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उत्तराखण्ड सरकार की कुंडली में ठीक नहीं चल रही है ग्रह-दशा

देहरादून। मोदी लहर के रथ पर सवार होकर प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार और प्रदेश भाजपा संगठन की राजनीतिक कुंडली में ग्रहदशा शायद ठीक नहीं चल रही है। जहां प्रदेश संगठन के कई नेता कोरोना से संक्रमित होकर अपना उपचार करवा रहे हैं, वहीं सरकार भी अपने ही लोगों के विरोध से बुरी तरह हिली हुई है। सूत्रों की मानें तो करीब तीन दर्जन विधायक अपनी ही सरकार के कामकाज को लेकर नाराज बताए जा रहे हैं, जबकि कुछ तो अपनी नाराजगी जताने के लिए भाजपा के दिल्ली दरबार में गुहार तक लगा चुके हैं। इससे भाजपा संगठन और सरकार दोनों ही राज्य में चल रहे राजनीतिक हालात को संभालने की जुगत में अपनी ऊर्जा खर्च करने में लगे हुए हैं।

हालांकि दिल्ली दरबार में गए हुए विधायकों के मामले में कहा गया है कि विधायकां की नाराजगी केवल अपने क्षेत्र में विकास के काम और अफसरों की कार्यशैली से ही है जिसके लिए पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विशन सिंह चुफाल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से मिलने गए थे और उन्होंने अपने क्षेत्र में नैनी-सैनी हवाई अड्डे से नियमित उड़ान शुरू करने का आग्रह किया था।

प्रदेश में विकास कार्यों के लिए विशन सिंह चुफाल द्वारा नैनी-सैनी हवाई अड्डे से नियमित उड़ान आरंभ करने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पास जाना किसी के गले नहीं उतर पा रहा है। ऐेसा इसलिए कि नड्डा तो नागरिक उड्यन मंत्री नहीं हैं। फिर विकास कार्य प्रदेश सरकार के अधीन होते हैं। अपने क्षेत्र में कामों के लिए अपनी ही सरकार के बजाय केंद्रीय नेतृत्व के पास जाना हास्यास्पद ही माना जा रहा है।

इसके अलावा चुफाल के साथ कई विधायक भी दिल्ली की दौड़ में शमिल थे। यह बात और है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाकात करने का सैभाग्य उन सभी विधायकां को नसीब नहीं हुआ। इससे यह भी साफ हो जाता है कि इस पूरे मामले के पर्दे के पीछे कुछ ऐसी खिचड़ी पक रही है जो प्रदेश भाजपा संगठन और सरकार के लिए मुसीबत का करण बन रही है और दोनों अपने बचाव में इसके पीछे दूसरे तर्क दे रहे हैं।

राजनीतिक तौर पर विगत साढ़े तीन साल के कालखण्ड में उत्तराखण्ड की त्रिवेंद्र रावत सरकार सबसे ज्यादा चर्चाओं में रही है। सत्ता पाने के तीन माह के बाद से लेकर आज तक प्रदेश में मुख्यमंत्री बदले जाने की चर्चाएं होती रही हैं। इसके अलावा इन साढ़े तीन साल के भीतर जितने भी चुनाव, उपचुनाव या लोकसभा के चुनाव हुए हैं हर चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के राजनीतिक भविष्य पर तमाम तरह के कयास लगाए जाते रहे हैं। इनमें सबसे अधिक कयास मुख्यमंत्री बदलने के ही लगाए जाते रहे हैं।

हालांकि यह भी एक बड़ा सत्य है कि इन साढ़े तीन सालां में कोई भी कयास ओैर चर्चाएं खरी नहीं उतरी हैं और त्रिवेंद्र रावत भाजपा के पहले ऐसे मुख्यमंत्री साबित हुए हैं जो मुख्यमंत्री के पद पर साढे़ तीन साल का कार्यकाल पूरा कर पाए हैं। अभी तक भाजपा सरकारां में जितने भी मुख्यमंत्री रहे हैं वे अपना कार्यकाल कभी भी पूरा नहीं कर पाए हैं और उनको दो-ढाई वर्ष में ही मुख्यमंत्री पद से चलता कर दिया गया। त्रिवेंद्र सिंह रावत भाजपा के सबसे लंबे कार्यकाल के मुख्यमंत्री होने का रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके हैं। अगर सब कुछ ठीक रहा तो स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी के बाद त्रिवेंद्र रावत ही दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री हांगे जो अपना पूरा कार्यकाल मुख्यमंत्री रहते हुए कर पाएंगे।

वर्तमान में जिस तरह के हालात भाजपा और सरकार के बीच दिखाई दे रहे हैं उससे यह तो नहीं लगता कि भाजपा और सरकार के बीच सब कुछ ठीक चल रहा है। दो-चार दिनों के अंतराल में जिस तरह से भाजपा विधायकों खासकर सरकार के मंत्रियों के बयान सामने आए हैं उससे भी सरकार पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सरकार में कृषि मंत्री सुबोध उनियाल ने सार्वजनिक तौर पर माना है कि उत्तराखण्ड में स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी जैसे विकास करने वाले मुख्यमंत्री नहीं हुए हैं। सिर्फ तिवारी ही ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं जिनके कार्यकाल में प्रदेश का बहुत विकास हुआ है, जबकि इससे पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत भी पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को प्रदेश का सबसे श्रेष्ठ मुख्यमंत्री बताकर प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर चुके हैं।

सरकार के दो कैबिनेट मंत्रियों द्वारा पूर्व मुख्यमंत्रियों को सबसे श्रेष्ठ मुख्यमंत्री बताने के सार्वजनिक बयान के बाद तमाम राजनीतिक चर्चाएं होना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन इन बयानां से एक अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि मौजूदा मुख्यमंत्री तमाम तरह के दावे करते रहे हैं लेकिन उनकी ही सरकार के मंत्री उनको श्रेष्ठ और सबसे ज्यादा विकास करने वाला मुख्यमंत्री नहीं मानते। राजनीतिक तौर पर यह मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के लिए गंभीर चिंतन का विषय हो सकता है क्योंकि कुछ ही माह पूर्व एक गैर राजनीतिक संस्था द्वारा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को राज्य का सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री होने का तमगा प्रदान किया जा चुका है।

भाजपा विधायकों के विरोध के स्वरों की बात करें तो लगातार अपनी ही सरकार से मतभेद की खबरें सामने आती रही हैं। विधायक पूरण फर्तयाल सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को लेकर ही विरोध के स्वर ऊंचा किए हुए हैं। अपने क्षेत्र में ब्लैक लिस्टेड निर्माण कंपनी और उसके ठेकेदार को सरकार द्वारा निर्माण कार्य दिए जाने को लेकर फर्तयाल खासे नाराज हैं। इस नाराजगी को बकायदा अभिलेखों के साथ फर्तयाल सार्वजनिक तौर पर सामने रख चुके हैं। हैरत की बात यह है कि अभी तक भाजपा संगठन और सरकार द्वारा विधायक पूरण फर्तयाल के आरोपों पर सफाई तक नहीं दी है।

 

इसी तरह से अन्य विधायक भी अपने-अपने क्षेत्र में विकास कार्यों में लापरवाही और अधिकारियों के निरकुंश रवेये के चलते नाराजगी जताते रहे हैं। किच्छा के विधायक राजेश शुक्ला तो जिलाधिकारी के रवैये से इतना नाराज थे कि कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक के साथ जिला विकास कार्यों के लिए चल रही मीटिंग को ही बीच में छोड़कर बाहर निकल गए।

जसपुर के विधायक आदेश चौहान की नाराजगी का वीडियो तो सोशल मीडिया में जमकर वायरल हुआ जिसमें वे मुख्यमंत्री को पंगु मुख्यमंत्री तक कहते सुनाई दिए। हरिद्वार के कई और विधायक भी सरकार से अपनी नाराजगी अनेक बार जाहिर कर चुके हैं जिसमें प्रशासन के खिलाफ धरना तक दिया गया।

अब इस नाराजगी के पीछे भले ही भाजपा तमाम तरह के तर्क दे रही हो लेकिन इतना तो साफ हो गया है कि सरकार के खिलाफ अपने ही मोर्चा खोले हुए है जिससे भाजपा संगठन के सामने 2022 की विधानसभा चुनाव की चुनौती बन चुकी है।

आम आदमी पार्टी के राज्य की सभी 70 विधानसभा सीटां पर चुनाव लड़े जाने और भाजपा-कांग्रेस के अलावा अन्य दलों के मजबूत नेताओं पर भी नजरें गड़ी हुई हैं। आम आदमी पार्टी से भाजपा के सामने भी चुनौतियों का पहाड़ खड़ा हो चुका है।

राजनीतिक जानकारां की मानें तो भाजपा के लिए अपने विधायकों की नाराजगी बदलते राजनीतिक समीकरणों में बड़ी मुसीबत लेकर आई है। अनुशासन के नाम पर अभी तक पार्टी ने जिस तरह से नाराजगी के स्वरां को दबाकर रखा था वह अब भाजपा के लिए गले की फांस बन सकती है। अगर अपने ही विधायकों पर सरकार के खिलाफ बयानबाजी करने पर पार्टी अनुशासन का डंडा चलाती है तो आम आदमी पार्टी के नए राजनीतिक समीकरणों से भाजपा को खास नुकसान उठाना पड़ सकता है।

सरकार और खास तौर पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के लिए भी बड़ी चुनौती पैदा हो चुकी है। उनके ही कैबिनेट मंत्री राज्य में सबसे ज्यादा विकास करने वाला मुख्यमंत्री उनको न बताकर स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी को बता रहे हैं तो यह मुख्यमंत्री के लिए चिंतन का सवाल हो सकता है, जबकि स्वयं मुख्यमंत्री का दावा है कि उनकी सरकार के साढ़े तीन साल में जितने विकास कार्य किए गए हैं उतने अभी तक किसी मुख्यमंत्री के कार्यकाल में नहीं किए गए। यह बात और है कि मुख्यमंत्री के दावां पर सवाल उनके ही विधायकों द्वारा उठाए जा रहे हैं। विधायक के क्षेत्रों में विकास कार्य नहीं हो पा रहे हैं, भले ही वे इसके लिए राज्य की अफसरशाही को सामने रखकर दोष देने की बात कह रहे हों लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही बयान कर रही है।

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