कांग्रेस अकेली ऐसी पार्टी है जो भारतीय राजनीति में लोकसभा की 400 पार सीटें कांग्रेस जीत पाई है और देश में लगातार तीन बार चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बनने का इतिहास भी कांग्रेस नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू के नाम दर्ज है। अब पीएम मोदी ने सत्ता की हैट्रिक लगाने और 400 पार सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है, जिसे पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश हो रही है। बीजेपी दक्षिण भारत और मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर जीत दर्ज किए अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकी है, जिसके लिए सीधे तौर पर साधने के बजाय साइलेंट मुस्लिम प्लान बनाया गया है।
देश में मुस्लिम समुदाय की आबादी करीब 15 फीसदी है, लेकिन ये 60 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर हार जीत तय करते हैं। इसके अलावा लगभग 300 सीटों पर अहम रोल अदा करते हैं। ऐसे में मुस्लिम वोटों की सियासी अहमियत को समझते हुए राजनीतिक दल उन्हें अपने पाले में करने की कोशिश में हैं, वहीं बीजेपी हिंदुत्व के एजेंडे के साथ ही मुस्लिम वोटों को सीधे तौर पर साधने के बजाय अपने गठबंधन के सहयोगी दलों के जरिए सियासी ताना बाना बुन रही है। यही वजह है कि बीजेपी ने अपने गठबंधन के कुनबे में उन दलों को भी मिलाया है, जिनकी मुस्लिम समुदाय के बीच पकड़ है।
बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए के साथ हाल ही में सहयोगी बने एनसीपी के अजित पवार से लेकर आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी और जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार की मुस्लिमों के बीच अच्छी पकड़ रही है। बीजेपी के साथ रहते हुए भी मुस्लिमों का वोट नीतीश कुमार को मिलता रहा है और जयंत चौधरी लगातार जाट-मुस्लिम समीकरण पर ही काम कर रहे हैं। बीजेपी के साथ गठबंधन करने के बाद भी आरएलडी के मुस्लिम विधायक उनका साथ छोड़कर नहीं गए हैं और न ही बागी रुख अख्तियार किया है।
जयंत चौधरी का सियासी ग्राफ पश्चिमी यूपी के इलाके में ज्यादा बड़ा है। जो किसी भी दल का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं। मुस्लिमों के बीच बीजेपी जानती है कि उसकी कितनी पकड़ है और अगर खुलकर उन्हें साधने की कोशिश करती है तो उसके बहुसंख्यक वोट छिटकने की आशंका बढ़ जाएगी। इसी समीकरण को देखते हुए जयंत को विपक्षी खेमे से अपनी साथ लाई है ताकि जाट वोटों को एकमुश्त अपने साथ लिया जा सके और मुस्लिमों को पिछले दरवाजे से अपने पाले में लाया जा सके।
इसी तरह अजित पवार के साथ मुस्लिम विधायक बने हुए हैं और हाल ही में कांग्रेस छोड़कर बाबा सिद्दीकी ने एनसीपी का दामन थामा है। यही नहीं एनसीपी पर कब्जा जमाकर बीजेपी के साथ मिलकर डिप्टी सीएम बने अजित पवार मुस्लिमों को साधने में जुटे हैं। पिछले दिनों रायगड में एक सम्मेलन में मुस्लिमों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते नजर आए अजित पवार ने मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा की मुख्यधारा में लाने के लिए महिला और पुरुषों के लिए अलग-अलग हॉस्टल बनाने की बात कही है। इस दौरान कब्रिस्तान और ईदगाहों को अतिक्रमण से बचाने के लिए संरक्षण दीवार बनाने, उर्दू स्कूलों में टीचरों की भर्ती, जातिगत जनगणना कराए जाने, मुसलमानों को विशेष आरक्षण दिए जाने और पिछड़े वर्ग के लिए गठित ‘बार्टी’ की तर्ज पर मुसलमानों के लिए ‘मार्टी’ के गठन की मांग की है। इसे मुस्लिमों को जोड़ने के लिहाज से देखा जा रहा है।
महाराष्ट्र में मुस्लिम वोटर करीब 16 फीसदी हैं, जिनके बीच ओवैसी अपनी पैठ जमाने में जुटे हैं तो कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की भी नजर है। ऐसे में बीजेपी मुस्लिम वोटों को साधने के लिए खुद फ्रंटफुट पर आने के बजाय अजित पवार के जरिए बैकडोर से दांव चल रही है ताकि मुस्लिमों के एक तबके के कुछ वोटों को जोड़ा जा सके। कांग्रेस के दिग्गज नेता बाबा सिद्दीकी को इसी समीकरण के तहत अजित पवार ने अपने साथ मिलाया है।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो बीजेपी भले ही मुस्लिम वोटों को साधने के लिए खुलकर दांव न खेल रही हो, लेकिन उसे दरकरार है। इसके लिए अपने सहयोगी दलों के जरिए उन पर डोरे डाल रही है। मुस्लिम वोट देश के कई राज्यों में निर्णायक भूमिका में हैं, जिन्हें बिना साथ लिए एनडीए 400 पार का आंकड़ा छू नहीं सकती है। विपक्षी दलों ने जिस तरह से एकजुट होकर 2024 के लोकसभा चुनाव में उतरने का प्लान बनाया है, उसके पीछे एक रणनीति मुस्लिम वोटों को एकजुट रखने की भी है। इस बात को बीजेपी बखूबी समझ रही है और उसे यह भी पता है कि मुस्लिम वोटर अगर एकमुश्त वोट उससे खिलाफ किसी एक पार्टी को करते हैं तो फिर देश में 80 लोकसभा सीटें वो नहीं जीत सकेगी। बीजेपी अपनी इस रणनीति से एक ओर जहां विपक्ष को मिलने वाले मुसलमानों के एकमुश्त वोट को जाने से रोकने की कोशिश में है तो दूसरी तरफ बैकडोर से इनके वोटों में सेंधमारी करने में भी जुटी है।

