कर्नाटक में कांग्रेस-जद(सेक्युलर) सरकार के पतन की पटकथा लगभग पूरी होने के साथ ही अब भाजपा के निशाने पर मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार आ चुकी है। दरसल, कर्नाटक में पिछले विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा एमएलए होने के बावजूद भाजपा सरकार बना पाने में विफल रही थी। प्रदेश के राज्यपाल वजुभाई वाला ने अपने विवेक का इस्तेमाल कर भाजपा विधायक दल के नेता बीएस येदुरप्पा को सरकार बनाने का मौका दिया, लेकिन उन्होंने सदन में विश्वासमत हासिल कर पाने से पहले ही बहुमत न जुटा पाने के चलते इस्तीफा दे डाला। कांग्रेस ने जद (सेक्युलर) के साथ सरकार बनाई जरूर, लेकिन आंतरिक विरोध और कांग्रेस के पूर्व सीएम सिद्धारम्मैया की महत्वाकांक्षा के चलते गठबंधन सरकार पहले ही दिन से अस्थिर रही। पूर्व सीएम देवेगौड़ा के कभी बेहद करीबी रहे सिद्धारम्मैया की उनके पुत्र एचडी कुमारस्वामी संग कभी न निभी। कांग्रेस आलाकमान के दबाव में आकर उन्होंने कुमार स्वामी को सीएम बनाने की हामी तो भर ली, लेकिन अपनी ही पार्टी की सरकार को वे लगातार अस्थिर करने में जुटे रहे। दूसरी तरफ भाजपा नेता येदियुरप्पा भी पिछले चौदह महीने के दौरान सरकार गिराने के एकसूत्रीय कार्यक्रम में लगे रहे। लोकसभा में 28 में से 26 सीटों पर जीत मिलने के साथ ही कुमार स्वामी सरकार के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। भाजपा ने ‘ऑपरेशन लोटस’ की शुरुआत कर कांग्रेस और जद (सेक्युलर) के विधायकों को अपनी तरफ खींचने के प्रयास शुरू किए। जद (सेक्युलर) और कांग्रेस का आरोप है कि बागी हुए विधायकों को भारी मात्रा में धन और मंत्री पद का लालच दिया गया है। हालांकि भाजपा ऐसे किसी भी आरोप की पूरी तरह नकार रही है। लेकिन कर्नाटक के सियासी संकट में हरेक प्रकार के अस्त्र का सहारा लिया जाना स्पष्ट नजर आ रहा है। राज्य विधानसभा के अध्यक्ष द्वारा बागी कहलाए जा रहे विधायकों का इस्तीफा नहीं स्वीकारे जाने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा है। इस बीच 18 जुलाई को कुमार स्वामी ने विधानसभा में विश्वासमत पेश करने के साथ ही अपने भाषण में भाजपा की धज्जियां उड़ाते हुए स्वयं को शहीद दर्शाने का प्रयास किया। जहां भाजपा को लग रहा था कि अब गठबंधन सरकार का गिरना तय है, एक के बाद एक फिल्मी घटनाक्रम के चलते विश्वासमत पर फैसला स्पीकर ने टाल दिया। कांग्रेस ने यकायक ही गायब हो मुंबई के एक अस्पताल में भर्ती हो चुके श्रीमंत पाटिल की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए। कांग्रेस के नेता डीके शिव कुमार ने इस पूरे प्रकरण के पीछे भाजपा के हाथ होने का आरोप लगाते हुए अपने आठ अन्य विधायकों की बाबत जानकारी मांगी। ये सभी विधायक सदन में व्हिप जारी होने के बावजूद गैरहाजिर रहे। स्पीकर केआर रमेश ने विश्वासमत पर वोटिंग से पहले इन विधायकों की खैर-खबर लेने का निर्देश गृहमंत्री आर-आर पाटिल को दे दिया। भाजपा इससे बौखलाकर राज्यपाल के पास ज्ञापन देने पहुंच गई। भाजपा ने स्पीकर पर जानबूझकर विश्वासमत पर वोटिंग टालने का आरोप लगा डाला। राज्यपाल ने इसके तुरंत बाद स्पीकर को पत्र लिख जल्द वोटिंग कराने को कहा। स्पीकर ने राज्यपाल का पत्र सदन में पढ़ा अवश्य, लेकिन वोटिंग पर कोई निर्णय नहीं लिया। एक सफल रणनीति के चलते भले ही कुमारस्वामी कुछेक घंटों के लिए मुख्यमंत्री बने रहने की मोहल्लत पा चुके हैं। भाजपा के पास उनकी सरकार गिराने और अपनी सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या बल है। इस बीच नेतृत्वविहीन कांग्रेस का संकट लगातार गहराता जा रहा है। लोकसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफे से काग्रेस पूरी तरह पस्त है। ऐसे में मध्य प्रदेश के कमलनाथ सरकार पर मंडरा रहे संकट ने कांग्रेस की परेशानियों को बढ़ाने का काम किया है। कमलनाथ ने पिछले दिनों भाजपा पर कांग्रेस के विधायकों को धन का लालचदेने का आरोप लगाया था।

राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री प्रद्युयम्न सिंह तोमर का कहना है कि हरेक विधायक को पचास करोड़ और मंत्री पद का लालच भाजपा दे रही है। तोमर का दावा है कि व्यापम घोटाले में बुरी तरह फंसा राज्य भाजपा का शीर्ष नेतृत्व किसी भी कीमत पर निर्वाचित सरकार को गिराने का षड्यंत्र रच रहा है। कांग्रेस को समर्थन दे रही बसपा की विधायक रमाबाई ने भी पिछले दिनों भाजपा पर उन्हें पचास करोड़ के ऑफर का जिक्र किया था। गत् वर्ष नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव में 231 सीटों वाले सदन में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी अवश्य, लेकिन सामान्य बहुमत के आंकड़े से दूर रही। कांग्रेस को 114 सीटें मिली तो भाजपा को 108, सपा-बसपा को एक-एक और चार सीटें निर्दलियों के खाते में हैं। ऐसे में यदि कर्नाटक की तरह कुछेक कांग्रेस विधायक अपने क्षेत्र के विकास या मोदीजी के ‘विजन’ से प्रभावित हो कांग्रेस छोड़ते हैं तो कमलनाथ सरकार का गिरना तय है। दिल्ली के सत्ता गलियारों में इस बात की खासी सुगबुगाहट है कि लगभग 11 विधायक पाला बदलने को तैयार हैं। ऐसे में गृहमंत्री अमित शाह का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार होता नजर आने लगा है।


