महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए भाजपा मध्यप्रदेश से ज्यादा प्रयासरत रही। यहां भाजपा की छटपटाहट का आलम यह रहा कि पूर्ण बहुमत न होने के वाबजूद उसने एक ऐसे घोड़े पर दांव लगाकर सरकार बना दी जिसके पांव आगे बढ़ने से पहले ही लड़खड़ा गए और उसने अपने घर वापसी में ही भलाई समझी।
इसके बावजूद इस बात की प्रबल संभावनाएं बरकरार रहीं कि राज्य में देर-सवेर कोई बड़ा उलटफेर हो सकता है और भाजपा का फिर से भाग्योदय होगा। राज्य में शिव सेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस गठबंधन की सरकार को लेकर शुरू में आशंकाएं जताई जा रही थी कि यह गठबंधन ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगा।
पार्टियों के आपसी मतभेद उन्हें साथ नहीं चलने देंगे। इसके बावजूद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार काफी अच्छी चलने लगी। लेकिन अब राज्य से जो संकेत मिल रहे हैं, उन्हें देखते हुए कहा जाने लगा है कि कहीं सरकार के विफल होने की ताक में बैठी भाजपा के भाग्य से छींका तो नहीं फूट रहा है।
राज्य में सामना अखबार को शिव सेना का मुख पत्र माना जाता है। यानी वेदों को जिस तरह ईश्वर का वचन माना जाता है उसी तरह सामना को भी ठाकरे परिवार की वाणी कहा जाता है। इस अखबार के जरिये कांग्रेस पर यह कहकर तंज किया जाना कि सीएम उद्धव ठाकरे कुर्सी के इतने लालची नहीं कि हर बात मान लें, इस बात की ओर साफ संकेत है कि सरकार में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है।
अखबार के लेख में कांग्रेस को उसकी हैसियत तक याद दिलाई गई है तो यह अंदरूनी मतभेद ही नहीं, बल्कि आगामी संकट की ओर भी इशारा करता है। इसका तो यही विश्लेषण किया जा सकता है कि कांग्रेस की ओर से सीएम पर दबाव है और यह दबाव अब उनके बर्दाश्त से बाहर है। हालात को देखते हुए भाजपा ने तत्काल हमला भी बोल दिया है कि राज्य कोरोना संकट से जूझ रहा है और सरकार में शामिल पार्टियों को कुर्सी की पड़ी है।
-दाताराम चमोली

