Country

भाजपा का दमदार प्रदर्शन, सकते में कांग्रेस

 

लोकसभा चुनाव नतीजों बाद आत्मविश्वास से लबरेज कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा था, ‘भारत की जनता ने एकजुट होकर साफ कह दिया है- ‘हम मोदी जी को नहीं चाहते’। इंडिया गठबंधन के नेता भी इसके बाद भाजपा का स्वर्णिम युग समाप्त होने की बात कहने लगे थे। हरियाणा विधानसभा चुनाव नतीजों ने लेकिन विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस के इस अति आत्मविश्वास को हिला डाला है। भाजपा तीसरी बार शानदार बहुमत के साथ हरियाणा में सरकार बनाने जा रही है। जम्मू-कश्मीर में भले ही इंडिया गठबंधन को जीत मिली है लेकिन कांग्रेस का प्रदर्शन यहां भी खासा निराशाजनक रहा है। इन दो राज्यों के चुनाव नतीजों बाद अब इंडिया गठबंधन में शामिल दलों ने कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने तो 10 सीटों पर प्रस्तावित विधानसभा उपचुनाव के लिए 6 पर पार्टी प्रत्याशी घोषित कर गठबंधन भीतर कांग्रेस की कमजोर होती पकड़ को सामने लाने का काम कर दिखाया है। इन चुनाव नतीजों का एक बड़ा असर महाराष्ट्र और झारखण्ड विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के मध्य सीटों के बंटवारे पर पड़ना तय है। अब कांग्रेस फायदे की स्थिति में समझौता नहीं कर पाएगी और उसे शिवसेना (उद्धव), एनसीपी (शरद) के साथ महाराष्ट्र में तथा झारखण्ड में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के साथ बैकफुट पर रह समझौता करना पड़ेगा

आज से चार महीने पहले चार जून को लोकसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा को 240 सीटें मिली थीं जो 2019 के चुनाव की 303 सीटों से 63 कम हैं। यह भाजपा के लिए बड़ा झटका था। इसके बाद से कयास लगाए जाने लगे थे कि अब भाजपा का ग्राफ उतार पर है लेकिन हाल में हुए देश दो राज्यों हरियाणा और जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में खासकर हरियाणा में भाजपा ने रिकॉर्ड तीसरी बार सत्ता में वापसी कर जहां पार्टी कॉडर का मनोबल बढ़ाया है तो वहीं जम्मू-कश्मीर में भाजपा सरकार बनाने से चूक जरूर गई मगर उसका वोट प्रतिशत सबसे अधिक है। यहां नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन ने लगभग डेढ़ दशक बाद जीत दर्ज की है। हरियाणा में कांग्रेस ही नहीं राजनीतिक जानकार और वोटिंग के बाद कई मीडिया संस्थान भी एग्जिट पोल के आधार पर कांग्रेस की जीत का दावा कर रहे थे। राज्य में बीते 10 साल में बीजेपी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर के साथ किसानों का मुद्दा हो या ‘अग्निवीर’ योजना, ऐसे कई मुद्दे थे जिनकी वजह से बीजेपी सरकार के प्रति लोगों की नाराजगी बताई जा रही थी। लेकिन विधानसभा चुनावों के नतीजों ने सियासी जानकारों से लेकर एग्जिट पोल तक को गलत साबित किया। अपनी सरकार की वापसी का इंतजार कर रही कांग्रेस को इससे बड़ा झटका लगा है। सवाल उठने लगे हैं कि क्या कारण हैं जिन्होंने कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया? आखिर क्या वजह रही जो कांग्रेस जीती हुई बाजी हार गई?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जीती हुई बाजी कैसे कांग्रेस हारती है यह मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हरियाणा में भाजपा की जीत से समझा जा सकता है। जहां तक हरियाणा का सवाल है इस चुनाव में भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने से लेकर आंतरिक गुटबाजी और भाजपा को कमजोर आंकने जैसे कई कारण रहे जिसकी कीमत पार्टी को चुकानी पड़ी है।

सबसे पहला कारण पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को बताया जा रहा है। हुड्डा ने अपने मुताबिक टिकट बांटे। हाईकमान से फ्रीहैंड मिलने के बाद न सिर्फ अपने समर्थकों को टिकट बांटे, बल्कि शैलजा समर्थकों को केवल 9 सीट देकर साइड लाइन कर दिया। इस तरह उन्होंने पार्टी में कलह के बीज रोप दिए। नतीजा यह रहा कि शैलजा की नाराजगी के बाद कांग्रेस के दलित कार्यकर्ता छिटक गए। भूपेंद्र हुड्डा के कारण आम आदमी पार्टी से गठबंधन का रास्ता भी बंद हो गया और आप ने 90 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए। आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के ही वोट काटे और वोटरों में संदेश अच्छा नहीं गया। प्रचार के दौरान 1 बनाम 35 का नैरेटिव भी हुड्डा के कैंप से बाहर आया और गैर जाट भी लामबंद हो गए।

दूसरा कांग्रेस जिस किसान, जवान और पहलवान के मुद्दे के सहारे भाजपा को परास्त करने की रणनीति बना रही थी उसे मंचों तक ही सीमित रख पाई। इस विरोध को जनता तक पहुंचाने में पार्टी असमर्थ रही। जवान के मामले में कांग्रेस ने ‘अग्निवर’ को मुद्दा बनाया। लेकिन नायाब सिंह सैनी अग्निवीरों को राज्य सरकार के द्वारा नौकरी देने की घोषणा कर थोड़ा डैमेज कंट्रोल कर पाने में सफल रहे। किसानों की नाराजगी को पीएम पेंशन योजना, अनाजों को एमएसपी तथा अन्य लाभकारी योजना के जरिए भाजपा थामने में सफल रही।

तीसरा चुनाव के आखिरी क्षणों में पार्टी आंतरिक कलह से परेशान रही। पार्टी में भूपेंद्र हुड्डा, कुमारी शैलजा और रणदीप सुरजेवाला जैसे कई गुट उभरकर सामने आए। स्थिति इतनी खराब थी कि शैलजा और सुरजेवाला ने चुनाव प्रचार में काफी देर से भाग लिया। यहां तक कि राहुल गांधी भी एक रैली में भूपेंद्र हुड्डा और कुमारी शैलजा के बीच हाथ मिलवाते हुए दिखाई दिए। वहीं चुनाव में पहलवानों के आंदोलन को राजनीतिक रंग देने का प्रयास भी भारी पड़ा। शुरू में लोगों की सहानुभूति प्राप्त कर रहा यह आंदोलन कांग्रेस की सक्रियता के साथ ही राजनीतिक रूप ले लिया। इसके बाद पार्टी ने पहलवान विनेश फोगाट और बजरंग पूनिया को कांग्रेस में शामिल कर लिया जिससे पहलवानों के आंदोलन पर राजनीतिक हितों की ओर इशारा करने के आरोप लगे। सबसे बड़ा कारण लेकिन हुड्डा पर पार्टी निर्भरता रही है। टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार तक हुड्डा का ही वर्चस्व रहा। जब विधानसभा चुनाव के लिए टिकटों का वितरण किया गया तो अधिकांश टिकट हुड्डा गुट के विधायकों को ही दिए गए।

भारी पड़ा अति आत्मविश्वास और हुड्डा पर निर्भरता
लोकसभा चुनाव 2024 में कांग्रेस पार्टी ने 2014 और 2019 के मुकाबले अच्छा प्रदर्शन किया और हरियाणा की 10 में से 5 सीटें जीतीं। लेकिन विधानसभा चुनाव में ऐसा प्रतीत हुआ कि कांग्रेस ने इस सफलता के बाद अत्यधिक आत्मविश्वास में आ भाजपा को कमतर आंकने की गलती की जिसका नतीजा उसे चुनाव परिणाम में भुगतना पड़ा। कांग्रेस और राहुल गांधी का चुनावी अभियान मुख्य रूप से जाति और आरक्षण के मुद्दों के चारों ओर केंद्रित रहा। वहीं भाजपा ने अपने पिछले 10 वर्षों के कार्यों को आधार बनाकर प्रचार किया। भाजपा ने कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार की नीतियों की भी तीखी आलोचना के अतिरिक्त राहुल गांधी द्वारा अमेरिका में आरक्षण खत्म करने की बात करने को चुनावी मुद्दा बनाया।

कुछ राजनीतिक जानकार कहते हैं कि इन नतीजों के पीछे सबसे बड़ी वजह बीजेपी का माइक्रो मैनेजमैंट रहा। हरियाणा में बीजेपी ने गैर जाट वोटों को बड़ी चतुराई से साधा। इसका असर यह हुआ है कि हुड्डा के गढ़ सोनीपत की पांच में से चार सीटों पर कांग्रेस की हार हो गई। कांग्रेस ने अपने किसी विधायक का टिकट नहीं काटा और उसके आधे उम्मीदवारों की हार भी हो गई। उम्मीदवारों को नहीं बदलना भी कांग्रेस के लिए बड़ा नुकसान साबित हुआ है।

हरियाणा में करीब 22 फीसदी जाट वोट हैं जो काफी वोकल हैं यानी खुलकर अपनी बात रखते हैं। गैर जाटों को लगा कि कांग्रेस के जीतने पर
भूपिंदर सिंह हुड्डा ही हरियाणा के मुख्यमंत्री बनेंगे इसलिए उन्होंने खामोशी से बीजेपी के पक्ष में वोटिंग कर दी। इस बार के विधानसभा चुनावों में वोटों का बंटवारा जाट और गैर जाट के आधार पर हुआ जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस को हुआ।

गैर जाट और जाट वोटों के बीच समीकरण साधने में बीजेपी ने कई सीटों पर करीबी मुकाबले में कांग्रेस को मात दी है। इनमें आसंध, दादरी, यमुनानगर, सफीदों, समलखा, गोहाना, राई, फतेहाबाद, तोशाम, बाढड़ा, महेंद्रगढ़ और बरवाला जैसी सीटें शामिल हैं, जहां कांग्रेस को काफी करीबी अंतर से हार का सामना करना पड़ा है। गुटबाजी और गलत तरीके से टिकट बांटने की वजह से कांग्रेस को करीब 13 सीटें गंवानी पड़ी हैं। इनमें भूपिंदर सिंह हुड्डा, कुमारी शैलजा और कांग्रेस आलाकमान की पसंद के उम्मीदवार भी शामिल हैं। इस मामले में कांग्रेस नेता कुमारी शैलजा को लेकर भी कई तरह की चर्चा चलती रही। यहां तक कहा जाने लगा कि कांग्रेस के कई नेताओं का ध्यान चुनावों से ज्यादा, चुनाव जीतने के बजाए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर था। जैसा कि चुनाव नतीजों के बाद आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा कि इन चुनावों का सबसे बड़ा सबक यही है कि अति आत्मविश्वास कभी नहीं करना चाहिए। जाहिर है उनका निशाना कांग्रेस पर ही था। दूसरी तरफ जहां कांग्रेस के नेताओं जैसे भूपेंद्र हुड्डा ने अपने खेमे के उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी, वहीं भाजपा ने इससे अलग रणनीति अपनाई। सत्ता विरोधी लहर से निपटने के लिए भाजपा ने 60 नए चेहरों को मैदान में उतारा और पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को भी हटा दिया, जिन पर घमंडी होने के आरोप थे। उनकी जगह पार्टी ने अधिक मिलनसार छवि वाले नायब सिंह सैनी को उम्मीदवार बनाया। इसके विपरीत कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्ष उदयभान सहित 17 ऐसे उम्मीदवारों को दोबारा टिकट दिया जो पहले चुनाव हार चुके थे। कुल मिलाकर देखें तो कांग्रेस की आंतरिक कलह और अतिआत्मविश्वास के चलते भाजपा के खिलाफ उपजे गुस्से को भुनाने में कांग्रेस कामयाब नहीं हुई तो वहीं प्रचार के आखिरी चरण में बीजेपी ने अपने कील-कांटे दुरुस्त किए और हारी हुई बाजी जीत ली।

दूसरी तरफ भाजपा की बात करें तो हरियाणा की बाजी अपने हाथ करने में भाजपा के टीम वर्क का सबसे बड़ा हाथ है और इस टीम वर्क की सबसे मजबूत कड़ी भाजपा का सांगठनिक ढांचा है। भाजपा की रणनीति में बूथ मैनेजमेंट का प्रबंधन उनकी जीत के ताले की चाबी है। भाजपा जानती है कि अपने कोर वोटर को कैसे बूथ तक ले जा सकें। जहां हार जीत का बड़ा अंतर नहीं होता है वहां विधानसभा को सक्रिय और समर्पित कार्यकताओं के जरिए भाजपा परिणाम बदलने की ताकत रखती है। लोकसभा चुनाव के विपरीत इस बार कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। भारतीय राष्ट्रीय लोकदल ने बसपा के साथ गठबंधन किया जबकि जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) ने आजाद समाज पार्टी के साथ हाथ मिलाया। इस तरह विपक्षी खेमे में काफी बिखराव था। इसके अलावा कई स्वतंत्र उम्मीदवार भी चुनावी मैदान में उतरे जिससे भाजपा के खिलाफ वोट विभाजित हो गए। नतीजों पर इस बिखराव का असर कई सीटों पर स्पष्ट रूप से देखा गया।

यहां तक चर्चा है कि इनेलो और जे जे पी को अकेले दम पर चुनाव लड़ने के पीछे भाजपा की शक्ति काम कर रही थी। जननायक जनता पार्टी और आजाद समाज पार्टी और इनेलो और बसपा के गठबंधन के पीछे भी भाजपा का हाथ है। चुनावी रणभूमि से यह बात छन के आ रही है कि इन दोनांे गठबंधन का हरियाणा के जाट और दलित वोटों में कुछ असर दिखा जिसकी वजह से कांग्रेस अपेक्षित वोट हासिल नहीं कर पाई। आम आदमी पार्टी भी वोट के विभाजन का कारण बनी।

नहीं दिखा एंटी इनकंबेंसी का असर
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ जब एंटी इनकंबेंसी का मामला उठा तो भाजपा नेतृत्व ने तत्काल सीएम का फेस नायब सिंह सैनी को बना कर डैमेज कंट्रोल किया। चुनाव प्रचार के दौरान खट्टर की छवि आगे आने लगी तो उन्हें न केवल मंच पर बुलाना बंद किया गया, बल्कि चुनावी पोस्टर से उनका चेहरा गायब कर भाजपा ने अपनी स्थिति एक हद तक ठीक की।

भाजपा के काम आया वोटों का धु्रवीकरण
भाजपा की रणनीति 2014 से ही हरियाणा में स्पष्ट रही है। उस चुनाव में भाजपा ने अपनी सीटों की संख्या 4 से बढ़ाकर 47 कर ली थी। पार्टी ने पंजाबी खत्री मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाकर ओबीसी वोटों को सुरक्षित करने पर ध्यान दिया जो कि हरियाणा की कुल आबादी का लगभग 40 फीसदी हैं। इस साल मार्च में बीजेपी ने खट्टर की जगह ओबीसी समुदाय से आने वाले नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। हरियाणा की राजनीति में अब तक मुख्यमंत्री अक्सर जाट समुदाय से होते थे जिसकी राज्य में सिर्फ 25 प्रतिशत आबादी है। पार्टी ने 75 फीसदी गैर-जाट मतदाताओं को आकर्षित कर अपनी जीत सुनिश्चित की। इसके साथ ही अनुसूचित जाति (एससी) के मतदाताओं को भी अपना समर्थन दिलाने के लिए कई कदम उठाए। पार्टी ने गांवों में महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से दलित परिवारों तक पहुंच बनाई, जिसमें ‘लखपति ड्रोन दीदी’ अभियान ने अहम भूमिका निभाई।

चुनावी रैलियों में भाजपा ने झोंकी पूरी ताकत
चुनाव में भाजपा अपनी पूरी ताकत झोंकी और 150 से अधिक रैलियों का आयोजन किया। कई सीटों पर प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने भी संबोधित किया। दूसरी ओर कांग्रेस ने लगभग 70 रैलियों का आयोजन किया। भाजपा का चुनावी संदेश कांग्रेस से पूरी तरह अलग था। राहुल गांधी ने अपने भाषणों में किसानों पर जोर दिया और उन्हें उद्योगपतियों जैसे अंबानी और अडानी के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की। उनका समाजवादी दृष्टिकोण शायद व्यापारिक समुदाय और विकास की ओर अग्रसर मतदाताओं को आकर्षित नहीं कर पाया।

छोटे दलों और निर्दलीय ने किया कांग्रेस का नुकसान

हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों पर गौर करें तो 10 से ज्यादा सीटों पर छोटे दल या निर्दलीय उम्मीदवार कांग्रेस की हार के पीछे बड़ी वजह रहे हैं। आम आदमी पार्टी हरियाणा में कोई चमत्कार नहीं कर पाई है और न ही उसे किसी सीट पर जीत मिली है। लेकिन छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच वोट बंटने का कांग्रेस को नुकसान हुआ है।

कहा जा रहा है कि बीजेपी ने उन सभी सीटों पर कांग्रेस विरोधी उम्मीदवार की मदद की जहां उसकी जीत की संभावना कम थी और कांग्रेस की जीत भी सपष्ट नहीं दिख रही दी। मसलन दादरी विधानसभा सीट को बीजेपी महज 1957 वोट से कांग्रेस से जीत पाई और इस सीट पर तीसरे नंबर पर रहे
निर्दलीय संजय छापरिया को 3713 वोट मिले हैं। इसके अलावा भी दो उम्मीदवारों को इस जीत के अंतर से ज्यादा वोट मिले हैं।

यही हाल सफीदों सीट का भी रहा है। कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी की जीत का अंतर यहां करीब 4 हजार वोट का रहा है जबकि तीसरे नंबर पर रहे
निर्दलीय उम्मीदवार को 20 हजार से ज्यादा वोट मिले हैं। वहीं फतेहाबाद सीट पर बीजेपी को कांग्रेस से महज 2252 ज्यादा वोट मिले जबकि इस सीट पर अन्य चार उम्मीदवारों को ढ़ाई हजार से लेकर करीब 10 हजार वोट मिले हैं। ऐसे कई और भी सीटें हैं जहां कांग्रेस को निर्दलीय और छोटे दलों ने नुकसान पहुंचाया है।

जम्मू-कश्मीर ने इंडिया गठबंधन को दी राहत

जम्मू कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के गठबंधन को बहुमत मिल गया है। विधानसभा परिसीमन के बाद 90 सीटों में से नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 42 पर जीत दर्ज की वहीं कांग्रेस के खाते में छह सीटें गई हैं जबकि बीजेपी ने 29 पर जीत दर्ज की हैं तो पीडीपी 3, जम्मू और कश्मीर पीपुल कॉन्फ्रेंस, 1 आम आदमी पाटी 1 और 7 सीटों पर निर्दलियों को जीत मिली है।

गौरतलब है कि 2019 में अनुच्छेद 370 व 35ए निरस्त होने के बाद केंद्र शासित प्रदेश में पहली सरकार बनाने के भाजपा के सपनों को न केवल झटका लगा है, बल्कि अपने बलबूते पहली बार जम्मू की सरकार बनाने का पार्टी का दांव भी खाली चला गया। दस साल बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा का सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला भी लड़खड़ाता दिखा। हालांकि सत्ता की इस दौड़ में पीछे रहने के बाद भी भाजपा ने राज्य में 2014 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। उसने 29 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि 2014 में उसके पास 25 सीटें ही थी। यही नहीं पार्टी को सभी दलों से ज्यादा मत प्रतिशत भी मिला है।

भाजपा ने सोशल इंजीनियरिंग के तहत पहली बार जम्मू-कश्मीर में अनुसूचित जनजाति (एसटी) को राजनीतिक आरक्षण देते हुए विधानसभा की नौ सीटें आरक्षित कीं। पहले से ही अनुसूचित जाति (एससी) के लिए सात सीटें आरक्षित थीं, जिसमें किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया गया। पहली बार भाजपा ने पहाड़ी समुदाय के 40 साल के आंदोलन से सरोकार रखते हुए पहाड़ियों को एसटी का दर्जा दिया। पहाड़ियों को आरक्षण मिलने के बाद यह प्रचारित किया गया कि गुर्जरों के आरक्षण पर डाका पड़ जाएगा। उनके हक में कटौती होगी। केंद्र सरकार ने विश्वास बहाली के लिए गुर्जर-बकरवालों को मिल रहे 10 फीसदी आरक्षण से किसी प्रकार की छेड़छाड़ न करते हुए पहाड़ी समुदाय को भी इनके बराबर अतिरिक्त 10 प्रतिशत का आरक्षण दिया। ओबीसी समाज का आरक्षण दोगुना करते हुए चार से आठ फीसदी कर दिया गया। हालांकि यह समाज इससे नाखुश रहा। उनकी मांग रही कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर अन्य राज्यों की तरह जम्मू-कश्मीर में भी आरक्षण का प्रावधान किया जाना चाहिए। विधानसभा चुनाव में ओबीसी समाज की यह नाराजगी भी देखने को मिली।

आरक्षण के बाद भी भाजपा को जोरदार झटका

भाजपा को तमाम जतन के बाद भी पीर पंजाल में जोरदार झटका लगा। राजोरी-पुंछ की आठ में एसटी के लिए आरक्षित पांच सीटों पर भी भाजपा करिश्मा नहीं कर सकी। इन दोनों जिलों की सात सीटें पार्टी हार गई, जबकि भाजपा को यहां से चार से पांच सीटों की उम्मीद थी। उसे एकमात्र सीट कालाकोट-सुंदरबनी से ही संतोष करना पड़ा। यहां भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र रैना को भी करारी हार का सामना करना पड़ा। 2014 में भाजपा को पीर पंजाल से नौशेरा तथा कालाकोट सीट मिली थी, लेकिन इस बार एक सीट का नुकसान उठाना पड़ा। खास बात यह रही कि पहाड़ी समुदाय को पहली बार भाजपा ने अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिया था और उसे उम्मीद थी कि पहाड़ी समुदाय भाजपा का साथ देगा। यहां गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की रैलियां भी काम नहीं आईं।

टिकट बंटवारे से उभरी नाराजगी पड़ी भारी
भाजपा की राह में संगठनात्मक चूक भी आड़े आई। टिकट बंटवारे से उपजी नाराजगी भाजपा को भारी पड़ी। पार्टी की ओर से टिकट घोषित करने के बाद जम्मू के जम्मू उत्तर व छंब, रियासी के श्री माता वैष्णो देवी, ऊधमपुर के रामनगर में विरोध प्रदर्शन हुए। छंब में तो कई दिनों तक प्रदर्शन चलता रहा और अंततः पार्टी के खिलाफ वरिष्ठ नेता नरिंदर सिंह भाऊ ने ताल ठोक दी। नतीजा निकला कि पार्टी को यहां हार का सामना करना पड़ा। अन्य सीटों पर पार्टी ने डैमेज कंट्रोल कर नाराज नेताओं को मना लिया था। ऊधमपुर में भाजपा के प्रदेश सचिव पवन खजूरिया ने टिकट न मिलने से नाराज होकर न केवल पार्टी छोड़ी, बल्कि पार्टी प्रत्याशी आरएस पठानिया के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर गए। हालांकि पठानिया जीतने में कामयाब रहे। रामबन में टिकट न मिलने से नाराज जिला पदाधिकारी सूरज सिंह परिहार ने पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ ताल ठोकी और यहां भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।

चिनाब वैली और एससी सीटों पर कायम रहा जादू

चिनाब वैली की आठ सीटों पर भाजपा पिछला प्रदर्शन बनाए रखने में कामयाब रही। 2014 में पार्टी को डोडा, किश्तवाड़ व रामबन की छह में चार सीटों किश्तवाड़, डोडा, रामबन व भद्रवाह में कामयाबी मिली थी। परिसीमन में डोडा व किश्तवाड़ में एक-एक सीटें बढ़ाई गईं तो यहां आठ सीटें हो गईं। यहां किश्तवाड़ व डोडा जिले की दो-दो सीटें जीतने में पार्टी सफल रही तो एससी सीटों पर भाजपा का जादू कायम रहा। सभी सात सीटों, ऊधमपुर के रामनगर, सांबा के रामगढ़, जम्मू के बिश्नाह, सुचेतगढ़, मढ़, अखनूर, कठुआ पर भाजपा को जीत मिली और अनुसूचित जाति के बीच पार्टी की मजबूत पकड़ बनी रही। 2014 के चुनाव में भी पार्टी ने सभी सात सीटें जीती थीं। हालांकि परिसीमन में पिछली आरक्षित सीटों पर रोटेशन हुआ और नई सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित की गईं। भाजपा के लिए यह सभी सात सीटें महत्वपूर्ण साबित हुईं।

वैष्णो देवी सीट पर बची साख

परिसीमन में अध्यात्म का केंद्र श्री माता वैष्णो देवी के नाम पर नई सीट बनाई गई थी। यहां टिकट बंटवारे के बाद भाजपा ने टिकट बदल दिया था। इससे बगावत के सुर उठे थे लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने डैमेज कंट्रोल करते हुए स्थिति पर नियंत्रण कर लिया था। पार्टी ने पूर्व विधायक बलदेव राज शर्मा को टिकट दिया और वे भाजपा की झोली में सीट डालने में कामयाब रहे। लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की अयोध्या सीट हारने के बाद पार्टी के लिए पहली बार बनी यह सीट जीतना काफी अहम था।

पीडीपी को लगा सबसे बड़ा झटका

जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन ने बड़ी जीत दर्ज की है। राज्य की 49 सीटें गठबंधन के खाते में गई हैं। सबसे बड़ा झटका महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी को लगा है, जो सिर्फ तीन सीटें ही जीती है। 2014 में उसे 28 सीटों पर जीत मिली थी।

फिसड्डी साबित हुई इंजीनियर रशीद की पार्टी

चुनाव से ठीक पहले बारामुला से सांसद और आवामी इत्तेहाद पार्टी के नेता इंजीनियर रशीद को चुनाव से पहले एक्स फैक्टर बताया जा रहा था। कयास लग रहे थे कि चुनाव के बाद उनकी पार्टी किंगमेकर की भूमिका में होगी और वह लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में भी चौंकाएंगे मगर मोटे तौर पर अगर कहें तो इंजीनियर रशीद की पार्टी को भी जम्मू कश्मीर की आवाम ने नकार दिया है। दो दर्जन से भी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही इंजीनियर की पार्टी केवल 1 सीट जीतने में सफल हुई है। नॉर्थ कश्मीर के कुपवाड़ा जिले की लांगेट सीट, जहां से वह दो बार विधायक रह चुके हैं से रशीद के भाई खुर्शीद अहमद शेख ने महज 1,602 वोटों के अंतर से जीत दर्ज है।

जम्मू-कश्मीर में हुई आप की एंट्री

आम आदमी पार्टी ने जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनावों में अपनी पहली जीत दर्ज की है। उसके उम्मीदवार मेहराज मलिक ने डोडा निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 4,538 से अधिक मतों के अंतर से हराया। जिला विकास परिषद (डीडीसी) के सदस्य मलिक को भाजपा के गजय सिंह राणा के 18,690 वोटों के मुकाबले 23,228 वोट मिले। मलिक ने इस साल की शुरुआत में ऊधमपुर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन असफल रहे थे। आप ने 90 विधानसभा क्षेत्रों में से सात उम्मीदवार मैदान में उतारे थे।

गौरतलब है कि दिल्ली और पंजाब की सत्ता में रहने वाली पार्टी को पिछले साल सितंबर में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिया गया था। गुजरात और गोवा में भी इसके विधायक हैं। हालांकि हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे पार्टी के लिए एक झटका है। यहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली और राज्य इकाई के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अनुराग ढांडा उन लोगों में शामिल हैं जिन्हें बड़ी हार का सामना करना पड़ा।

You may also like

MERA DDDD DDD DD