जहां प्लास्टिक के बहुतायत उपयोग से हमारी प्रकृति का संचालन और संतुलन बिगड़ रहा है, वहीं आज पूरी दुनिया में प्लास्टिक के उपयोग पर लगाम लगाने की मुहिम जोर पकड़ रही है। भारत सरकार ने भी अपनी नीति स्पष्ट कर प्लास्टिक मुक्त देश बनाने की मुहिम शुरू कर दी है। इस मुहिम में उत्तराखण्ड का रिंगाल बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उत्तराखण्ड में रिंगाल जीवन का अभिन्न अंग होने के साथ-साथ वहां की कला को भी प्रदर्शित करता है। यह प्रदेश की आजीविका का साधन बन रहा है। इसके लिए राजेन्द्र बडबाल की मेहनत और लगन को श्रेय दिया जाता है। राजेन्द्र ने प्रदेश के लोगों को रिंगाल के माध्यम से रोजगार की राह दिखलाई है। फिलहाल वे राज्य के बेरोजगारों के लिए प्रेरणा स्रोत बनकर उभर रहे हैं
पहाड़ में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। कहा जाता है कि कला और कलाकार को सरहदों के बंधन में नहीं बांधा जा सकता है। रिंगाल मैंने राजेंद्र ने उक्त कहावत को चरितार्थ करके दिखाया है। सीमांत जनपद चमोली के दशोली ब्लॉक के किरूली गांव निवासी राजेंद्र बडवाल विगत 15 सालों से अपने पिताजी दरमानी बडवाल जी के साथ मिलकर हस्तशिल्प का कार्य कर रहें हैं। उनके पिताजी पिछले 46 सालों से हस्तशिल्प का कार्य करते आ रहें हैं। राजेंद्र पिछले 10 सालों से रिंगाल के परम्परागत उत्पादों के साथ-साथ नए-नए प्रयोग कर इन्हें मार्डन लुक देकर नए डिजाइन तैयार कर रहे हैं। उनके द्वारा बनाई गई रिंगाल की छंतोली, ढोल दमाऊ, राज्य पक्षी मोनाल, हुडका, लैंप शेड, लालटेन, गैस, टोकरी, फूलदान, घौंसला, पेन होल्डर, फुलारी टोकरी, चाय ट्रे, नमकीन ट्रे, डस्टबिन, फूलदान, टोपी, स्ट्रैं, वाटर बोतल, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, पशुपतिनाथ मंदिर सहित अन्य मंदिरों के नमूने बेहद पसंद किए जा रहे हैं। जिनकी बिक्री कर राजेंद्र अच्छा खासा मुनाफा ले रहे हैं। राजेंद्र बडवाल की हस्तशिल्प के मुरीद उत्तराखण्ड में हीं नहीं, बल्कि देश के विभिन्न प्रदेशों से लेकर विदेशों में बसे लोग भी हैं।

हिमालयी महाकुंभ नंदा देवी राजजात यात्रा और नंदा की वार्षिक लोकजात यात्रा में रिंगाल की छंतोली बरबस ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। रिंगाल की छंतोली के बिना आप नंदा देवी राजजात यात्रा की परिकल्पना नहीं कर सकते हैं। रिंगाल के विभिन्न उत्पाद आज भी लोगों को बेहद भाते हैं। रिंगाल से पहले जहां केवल पांच या छह प्रकार का सामान बनाया जाता था वहीं अब 200 से अधिक प्रकार का सामान बनाया जा रहा है। पारम्परिक हस्तशिल्प से इतर अब रिंगाल को मार्डन लुक देकर रिंगाल के बेजोड हस्तशिल्पियों ने रिंगाल की मंदिरों के डिजाइन, सर्विस टोकरी, झूमर, झाड़ू, खूबसूरत ज्वैलरी, कलाई में बांधे जाने वाले आकर्षक बैंड, रिंगाल की राखी सहित विभिन्न प्रकार के उत्पादों को तैयार कर पहचान दिलाई है। पहाड़ में खेती और पशुपालन के सिमटने से संकट में आए परंपरागत रिंगाल उद्योग को सजावटी सामान की संजीवनी मिल गई है। जहां मॉर्डन फर्नीचर्स केवल दिखावे तक सीमित हैं जबकि रिंगाल के उत्पादों से घरों की शोभा वास्तविक रूप से बढ़ती है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में रिंगाल को उच्च दर्जा प्राप्त है। फूलों की टोकरी से लेकर रिंगाल की छंतोली इसका उदाहरण हैं। वहीं रिंगाल का सबसे बड़ा फायदा ये है वो पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद अच्छा होता है। रिंगाल के उत्पाद बेहद हल्के होते हैं और अन्य की तुलना में आकर्षक और सस्ते भी होते हैं। इन्हें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है।
रिंगाल उत्तराखण्ड के जंगलों में पाया जाने वाला एक वृक्ष है। ये वृक्ष बांस प्रजाति का है। बांस और रिंगाल के बीच अंतर बस इतना है कि बांस आकार में बहुत बड़ा होता है और रिंगाल थोड़ा छोटा। रिंगाल और बांस की
लकड़ियों की बनावट और पत्तियां लगभग एक समान ही होती हैं। इसीलिए रिंगाल को बोना बांस (Dwarf Bamboo) भी कहा जाता है। जहां बांस की लम्बाई 25-30 मीटर होती है वहीं रिंगाल 5-8 मीटर लंबा होता है। जहां रिंगाल 1000-7000 फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है क्योंकि रिंगाल को पानी और नमी की आवश्यकता ज्यादा रहती है वहीं बांस सामान्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आसानी से पाया जाता है। रिंगाल पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के अलावा भूस्खलन को रोकने में भी सहायक होता है। रिंगाल मैंने राजेंद्र बडवाल कहते हैं कि रिंगाल की 12 प्रजाति होती हैं लेकिन हमारे क्षेत्र में आठ प्रकार का रिंगाल पाया जाता है। देव रिंगाल, थाम रिंगाल, मालिंगा रिंगाल, गोलू(गड़ेलू) रिंगाल, ग्यंवासू रिंगाल, सरुड़ू रिंगाल, भट्टपुत्रु रिंगाल, नलतरू रिंगाल। लेकिन सबसे उत्तम प्रजाति का रिंगाल देव रिंगाल होता है। रिंगाल उत्तराखण्ड के लोकजीवन का अभिन्न अंग है। इसके बिना पहाड़ के लोक की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। रिंगाल से दैनिक जीवन में काम आने वाले जरुरी उपकरण तो बनते ही हैं, इनसे कई तरह के आधुनिक साजो-सामान भी बनाए जा सकते हैं।
रिंगाल से राज्य को फायदे
-पलायन पर रोक
-माइक्रो विलेज इंडस्ट्री होने से रोजगार के अवसर
-उत्तराखण्ड आर्ट एंड क्राफ्ट्स का विश्व भर में परचम एवं सरंक्षण
-प्राकृतिक सौंदर्यता एवं ईको फ्रेंडली स्टेट
-प्लास्टिक मुक्त प्रदेश

