न्यायालय के निर्णय को संसद के जरिए पलटने की पैरोकारी करने वालों में एम.जे. अकबर भी शामिल थे। भारत के मुख्य सूचना आयुक्त और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रह चुके वजाहत हबीबुल्लाह के अनुसार एम.जे. अकबर ने राजीव गांधी को समझाया था कि यदि शाहबानो पर उच्चतम न्यायालय के फैसले को नहीं रोका गया तो मुसलमान कांग्रेस से दूर हो जायंगे। बकौल वजाहत हबीबुल्लाह- ‘एक दिन जब मैंने राजीव गांधी के कक्ष में प्रवेश किया, तो वहां एम.जे. अकबर को बैठा पाया। राजीव ने प्रसन्न मुद्रा में मुझसे कहा- ‘आओ वजाहत! आओ, तुम हममें से एक हो।’ मुझे राजीव का यह कहना थोड़ा अटपटा-सा लगा। शीघ्र ही मुझे इसका कारण समझ आ गया। अकबर ने राजीव को समझा दिया था कि यदि सरकार शाहबानो पर उच्चतम न्यायालय के फैसले को नहीं उलटती है, तो मुसलमान समाज में यह संदेश जाएगा कि प्रधानमंत्री उन्हें अपना नहीं मानते हैं।’

भारतीय राजनीति में ‘मिस्टर क्लीन’ की छवि लिए प्रवेश करने वाले राजीव गांधी की यह ऐसी पहली भयंकर भूल थी, जिसने उन्हें दूसरी बड़ी भूल करने के लिए मजबूर कर दिया। इस दूसरी भूल ने न केवल धर्म को भारत की राजनीति में मजबूती से स्थापित करने का काम किया, बल्कि कांग्रेस का वर्चस्व भी शनैःशनैः समाप्त कर डाला। राजीव सरकार को विपक्षी दलों, विशेष रूप से भाजपा एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा अन्य दक्षिणपंथी संगठनों ने मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाकर घेरना शुरू कर दिया था। राजीव के मित्र और करीबी सलाहकार अरुण नेहरू समेत कई वरिष्ठ कांग्रेसियों ने पार्टी और सरकार के भीतर यह माहौल बनाना शुरू कर दिया कि शाहबानो प्रकरण के बाद संसद में पेश किए गए विधेयक ने हिंदू मतदाताओं के इस भय को पुख्ता कर दिया है कि आने वाले समय में मुसलमानों का राज एक बार फिर से भारत में स्थापित हो जाएगा। समाजविज्ञानी प्रोफेसर जोया हसन अपनी पुस्तक ‘कांग्रेस आफ्टर इंदिरा’ में लिखती हैं. ‘…पसर्नल लॉ पर मुस्लिम संवेदनाओं के लिए इस अत्यधिक सम्मान ने एक आक्रोशपूर्ण प्रतिक्रिया को पैदा करने का काम किया कि मुसलमानों के मध्य बहुपत्नी प्रथा के चलते इनकी आबादी इस तेजी से बढ़ेगी कि भारत में इनका ही शासन स्थापित हो जाएगा। मध्यम वर्ग,  विशेष रूप से हिंदुओं द्वारा और महिला आंदोलनों के जरिए मुस्लिम महिला बिल का कड़ा विरोध इस आधार पर शुरू हुआ कि यह कट्टरवाद को रियायत और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध है। भाजपा के लिए हिंदुओं द्वारा इस कानून का विरोध एक वरदान के समान था। पहली बार भाजपा भारतीय मध्यम वर्ग से सीधा तार जोड़ पाने में सफल होने लगी थी। मध्यम वर्ग को लगने लगा था कि कांग्रेस भारतीय मुसलमानों के प्रति तुष्टिकरण की नीति पर चल रही है।’

हिंदू मतदाता की कांग्रेस के प्रति बढते कथित आक्रोश से चिंतित राजीव गांधी ने अब बहुसंख्यक तुष्टिकरण की तरफ एक ऐसा कदम उठाने का निर्णय लिया जिसका लाभ कांग्रेस के बजाय दक्षिणपंथी ताकतों को अपनी जड़े मजबूत करने और अंततः उत्तर भारत में, विशेषकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को मटियामेट करने वाला निर्णय साबित हुआ। यह निर्णय था- उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (अब अयोध्या) जिले के शहर अयोध्या स्थित एक मस्जिद के भीतर बने मंदिर के ताले को खोलना और वहां नियमित पूजा कराया जाना। 1 फरवरी, 1986 को फैजाबाद के जिला जज द्वारा इस बाबत सुनाए गए निर्णय और उससे पैदा हुए धार्मिक उन्माद पर चर्चा से पहले इस विवाद के इतिहास को समझा जाना जरूरी है।

इस विवाद की जड़ में यहां बनी एक मस्जिद थी, जिसे ‘बाबरी मस्जिद’ कहकर पुकारा जाता था। यह मस्जिद रामकोट नाम की पहाड़ी पर स्थित थी, जिसे हिंदुओं के अनुसार मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर उसके एक सेनापति मीर बाकी ने वहां बने भगवान राम के मंदिर को ध्वस्त कर बनाया था। इस मस्जिद के निर्माणकाल की बाबत नाना प्रकार के दावे किए जाते हैं, लेकिन पुख्ता प्रमाण किसी भी दावे के पक्ष में देखने को नहीं मिलते हैं। माना जाता है कि 1528-29 में इस मस्जिद को बनाया गया था। ब्रिटिश भारत के दौरान 19वीं शताब्दी के मध्य में इस मस्जिद को लेकर मुसलमानों और हिंदुओं के मध्य भारी तनाव और झगड़े होने लगे थे।

30 नवम्बर, 1858 को एक प्रथम सूचना रिपोर्ट किसी मोहम्मद सलीम के द्वारा निहंग सिखों के खिलाफ स्थानीय पुलिस थाने में दर्ज कराई गई थी, जिसमें इन सिखों पर मस्जिद के परिसर पर कब्जा करने और मस्जिद की दीवारों पर ‘राम’ लिखने का आरोप लगाया था। इस एफआईआर पर सम्भवतः कोई विशेष कार्यवाही नहीं हुई थी और मस्जिद के परिसर पर मुसलमानों का कब्जा बना रहा था। इस मुद्दे पर पहला मुकदमा 1885 में फैजाबाद के सिविल जज के समक्ष महंत रघुबरदास द्वारा दर्ज कराया गया, जिसमें मांग की गई थी कि मस्जिद के बाहर बने राम चबूतरे पर मंदिर के निर्माण की स्वीकृति दी जाए। मुस्लिम पक्ष द्वारा महंत रघुबरदास की इस याचिका का पुरजोर विरोध किया गया था। फैजाबाद के सिविल जज पंडित हरि किशन सिंह ने रघुबरदास की याचिका निरस्त करने का आदेश दिया था। 1886 में इस निर्णय के खिलाफ रघुबरदास ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश के यहां अपील की जिसे भी खारिज कर दिया गया था। इसके बाद इस विवादित परिसर में यथास्थिति तो बनी रही, लेकिन स्थानीय हिंदुओं एवं मुसलमानों के मध्य तनाव लगातार गहराता गया। मार्च, 1934 में अयोध्या में हिंदू -मुसलमान दंगों के दौरान मस्जिद को नुकसान पहुंचाया गया था। 1936 में तत्कालीन संयुक्त प्रांत सरकार ने इस विवादित परिसर को वक्फ की सम्पत्ति घोषित करते हुए सुन्नी वक्फ बोर्ड को सौंप दिया, जिसका पुरजोर विरोध शिया मुसलमानों द्वारा किया गया, जिसे अमान्य करार देते हुए संयुक्त प्रांत के वक्फ आयुक्त ने विवादित परिसर को सुन्नी वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति करार दिया था।’
आजादी मिलने के बाद 22-23 दिसम्बर, 1949 की रात अखिल भारतीय रामायण महासभा नामक एक हिंदुवादी संगठन ने मस्जिद के परिसर में रात को प्रवेश कर रामलल्ला (बालरूपी राम) एवं सीता की मूर्तियां स्थापित कर यह प्रचारित करना शुरू कर दिया कि दोनों मूर्तियां स्वयं ही प्रकट हुई हैं। नतीजा रहा अगले दिन से विवादित स्थल पर भारी तादाद में हिंदुओं का भगवान राम के दर्शन हेतु उमड़ना। स्थानीय थाने में इस बाबत एक प्रथम सूचना रिपोर्ट सिपाही माताप्रसाद द्वारा लिखी गई, जिसमें कहा गया था कि 50- 60 अनाम व्यक्तियों ने मस्जिद के परिसर में चुपचाप प्रवेश कर वहां की पवित्रता को भंग किया हैं। संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) में तब कांग्रेस की सरकार थी और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गोविंद वल्लभ पंत राज्य के मुख्यमंत्री थे। 26 दिसम्बर को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पूरे प्रकरण को बेहद गम्भीर करार देते हुए पंत को एक टेलीग्राम भेजा, जिसमें उन्होंने कहा- ‘अयोध्या में घटी घटनाओं से मैं व्यथित हूं। मुझे पूरी आशा है कि आप इस मुद्दे को व्यक्तिगत तौर पर देख रहे होंगे। एक खतरनाक उदाहरण की शुरुआत की गई है, जिसके बेहद गम्भीर परिणाम होंगे।’

नेहरू चाहते थे कि मस्जिद के परिसर से मूर्तियों को हटाकर कहीं अन्य स्थान पर स्थापित कर दिया जाए, लेकिन फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी के.के. नायर ऐसा करने को तैयार नहीं हुए। नेहरू आशंकित थे कि यदि समय रहते मामला नहीं सुलझाया गया, तो यह विवाद अपनी चपेट में पूरे भारत को ले लेगा और इसका प्रतिकूल असर कश्मीर मुद्दे पर पड़ेगा। 5 फरवरी, 1950 को नेहरू ने गोविंद वल्लभ पंत को लिखे अपने पत्र में कहा. ‘मुझे प्रसन्नता होगी, यदि आप अयोध्या की स्थिति की बाबत मुझे सूचित करते रहेंगे। आपको पता ही है कि मैं इस प्रकरण को और इसके चलते समस्त भारत, विशेषकर कश्मीर पर पड़ने वाले प्रभावों को कितना महत्वपूर्ण मानता हूं।’

क्रमशः

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