राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में आजकल कुछ ऐसा चल रहा है जैसा पहले कभी देखने को नहीं मिला। संघ प्रमुख मोहन भागवत इन दिनों अपने संगठन भीतर ही अलग-थलग पड़ते दिखाई दे रहे हैं। इसके पीछे उनका एक बयान बताया जा रहा है। चर्चा गर्म है कि भागवत का यह कथन कि ‘हर मस्जिद में शिवलिंग ढूंढ़ने की जरूरत नहीं है’, हिंदुवादियों के साथ-साथ संघ के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों को भी नहीं सुहाया है जिसके बाद से ही भागवत कट्टर हिंदुत्ववादियों के निशाने पर आ गए हैं। नागपुर से लेकर दिल्ली तक, यहां तक कि संघ के मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइजर’ ने भी भागवत का इस मुद्दे पर समर्थन न कर इन अफवाहों का बाजार गर्म कर दिया है कि उनका विरोध संघ भीतर भी शुरू हो चला है। ‘ऑर्गेनाइजर’ ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि धाार्मिक जगहों की वास्तविक पहचान जाहिर होनी चाहिए। यह भागवत के कथन का एक तरीके से विरोध ही है। इतना ही नहीं ज्यादातर मामलों में संघ के प्रति वफादार रहने वाले हिदू धर्मगुरुओं ने तो खुले तौर पर भागवत के बयान को गलत करार दे डाला है। हालांकि चर्चा यह भी है कि समूचा प्रकरण संघ की सोची-समझी रणनीति का हिसा है। इस चर्चा पर लेकिन यकीन करने वालों की संख्या नगण्य है। अधिकांश का मानना है कि भागवत इस बयान के बाद सचमुच अलग-थलग पड़ गए हैं।

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