इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने बीते दिनों विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कुछ ऐसा कह डाला जिसके चलते वे विवादों के घेरे में जा फंसे हैं। तमाम न्यायिक नैतिकता, धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक गरिमा को तार-तार कर देने वाला उनका भाषण न्यायपालिका की साख को कमतर करने वाला है ही, पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत पर चलने वाले राष्ट्र की वर्तमान दशा और दिशा को लेकर गम्भीर चिंताएं पैदा कर रहा है

बीते दिनों आठ दिसंबर को विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के एक कार्यक्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस शेखर कुमार यादव द्वारा दिए गए एक बयान को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है। आलम यह है यह मामला अब देश की संसद तक पहुंच गया है। गत सप्ताह सप्ताह विपक्षी इंडिया गठबंधन ने जस्टिस शेखर के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की बात कही है। करीब 40 सांसदों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं। इन सांसदों में तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा भी शामिल हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करके लिखा है कि उन्होंने अपनी पार्टी के अन्य सांसदों के साथ जस्टिस यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का अनुरोध करते हुए विपक्ष जो प्रस्ताव तैयार कर रहा है उसमें न्यायाधीश जांच अधिनियम की धारा 3 (1) (बी) का हवाला दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) व 124 (5) का भी हवाला देते हुए कहा गया है कि जस्टिस शेखर ने बतौर जज अपने
अधिकारों का दुरुपयोग और अवहेलना की है। याचिका के साथ भाषण के वीडियो क्लिप और खबरों की कटिंग भी पेश की है।

बीते 8 दिसंबर को जस्टिस शेखर कुमार यादव विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की कानूनी शाखा की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। न्यायमूर्ति शेखर ने इसी कार्यक्रम में बहुसंख्यक समुदाय के पक्ष में टिप्पणी की। इसमें उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंदुस्तान बहुसंख्यकों की इच्छा के अनुसार काम करेगा और सुझाव दिया कि कानून बहुसंख्यकों के हितों के अनुरूप हो। न्यायाधीश ने मुस्लिम समुदाय के भीतर की प्रथाओं की भी आलोचना करते हुए बहुविवाह, हलाला और तीन तलाक का संदर्भ दिया और इनकी तुलना हिंदू परंपराओं से की। उन पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने इन टिप्पणियों में कथित तौर पर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है। कुमार के इस बयान की देश के कई अधिवक्ता संगठनों ने आलोचना की है। बढ़ते विवाद के बीच न्यायिक जवाबदेही और सुधार अभियान (सीजेएआर) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को पत्र लिख न्यायमूर्ति शेखर के खिलाफ आंतरिक जांच की मांग की है।

सीजेएआर के संयोजक प्रशांत भूषण ने न्यायमूर्ति पर न्यायिक
नैतिकता, निष्पक्षता और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। कई अन्य अधिवक्ता संगठनों ने भी न्यायमूर्ति शेखर के खिलाफ आंतरिक जांच और अनुशासनिक कार्रवाई की मांग की है। कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा ने कहा कि संसद के वर्तमान शीतकालीन सत्र में ही विपक्षी दलों का इंडिया गठबंधन जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ महाभियोग नोटिस देगा और और अब तक राज्यसभा के 30 से अधिक सदस्यों के हस्ताक्षर लिए जा चुके हैं। राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि कोई भी जज इस तरह का बयान देता है तो वह अपने पद की शपथ का उल्लंघन करता है। अगर वह पद की शपथ का उल्लंघन कर रहा है, तो उसे उस कुर्सी पर बैठने का कोई अधिकार नहीं है। जस्टिस शेखर के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया जाएगा। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि देश के इतिहास में जो महाभियोग आज तक कभी भी सफल नहीं हो पाया क्या वो अब हो सकता है? क्या विपक्ष के पास इस महाभियोग को पारित कराने लायक संख्या बल है? आखिर किस आधार पर किसी जज को हटाया जा सकता है?

राजनीतिक विशेषज्ञों और कानूनविदों का कहना है कि सबसे पहले तो समाज के अभिभावक को तो इस तरह की बातंे बिल्कुल भी नहीं कहनी चाहिए। न्यायाधीश हमारे व्यवस्था के अभिभावक हैं। समाज उनसे उम्मीद करता है कि वो आदर्श स्थिति को बनाएं रखें। बहुमत की बात करने के लिए राजनीतिज्ञ तो हैं हीं। हालांकि धीर गंभीर राजनीतिज्ञ भी ऐसी बातें नहीं करते हैं जिसमें अलगाव की गंध आती हो। पिछले 10 सालों से देश में बीजेपी का राज है। भारतीय जनता पार्टी की राजनीति बहुसंख्यकों के हित लाभ को ध्यान में होती है इसलिए जाहिर है कि सत्ता के विचारों से शासन के सभी अंग प्रभावित होंगे ही होंगे। रहा सवाल जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ महाभियोग का तो जब विपक्षी दलों के पास दोनों ही सदनों में संख्या बल नहीं है तो इस प्रस्ताव का क्या औचित्व है। ऊपर से इतिहास भी विपक्षी दलों के साथ नहीं है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में आज तक एक भी जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी है। ऐसे में जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ लाए जा रहे महाभियोग प्रस्ताव का क्या होगा यह देखने वाली बात होगी।

क्या है जजों को हटाने की प्रक्रिया
विपक्ष के नोटिस में संविधान के अनुच्छेद 124 (4) और अनुच्छेद 124 (5) के साथ न्यायाधीश (जांच) अधिनियम की धारा 3 (1) (बी) के तहत जस्टिस यादव के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई है। न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के अनुसार जजों को हटाने की पूरी प्रक्रिया बताई गई है। संविधान के अनुच्छेद 124(4), (5), 217 और 218 में इन प्रक्रियाओं का जिक्र है। सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया की शुरुआत संसद के किसी भी सदन यानी लोकसभा या राज्यसभा में हो सकती है। इसके लिए सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस देना पड़ता है। अगर ये नोटिस लोकसभा में दिया जा रहा है, तो इसके लिए 100 या इससे अधिक सांसदों का समर्थन चाहिए। अगर ये प्रक्रिया राज्यसभा में शुरू हो रही है, तो इसके लिए 50 या इससे अधिक सांसदों का समर्थन चाहिए। नोटिस के बाद अगर लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के सभापति इसे स्वीकार करते हैं, तभी किसी जज को हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। संविधान के प्रावधानों के अनुसार अगर ये नोटिस स्वीकार होता है, तो सदन के चेयरमैन या स्पीकर तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन करते हैं, यह कमेटी शिकायत की जांच करती है और यह तय करती है कि मामला महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने लायक है या नहीं।

किस आधार पर किसी जज को हटाया जा सकता है?
संविधान का अनुच्छेद 121 कहता है कि सर्वाेच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण पर संसद में चर्चा नहीं की जा सकती है। हालांकि, राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले उस प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है जिसमें किसी जज को हटाने की बात की गई हो। किसी जज को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया का पालन करना होगा जिसका जिक्र संविधान के अनुच्छेद 124(4) में है। किसी भी जज को राष्ट्रपति के आदेश के अलावा उनके पद से नहीं हटाया जा सकता है। किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए याचिका केवल ‘सिद्ध कदाचार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर ही राष्ट्रपति को प्रस्तुत की जा सकती है।

अगर शिकायत किसी हाईकोर्ट के जज के खिलाफ है, जैसा कि इस मामले में है तो कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के एक जज और हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस शामिल होते हैं। अगर शिकायत सुप्रीम कोर्ट के किसी वर्तमान जज के खिलाफ है तो कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के दो जज शामिल किए जाते हैं। अगर यह कमेटी पाती है कि सम्बंधित जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है तो उसे दोनों सदनों के सामने रखा जाता है। प्रस्ताव को दोनों सदनों के अनुमोदन की जरूरत होती है। संविधान का अनुच्छेद 124 (4) कहता है कि महाभियोग के प्रस्ताव को उस सदन की कुल सदस्यता के बहुमत द्वारा तथा सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा समर्थित होना चाहिए। दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने पर राष्ट्रपति संबंधित जज को हटाने का आदेश जारी करते हैं।

जजों के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का इतिहास
स्वतंत्र भारत की न्यायपालिका के इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब जजों को महाभियोग के जरिए हटाने की कोशिश की गई लेकिन अभी तक एक भी प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वी. रामास्वामी पहले जज थे जिनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू की गई थी। उनके खिलाफ 1991 में महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा में लाया गया था लेकिन जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं हो सका। इसके बाद 2011 में कलकत्ता हाई कोर्ट के सौमित्र सेन के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पारित किया था लेकिन लोकसभा में वोटिंग होने से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। 2011 में ही सिक्किम हाईकोर्ट के जस्टिस पीडी दिनाकरन के खिलाफ कदाचार के आरोप में शुरू की गई महाभियोग प्रक्रिया जांच समिति के गठन तक गई थी लेकिन जस्टिस दिनाकरन के इस्तीफे बाद जांच समिति की निष्पक्षता में विश्वास और भरोसे की कमी के आधार पर उन्हें हटाने की प्रक्रिया रोक दी गई।

इसके बाद वर्ष 2015 में राज्यसभा के 58 सदस्यों ने गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला के खिलाफ आरक्षण के मुद्दे पर आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए महाभियोग नोटिस पेश किया तो वहीं 2015 में ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस एसके गंगेले के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू की गई थी लेकिन राज्यसभा द्वारा गठित जांच समिति ने आरोपों को निराधार पाते हुए जज को क्लीन चिट दे दी थी। 2017 में राज्यसभा के सांसदों ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाईकोर्ट के सीवी नागार्जुन रेड्डी के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया जो असफल रहा। मार्च 2018 में विपक्षी दलों ने तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए एक मसौदा प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। राज्यसभा के सभापति ने इससे जुड़े नोटिस को खारिज कर दिया था।

जस्टिस शेखर के खिलाफ महाभियोग सफल होगा?
वर्तमान में राज्यसभा में विपक्ष के 100 सांसद हैं। 245 सदस्यों वाले उच्च सदन में महाभियोग प्रस्ताव पारित कराने के लिए 163 सदस्यों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में अगर सत्ता पक्ष ने प्रस्ताव से दूरी बनाई तो इसका गिरना तय है। हालांकि विपक्षी दलों का कहना है कि इसके सहारे उसकी योजना जस्टिस यादव की विवादित टिप्पणियों पर देश का ध्यान आकृष्ट करना है।

बहरहाल, इस मामले का सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए

हाई कोर्ट से विस्तृत जानकारी मांगी है। इसके पहले कैंपेन फार ज्यूडीशियल अकाउंटैबिलिटी एंड रिफार्म्स ने शेखर यादव की शिकायत चीफ जस्टिस आफ इंडिया को चिट्ठी लिखकर की थी। इस चिट्ठी में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस शेखर कुमार यादव के बयान की इन-हाउस जांच की मांग की गई है। चिट्ठी में मांग की गई है कि जांच होने तक जस्टिस को सभी न्यायिक कार्यों से दूर रखा जाए। ­­

You may also like

MERA DDDD DDD DD