राज्यसभा की 15 सीटों के लिए हुए चुनावों के नतीजे घोषित हो गए हैं। इस दौरान सबसे ज्यादा चर्चा क्रॉस वोटिंग की रही। आलम यह है कि एक ओर जहां बीजेपी ने सबसे बड़ा खेला उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ किया है, वहीं दूसरी तरफ हिमाचल प्रदेश में भाजपा प्रत्याशी की जीत ने कांग्रेस सरकार के अल्पमत में होने के संकेत तक दे दिए थे। हालांकि बागी विधायकों की बर्खास्तगी से सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार का संकट फिलहाल टल गया है। कहा जा रहा है कि वे सीएम पद पर भी बने रहेंगे
गत् सप्ताह उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में राज्यसभा के लिए चुनाव हुए। इस दौरान सबसे ज्यादा चर्चा क्रॉस वोटिंग की रही। जिसका सीधा फायदा देश की सत्ताधारी पार्टी भाजपा को हुआ। आलम यह है कि हिमाचल में कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत होने के बावजूद पार्टी के उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी हार गए वहीं कांग्रेस के सामने प्रदेश में अपनी सरकार बचाने का भी संकट खड़ा हो गया। यह संकट तब और ज्यादा गहरा गया जब मंत्री और कांग्रेस विधायक विक्रमादित्य सिंह ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया। हालांकि यह सियासी संकट फिलहाल टलता नजर आ रहा है।
कहा जा रहा है कांग्रेस के पर्यवेक्षकों की विधायकों, प्रदेश अध्यक्ष और सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू से मुलाकात के बाद डैमेज कंट्रोल कर लिया गया है। वहीं क्रॉस वोटिंग करने वाले छह विधायक पहले से ही पंचकूला में डेरा डाले हैं जिन्हें स्पीकर ने सदन की सदस्यता के अयोग्य घोषित कर दिया है। हालांकि इससे पहले विधानसभा स्पीकर कुलदीप सिंह पठानिया ने बीजेपी के 15 विधायकों को सदन की कार्यवाही से सस्पेंड कर बजट पास कराकर विश्वास मत हासिल कर लिया और इसके बाद विधानसभा अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी गई थी जिससे सुक्खू सरकार को कम से कम तीन महीनों तक कोई खतरा नहीं है। इस बीच पर्यवेक्षकों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि सरकार पर कोई खतरा नहीं है और सुक्खू ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे। लेकिन सवाल अब भी बरकरार हैं कि क्या बजट और बागी विधायकों को बर्खास्त कर देने से सुक्खू सरकार भी पास हो गई है? क्या सुक्खू सरकार का संकट टल गया? या फिर दल बदल के उस दलदल में कांग्रेस अभी भी फंसी है, जहां या तो सुक्खू बचेंगे या सरकार।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि कांग्रेस राज्यसभा चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार के समर्थन में बगावत करने वाले अपने 6 विधायकों की अयोग्यता करार करा चुकी है। लेकिन कांग्रेस की मुश्किलें अभी भी कम नहीं हुई हैं। क्योंकि सीएम की ब्रेकफास्ट पार्टी में विक्रमादित्य सहित 4 विधायक नहीं पहुंचे। दूसरी तरफ प्रदेश में मची सियासी कलह के बीच नए मुख्यमंत्रियों के नाम की भी खूब चर्चा हो रही है। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह का नाम आगे बढ़ाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि प्रतिभा सिंह के बेटे और बगावत करने वाले मंत्री विक्रमादित्य भी इस बगावत को तभी खत्म करने के मूड में हैं, जब मुख्यमंत्री बदल जाएगा। यही वजह है कि तमाम समझौतों की कोशिशों के बाद भी विक्रमादित्य ने कोई ढील नहीं बरती है।
सियासी जानकारों का मानना है कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के समर्थक इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं। यही वजह है कि प्रतिभा सिंह का नाम एक बार फिर से आलाकमान तक पहुंचाया गया है।
जानकारी के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में शुरू हुई कवायद में मुख्यमंत्री के बदलाव का बड़ा दबाव बन रहा है। जानकारों का कहना है कि जब हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी, तब भी वीरभद्र सिंह के परिवार से ही मुख्यमंत्री के बनाए जाने का दबाव बढ़ा था। सूत्रों की मानें तो वीरभद्र सिंह की पत्नी और हिमाचल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह को इस पूरे विवाद के दौरान सत्ता परिवर्तन कर मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग होने लगी है। कहा जा रहा है कि लोक निर्माण मंत्री और वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य ने इस पूरे मामले में बगावत यूं ही नहीं की है। तकरीबन डेढ़ साल बाद पैदा हुआ सियासी संकट अब मुख्यमंत्री के बदलाव के साथ ही समाप्त हो सकता है।
वहीं कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि हिमाचल की सियासत में जो चर्चा विक्रमादित्य के लिए उपमुख्यमंत्री पद की हो रही है उसका फिलहाल कोई आधार नजर नहीं आ रहा है। जब चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री बनाए जाने की बात हुई, तो उनकी मां प्रतिभा सिंह का नाम रेस में सबसे आगे था। लेकिन उस समय की सियासी उठापटक में राजा वीरभद्र सिंह के परिवार में मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं आई। उसके बाद से हिमाचल प्रदेश की सियासत में दो धड़े अलग- अलग तरह से राजनीति करते रहे। इसमें एक धड़ा मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का रहा, जबकि दूसरा धड़ा राजा वीरभद्र सिंह के समर्थकों और प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह का माना जाता रहा।
ऐसे में भले ही प्रतिभा सिंह प्रदेश अध्यक्ष हों, लेकिन वह अपने बेटे के साथ मजबूती के साथ खड़ी हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रतिभा सिंह के अपने बेटे के साथ खड़े होने को पार्टी आलाकमान अच्छा नहीं मान रहा है। ऐसे में हिमाचल प्रदेश कांग्रेस और केंद्र सरकार के नेताओं के बीच में भी कुछ-कुछ टकराहट जैसी स्थिति बन सकती है। हालांकि हिमाचल संकट पर बातचीत के लिए गए केंद्रीय पर्यवेक्षकों की प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह से मुलाकात हो चुकी है। इस बैठक में प्रतिभा सिंह और उनके बेटे विक्रमादित्य भी मौजूद रहे।
सूत्रों की मानें तो हिमाचल के कुछ प्रमुख नेताओं ने प्रतिभा सिंह का नाम दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान तक भी बढ़ाया है। नाम बढ़ाने वाले नेताओं की ओर से प्रदेश के सियासी संकट को दूर करने के लिए मुख्यमंत्री के परिवर्तन की बात कही गई है। हालांकि कांग्रेस की ओर से भेजे गए पर्यवेक्षकों को किसी भी दशा में सरकार बचाने के लिए हर फैसला लेने के लिए स्वतंत्र किया गया था। लेकिन देर रात तक हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हड्डा और कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मामले को बहुत हद तक सामान्य करने के प्रयास किए। इसके अलावा कांग्रेस के बागी विधायकों को निलंबित करके भी सरकार को बचाने का एक प्रयास किया गया। ऐसी दशा में जो सियासी संकट था, वह अब त्वरित प्रभाव से सरकार के ऊपर खतरे जैसा नहीं दिखा। यही वजह है कि अब मामले को सामान्य करने और सरकार बचाने के साथ सीएम को न हटाए जाने की भी कवायद चल रही है।
क्या संकट से उबर गई सुक्खू सरकार?
बागी 6 विधायकों पर हुई कार्रवाई से ऐसा प्रतीत होता है कि सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली हिमाचल प्रदेश कांग्रेस सरकार राजनीतिक संकट से सफलतापूर्वक निपट गई है। हिमाचल विधानसभा में 68 सीटें हैं। इनमें कांग्रेस के 40 विधायक थे। बहुमत का आंकड़ा 35 का था। 6 विधायक बागी हुए तो कांग्रेस का नंबर 34 पर आ गया था। यह बहुमत से एक नंबर कम था। अब स्पीकर ने 6 विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया है तो विधानसभा की क्षमता 62 के साथ ही बहुमत का आंकड़ा 32 का है। भाजपा के पास 25 विधायक हैं। निर्दलीय भी उनके पाले में हैं। ऐसे में कांग्रेस के पास फिलहाल 34 विधायक हैं तो पार्टी संकट से उबरती नजर आ रही है।
अयोग्य घोषित हुए बागी
राज्यसभा चुनाव में भाजपा के लिए क्रॉस वोटिंग करने वाले छह कांग्रेस विधायकों को हिमाचल विधानसभा से अयोग्य घोषित कर दिया गया है। बागी विधायकों पर दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई हुई है। विधानसभा स्पीकर कुलदीप सिंह पठानियां ने कहा कि विधायकों ने चुनाव कांग्रेस के सिंबल पर लड़ा, लेकिन वोट भाजपा के पक्ष में दिए। यह पार्टी के व्हिप का उल्लंघन है। मैंने दोनों पक्षों को सुना। तीस पन्नों का ऑर्डर दिया है। मैं घोषणा करता हूं कि छह लोग तत्काल प्रभाव से हिमाचल प्रदेश विधानसभा के सदस्य नहीं रहेंगे। जिन विधायकों पर कार्रवाई की गई है उनमें सुधीर शर्मा, रवि ठाकुर, राजेंद्र राणा सिंह, चौतन्य शर्मा, देवेंद्र भुट्टो, इंदर दत्त लखनपाल शामिल हैं।
हिमाचल राज्यसभा चुनाव में क्या हुआ
हिमाचल प्रदेश में 68 विट्टानसभा सीटें हैं, जिसमें से 40 सीट कांग्रेस के पास है, जबकि 25 विट्टायक बीजेपी के पास हैं, 3 सीटों पर निर्दलीय का कब्जा है। निर्दलीय ताजा घटनाक्रम के बाद बीजेपी के साथ नजर आ रहे हैं। राज्यसभा चुनाव की बात करें तो कांग्रेस और बीजेपी दोनों के उम्मीदवारों को 34-34 वोट मिले हैं। मतलब कांग्रेस के 6 विट्टायकों ने क्रॉस वोटिंग की और कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु भाजपा के हर्ष महाजन से हार गए जबकि उनके पास समर्थन में पर्याप्त मत थे। ऐसे में कांग्रेस के पास 34 विट्टायक बचते हैं, हिमाचल में सरकार बनाने के लिए 35 विट्टायकों की जरूरत होती है। ऐसे में कांग्रेस सरकार अल्पमत में आ गई थी।
गौरतलब है कि हिमाचल में जब से कांग्रेस की सरकार बनी है सीएम के नाम पर विवाद रहा है। यहां पार्टी में कई गुट हैं जो सत्ता पर पकड़ रखना चाहते हैं। उनके अपने विट्टायक भी हैं, जिसमें से सबसे मजबूत पूर्व सीएम स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के परिवार वाला गुट है। हालांकि जीत के बाद कांग्रेस आलाकमान ने सुखविंदर सिंह सुक्खू पर भरोसा जताते हुए सीएम की कुर्सी दी थी। अब सुखविंदर सिंह सुक्खू को लेकर ही बगावत हुई है। कहा जा रहा है कि 15 विट्टायक सुखविंदर सिंह सुक्खू के खिलाफ हैं। उनकी मांग है कि सीएम बदला जाए।
सपा पर भी भारी पड़ी क्रॉस वोटिंग
उत्तर प्रदेश में हुए राज्यसभा की 10 सीटों के चुनाव में बीजेपी ने 8 सीट जीती हैं तो वहीं सपा के खाते में दो सीट गईं। सपा उम्मीदवार जया बच्चन को सबसे ज्यादा वोट मिले हैं। क्रॉस वोटिंग का बीजेपी को स्पष्ट फायदा मिला और उसका आठवां उम्मीदवार भी जीत गया है। कहा जा रहा है कि यहां बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में सपा के 7 विट्टायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी। इस तरफ सपा पर क्रॉस वोटिंग भारी पड़ी।
बीजेपी ने पहले यूपी में राज्यसभा के लिए सात प्रत्याशी ही उतारे थे लेकिन आरएलडी के एनडी में आने के बाद पार्टी ने मुलायम सिंह यादव के करीबी रहे संजय सेठ को अचानक अपने आठवें प्रत्याशी के तौर पर उतार दिया। दूसरी ओर सपा ने तीसरे उम्मीदवार के तौर पर राज्य के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन को उतारा था। समाजवादी पार्टी के कई प्रत्याशियों ने वोटिंग के दौरान क्रॉस वोटिंग की जिसके चलते संजय सेठ राज्यसभा पहुंच गए हैं जबकि आलोक रंजन हार गए हैं।
राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान के दौरान ही सपा विट्टायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग की खबरें आईं थी, उस दौरान ही यह तय हो गया था कि बीजेपी के संजय सेठ की क्रॉस वोटिंग के चलते जीत हो जाएगी। गौरतलब है कि वोटों की काउंटिंग सपा की कुछ आपत्तियों के चलते रोकी गई थी लेकिन वे सभी खारिज हो गईं थी। इसके बाद जब दोबारा गिनती शुरू हुई तो थोड़ी ही देर में सारी तस्वीर साफ हो गई, जिसमें सपा की हार घोषित हो गई थी।

