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किरदारों से झांकता जीवन

‘याद दों के मोती’ भले ही एक व्यक्ति के जीवन का वृतांत हो, लेकिन एक व्यक्ति समय के साथ कई तरह के किरदारों को जीता है। इस पुस्तक में भी एक व्यक्ति के तमाम किरदार बीते वक्त के यथार्थ को बयां करते हैं। कहते हैं कि ‘आयना ऐसा बना ऐ खुदा, इन्सान का चेहरा नहीं, उसका किरदार दिखाई दे। इस किताब में यह शत-प्रतिशत लागू होता है। 24 पाठों में विभाजित इस जीवन वृतांत के हर पाठ में आप कई तरह की सच्चाइयों से परिचित होते हैं। गरीबी, फटेहाली, तनाव, संघर्ष, शिक्षा यानी हर स्तर व जीवन के हर किरदार को इसमें बड़ी बेबाकी से उकेरा है। बचपन में मिला पारिवारिक माहौल, परवरिश के तौर-तरीके, महिलाओं का कार्यबोझ, मां की प्रसव वेदना से हुई मौत, भेदवा यानी स्वास्थ्य कर्मी का डर, जन्माष्टमी के व्रत के दिन संस्कृत अध्यापक का दावत के बहाने शारीरिक शोषण पर उतारु हो जाना व देवकी कांड जैसे मामले को अखबारों में उछालने के चलते जीवन पर संकट आ पड़ना आदि ऐसे तमाम विपरीत हालात का वह कैसे सामना करते हैं, इसका उल्लेख उनकी इस जीवटता को दिखाता है कि कैसे इन सबका उन्होंने सामना किया। बचपन से ही दूसरों के साथ हुए अन्याय को देखकर आने वाला गुस्सा कैसे समय के साथ लेखक के आंदोलनों का आधार बन गया। इस पूरी किताब में संघर्ष व जज्बे का जबर्दस्त सामंजस्य है। बगैर गुरु व मागदर्शक के विपरीत परिस्थितियों के बीच सामाजिक व पत्रकारिता के क्षेत्र में नाम बनाना कोई सरल काम नहीं होता लेकिन इसके बावजूद जनहित के विषयों व सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर लेखक की तड़प उनसे बेहतर काम कराती रही है। विद्यालयी जीवन के डिबेट, सेमीनार व गोष्ठियां उनके व्यक्तित्व को किस तरह नया आयाम देती हैं। पत्रकारिता में होने वाले छल-कपट पर भी उन्होंने बेबाकी से बयां किया है। विद्यार्थी जीवन से ही सामाजिक विसंगतियों व शासन-प्रशासन की उपेक्षा के मुद्दों को उठाने व समय के साथ खनन, चिपको आन्दोलन, नशा नहीं रोजगार दो, महिला सशक्तीकरण आंदोलन, शराब नहीं, स्वास्थ्य चाहिये जैसे आंदोलनों में भागीदारी को भी लेखक ने रेखांकित किया है।

डलिया की कैद- मां की मार, रोने का जुगाड़, एकनर का बुखार (टाईफाइड), भेदुवा का डर, शिवका का भूत, कठपत्तियों का आनंद, आनंदी की सहनशक्ति व मास्साब की चाय, दगड़ियों की बीड़ी, घर व गाड़ के बीच, डाडू की आग, नौले का पानी, तिलोमनी की चाय व साथियों की घुच्ची, सातवीं का रिजल्ट और मास की दाल, चाची का कमर दर्द, सिमलथैं का भूत, मौत से सामना और अदृश्य आवाज, धान की रोपाई में मौत का सामना, चौहान की खिचड़ी, बैडमिंटन का शौक व पीटीआई का पक्षपात, कमला की किताब व फर्त्याल का चाकू, जन्माष्टमी का व्रत और संस्कृत अध्यापक की दावत, न गुरु ही था न मार्गदर्शक, देवकी कांड से आया एक और नया मोड़, क्या था देवकी कांड, इन पाठों के माध्यम से लेखक ‘यादों के मोती’ में यह बताने में सफल रहा है कि तमाम कठिन परिस्थितियों के बाद भी किस तरह वह अपने सामाजिक सरोकारों से जुडेे़ हुए हैं।

लेखक का जन्म उस पिछड़े ग्रामीण परिवेश में हुआ, जहां कई तरह की सामाजिक बुराइयां, रूढ़ियां व अंधविश्वास व्याप्त थे। गरीबी के चलते लोगों की आर्थिक स्थितियां बेहद खराब थी। भेदभाव व गलत आदतों का एक खुला मैदान था, लेकिन यह तमाम परिस्थितियां भी उन्हें जनसरोकारों से अलग नहीं कर सकी। बचपन से लेकर आज तक जिये हर किरदार को वह बेबाकी से रखते हैं।

यह कहना भी नहीं भूलते कि जनवादी सोच की बलिवेदी पर किस तरह उनके अपने सपने बलिदान हो गये। कुल मिलाकर यह पुस्तक आपको ग्रामीण पृष्ठभूमि, संघर्ष, उपेक्षा, शोषण, अन्याय, पक्षपात व गरीबी से तो परिचित कराती ही है, लेकिन इन सबके बीच जनसरोकारों के लिए किया गया संघर्ष व जज्बा आपको प्रेरणा का एक पाठ भी पढ़ा जाता है। इस पुस्तक के हर पाठ में एक कहानी छिपी है, जो इस पूरे जीवन वृतांत का एक कहानी संग्रह में परिवर्तित कर सकती है, बशर्ते अगर लेखक चाहे तो।

यादों के मोती (जीवन वृतांत) दिनेश जोशी
आधारशिला प्रकाशन
बड़ी मुखानी, हल्द्वानी
शिवशक्ति प्रेस
शाहदरा, दिल्ली
मूल्य: 200 रु.

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