देश की आर्थिक राजधानी महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव मात्र दो माह दूर है। 2019 में हुए विधानसभा नतीजे भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के पक्ष में आए जरूर थे लेकिन गठबंधन में शामिल शिवसेना संग मुख्यमंत्री पद को लेकर मतभेद चलते सरकार का गठन नहीं हो पाया था और कुछ दिनों के लिए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा था। इन कुछ दिनों के दौरान भाजपा ने बड़ा खेला करते हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता अजित पवार से हाथ मिला सरकार बना ली। यह सरकार लेकिन मात्र ढाई दिन की रही थी। राष्ट्रवादी कांग्रेस के अध्यक्ष शरद पवार ने भतीजे अजित पवार का साथ नहीं दिया जिसके चलते येन-केन-प्रकारेण सत्ता पाने का भाजपाई दांव असफल हो गया।

26 नवम्बर, 2019 को देवेंद्र फडणवीस की ढाई दिनी सरकार का इस्तीफा हुआ और 29 नवम्बर, 2019 को महाराष्ट्र की राजनीति में नया कमाल होते सबने देखा। दो धुर विरोधी दल, कांग्रेस और शिवसेना ने हाथ मिला लिया। नतीजा उद्धव ठाकरे की ताजपोशी बतौर सामने आया। इस अनोखे गठबंधन को महाविकास अघाड़ी कह पुकारा गया। भाजपा के लिए उद्धव ठाकरे का पाला बदलना बड़ा सदमा था, जिसे वह सह नहीं पाई। 29 जून, 2022 को ‘ऑपरेशन लोट्स’ के तहत शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में टूट करा पाने में भाजपा को सफलता मिली तथा उद्धव सत्ता से बेदखल हो गए। तभी से राज्य में भाजपा-शिवसेना (शिंदे) और राकांपा (अजित पवार) की सरकार सत्ता में है। यह गठबंधन चूंकि हर कीमत पर सत्ता पाने और सत्ता की मलाई खाने के लिए हुआ है इसलिए इसकी स्थिरता लगातार सवालों के घेरे में बनी रही है। अब जबकि चुनाव सिर पर है, भाजपा और उसके सहयोगी दलों के मध्य और इन दलों के भीतर भारी घमासान छिड़ चुका है। अजित पवार के लिए कहा-सुना जा रहा है कि वे अपने चाचा शरद पवार के एक बार फिर से करीब होने का प्रयास कर रहे हैं और यदि वे सफल हुए तो चुनाव से ठीक पहले वे घर वापसी कर सकते हैं।

दूसरी तरफ शिवसेना (शिंदे) गुट के कई नेता भी जुगाड़ लगा रहे हैं कि कैसे भी वे वापस उद्धव ठाकरे की शरण में पहुंच जाएं। अजित पवार गुट के विधायक और राज्य विधानसभा के डिप्टी स्पीकर ने तो गत् सप्ताह कमाल ही कर दिखाया। डिप्टी स्पीकर नरहरी झिरवाल अपने एक साथी विधायक के साथ मुख्यमंत्री शिंदे से मंत्रालय मिलने पहुंचे। उनकी मुलाकात का एजेंडा आदिवासी समाज की समस्याओं पर चर्चा करना और इन समस्याओं का समाधान तलाशना था। इस मुलाकात के बाद नरहरी और उनके साथ विधायक आदिवासी हितों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए मंत्रालय की तीसरी मंजिल से नीचे कूद गए। हालांकि इस ‘स्टंट’ को करने से पहले उन्होंने नीचे जाल लगा दिया था जिससे उनकी जान तो बच गई लेकिन सरकार की खासी किरकिरी उन्होंने करा डाली।

जानकारों की मानें तो नरहरी और उनके कई साथी विधायक अजित पवार का साथ छोड़ शरद पवार की शरण में जाने का मन बना चुके हैं। भाजपा के समक्ष गठबंधन दलों के नेताओं की बढ़ती बेचैनी तो समस्या है ही है, वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के तेवर भी उसके लिए मुसीबतें पैदा कर रहे हैं। भाजपा के वर्तमान नेतृत्व इशारों में इस नाराजगी को सार्वजनिक करने से चूकते भी नहीं हैं। गत् दिनों उन्होंने महाराष्ट्र सरकार की चुनाव जिताओ योजना ‘लाडली बहिन’ को कठघरे में खड़ा कर डाला। इस योजना के अंतर्गत राज्य सरकार प्रतिमाह महिलाओं को 1500 रुपया देती है। चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री ने दोबारा सत्ता में आने पर प्रतिमाह 3000 रुपया देने की बात कही है। गडकरी इससे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि इस योजना पर प्रति वर्ष 46 हजार करोड़ खर्च होने वाले हैं। एक ही योजना में इतनी बड़ी सब्सिडी का असर सरकारी खजाने पर बुरा असर डालेगा और विकास योजनाओं के लिए बजट का संकट पैदा हो जाएगा। मुख्यमंत्री शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सकते में हैं कि अपने ही नेता के इस वार की काट करें तो कैसे?

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