महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली महायुति सरकार के भीतर खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही है। महायुति के तीनों घटक दल भाजपा, शिवसेना और एनसीपी के नेता आपस में हर एक कदम पर मोलभाव करने में जुटे हैं। डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे की शिकायतें अब तक दूर नहीं हुई हैं। इस कारण वह अपनी ही सरकार से दूरी बनाने लगे हैं। पहले सीएम की कुर्सी, फिर गृह मंत्रालय, उसके बाद अपनी पसंद के मंत्रालय और अब पालक मंत्रियों के मामले में भी उनकी नाराजगी देखने को मिल रही है और वे कुछ समय से कैबिनेट और कई अन्य अहम बैठक में देवेंद्र फडणवीस के साथ शामिल नहीं हो रहे हैं। उनकी नाराजगी का आलम यह है कि गत तीन फरवरी को सीएम देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में वार रूम की बैठक हुई। इस बैठक में भी एकनाथ शिंदे शामिल नहीं हुए। इसके अलावा उन्होंने शहरी विकास मंत्रालय की दो समीक्षा बैठकें भी रद्द कर दी। यही नहीं एकनाथ शिंदे की नाराजगी की वजह पालक मंत्रियों का भी मामला बताया जा रहा है। गौरतलब है कि रायगढ़ में एनसीपी की अदिति तटकरे को पालक मंत्री बनाया गया था। नासिक में भाजपा के गिरीश महाजन को यह जिम्मेदारी मिली थी लेकिन शिवसेना के विरोध के बाद सीएम ने दावोस से ही इन नियुक्तियों को रद्द कर दिया था। शिवसेना इन दोनों जिलों में अपना पालक मंत्री चाहती है। इसके लिए पार्टी के नेता भरत गोगावले और दादा भुसे रेस में बताए जा रहे हैं। लेकिन सीएम की ओर से इस बारे में अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है। शिंदे ने अपने नेताओं का बचाव करते हुए यह भी कहा है कि पालक मंत्री बनने की चाहत रखने में कुछ भी गलत नहीं है। शिवसेना के नेता सार्वजनिक तौर पर पालक मंत्री बनाए जाने की मांग कर चुके हैं। इसके लिए उनके समर्थकों ने जिलों में हाईवे तक को जाम कर दिया था। शिवसेना और एनसीपी दोनों ने पालक मंत्रियों के मसले नहीं सुलझने की बात कही है। माना जा रहा था कि देवेंद्र फडणवीस के दावोस से लौटने के बाद इस मसले को सुलझा लिया गया है लेकिन दो हफ्ते बीत जाने के बाद भी इस मसले का कोई समाधान नहीं निकलने से एकनाथ शिंदे नाराज हैं। ऐसे में सूबे की सियासत में अटकलें लगाई जा रही हैं कि बीएमसी चुनाव से पहले अगर शिंदे की नाराजगी दूर नहीं की गई तो भाजपा को इसका खामियाजा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।

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