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राजस्थान के मोर्चे पर कांग्रेस की रणनीति

नई दिल्ली। कांग्रेस को लग रहा है कि बेशक वह मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मोर्चे पर भाजपा को न पछाड़ पाए, लेकिन कम से कम राजस्थान से तो उसे बेदखल कर ही सकती है। यहां कांग्रेस को संभावनाएं अपने पक्ष में दिखाई दे रही हैं। यही वह है कि पार्टी खुद के लिए अनुकूल स्थितियां बनाने की रणनीति पर काम कर रही है।
दरअसल, राजस्थान में भाजपा के कई नेता और विधायक मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सेे नाराज चल रहे थे। रही-सही कसर टिकट बंटवारे ने कर डाली। टिकट से वंचित विधायकों ने बगावती तेवर अखित्यार कर लिये हैं। कांग्रेस ने अपनी रणनीति के तहत भाजपा के भीतर के इसी असंतोष को गोलबंद करने की रणनीति अपनाई है। पार्टी ने न सिर्फ भाजपा के असंतुष्ट नेताओं के लिए  अपने दरवाजे खोले हैं, बल्कि उन्हें टिकट भी दे रही है। महज कुछ घंटे पहले भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए दौसा के सांसद हरीश मीँणा को देवली उनियारा से टिकट दिया गया है।
भाजपा के भीतर से उठते बगावती सुरों के बीच कांग्रेस ने यह संदेश देने की भी भरसक कोशिश की है कि पार्टी में कहीं भी अंदरूनी तौर पर खेमेबाजी नहीं हैं। अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों के नाम उम्मीदवारों की पहली सूची में हैं। जैसा कि राजनीतिक कुछ विश्लेषक अनुमान लगा रहे थे कि इन दोनों नेताओं के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर ऐसी खींचतान होगी कि इसका खामियाजा कांग्रेस को चुनाव में भुगतना पड़ सकता है, वैसी स्थिति अभी लगती नहीं। इसके उलट अब तो ऐसा लग रहा है कि सचिन ने गहलोत के नाम पर अपनी सहमति दे दी है। पार्टी की इस रणनीति से कार्यकर्ताओं में जोश आ सकता है।
रणनीति के तहत राजस्थान में ही कांग्रेस को ज्यादा फोकस करने की जरूरत है। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को हटाने के लिए उसे ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ेगा। छत्तीस गढ़ में बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनाव में उतरे जनता कांग्रेस के नेता पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने दूसरे चरण के चुनाव से पहले बड़ा बयान दिया है कि अगर चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है तो वह भारतीय जनता पार्टी के साथ हाथ मिला सकते हैं। जाहिर है कि यहां की चुनौती भी कांग्रेस के लिए काफी कड़ी है

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