गठबंधन का दबाव, आक्रामक पक्ष और घर भीतर घमासान

आम चुनाव 2014 और 2019 में लगातार दो बार भाजपा अकेले दम पर देश की सत्ता पर काबिज हुई। इस दौरान तीन नए कृषि कानून और भूमि अधिग्रहण बिल को अगर छोड़ दिया जाए तो प्रट्टाानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली फैसला वापस लेने की नहीं रही। अपने फैसलों-नीतियों पर अडिग रहना ही मोदी- शाह की नई भाजपा और सरकार की रणनीति मानी जाने लगी। लेकिन अपने तीसरे कार्यकाल में दस जून से अब तक कई बार मोदी सरकार फैसलों से यू-टर्न ले चुकी है या यूं कहें कि उसे अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। जबकि जब पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तीसरी नई सरकार में मंत्रालयों का बंटवारा हुआ तो एक संदेश दिया गया कि भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बाद भी कुछ नहीं बदला है। मोदी कैबिनेट के चार शीर्ष मंत्रालय उन्हीं को दिए गए जिनके पास पिछली सरकार में थे। ओम बिड़ला को दोबारा लोकसभा का स्पीकर बनाकर पिछली सरकार जैसी ही तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई। लेकिन पिछली दो सरकारों के मुकाबले इस बार सरकार की कार्यशैली में फर्क अब साफ नजर आने लगा है। यूपीएससी में लेटरल एंट्री की बात हो, वक्फ बोर्ड बिल, ब्रॉडकास्टिंग ड्राफ्ट या फिर अन्य मोदी सरकार अपने फैसले बदलने को मजबूर हुई है

इन दिनों चौतरफा चर्चा केंद्र सरकार के रिवर्स गियर पर चले जाने की हो रही है। कई महत्वपूर्ण फैसलों को गठबंधन के दबाव चलते रद्द किए जाने के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या सचमुच मोदी सरकार बहुत कमजोर हो गई है और उसका अपना बहुमत नहीं है, जिसकी वजह कई मौकों पर सरकार झुकी है और उसने यू टर्न किया है? या किसी खास रणनीति के तहत जान बूझकर सरकार की ओर से विवादित मसले आगे किए जा रहे हैं और फिर पीछे हटा जा रहा है ताकि देश के मतदाताओं में यह मैसेज बने कि भाजपा को बहुमत नहीं देने का क्या नुकसान हो रहा है? एक दूसरी चर्चा यह कि लेटरल एंट्री पर जान बूझकर विवाद कराया गया ताकि उसमें आरक्षण लागू किया जा सके। इसी तरह वक्फ बोर्ड कानून को भी जेपीसी के पास इसलिए भेजा गया ताकि यह मैसेज बने कि सभी पार्टियों से सलाह मशविरा करके इसे लागू किया जा रहा है। सरकार ने इस तरह कुछ समय भी हासिल किया है ताकि राज्यसभा में उसका बहुमत हो जाए। या एक बात और हो सकती है कि सरकार जानबूझकर ऐसे मुद्दों को हल करने के बजाय लटकाने की अहमियत समझ चुकी है। राम मंदिर का निर्माण फंसाकर उसे जितना उत्तर प्रदेश में फायदा मिला उतना मंदिर बनाकर नहीं। इसलिए हो सकता है कि यह रणनीति के तहत हो रहा है कि मुद्दे को तब तक लटकाए रखा जाए जब तक जनता आंदोलित न हो जाए।

असल में पिछले महीने 18 अगस्त को यूपीएससी ने 24 केंद्रीय मंत्रालयों में संयुक्त सचिव, निदेशक और उप सचिव के 45 पदों के लिए लेटरल एंट्री से आवेदन मांगे । इनमें जाइंट सेक्रेटरी लेवल के 10 पद भी शामिल थे। लेकिन इन नियुक्तियों को लेकर जैसे ही नोटिफिकेशन जारी हुआ वैसे ही विपक्षी दलों और कुछ सरकार के सहयोगियों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। तत्पश्चात महज दो दिन बाद यानी 20 अगस्त को सरकार ने फैसला वापस ले लिया।

इससे एक हफ्ते पहले चौतरफा आलोचनाओं के बाद मोदी सरकार ने ब्राडकास्टिंग सर्विसेज (रेगुलेशन) बिल का ड्राफ्ट वापस लिया जो पिछले साल 10 नवंबर को बिल का ड्राफ्ट सार्वजनिक किया गया था। पिछले महीने मंत्रालय ने नया मसौदा तैयार किया था। नए मसौदे को लेकर सवाल उठने लगे कि क्या सरकार इस बिल के जरिए अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाना चाह रही है। 2024 के मसौदे में मंत्रालय ने ओटीटी कान्टेंट और डिजिटल न्यूज से अपने अधिकार क्षेत्र को बढ़ाते हुए सोशल मीडिया अकाउंट्स और ऑनलाइन वीडियो बनाने वालों को भी इसमें शामिल किया था। इस मसौदे में ‘डिजिटल न्यूज क्रिएटर’ शब्द का इस्तेमाल किया गया और इनके लिए प्रस्तावित नियम-कानूनों ने यू-ट्यूबर्स के कान खड़े कर दिए। जिसके बाद सरकार की जमकर आलोचना हुई और आखिरकार 12 अगस्त को सरकार को ड्राफ्ट वापस लेना पड़ा तो वहीं जिस वक्फ बोर्ड कानून में संशोट्टान के लिए 8 अगस्त को जैसे ही मसौदा आया सरकार को घेर लिया गया। कहा गया कि यह ट्टार्म की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। नतीजा ये हुआ कि सरकार को बिल संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजना पड़ा। हालांकि इसे फैसला वापस लेना नहीं कहा जाना चाहिए क्योंकि सरकार ने बिल वापस नहीं लिया है, जेपीसी के पास भेजा है लेकिन मोदी सरकार पिछले 10 साल में कभी इतना भी पीछे नहीं हटी थी इसलिए इसे कमजोर सरकारी ही माना जाएगा।

इतना ही नहीं सरकार ने बजट में लान्ग टर्म कैपिटल गेन पर लगने वाले टैक्स में बदलाव किए जिसका भारी विरोट्टा के बाद बजट सत्र खत्म होने से पहले ही सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा। इसके अलावा अन्य फैसलों को लेकर भी सरकार कमजोर दिखाई दी है। ऐसे में मीडिया सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्या कारण हैं जो सरकार को बार-बार पीछे हटना पड़ रहा है? या सरकार की यह कोई रणनीति तो नहीं है?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब चार जून को चुनाव नतीजे आए तो कहा गया कि इस बार जनता ने सरकार को नहीं विपक्ष को बहुमत दिया है। एक दशक बाद देश को विपक्ष और लोकसभा को नेता प्रतिपक्ष मिला है। अब संसद में सिर्फ सरकार की नहीं विपक्ष की आवाज भी सुनाई देगी। सरकार को विपक्ष के सवालों को तरजीह देनी पड़ेगी और वॉकआउट नहीं विरोट्टा झेलना पड़ेगा। जो अब नजर आने लगा है। राजनीति में सब कुछ परसेप्शन का खेल है। सरकार के हर कदम पर विपक्ष हमलावर दिखता है। कांग्रेस ज्यादा मुखर नजर आती है। ऐसे में जब सरकार अपने फैसलों पर पीछे हटने लगी तो कहा जाने लगा कि सरकार विपक्ष के जाल में फंस रही है। विपक्ष इतना ताकतवर हो गया है कि सरकार की मनमानी नहीं चल पा रही है। इस बात में दो राय नहीं है कि विपक्ष हमलावर तो है और सरकार ज्यादा सतर्क भी लेकिन इसका मुख्य कारण यह है कि सरकार को विपक्ष के दबाव से ज्यादा सहयोगी दलों के दबाव में अपने पैर पीछे खींचने पड़ रहे हैं। उसकी सबसे बड़ी चुनौती खिचड़ी सरकार है।

सरकार पर सहयोगी पार्टियों का दबाव तब देखने को मिला जब लेटरल एंट्री स्कीम पर विपक्ष तो हमलावर था ही सरकार में शामिल पार्टियों ने भी मोर्चा खोल दिया। चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी तो कुछ नहीं बोली, लेकिन चिराग पासवान और नीतीश कुमार की पार्टी ने सार्वजनिक तौर पर विरोट्टा जताया। उन्होंने इसकी कड़ी आलोचना की और कहा कि यह आरक्षण के सिद्धांतों के खिलाफ है। चिराग ने कहा कि सरकारी पदों पर आरक्षण का प्रावट्टाान जरूरी है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। नीतीश कुमार की पार्टी ने भी इस मुद्दे पर आरक्षण को तरजीह देने की बात कही। इससे पहले वक्फ बोर्ड के मसले पर भी चिराग पासवान ने आपत्ति जताई थी। चिराग पासवान सिर्फ इन दोनों मुद्दों पर ही नहीं, जातिगत जनगणना के मुद्दे पर भी बयान देकर बीजेपी को असहज कर चुके हैं। पासवान ने जातिगत जनगणना को जरूरी बताया जो राहुल गांधी के स्टैंड से मेल खाता है।
दूसरी तरफ बीजेपी को 2014 और 2019 के विपरीत इस बार गठबंट्टान सरकार चलानी है। सरकार के हालिया फैसलों पर पलटी मारना उसकी कमजोरी का संकेत माना जा रहा है, क्योंकि पार्टी की लोकसभा की संख्या 303 से घटकर 240 हो गई है। हालांकि बीजेपी इन फैसलों को रोलबैक नहीं मान रही है। पार्टी का कहना है कि देश के लिए जब भी जरूरी होता है कदम वापस लिए जाते हैं।

सवाल है कि क्या जनादेश के मुताबिक चलना कमजोरी का संकेत माना जाना चाहिए? सहयोगियों की चिंताओं, विपक्ष की मांगों और जनमत के दबाव के प्रति उत्तरदायी होना लोकतंत्र में निहित ताकत को दर्शाता है। हालांकि फैसलों को वापस लेना ये रेखांकित करता है कि सरकार को सहयोगी दलों के साथ दूसरों से भी सलाह मशविरा करने की जरूरत है।

सरकार के इन फैसलों के अलावा यहां जिक्र यूनिफाइड पेंशन स्कीम का भी जरूरी है। 2022 में जब उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड समेत पांच राज्यों में चुनाव हुए तो ओपीएस का मुद्दा प्रमुखता से चर्चा में आया। इसके बाद से कांग्रेस इसे लगातार उठाती रही। लेकिन बीजेपी ने इस पर ट्टयान देना वाजिब नहीं समझा। हिमाचल प्रदेश विट्टाानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत मिली तो ओपीएस के बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन पिछले साल के अंत में बीजेपी ने राजस्थान, मट्टय प्रदेश और छत्तीसगढ़ जीत लिए तो इस मुद्दे की प्रमुखता कम होती दिखी। अब लोकसभा चुनाव के परिणामों ने बीजेपी को सतर्क कर दिया है तो कांग्रेस ओपीएस का मुद्दा छोड़ने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि सरकार ने ओपीएस और एनपीएस के बजाए गारंटीड पेंशन के तौर पर यूपीएस स्कीम का ऐलान कर बीच का रास्ता चुना है।

इसी तरह अगस्त की शुरुआत के पहले ही दिन जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि दलित कोटे में अलग कोटा राज्य बना सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट की मंशा थी दलितों में अति रखा पिछड़े दलितों को भी आरक्षण का लाभ मिल सके। शुरुआत आरएसएस और बीजेपी के नेताओं ने कोर्ट के इस फैसले का समर्थन किया। सहयोगी पार्टियों जेडीयू और टीडीपी ने भी सपोर्ट किया। कांग्रेस के दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी इस फैसले का समर्थन किया, विरोट्टा के नाम पर केवल बीएसपी नेता मायावती, भीम आर्मी के चंद्रशेखर, लोजपा के चिराग पासवान, प्रकाश आंबेडकर आदि ने ही इसका विरोट्टा किया। 9 अगस्त को पार्टी के एससी-एसटी सांसदों ने पीएम से मुलाकात की और उसी दिन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ये फैसला ले लिया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू नहीं किया जाएगा। इसी प्रकार 8 अगस्त को वक्फ बोर्ड संशोट्टान बिल संसद में पेश किया गया, सहयोगी पार्टियों के समर्थन के बावजूद सरकार ने विपक्ष के विरोट्टा के चलते बिल जेपीसी को भेज दिया। ये दोनों फैसले सरकार के ऐसे थे जिसे दबाव में लिया गया फैसला ही कहा जाएगा। सरकार चाहती तो बिल पास भी करवाती और लागू भी कर सकती थी। ऐसी परिस्थितियां नहीं बन रही थीं कि कहा जा सके कि चीजें सरकार के लिए नियंत्रण से बाहर हो रही थीं। जरा याद कीजिए सरकार का दूसरा कार्यकाल जब किसान राष्ट्रीय राजट्टाानी दिल्ली को घेरकर कई महीने बैठे रहे पर सरकार टस से मस नहीं हुई। शाहीन बाग का ट्टारना भी याद होगा पर सरकार ने झुकने का फैसला नहीं लिया। सीएए कानून जरूर कुछ दिनों के लिए टाल दिया गया पर कानून वापस नहीं लिया गया, मतलब साफ है कि सरकार अपने पहले दो कार्यकाल के मुकाबले कमजोर हुई है। जबकि लेटरल एंट्री पर सरकार सहयोगी दलों के नेता नीतीश कुमार और चिराग पासवान की उन आपत्तियों को सुलझा सकती थी, सबसे अट्टिाक विरोट्टा इस बात का था कि लेटरल एंट्री में आरक्षण का प्रावट्टाान नहीं था। सरकार को विपक्ष के दुष्प्रचार का अगर डर था तो लेटरल एंट्री में आरक्षण की व्यवस्था कर देती या सरकार इस मुद्दे पर जनता के बीच जाकर यह दावा करती कि आजादी के पिचहत्तर साल बाद भी दलित लोगों को आरक्षण देकर इतना नहीं उठाया जा सका कि वो लेटरल एंट्री में अपनी जगह बना सकें, पर कांग्रेस जिस तरह झूठ आट्टाारित हमले कर रही है शायद सरकार उससे डरी हुई है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में इसी तरह का झूठ फैलाकर बीजेपी को मात्र 33 सीटों पर समेट दिया। लगता है बीजेपी उस हार से अब तक उबर नहीं पाई है। कई राज्यों जैसे जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश आदि में अब पार्टी नेताओं का असंतोष बढ़ रहा है।

बीजेपी का मीडिया सेल अपनी बातें आम लोगों तक पहुंचाने में सफल नहीं हो पा रहा है। सरकार को लेटरल एंट्री पर रणनीति के साथ जनता के बीच जा विपक्ष से सवाल पूछना चाहिए था कि कांग्रेस सरकार में जितनी नियुक्तियां बाहर से की गई उनमें कितने दलित और पिछड़े थे? कांग्रेस के यूपीए सरकार की एडवाइजरी कमेटी में कितने दलित और पिछडे़ थे। यह सब दर्शाता है कि रणनीति पर सरकार न अपनी अच्छी बातों को जनता तक पहुंचा पा रही है और न ही विरोट्टिायों का मुंहतोड़ जवाब दे पा रही है। मतलब कहीं न कहीं जनता और सरकार के संवाद में कमी आई है। जिसे सुट्टाारे बिना इस तरह के यू टर्न से सरकार को छुटकारा नहीं मिलने वाला है। भविष्य में अभी और ऐसे यू टर्न के लिए सरकार को तैयार रहना चाहिए।

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