Editorial

आपातकाल की याद के बहाने

पच्चीस जून 1975 का दिन हिंदुस्तान के इतिहास में हमेशा काले अक्षरों में लिखा जाएगा। देश की सबसे पुरानी पार्टी भी इस दिन के चलते खुद के दामन में लगे दाग को लाख कोशिशों के बाद भी छुड़ा पाने में विफल रही है, रहेगी। ठीक वैसे ही जैसे 1984 के सिख दंगों के दाग इस पार्टी के गौरवशाली इतिहास को कलंकित करते रहेंगे। ठीक वैसे ही जैसे 2002 के गुजरात दंगों का प्रेत न तो नरेंद्र मोदी का पीछा छोड़ेगा न ही भाजपा के दामन में लगे लहू के छींटे कभी धुंधले पड़ेंगे। इंदिरा गांधी यानी हमारी तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस दिन यकायक ही बगैर अपने मंत्रिमंडल से सलाह किए देश में आंतरिक आपातकाल लगा डाला। उस समय के राष्ट्रपति डॉ फखरुद्दीन अली अहमद ने बेहद विवादित फैसला लेते हुए इंदिरा गांधी की सलाह पर मध्य रात्रि को देश में आपातकाल लगाने की घोषणा पर अपने हस्ताक्षर कर दिए। राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कमजोर हड्डी से राजनीति नहीं की जाती। अफसोस हमारे तब के राष्ट्रपति कमजोर हड्डी के निकले। बहरहाल आपातकाल इंदिरा गांधी ने सत्ता में कमजोर पड़ती अपनी पकड़ के असुरक्षा बोध के चलते देश पर थोपा था। आपातकाल लगाए जाने से काफी पहले ही इंदिरा गांधी सत्ता पर पूर्ण अधिकार की चाहत रखने लगी थी। 1967 में जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘गोलकनाथ बनाम सरकार’ मामले में अपना ऐतिहासिक निर्णय दिया कि संविधान की मूल भावना से जुड़े मुद्दों जैसे कि जनता के मौलिक अधिकारों आदि पर संसद संविधान में संशोधन नहीं कर सकती है। इंदिरा गांधी को यह निर्णय अप्रिय लगा। उन्होंने 1971 में इस निर्णय को संसद में संविधान में 24वां संशोधन कर खारिज करवा दिया। इसी प्रकार राजाओं और नवाबों को मिलने वाली सुविधाओं पर इंदिरा सरकार ने रोक लगाई तब सुप्रीम कोर्ट ने इसे गैरसंवैधानिक करार दिया। एक बार फिर संसद में 26वें संविधान संशोधन को पास कर इंदिरा सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय को ताक पर रख दिया था। तत्कालीन इंदिरा सरकार और न्यायपालिका के बीच एक प्रकार से अघोषित युद्ध इस दौर में चला। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान में किए गए 24वें संशोधन को ‘केशवानंद भारती बनाम राज्य’ मामले में खारिज कर डाला। इंदिरा गांधी इसे सह न सकी थीं। पहली बार न्यायपालिका में बड़ा राजनीतिक हस्तक्षेप तब देखने को मिला। उन्होंने तीन वरिष्ठ जजों को नजरअंदाज कर न्यायमूर्ति ए. एन रे को देश का मुख्य न्यायाधीश बना डाला। आपातकाल के दौरान तो मानो लोकतंत्र के सभी स्तंभ धराशायी हो गए।

न्यायपालिका, नौकरशाही, संसद और मीडिया, सभी इंदिरा गांधी के समक्ष नतमस्तक हो गए। जिन्होंने विरोध का स्वर बुलंद किया, उन्हें जेलों में ठूस दिया गया। इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी बेताज बादशाह की तर्ज पर देश पर हुकूमत करने लगे। आपातकाल के दौरान संजय गांधी एक खलनायक के तौर पर नजर आते हैं। उन्होंने जबरन नसबंदी कराने का निर्णय लिया। दिल्ली के तुर्कमान गेट और जामा मस्जिद इलाकों में झुग्गी-झोपड़ियों को निर्ममतापूर्वक हटाया गया, राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ पुलिस का दमनचक्र चला। यानी ऐसा बहुत कुछ हुआ जिसके चलते आपातकाल कांग्रेस के इतिहास का काला अध्याय बनकर उससे चिपक गया है। इन दिनों खासकर जब से केंद्र में मोदी सरकार सत्तारूढ़ हुई है, बहुत चर्चा है कि देश में एक बार फिर से आपातकाल जैसे हालात पैदा हो चुके हैं। जमकर मोदी-शाह द्वय की लानत-मलानत मुझ सरीखे पत्रकार, संपादक और विचारक कर रहे हैं। मेरी समझ यह कहती थी कि मोदी सत्ता में वापसी नहीं कर पाएंगे। कम से कम इतना तो पक्का विश्वास था कि भाजपा अपने दम पर सरकार नहीं बना पाएगी। हुआ लेकिन ठीक उलट। जनादेश मोदी को मिला, जबर्दस्त मिला। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि आपातकाल के बहाने यह समझा जाए, खुलेमन से, खुली दृष्टि से कि क्या वाकई यह अघोषित आपातकाल का समय है या फिर दक्षिणपंथी विचार का विरोध हम सरीखों की दृष्टि बाधित करने का कारण बन चुका है। पहले बात करते हैं न्यायपालिका की। स्वयं देश के सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने गत् वर्ष जनवरी में एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए ‘लोकतंत्र खतरे में है’ कह डाला। वर्तमान मुख्य न्यायाधीश कुछ ही समय पूर्व इस आशंका को दोहरा चुके हैं। जाहिर है न्यायपालिका इस समय जबर्दस्त दबाव का अनुभव कर रही है। लेकिन ऐसा पूर्व में भी होता आया है। इंदिरा गांधी ने इस परंपरा को जन्मा था। उन्होंने कांग्रेस समर्थक जजों को प्रोन्नत किया। अपनी मनपसंद न्यायपालिका बनाने का पूरा प्रयास किया। आज की सत्ता उन्हीं के पदचिन्हों पर चल रही है तो केवल मोदी-शाह को टारगेट पर लिया जाना ईमानदारी नहीं। जैसा बोया जाएगा, वैसा ही काटा जाएगा। जब देश की सबसे बड़ी पार्टी ने आपातकाल लगाया, दमन का सहारा लिया तो सत्ता का भरपूर स्वाद चखने वाली भाजपा से लोकतंत्र के स्तंभों की रक्षा करने की अपेक्षा क्यों? बहुत हल्ला है कि मीडिया का गला घोंटा जा रहा है। सच को बाहर नहीं आने दिया जा रहा है। इमरजेंसी में यही सब तो इंदिरा जी ने किया था। स्मरण रहे आडवाणी जी के शब्द कि ‘पत्रकारों को झुकने के लिए कहा गया, वे लेकिन रेंगेन लगे थे। आज हालात वही हैं, सच को बाहर नहीं आने दिया जा रहा है लेकिन ऐसा करने का पुराना हथियार अब बदल दिया गया है। यह कहना ज्यादती होगी कि वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठा सच को दबाने के लिए दमन का सहारा ले रहा है। सच यह है कि मीडिया संस्थानों को पूंजी के जरिए सरकार परस्त बनाया जा चुका है। पत्रकारिता मिशन नहीं शुद्ध व्यापार में बदल चुकी है। पहले वे शोषण के खिलाफ आमजन का हथियार थी, आज वह राजनीतिक दलों के लिए हथियार बन चुकी है। असल मुद्दों से जनमानस का ध्यान भटकाकर अपने स्वार्थ, अपने लक्ष्यपूर्ति के लिए मीडिया को औजार बना दिया गया है। यह बात अलग है कि कांग्रेस भाजपा से इस मामले में पिछड़ चुकी है। भाजपा ने मुख्यधारा के मीडिया को तो साधा ही, सोशल मीडिया पर भी वह अन्य राजनीतिक दलों की बनिस्पत कोसों आगे है। जब देश को पूंजीवाद की राह पर नरसिम्हा राव ने डाला तो उसके दुष्परिणाम साथ आने ही थे। आज का दौर पूंजी का दौर है। पूंजी ही सबसे ताकतवर है। तब यह कहना कि सच की आवाज को जबरन दबाया जा रहा है, कहना गलत है। सच को दबाने के लिए झूठ का बड़ा बाजार तैयार किया जा रहा है ताकि सच झूठ के कोलाहल में खो जाए। समझने की बड़ी आवश्यकता है कि सत्ता ने शोषण के हथियार बदल दिए हैं। ऐसे में प्रतिरोध के स्वर भी, प्रतिरोध के हथियार भी बदलने होंगे। पूंजी के जहर की काट आज के दौर में गांधी के सिद्धांतों पर चलकर नहीं की जा सकती। अब ‘साध्य और साधन’ के पवित्र होने का सिद्धांत चलने वाला नहीं। सामने वाली ताकत इतनी शक्तिशाली है, इतनी संवेदनहीन है कि उसे आप उसी के हथियार से मार सकते हैं। गांधी इस दृष्टि से काफी हद तक अप्रासांगिक हो चुके हैं। और गांधी अप्रासांगिक आम जनता के चलते हुए हैं। ‘राम अभी तक हैं नर में, नारी में अभी तक सीता हैं’ अब खोजे नहीं मिलता। झूठ, फरेब, लालच, भ्रष्ट और अनैतिक व्यवहार हमारे डीएनए में है। हम पूरी तरह पथभ्रष्ट हैं। यही कारण है कि असल मुद्दों से हमें भटकाया-भरमाया जाता है।

सरकारें चाहे किसी पार्टी की भी क्यों न हों, नैतिक मूल्यों का क्षरण हर दौर में होता आया है। यदि आपातकाल जैसी स्थिति को दोबारा हम पर थोपे जाने से रोकना हम चाहते हैं तो जरूरत असल मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित करने की है। असल मुद्दे हैं धर्म और जाति को आधार बना समाज को बांटने का षड्यंत्र। केवल भाजपा इसके लिए दोषी नहीं। कांग्रेस ऐसा आजादी के बाद से, खासकर इंदिरा गांधी के सत्तासीन होने के बाद से करती आई है। भाजपा उसी को विस्तार देने में जुटी है। बात गरीबी हटाने की, सांप्रदायिकता को जड़-मूल से नष्ट करने की, किसानों को समृद्ध करने की, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की होनी चाहिए, लेकिन हो उल्टा रहा है। राष्ट्रवाद के नाम पर, छद्म गौरवशाली अतीत की बात कर, विदेशी आक्रांताओं की बात कर आमजन का ध्यान असल मुद्दों से भटकाया जा रहा है। पहले जो कांग्रेस करती थी, आज भाजपा कर रही है। हां, इतना जरूर है कांग्रेस परदे के भीतर रह सब कुछ करती थी, भाजपा खुलकर खेल रही है। लोकतंत्र है, जनता ने भाजपा को जनादेश दिया है तो अघोषित आपातकाल का रोना व्यर्थ है। जरूरत है मोदी सरकार के कामकाज पर पैनी नजर रखने की। जरूरत उनकी असल परख करने की है।

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