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पप्पू नहीं महानायक बन उभरे राहुल

पिछले दस वर्षों से देश की सत्ता से बाहर रही सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी को गत सप्ताह जारी हुए अठारहवीं लोकसभा चुनाव के नतीजों ने संजीवनी देने का काम किया है। यह कामयाबी ऐसे समय में हाथ लगी है जब ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा लेकर चलने वाली भाजपा अकेले अपने बलबूते लगातार तीसरी बार जीत का दंभ भर रही थी। लेकिन उसके इस सपने को विपक्षी इंडिया गठबंट्टान ने चकनाचूर कर दिया है। इसका श्रेय पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी की यह उपलब्धि वैसी ही है जैसी वर्ष 1996-2004 के बीच गहरे संकटों से जूझती कांग्रेस को सोनिया गांधी के करिश्माई नेतृत्व ने उबारा था। इस बार कांग्रेस गठबंधन चुनाव नतीजों में भले बहुमत से दूर रह गया है मगर अपनी बड़ी नैतिक विजय के साथ राहुल गांधी ने देश में वैकल्पिक राजनीतिक नेतृत्व के चेहरे के रूप में जनता का भरोसा हासिल कर लिया है

Rahul Ghandhi and Akhilesh Yadav

कांग्रेस जब भी चुनौतियों के गहरे चक्रव्यूह में होती है तो गांधी से जुड़ी उसकी मजबूत विरासत ही पार्टी को संकटों के दौर से बाहर निकालती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उसकी राष्ट्रीय राजनीति में दमदार वापसी से यह बात फिर साबित हो गई है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस की इस दमदार वापसी के असली महानायक पार्टी के राहुल गांधी हैं जिन्होंने तमाम हमलों-आक्षेपों को झेलते हुए हाथ में संविधान लेकर भारत की आत्मा को बचाने की अपनी लड़ाई में बाजी मार ली है। राहुल ने कन्याकुमारी से कश्मीर और मणिपुर से मुंबई की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और ‘न्याय यात्रा’ के दौरान अर्जित लोगों के विश्वास के सहारे कांग्रेस ही नहीं देश की राजनीति को नई दिशा की ओर आगे बढ़ा दिया है। जब लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई तब 2024 के चुनाव को लगभग विपक्ष विहीन करार दिया गया और सत्ताधारी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कांग्रेस का राजनीतिक अस्तित्व मिट जाने तक के दावे किए गए। इसके बावजूद राहुल गांधी ने अपने हौसले की उड़ान को इन प्रहारों के दबाव में नहीं आने दिया और नरेंद्र मोदी पर सीधे
राजनीतिक हमले कर विपक्षी गठबंधन में शामिल दलों में यह भरोसा पैदा किया कि भाजपा को कड़ी टक्कर दी जा सकती है। राहुल गांधी के इस भरोसे का आधार वास्तव में कन्याकुमारी से कश्मीर तक ऐतिहासिक पदयात्रा ने तैयार किया।

इस यात्रा ने राहुल की गंभीर राजनीतिक छवि के नए अक्स से जनता को रूबरू कराया तो कांग्रेस नेता ने भी महंगाई, बेरोजगारी, खेती-किसानी की चुनौतियों से लेकर दलितों-आदिवासियों और विशेषकर युवाओं के मुद्दों को गहराई से समझा। साथ ही लोगों के बीच यह संदेश पहुंचाने में सफल रहे कि कांग्रेस ही इन वर्गों की समस्याओं के समाधान का विकल्प हो सकती है। पहली यात्रा के बेहतर अनुभवों से सीखते हुए आम चुनाव से पहले मणिपुर से मुंबई की 6500 किमी लंबी ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ में राहुल ने पीएम मोदी के खिलाफ अपने आक्रामक तेवरों को और ट्टाार देते हुए उन्हें कुछ चुनिंदा उद्योग घरानों के हितैषी होने का विमर्श भी एक व्यापक जनसमूह तक ले जाने में सफल रहे। ऐसे में कहा जा सकता है कि चाहे सत्ता न मिली हो मगर कांग्रेस को इस चुनाव में राहुल गांधी ने जहां ला खड़ा किया है उसकी उम्मीद राजनीतिक पंडितों को भी नहीं थी राहुल ने अपनी दोनों यात्राओं के जरिए आम लोगों से सीधे रूबरू होने के बाद यह भांप लिया था कि जनता के मुद्दे ही पार्टी को संकट से बाहर निकाल सकते हैं। इसीलिए कांग्रेस ने चुनावी घोषणा पत्र को न्याय पत्र का नाम देते हुए उसमें ऐसे ही वादे किए जो जनता के मन-मिजाज को छूने वाले रहे।

इसी का परिणाम रहा कि 10 साल की मोदी सरकार की सत्ता के बावजूद कांग्रेस का घोषणा पत्र लोकसभा चुनाव के विमर्श की धुरी बना रहा। पीएम मोदी से लेकर भाजपा का संपूर्ण नेतृत्व पूरे चुनाव के दौरान कांग्रेस के घोषणा पत्र पर ही हमला करता दिखा। इस दौरान 400 सीटों का आंकड़ा पार कर विपक्ष को मटियामेट करने के भाजपा नेतृत्व के प्रहारों का जवाब देने के लिए राहुल गांधी ने अपने हाथ में संविधान ले लिया। अपनी हर चुनावी सभा में संविधान की प्रति दिखाते हुए राहुल देश के एक व्यापक जनसमूह के बीच संविधान ही नहीं आरक्षण और लोकतंत्र पर खतरा मंडराने का संदेश पहुंचाने में कामयाब रहे।

जानकार कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं कि 2024 के चुनाव के राजनीतिक विमर्श की दशा-दिशा का पूरा नियंत्रण राहुल गांधी ने अपने हाथों में मजबूती से थामे रखा और भाजपा ही नहीं पीएम मोदी को इन मुद्दों पर प्रतिक्रियावादी विमर्श से आगे नहीं बढ़ने दिया। लोकतंत्र, संविधान और आरक्षण को खतरा होने के अपने दावों का संदेश पहुंचाने के लिए राहुल ने ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स जैसी जांच एजेंसियों की विपक्षी नेताओं के खिलाफ की जा रही कार्रवाईयों से लेकर राजनीतिक पार्टियों में तोड़फोड़ की भाजपा की रणनीति से जोड़ दिया।

चुनाव के दौरान पीएम मोदी से लेकर भाजपा नेताओं तक ने राहुल पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करने से लेकर निजी हमले किए मगर कांग्रेस नेता ने इस पर किसी तरह का विक्टिम कार्ड खेलने से परहेज करते हुए चुनाव को जनता बनाम मोदी की लड़ाई में तब्दील कर दिया। चुनाव परिणामों में कांग्रेस आज जहां खड़ी है वहां से अब उसके लिए भविष्य में देश की सत्ता वैकल्पिक धुरी के सारे रास्ते खुल गए हैं और इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि राहुल गांधी ही कांग्रेस के इस राजनीतिक पुनर्जीवन के असली महानायक हैं।

विरासत की सियासत

राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी से होते हुए जो पार्टी सोनिया गांधी के नेतृत्व में सहज हो चुकी थी और 10 बरस सत्तासुख भोग चुकी थी, उसके लिए राहुल एक असहज वारिस बनते जा रहे थे। राहुल के तरीकों, क्षमता पर सवाल उठाए गए और वे
राजनीति के प्रति गंभीर नहीं हैं जैसी बातें प्रचारित की गई। रही-सही कसर अन्ना आंदोलन और कांग्रेस की राजनीतिक विरोधी रहे दलों ने पूरी की।
दूसरी तरफ राहुल अपने तरीके की राजनीति के लिए पार्टी के अंदर और बाहर जूझते नजर आए। 2014 में पार्टी हारी तो राहुल नई कांग्रेस खड़ी करने की कोशिशों में जुटे लेकिन मोदी के गुजरात मॉडल, ट्टाार्मिक ट्टा्रुवीकरण और कांग्रेस पार्टी की आंतरिक कमजोरियों चलते राहुल और भी घिरते गए। कई नेता पार्टी से छिटककर चले गए तो कइयों ने सोनिया तो कभी प्रियंका गांट्टाी को ही जमात की संभावना बताकर राहुल विरोध जारी रखा।

इस दौरान एक समय ऐसा आ पहुंचा जब राहुल विपक्ष के लिए पप्पू और पार्टी के लिए दुविधा बन गए। 2013 में पार्टी के उपाट्टयक्ष और फिर 2017 में कांग्रेस अध्यक्ष पद पर राहुल पहुंचे लेकिन 2019 की हार ने जैसे विद्रोह को शब्द दे दिए। राहुल इस्तीफा देकर कोपभवन में चले गए। हाथ से अमेठी की सीट भी गई और कांग्रेस की फूट खुलकर सामने आ गई। बरसों कांग्रेस में रह सत्ता सुख भोगने वाले कपिल सिब्बल, आनंद शर्मा, मनीष तिवारी, संदीप दीक्षित, गुलाम नबी आजाद, हेमंत बिस्वा शर्मा, आरपीएन सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, वीरेंद्र सिंह, कैप्टन अमरिंदर, अश्विनी कुमार, एसएम कृष्णा, अशोक चव्हाण जैसे दिग्गज नेता पार्टी से या तो मुक्त हो गए या बागी। चुनावों में भी राहुल के प्रयोग जमीन पर जीत में तब्दील नहीं हुए और राहुल सतत कमजोर होते गए। ऐसे में राहुल की राजनीतिक यात्रा में ‘भारत जोड़ो यात्रा’ एक अहम पड़ाव बनकर आई।
भारत जोड़ो यात्रा और सामाजिक न्यायमट्टय राहुल का नया अवतार चमत्कार करने वाला है। उन्होंने कांग्रेस की राजनीति को अपनी यात्राओं के जरिए जीवन ऊर्जा देने का प्रयास किया और अपने परनाना नेहरू की तर्ज पर ‘भारत की खोज’ पर निकल गए। देश के बारे में उनकी धारणा बदली और उनके बारे में देश की। पहली बार लोगों को लगा कि सफेद टी-शर्ट पहने ये युवा चेहरा कुछ तो कर रहा है। इस बिखरी और बढ़ी हुई दाढ़ी के पीछे लोगों को एक ईमानदारी नजर आई और राहुल के प्रति निगेटिव नैरेटिव को अब ढलान मिलने लगा।

दूसरा बड़ा मंत्र बना सामाजिक न्याय। महिलाओं, पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, गरीबों के हक और हित के मुद्दों को राहुल ने अपनी भाषा बनाया। राहुल उद्योगिक घरानों पर हमला किया कि कृपा नहीं, अधिकार देने वाले की बात करते हैं। नीतिगत भ्रष्टाचार के प्रश्न पूछते हैं। जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनके लिए घोषणापत्र बनाते हैं।

देश की एक बड़ी आबादी इस मुद्दे से ताल्लुक रखती है। इसी रिलेटिविटी से वो सहजता आने लगती है जिससे ये लोग धीरे-धीरे राहुल से भी रिलेट करने लग गए हैं। यह अकारण ही नहीं है कि पिछले कुछ समय में राहुल गांधी और कांग्रेस की तरफ मुस्लिम वोटों की वापसी हो रही है। दलितों के बड़े नायक जब एक-एक कर समर्पण करते दिख रहे हैं, देश की ये बड़ी आबादी राहुल में अपने लिए संभावना देखने लगी है। जातियों से निकलकर आगे बढ़ने के दावों वाले समय में जातियां जिस सामाजिक न्याय को अपने दिल से लगाकर रखती हैं, उसके लिए राहुल ने एक मशाल उठाई जिसके कारण आम चुनाव नतीजों के बाद राहुल एक नए अवतार में सबके सामने हैं।

कुछ राजनीतिक पंडित कहते हैं कि पार्टी के अंदर का विरोध या तो आत्मसमर्पण कर चुका है और या फिर चुनाव हारकर अब अपने आखिरी मौके परास्त हो चुका है। मां-बाप के समय के अनिवार्य चेहरे अब यहां से नेपथ्य में चले जाएंगे। विरासत के अधिकतर परिवार नतमस्तक हैं। अब राहुल की विचारधारा ही कांग्रेस की विचारधारा और राहुल की सोच ही कांग्रेस का नैरेटिव है। सब कुछ राहुल के इर्द-गिर्द और जद में आ चुका है। ऐसी स्थिति में यह कहा जा सकता है कि आज जो कांग्रेस है, वो राहुल की कांग्रेस है। राहुल के लोग ही अब कांग्रेस का संगठन संभाल रहे हैं। पुराने मैनेजर अब बैठकों तक सीमित हैं। ट्टाीरे-ट्टाीरे वहां भी भीड़ कम होगी। नए चेहरे पार्टी में उभरे हैं। 15 साल में ये पहला चुनाव है जब राहुल और पप्पू शब्द एक साथ इस्तेमाल नहीं हुए। विरोधियों को समझ आ चुका है कि राहुल अब पप्पू रहे नहीं और उनको ऐसा कहकर सिवाय नुकसान के कुछ अर्जित नहीं होना है। सोशल मीडिया पर राहुल को सुनने वालों की तादाद बढ़ी है।

टीवी पर कांग्रेस के विज्ञापन इस बार भाजपा के विज्ञापनों पर भारी पड़े। कांग्रेस पार्टी को बरसों जानने वाले जानकार कहते हैं कि राहुल गांधी की 2022-23 की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की काफी चर्चा हुई। दूसरे चरण में जब जनवरी में राहुल गांधी ने मणिपुर से ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ शुरू की, तब इसकी टाइमिंग पर कई सवाल उठे थे। कांग्रेस हमेशा से ही समाज के गरीब तबकों की पार्टी रही है, मगर उसकी नीतियां और उसका नेतृत्व दोनों उससे अलग हो रहा था। राहुल ने जो किया उससे जुड़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई। ये प्रक्रिया अभी शुरू ही हुई है और उसको पूरा होने में अभी वक्त लगेगा। जब न्याय यात्रा शुरू हुई तो ऐसे बहुत से कांग्रेस नेता थे जिन्हें लगता था कि ये जमीन पर काम करने और सहयोगियों से बातचीत करने का वक्त है न कि यात्रा का। लेकिन राहुल गांधी ही थे जिन्हें इस पर दृढ़ विश्वास था। यात्रा के दौरान इंडिया गठबंधन बंटा हुआ था लेकिन जब न्याय यात्रा शुरू हुई तब विपक्ष की एजेंडा सेटिंग शुरू हुई और इस यात्रा के दौरान लोगों से मिले विचारों से न्याय पत्र या कांग्रेस के घोषणा पत्र का निर्माण हुआ। इस यात्रा में राहुल गांधी की रणनीति थी कि वो आम लोगों से उनकी सोच सुनें। आम लोगों की बातें न्याय घोषणा पत्र तक पहुंची। यात्रा का दूसरा हिस्सा था मोदी सरकार के झूठ का पर्दाफाश करना। कांग्रेस ने पांच न्याय की बात करते हुए चुनाव लड़ा। इसमें युवाओं, किसानों, महिलाओं, श्रमिकों आदि को न्याय देने की बात की गई थी। यात्रा के दौरान राहुल गांट्टाी ने महंगाई, किसानों की समस्या, बेरोजगारी का लगातार जिक्र कर मोदी विरोध का माहौल तैयार किया।

हालांकि ये अनुमान लगाना कठिन है कि आखिर इन यात्राओं ने हवा बदली या जैसा राजनीतिक विचारक और राहुल गांधी की यात्रा में शामिल रहे लोगों का कहना था कि यह जनता का चुनाव है और ये परिणाम तंत्र के ऊपर लोक की जीत मानी जानी चाहिए। इस चुनाव में राहुल गांधी ने लगातार जाति जनगणना की बात की। उन्होंने आगे बढ़ कर कहा कि जितनी आबादी उतनी हिस्सेदारी होनी चाहिए। इन नारों ने जरूर कई तबकों में प्रभाव डालने का काम किया। संविधान खतरे में है कहते हुए राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर तीखे हमले किए। इसका साफ संदेश इस बात को लेकर लोगों तक ये पहुंचा कि बीजेपी अगर पूर्ण बहुमत मे आती है तो संविट्टाान में संशोधन लाकर आरक्षण खत्म कर देगी।

गौरतलब है कि करीब दो साल पहले तक राहुल गांधी के राजनीतिक विरोधियों ने उनका मजाक उड़ाया था। भाजपा के नेताओं ने उन पर कटाक्ष करते हुए दावा किया था कि राहुल गांधी का देश को एकजुट करना विडंबना है क्योंकि वे उस गुट का हिस्सा हैं, जिसे वे टुकड़े-टुकड़े गैंग कहते हैं।
राहुल गांधी अपनी खास सफेद टी-शर्ट पहनकर सितंबर 2022 से जनवरी 2023 तक कई राज्यों की यात्रा पर निकले। पूरी यात्रा के दौरान उन्होंने भाजपा और उसकी हिंदुत्व की राजनीति पर हमला बोला। उन्होंने बीजेपी पर भारत को बांटने और नफरत फैलाने का आरोप लगाया। जब वे हर रोज लगभग 24 किलोमीटर पैदल चलकर ऑटो चालकों, किसानों, छात्रों और दिहाड़ी मजदूरों से मिलते थे तो उन पर राजनीतिक हमले और विवाद तेजी से बढ़ते थे। इसके बाद लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले राहुल गांधी ने भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू की। ये यात्रा पूर्वी भारत से पश्चिमी भारत में की गई। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि लोकसभा में भाजपा का 272 सीटों का बहुमत वाला जादुई आंकड़ा पार न कर पाने की अन्य कारणों के अलावा कहीं न कहीं राहुल गांधी की देश भर में की गई यात्रा भी है।

इन यात्राओं के परिणाम स्वरूप राहुल गांधी की छवि में बड़ा बदलाव आया। अब वे व्यावहारिक और जमीन से जुड़े हुए दिखाई दिए, क्योंकि यात्रा के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों से हाथ मिलाया, अपने साथी यात्रियों को देखकर मुस्कुराए और गले मिले। कांग्रेस ने उन्हें एक जननायक के रूप में पेश किया, जो संविधान और उसमें निहित मूल्यों को बचाने के लिए गर्मी, बर्फ और तूफानों का सामना करते पेश किए गए। वहीं दिनभर की पैदल यात्रा के बाद कर्नाटक में भीड़ को संबोधित करते हुए देर शाम बारिश में खड़े राहुल गांधी की तस्वीरों ने भाजपा द्वारा लगातार बनाई गई ‘शहजादा’ या ‘युवराज’ की छवि को पूरी तरह बदल दिया।

राहुल गांधी ने सुनिश्चित किया कि वे अपने भाषणों की शैली में निरंतरता बनाए रखें। उन्होंने देश को तानाशाही शासन से बचाने की बात करते हुए अपने आक्रामक आह्वान को बार-बार दोहराया। उनका नारा था, नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोलने आया हूं। इस संदेश को निश्चित रूप से कुछ लोगों ने अपनाया। ऐसे में धीरे-धीरे, अन्य विपक्षी नेताओं पर लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने का दबाव बढ़ने लगा।

जाति जनगणना, गरीबों के हित में काम
‘संविधान बचाओ’ के नारे के अलावा, राहुल गांधी ने ‘जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा भी लगाया, जिसमें पिछड़े वर्गों को उनका हक दिलाने के लिए जाति जनगणना की मांग की गई। कांग्रेस के लिए यह एक बड़ी छलांग थी, जो परंपरागत रूप से इस रुख का विरोध करती रही है। पार्टी के कई लोगों ने कहा कि इससे पार्टी को सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ेगा क्योंकि वह मुश्किल हालात में फंसने की
कोशिश कर रही थी। हालांकि राहुल गांधी ने इस आह्वान को और आगे बढ़ाया और इसे पार्टी के घोषणा पत्र में शामिल किया। इससे वह सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाले नेता की तरह दिखने लगे।

उत्तर प्रदेश में लौटता जनाधार

यूपी के जनादेश में राहुल की बड़ी भूमिका है। दलितों को समाजवादी पार्टी के बटन तक लाना आसान नहीं था। पीडीए का फार्मूला अखिलेश के लिए रामबाण था लेकिन उसके लिए पुल का काम राहुल ने ही किया। संविधान और आरक्षण का मुद्दा दलितों के बीच बन तो गया था पर असल चुनौती थी दलितों का वोट सपा में शिफ्ट करवाने की। इस सहजता को राहुल के नाम पर ही अर्जित किया जा सका।

इसी प्रकार राज्य का मुस्लिम मतदाता पिछले 10 साल में बंटा हुआ नजर आ रहा था। सपा और बसपा के बीच झूलता ये वोट बैंक इस बार कांग्रेस के प्रति लामबंद हुआ है। अखिलेश ने 2024 की शुरुआत में ही इसे भांपकर कांग्रेस के साथ फेल हो चुकी साझेदारी को दोबारा मौका दिया। सपा को उसका पुराना ‘एमवाई’ वोट बैंक इसलिए अर्जित हुआ क्योंकि वहां कांग्रेस साथ खड़ी थी। आज कांग्रेस मजबूत है। आने वाले दिनों में कांग्रेस और मुखर होकर देश के सामने एक मजबूत विपक्ष की भूमिका में नजर आएगी। राहुल इसके नायक होंगे। ऐसा नहीं है कि राहुल के सामने चुनौतियां नहीं हैं या उनमें अब कोई कमी नहीं, लेकिन लगता है कि राहुल की मोहब्बत की दुकान अब चल पड़ी है।

अडानी-अंबानी मुद्दे पर भी हावी रहे राहुल

उद्योगपति गौतम अडानी और मुकेश अंबानी को चुनावी चर्चा में घसीटा गया तो राहुल ने रील्स के जरिए तुरंत जवाब दिया और सवाल किया, ‘क्यों मोदी जी, डर गए?’ उन्होंने तर्क दिया कि मोदी को कैसे पता था कि अडानी ने टैम्पो में कालाधन भेजा है, उन्होंने पूछा कि पीएम सीबीआई और ईडी से इसकी जांच क्यों नहीं करवा सकते। राहुल गांधी ने अपनी गरीब समर्थक छवि को आगे बढ़ाया और अनुसूचित जाति के मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को यह विश्वास दिलाया जो कांग्रेस से दूर हो गए थे कि वे निडरता से उनके मुद्दों की पैरवी कर रहे हैं।

भविष्य की चुनौतियां

चुनाव से पहले विपक्ष के करीब 150 सांसदों का निलंबन, अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन का भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल भेजा जाना, राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता से अयोग्यता, कांग्रेस के घोषणापत्र और राहुल गांधी पर प्रधानमंत्री मोदी सहित भाजपा नेताओं के लगातार हमले, राहुल को वजह बताते हुए पार्टी नेताओं के इस्तीफे, राज्यों में पार्टी की चुनावी हार चलते विपक्ष और राहुल गांधी के समक्ष चुनौतियों की कमी नहीं रही। यहां तक कि कांग्रेस के अस्तित्व पर भी सवाल उठे।

इंडिया गठबंधन की शुरुआती बैठकों और सीट बंटवारे में देरी, महीनों संयुक्त रैलियों और घोषणा पत्र का न हो पाना विपक्ष के सबसे बड़े संगठन होने के कारण कांग्रेस आलोचकों के निशाने पर रही। बार-बार कहा गया कि विपक्ष के पास न चेहरा है न मुद्दे। साथ ही भाजपा राहुल गांधी को एक ऐसे नेता के तौर पर पेश करती रही है जो ऊंचे पदों पर अपनी काबिलियत के बल पर नहीं, बल्कि गांधी सरनेम की वजह से पहुंचे थे।

साल 2014 और 2019 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की हार का ठीकरा भी राहुल के सिर फोड़ा गया। हालांकि कई कांग्रेस समर्थक इससे सहमत नहीं थे। लोकसभा चुनाव के अलावा कई विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार ने राहुल गांधी के नेतृत्व पर लगातार सवाल खड़े किए। हालांकि बीच में ऐसे भी दौर आते रहे जब पार्टी ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन भी किया लेकिन ज्यादातर चुनावों में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा लगातार आगे रही। यही नहीं राहुल गांधी के लिए भाजपा नेताओं ने ‘पप्पू’, ‘शहजादा’, ‘ट्यूबलाइट’, ‘मूर्खों का सरदार’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। लेकिन अब माहौल बदला हुआ लग रहा है। कांग्रेस के ताजा आंकड़ों को उसका सबूत भी माना जा रहा है।

राजनीतिक जानकार कहते हैं कि कांग्रेस के सामने चुनौती थी कि देश का एक तबका जो कांग्रेस को छोड़कर दूसरी पार्टियों को वोट कर रहा है, उसे वापस कैसे पाया जाए। साल 1991 में कांग्रेस ने जो आर्थिक सुधार किए थे, उससे उसे वोट नहीं मिलते थे। 1996 में नरसिम्हा राव हार गए। साल 2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह सुट्टाारों का चेहरा थे। वो गरीब आदमी का चेहरा नहीं थे। राहुल गांधी इस चीज को भांप गए और उन्होंने इस पर मेहनत की। अब कांग्रेस फिर से अपने पुराने अंदाज में आने लगी है। मध्यम वर्ग ने उसे नजरअंदाज कर दिया था। अब कांग्रेस गरीबों, वंचित समाज को जिन्हें आर्थिक सुधार का फायदा नहीं मिला उसे कुछ हद तक जोड़ पाने में सफल दिख रही है।

लेकिन आने वाले दिनों मे हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और सभी की निगाहें होंगी कि लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन और खासकर कांग्रेस का प्रदर्शन कैसा रहता है। इसके लिए जरूरी है कि राहुल गांधी और कांग्रेस जमीन पर लगातार काम करें ताकि आने वाले विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को मजबूती दी जा सके।

विपक्ष को ये नहीं समझना चाहिए कि मोदी और भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति फ्लॉप हो गई है। अगर वो फ्लॉप होती तो उसकी संख्या और नीचे जाती। आज उसकी हवा निकली है, लेकिन आप उसमें दोबारा हवा मत भरिए। भाजपा ने उड़ीसा जैसी जगहों पर नए घर ढूंढ़ लिए हैं। ताजा नतीजों को बेस बनाकर आगे बढ़ने की जरूरत है। ऐसा न सोचा जाए कि यहां से कांग्रेस के लिए राजनीति आसान हो गई है।

राहुल गांधी के लिए चुनौती होगी कि उनके विरोधी उन्हें जिस राजनीतिज्ञ की छवि में बांधना चाहते हैं, वो उसे आने वाले विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन से कैसे गलत साबित करते हैं और दिखा पाते हैं कि पार्टी का ताजा बेहतर प्रदर्शन कोई अनायास सफलता नहीं थी।

इसमें कोई संदेह नहीं कि 2024 के चुनाव के राजनीतिक विमर्श की दशा-दिशा का पूरा नियंत्रण राहुल गांधी ने अपने हाथों में मजबूती से थामे रखा और भाजपा ही नहीं पीएम मोदी को इन मुद्दों पर प्रतिक्रियावादी विमर्श से आगे नहीं बढ़ने दिया। लोकतंत्र, संविधान और आरक्षण को खतरा होने के अपने दावों का संदेश पहुंचाने के लिए राहुल ने ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स जैसी जांच एजेंसियों की विपक्षी नेताओं के खिलाफ की जा रही कार्रवाईयों से लेकर राजनीतिक पार्टियों में तोड़-फोड़ की भाजपा की रणनीति से जोड़ दिया। चुनाव परिणामों में कांग्रेस आज जहां खड़ी है वहां से अब उसके लिए भविष्य में देश की सत्ता वैकल्पिक धुरी के सारे रास्ते खुल गए हैं और इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि राहुल गांधी ही कांग्रेस के इस राजनीतिक पुनर्जीवन के असली नायक हैं

यह कहा जा सकता है कि आज जो कांग्रेस है, वो राहुल की कांग्रेस है। राहुल के लोग ही अब कांग्रेस का संगठन संभाल रहे हैं। पुराने मैनेजर अब बैठकों तक सीमित हैं। ट्टाीरे-ट्टाीरे वहां भी भीड़ कम होगी। नए चेहरे पार्टी में उभरे हैं। 15 साल में ये पहला चुनाव है जब राहुल और पप्पू शब्द एक साथ इस्तेमाल नहीं हुए। विरोधियों और प्रतिपक्ष को समझ आ चुका है कि राहुल अब पप्पू रहे नहीं और उनको ऐसा कहकर सिवाय नुकसान के कुछ अर्जित नहीं होना है। सोशल मीडिया पर राहुल को सुनने वालों की तादाद बढ़ी है। टीवी पर कांग्रेस के विज्ञापन इस बार भाजपा के विज्ञापनों पर भारी पड़े। पुराने इंटरव्यू की रील्स के जरिए जो ट्रोलिंग राहुल ने इस चुनाव से पहले तक झेली थी अब वह अतीत की गर्त में समाने लगी है

 

 

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