Uttarakhand

मंत्री की हठधर्मिता, फजीहत मुख्यमंत्री की

भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में शिक्षा को समवर्ती सूची में शामिल किया गया है। संविधान और यूजीसी अधिनियम के तहत विश्वविद्यालयों को शैक्षिक और प्रशासनिक स्वायत्तता दी गई है। 2006 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित लिंगदोह समिति ने छात्रों के समग्र विकास के लिए निर्धारित समय पर छात्र संघ चुनाव कराए जाने सम्बंधी अपनी विस्तृत रिपोर्ट जारी की थी। उत्तराखण्ड में उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत की हठधर्मिता कहिए या फिर उनकी राजनीति, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को कुचला जा रहा है और शिक्षा मंत्रालय कुलपतियों के अधिकारों पर अनावश्यक हस्तक्षेप कर रहा है। राज्य में इस वर्ष छात्र संघ चुनाव न कराए जाने का फरमान इसी हठधर्मिता का परिणाम है जिसके चलते युवाओं में खासे लोकप्रिय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को बेवजह उनके आक्रोश का शिकार होना पड़ रहा है। छात्र संगठन आक्रोशित हो सड़क से न्यायालय तक अपने अधिकारों के लिए आंदोलनरत हैं तो अब बैकफुट में आया शिक्षा मंत्रालय कभी उच्च न्यायालय के आदेश चलते चुनाव न कराने की गलत बयानबाजी कर रहा है तो कभी इस बेवजह विवाद का ठीकरा कुलपतियों पर फोड़ता नजर आ रहा है

  •       सुनील भारद्वाज

‘‘छात्रों के समग्र विकास के लिए छात्रों का प्रतिनिधित्व जरूरी है इसलिए विश्वविद्यालय छात्रों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेंगे। इन सिफारिशों के आधार पर केंद्र, राज्य या विश्वविद्यालय स्तर पर छात्रों का प्रतिनिधित्व विनियमित (Regulate) करना सुनिश्चित किया जाए। साथ ही छात्रों में नेतृत्व क्षमता के विकास के लिए व्यवसायिक प्रोफेशनल के माध्यम से संस्थान लीडरशिप टेªनिंग का आयोजन करेंगे।’’

छात्रों के प्रतिनिधित्व के महत्व को रेखांकित करती हुई उक्त पंक्तियां लिंगदोह समिति की उन सिफारिशों का हिस्सा हैं जो विश्वविद्यालयों, उनसे संबद्ध विद्यालयों और उच्च शिक्षा के संस्थानों में छात्र संघों के चुनाव कराने छात्रों का प्रतिनिधित्व तय करने के लिए उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर बनाई गई थी जिनका उच्चतम न्यायालय ने अनुमोदन किया तथा उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) के माध्यम से पूरे देश के उच्च शिक्षा से संबंधित शिक्षण संस्थानों में लागू किया जाना था। उच्चतम न्यायालय की मंजूरी के बाद पूरे देश में छात्र संघों के चुनाव लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुसार ही होते है। छात्र संघ चुनाव के संदर्भ में लिंगदोह समिति की सिफारिशों से छात्र संघ चुनाव में एक क्रांतिकारी बदलाव तो आया ही शौकिया चुनाव लड़ने वाले उम्रदराज छात्रों की इन चुनाव में भागीदारी न के बराबर हो गई। लेकिन उत्तराखण्ड सरकार का 23 अप्रैल 2024 का एक शासनादेश लिंगदोह समिति की सिफारिशों और छात्रों को अपना प्रतिनिधि चुनने के अधिकारों पर भारी पड़ गया। सरकारों की सारी संस्थाओं को नियंत्रित कर लेने की मंशा उन संस्थानों की स्वायत्तता का भी अतिक्रमण कर देती है जिनको सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण की दरकार नहीं है। ये ठीक है कि उन संस्थाओं को चलाने के लिए आर्थिक मदद सरकार ही देती है लेकिन ये किसी संस्थान की स्वायत्तता नियंत्रित करने का आधार नहीं बन जाता।

उत्तराखण्ड के विश्वविद्यालयों और राजकीय महाविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों को कराने में सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं। खासकर उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के साथ उच्च शिक्षा विभाग भी कठघरे में है। विवाद का कारण है 23 अप्रैल 2024 का शासनादेश जिसमें सरकार ने शैक्षणिक कैलेंडर जारी कर दिया साथ ही छात्र संघ चुनाव 30 सितंबर 2024 तक करा लेने का समय तय कर दिया। 23 अप्रैल 2024 का शासनादेश विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक कैलेंडर के संदर्भ में है जिसमें कहा गया है कि स्नातक स्तर के लिए प्रवेश की तिथि 15 मई 2024 और स्नातकोत्तर व अन्य के लिए 31 जुलाई निधारित की गई है। उसके अनुसार छात्र संघ चुनावों का समय 30 सितंबर 2024 या उससे पहले करा लेने को कहा गया। मामला उच्च न्यायालय में जाने के बाद सरकार ने अपने जवाब में 23-4-2024 के शासनादेश का हवाला देकर अपना पक्ष रखा साथ ही कहा कि अब कोई विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव करवाता है तो 23-4-2024 के शासनादेश का उल्लंघन होगा। सरकार का पक्ष सुनने के बाद उच्च न्यायालय नैनीताल ने याचिका निस्तारित कर दी।

गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी से जुड़े याचिकाकर्ता महिपाल सिंह ने छात्र संघ चुनावों के संदर्भ में एक जनहित याचिका उच्च न्यायालय नैनीताल में दाखिल की थी जिसमें कहा गया था कि 23 अप्रैल 2024 को जारी शैक्षणिक कैलेंडर के अनुसार 30 सितंबर 2024 तक छात्र संघ चुनाव सम्पन्न हो जाने चाहिए थे लेकिन उस तिथि के बाद चुनाव करवाना लिंगदोह समिति की सिफारिशों का उल्लंधन होगा तथा अब छात्रसंघ चुनावों के चलते पढ़ाई में बाधा उत्पन्न होगी। सरकार का पक्ष सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका को निस्तारित कर दिया था। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट ने छात्र संघ चुनावों पर रोक लगाने सम्बंधी कोई बात नहीं की थी लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया में ऐसा प्रसारित किया गया कि हाईकोर्ट ने चुनावों पर रोक लगा दी है। छात्र संघ चुनावों को न करवाने के पीछे की वजहों को जानें तो संस्थाओं पर नियंत्रण करने की मंशा और राजनीतिक पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। छात्र संघ के संदर्भ में ‘एक दिन-एक चुनाव-एक परिणाम का दावा करने वाले उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत कहां पर चूक कर गए? आखिर एक महज प्रशासनिक आदेश का हवाला देकर चुनाव न कराने की बात कहने वाली सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रातव उसी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पाठशाला से निकले हैं जिसने कई छात्र नेता उत्तराखण्ड को दिए हैं। छात्र संघ चुनावों को न कराने की मंशा के पीछे महज एक शासनादेश वजह दोनों समझ पाना मुश्किल है। जिस पार्टी की सरकार में युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का चेहरा हो, युवा उच्च शिक्षा मंत्री हो वहां छात्र अपने प्रतिनिधियों को चुनने से वंचित होना पड़ रहा हो समझ से परे है। हां इतना जरूरी है कि इस निर्णय ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की छवि को छात्रों के बीच एक हद तक नकारात्मक रूप से प्रभावित जरूर किया है। हालांकि धामी सरकार अपने चुनावी दायित्व से भी बचती नजर आ रही है। संवैधानिक रूप से बाध्यता वाले नगर निकाय चुनाव और पंचायत चुनाव सरकार की इन्हीं काहिलियों का शिकार हुए जहां नगर निकायों में एक साल से प्रशासक बैठे हैं वहीं पंचायतों पर प्रशासक बैठाने की तैयारी है। ऐसे में ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिकल्पना पर उनके दल की सरकार ही पलीता लगा रही है।

छात्र संघ चुनावों को न करवाकर सरकार छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन तो कर ही रही है, साथ ही छात्रों के बीच से निकलने वाले युवा नेतृत्व की राह में भी बाधा उत्पन्न कर रही है। छात्र संघ चुनाव न कराने के बीच एक सवाल ये भी उठ रहा है कि एक प्रशासनिक आदेश के जरिए सभी विश्वविद्यालयों व उनसे जुड़े महाविद्यालयों का शैक्षणिक कैलेंडर जारी कर कही अपने अधिकार क्षेत्र से तो बाहर नहीं जा रही क्योंकि छात्र संघ चुनावों न होने देने के लिए इसी शैक्षणिक कैलेंडर को आधार बनाया गया है। सवाल है कि क्या इस प्रकार सरकार की तरफ से शैक्षणिक-कैलेंडर जारी किया जाना विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का अतिक्रमण नहीं? विश्वविद्यालय का निर्माण एक महज प्रशसनिक आदेश के जरिए नहीं होता। केंद्र या राज्य सरकारें इसका निर्माण संसद या विधानसभाओं में अधिनियम पारित करके करती हैं। राष्ट्रपति या राज्यपाल इसके कुलाधिपति होते हैं। सारे विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की गाइडलाइंस के अनुसार चलते हैं। ये भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक संगठन है जिसे विश्वविद्यालयों में शिक्षा के प्रचार, समन्वय, शिक्षण परीक्षा और अनुसंधान के मानकों एवं रख-रखाव के लिए 1956 में संसद के एक अधिनियम द्वारा स्थापित किया गया था। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 2008 के एक रेगूलेशन के संदर्भ में 16-2-2009 का एक आदेश है जिसमें कहा गया है कि प्रत्येक शैक्षिक सत्र की शुरूआत पर विश्वविद्यालय अपना एक शैक्षणिक कैलेंडर जारी करेंगे जिसमें वो पूरे सत्र की गतिविधियों व क्रियाकलापों की जानकारियों का शेड्यूल देंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार विश्वविद्यालय अगस्त माह के प्रथम सप्ताह या फिर उसके पश्चात दो सप्ताह की शिथिलता के साथ पढ़ाई प्रारंभ करवा दें। उत्तराखण्ड सरकार का 23-4-2024 को जारी शासनादेश विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 15-4-2002 के उस निर्देश का उल्लंघन है जिसमें विश्वविद्यालय के कुलपतियों सभी कॉलेज के प्रधानाचार्यों और शैक्षिक संस्थाओं के प्रमुखों को 2003 और 2008 के रेगुलेशन का हवाला देकर उसका अनुपालन करने का निर्देश दिया है। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर राज्य सरकार के अतिक्रमण को प्रदेश के विश्वविद्यालयों के कुलपति भी समझते हैं लेकिन सरकारों के दबाव के आगे वो खुद को असहाय पाते हैं। ऐसा नहीं है कि विश्वविद्यालयांे ने स्वयं से अपना शैक्षणिक कैलेंडर जारी न किया हो। उदाहरण के तौर पर श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय ने पूर्व के वर्षों में अपना स्वयं का शैक्षणिक कैलेंडर बिना सरकार के हस्तक्षेप के जारी किया था। एक वर्ष पूर्व तक विश्वविद्यालय अपना ही कैलेंडर प्रयोग कर रहा था। सरकार ने विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए ‘समर्थ पोर्टल’ के माध्यम से पूरे प्रदेश में एक साथ प्रवेश की प्रक्रिया शुरू की। समय-समय पर छात्रों की मांग पर प्रवेश तिथि बढ़ती गई। अभी अक्टूबर माह में प्रवेश के लिए ‘समर्थ पोर्टल’ फिर खोला गया। सवाल है कि जब आप प्रवेश के लिए एक नियम नहीं बना सके, एक निश्चित तिथि तय नहीं कर पाए तो छात्र संघ चुनाव के लिए ही हठधर्मिता क्यों? लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुसार शैक्षिक – छात्र के आरम्भ होने के आठ सप्ताह के भीतर चुनाव करा लेने चाहिए लेकिन अक्टूबर तक कॉलेज में प्रवेश प्रक्रिया के चलते 3 अप्रैल 2024 का शैक्षिक कैलेंडर के अनुसार 30 सितंबर 2024 तक छात्र संघ चुनाव करा लेने का शासनादेश बेमानी है। विश्वविद्यालयों को अपना शैक्षिक कैलेंडर जारी करने का अधिकार है। इसको तय करने में राज्य सरकारों की कोई भूमिका नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि विश्वविद्यालयों को नियंत्रित करने में सरकार की इतनी दिलचस्पी क्यों? जिस एक्ट के माध्यम से विश्वविद्यालयों का गठन होता है उसमें आंतरिक शैक्षणिक कार्य बिना सरकारी हस्तक्षेप के करने की स्पष्टता होती है। विश्वविद्यालय की एक्जीक्यूटिव काउंसिल और बोर्ड ऑफ स्टडीज के जरिए ये काम सम्पादित होते हैं। कोई भी एक्ट सरकारों या उच्च शिक्षा विभाग को ऐसी असीमित शक्ति नहीं देता कि वो विश्वविद्यालयों का शेड्यूल तय कर सकें।

छात्र संघ छात्रों की शिक्षा का अभिन्न है जो छात्रों में नेतृत्व क्षमता के विकास के साथ नए नेतृत्व को उभरने का अवसर प्रदान करता है साथ ही लोकतांत्रिक एवं चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी को सुनिश्चित करता है। 2022 और 2023 में छात्र संघ चुनाव नवम्बर और दिसम्बर माह में कराए गए थे। इस वर्ष छात्रसंघ चुनावों के न होने से छात्रों का आक्रोश सड़कों पर दिखा। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने लेकिन इस मुद्दे पर खामोशी अख्तियार कर अपनी साख को खतरे में डाल दिया है। सरकार के हाईकोर्ट में रूख के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद चुप्पी साध कर बैठ गया है जब कि उसका दायित्व तो छात्र हितों के लिए लड़ना है। सरकार का दबाव शायद उस पर काम कर गया। हालांकि छात्र संगठनों का छात्रों या शिक्षा के लिए लड़ना बीते समय की बात हो गई है।

उत्तराखण्ड में छात्र हितों के लिए आंदोलन एक लंबे समय से देखने को नहीं मिला है। अब छात्र संगठन विद्यालयों में प्रवेश के समय, छात्र संघ चुनाव के वक्त या फिर राजनीतिक दलों के चुनावों में ही नजर आते हैं। छात्र संगठनों ने भी छात्र राजनीति को नुकसान पहुंचाया है जो अब छात्रों के खैरख्वाह कम, राजनीतिक दलों के टूलकिट ज्यादा हो गए हैं। फिलहाल छात्र संघ चुनावों के लिए छात्र फिर उच्च न्यायालय की शरण में हैं वहां निर्णय जो भी हो लेकिन छात्र राजनीति से मुकाम पाने वाले राजनेताओं की अब वो कतार नजर नहीं आती जिसमें कभी नारायण दत्त तिवारी, महेंद्र पाल, पी.सी. तिवारी, विपिन त्रिपाठी, प्रदीप टम्टा, राम सिंह कैड़ा, ललित जोशी सरीखे नेता आते थे।

चुनाव नहीं कराए जाने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है। बीते छह वर्षों से ऐसा हो रहा है। सरकार ने यह निर्णय लिया है कि सभी विश्वविद्यालयों में एक साथ चुनाव हों। मेरी दृष्टि में यह सही निर्णय है।
प्रो. डी.एस. रावत, कुलपति कुमाऊं विश्वविद्यालय

 

सरकार के दबाव में हम काम नहीं कर रहे हैं। लेकिन सरकार ने अवश्य शैक्षणिक कैलेंडर तीनों विश्वविद्यालयों के लिए ‘एक परीक्षा – एक परिणाम’ के तहत् निर्गत किया है। बीते दो बरसों से सरकार द्वारा राज्य के तीनों विश्वविद्यालयों के लिए कैलेंडर जारी किया जा रहा है। अब मामला न्यायालय में है। उनके आदेश का पालन किया जाएगा।
प्रो. एन.के. जोशी, कुलपति श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय

 

सरकार तत्काल छात्रसंघ चुनाव कराने के लिए तैयार है। 26 नवम्बर को इस मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई है। तत्पश्चात् हम निर्णय ले लेंगे। यह कहना गलत है कि हम विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को कमजोर कर रहे हैं। हमारा ऐसा कोई उद्देश्य नहीं है।
धन सिंह रावत, उच्च शिक्षामंत्री, उत्तराखण्ड

हमारे विश्वविद्यालय से जुड़े महाविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव कराए जाने का कैलेंडर हमने जारी कर दिया था। यदि महाविद्यालयों ने चुनाव नहीं कराए तो इसमें हम क्या कर सकते हैं? हमारा दायित्व परीक्षाएं कराना और एडमिशन कराना भर है, चुनाव कराना हमारा कार्य नहीं है।
प्रो. अन्नपूर्णा नौटियाल, कुलपति हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय

 

 

रीढ़विहीन हो गए हैं कुलपति
लिंगदोह कमेटी के अनुसार सितम्बर तक छात्रसंघ चुनाव हो जाने चाहिए थे। राज्य में शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह बदहाल है। राजनीतिक हस्तक्षेप विश्वविद्यालयों में बहुत बढ़ गया है जिसके चलते शिक्षा व्यवस्था का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। कुलपतियों ने सरकार के समक्ष घुटने टेक दिए हैं। सारे निर्णय राजनीतिक स्तर पर लिए जा रहे हैं। शिक्षण संस्थाओं में गुणवत्ता की बात कोई नहीं कर रहा है। सरकार विश्वविद्यालयों की ऑटोनॉमी को समाप्त कर रही है। सरकार द्वारा शैक्षणिक कैलेंडर जारी करना स्पष्ट करता है कि कुलपतियों ने सरकार के आगे समर्पण कर दिया है। सब अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं। सच तो यह है कि हाथ-पांव जोड़कर कुलपति बन रहे हैं। तब कैसे ऑटोनॉमी बरकरार रहेगी। इस प्रकार के कुलपति आ गए हैं कि उन्होंने खुद ही अपने अधिकारों को सरेंडर कर दिया है। जिस प्रकार के कुलपति होने चाहिए थे, वे अब नहीं हैं। पहले मजबूत रीढ़ के कुलपति हुआ करते थे, अब रीढ़विहीन कुलपति हैं जिसके चलते वर्तमान स्थिति पैदा हुई है। छात्रसंघ चुनाव में शासन का कोई दखल नहीं हो सकता है। यह काम विश्वविद्यालय का है। कुलपतियों को शासन निर्देश नहीं दे सकता। विश्वविद्यालयों को केवल राज्यपाल जो कुलाधिपति होते हैं, निर्देश दे सकते हैं।
डॉ. जगदीश प्रसाद, पूर्व उच्च शिक्षा निदेशक, उत्तराखण्ड

बात अपनी-अपनी
एनएसयूआई चाहता है कि पूरे प्रदेश में छात्रसंघ चुनाव हों। सरकार छात्रों को अपना प्रतिनिधि चुनने से रोक नहीं सकती। दरअसल, सरकार छात्रसंघ छोड़िए कोई भी चुनाव नहीं करवाना चाह रही है। नगर निगम, पंचायत चुनाव इसके उदाहरण हैं। सरकार अब इसके लिए कोर्ट की बात कर रही है। ये सरकार की ही चाल है। एक तरफ सरकार कहती है कि वो चुनाव करवाना चाहती है, दूसरी ओर अपने ही पदाधिकारी को कोर्ट भेज रही है। प्रदेश सरकार का ‘एक छात्रसंघ – एक चुनाव’ महज नारा है वो शैक्षिक कैलेंडर जारी कर विश्वविद्यालयों में अपनी मर्जी थोपना चाहती है। अभी विश्वविद्यालयों के परीक्षाफल भी पूरे नहीं आए हैं तो शैक्षिक कैलेंडर की बात करना बेमानी है।
विकास नेगी, प्रदेश अध्यक्ष, एनएसयूआई, उत्तराखण्ड

छात्रसंघ चुनाव होने चाहिए। जब से छात्रसंघ चुनाव हो रहे हैं, विद्यार्थी परिषद् की हमेशा से भागीदारी रही है। छात्रसंघ नेतृत्व खड़े करने का एक माध्यम है। छात्रसंघ के माध्यम से समाज को बहुत सारे नेतृत्व मिले हैं। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री विद्यार्थी परिषद् से ही निकले हैं। यूथ को विद्यार्थी परिषद् ने छात्रसंघ के माध्यम से लीडरशिप दी है। कैम्पस के अंदर अच्छा वातावरण रहे, शैक्षिक वातावरण रहे इसके लिए भी छात्रसंघ के माध्यम से विद्यार्थी परिषद् निरंतर कार्य करता आया है। विद्यार्थी परिषद् का मानना है कि छात्रसंघ चुनाव होने चाहिए। हाईकोर्ट के निर्णय बाद विद्यार्थी परिषद् ने छात्रसंघ चुनाव के लिए हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। कोर्ट के निर्णय का हम सभी सम्मान करते हैं।
अंकित सुंदरियाल, प्रदेश संगठन मंत्री, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्, उत्तराखण्ड

छात्रसंघ के माध्यम से ही छात्रों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलता है। छात्रसंघ का मतलब सिर्फ राजनीतिक नेतृत्व ही नहीं है, समाज के हर क्षेत्र में एक नेतृत्व की जरूरत होती है। इसलिए नए नेतृत्व को उभारने के लिए छात्रसंघ चुनाव जरूरी है।
गौरव मठपाल, पूर्व अध्यक्ष, छात्र महासंघ, कुमाऊं विश्वविद्यालय

निवर्तमान छात्रसंघ अध्यक्ष और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य के तौर पर मेरा मानना है कि छात्रसंघ चुनाव नए नेतृत्व को आगे लाते हैं इसलिए छात्रसंघ चुनाव जरूरी है। छात्रसंघ चुनाव की पहली सीढ़ी है। छात्रसंघ से निकले नेताओं ने देश व प्रदेश में राजनीति ही नहीं समाज के अन्य क्षेत्रों में भी अमिट छाप छोड़ी है। विद्यार्थी परिषद की ओर से नैनीताल हाईकोर्ट में छात्रसंघ चुनाव के लिए पुनर्विचार याचिका दायर की गई है।
सूरज रमोला, निवर्तमान छात्रसंघ, अध्यक्ष, एमबीपीजी कॉलेज, हल्द्वानी

चुनाव समय पर कराने की जिम्मेदारी विश्वविद्यालयों की है। शैक्षणिक सत्र ही देर से चल रहा है तो समय पर चुनाव कैसे सम्भव है? गलती विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की है जिसका नुकसान छात्रों को उठाना पड़ रहा है।
संजय रावत, पूर्व अध्यक्ष, छात्र संघ, एमबीपीजी कॉलेज, हल्द्वानी

You may also like

MERA DDDD DDD DD