प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2025 में पिचहत्तर बरस के हो जाएंगे। उनका पिचहत्तरवां जन्म दिन राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है। इतना अहम की इसने मोदी के उत्तराधिकारी की तलाश का मुद्दा गर्मा भाजपा भीतर तनाव और तकरार को पैदा कर डाला है। प्रधानमंत्री के वारिस की तलाश और इस चलते पार्टी के वरिष्ठ नेताओं मध्य बढ़ता तनाव, यहां तक कि तकरार अकारण नहीं हैं इसके पीछे स्वयं मोदी-शाह के युग वाली भाजपा का वह निर्णय है जो पिचहत्तर की उम्र वाले नेताओं को सक्रिय राजनीति से विदाई दे देता है। इसकी शुरूआत 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने बाद हुई। तब पार्टी के दो वरिष्ठतम नेताओं लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को मोदी मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करने और उन्हें केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल में भेज दिए जाने से हुई थी। यह मार्गदर्शक मंडल 26 अगस्त 2014 को अस्तित्व में आया था। इससे पहले जुलाई 2014 में तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के स्थान पर अमित शाह भाजपा के अध्यक्ष बनाए गए थे जिन्होंने पार्टी की शीर्ष संस्था संसदीय बोर्ड में अटल बिहारी वाजपेयी, आडवाणी और जोशी को शामिल न कर स्पष्ट संकेत दे डाला था कि अब नई भाजपा का समय शुरू हो चला है। मार्गदर्शक मंडल का घोषित उद्देश्य पार्टी को दिशा प्रदान करना बताया गया था लेकिन इस मार्गदर्शक मंडल की कभी कोई बैठक नहीं हुई जिससे कांग्रेस के इस आरोप को बल मिला कि यह भाजपा के कद्दावर नेताओं को वृद्धाश्रम भेजने की कवायद भर है। 2019 के आम चुनाव में आडवाणी को गुजरात की गांधी नगर सीट से टिकट न देकर पार्टी ने अमित शाह को वहां से मैदान में उतारा था। तब अमित शाह ने अंग्रेजी पत्रिका ‘द वीक’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि भाजपा ने पिचहत्तर बरस से अधिक उम्र के नेताओं को टिकट नहीं देने का फैसला लिया है। हालांकि आडवाणी का टिकट भले ही इस नए नियम का हवाला दे काट दिया गया था, इस नियम को नई भाजपा के नेतृत्व ने अपनी सुविधानुसार कई बार तोड़ा भी। कर्नाटक में वयोवृद्ध नेता बी.एस. येदियुरप्पा को अस्सी बरस की उम्र में मुख्यमंत्री बनाया जाना इसका उदाहरण है। हालिया संपन्न आम चुनावों के नतीजों बाद राजनीतिक हालात तेजी से बदले हैं। ‘अबकी बार चार सौ पार’ का नारा धूल -धूसरित हो गया है और भाजपा मोदी के नेतृत्व में सामान्य बहुमत के जादुई आकड़े तक को छू नहीं पाई है। भले ही मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने में सफल रहे लेकिन उनकी छवि कमजोर हुई है और अब उनकी कार्यशैली को लेकर भाजपा भीतर बातें होनी तेज हो चली है। पुरानी कहावत है ‘बिना आग धुंआ नहीं उठता’। इस कहावत को भाजपा भीतर मोदी के बाद कौन सरीखी बातों संग जोड़ा जाए और 4 जून के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों बरअक्स परखा जाए तो तस्वीर पूरी तरह से साफ हो जाती है। 4 जून से पहले ही मोदी के उत्तराधिकारी को लेकर पार्टी भीतर चल रही रस्सा-कशी को आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने हवा देने का काम मई 2024 को तिहाड़ जेल से जमानत पर बाहर आने बाद किया था। 11 मई को केजरीवाल ने 17 सितंबर 2025 के बाद यानी मोदी के पिचहत्तरवें जन्म दिन बाद उनको रिटायर किए जाने का शिगूफा छोड़ा था। केजरीवाल के इस बयान को अमित शाह, यहां तक की स्वयं मोदी ने टिप्पणी कर सुलगा दिया। शाह ने नाराजगी भरे शब्दों में कहा था ‘केजरीवाल और पूरे इंडी गठबंधन को मैं कहना चाहता हूं कि मोदी जी 75 के हो जाएंगे, इससे आपको आनंदित होने की जरूरत नहीं है। ये भाजपा के संविधान में कहीं नहीं लिखा है। मोदी जी ही टर्म पूरा करेंगे।’ मोदी ने भी केजरीवाल के तंज का जवाब 12 मई को कुछ यूं दिया-’ परिवार का जो मुखिया होता है, वो अपने बच्चों के लिए कुछ छोड़कर जाना चाहता है। वो अपने वारिस को कुछ देकर जाना चाहता है लेकिन मोदी का वारिस कौन है भाई? मुझे किसके लिए छोड़ना है? मेरे वारिस तो आप सब देशवासी हैं। आप ही मेरा परिवार हैं। आप ही मेरे वारिस हैं।’ यहां यह गौरतलब है कि अमित शाह का कथन और मोदी का बयान, दोनों ही चुनाव नतीजों से पूर्व के हैं। 4 जून के बाद हालात बदल गए हैं और मोदी के नेतृत्व में भाजपा चार सौ का आंकड़ा तो छोड़िए सामान्य बहुमत तक नहीं पा सकी है। गोदी मीडिया भले ही स्वामी भक्ति के बोझ तले जनता जनार्दन से यह छिपाने में सफल रहा हो, सच यह कि मोदी इन नतीजों बाद कमजोर हुए। इतने कमजोर की भाजपा संसदीय दल की बैठक बुलाने की परंपरा का पालन करने तक से परहेज किया गया और जनता दल(यू) तथा टीडीपी के नेतृत्व को मना-पटा कर मोदी के नाम पर सहमति बना उन्हें शपथ दिला दी गई। 4 जून से 8 जून अर्थात् शपथ ग्रहण तक नाना प्रकार की बातें उठी। कहा गया कि संघ अब भाजपा नेतृत्व में बदलाव चाह रहा है। बदलाव, वह भी संघ की इच्छा चलते सरीखी बातें यूं ही नहीं उठ रही हैं। मोदी की बतौर प्रधानमंत्री तीसरी बार शपथ लेने बाद संघ प्रमुख का 10 जून को दिया गया बयान खासा महत्वपूर्ण है। उन्होंने बगैर किसी का नाम लिए कहा-‘जो वास्तविक सेवक है, जिसको वास्तविक सेवक कहा जा सकता है वो मर्यादा से चलता है…उसमें अहंकार नहीं आता कि मैंने किया और वहीं सेवक कहलाने का अधिकारी है।’ भागवत के इस बयान का एक बड़ा असर मोदी सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों के संघ का सदस्य बनने पर लगी रोक को हटाए जाने बतौर सामने आया। 1966 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जमात-ए-इस्लामी नामक संगठनों की गतिविधियों को संदिग्ध मानते हुए सरकारी कर्मचारियों को इसकी सदस्यता लेने से प्रतिबंधित कर दिया था। इससे पहले महात्मा गांधी की हत्या बाद फरवरी, 1948 में तत्कालीन गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने संघ को प्रतिबंधित संगठन घोषित करा था। बाद में संघ द्वारा लिखित आश्वासन बाद कि वह किसी भी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल नहीं है, यह प्रतिबंध हटा लिया गया था जिसे 1966 में पुनः लागू कर दिया गया। मोदी सरकार के गठन बाद भी यह प्रतिबंध बना रहा। 10 जून को भागवत का बयान मोदी और शाह के लिए खतरे का संकेत ले कर आया जिसका नतीजा रहा 9 जुलाई का आदेश जो सरकारी कर्मचारियों को संघ की सदस्यता लेने के लिए स्वतंत्र होने की बाबत था। हालांकि इस आदेश का अपेक्षित लाभ मोदी-शाह को मिलता नजर नहीं आता। 18 जुलाई को एक बार फिर से भागवत ने इशारों-इशारों में बहुत कुछ ऐसा कह दिया जिसने भाजपा भीतर मौजूद मोदी विरोधियों बीच उत्साह पैदा कर डाला। भागवत ने कहा- ‘मनुष्य है पर मानवता नहीं है। वो पहले मनुष्य बन जाए…फिर मनुष्य अलौलिक, सुपरमैन, अति मानव बनना चाहता है। वहां भी रूकता नहीं है। फिर उसे लगता है कि देवता बनना चाहिए। लेकिन देवता कहते हैं कि हमसे तो बड़ा भगवान है तो फिर वो भगवान बनना चाहता है।
भगवान कहते हैं कि मैं तो विश्वरूप दूं। वहां भी कुछ रूकने की जगह है या वहां से आगे कुछ है?’ संघ की यह परंपरा रही है कि उसके नेता सीधे कुछ न कहकर सांकेतिक तौर पर अपनी बात कहते हैं। भागवत के इस कथन को सीधे प्रधानमंत्री पर कटाक्ष तौर देखा जा रहा है। स्मरण रहे 23 मई 2024 को उड़ीसा में एक रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा था कि ‘मेरे इंसान पैदा होने की कोई संभावना नहीं है। जैविक रूप से मेरे पैदा होने का कोई मौका नहीं है… यह परमात्मा है जिसने मुझे इस दुनिया में भेजा’। भागवत ने संभवत इसी बयान पर तंज कसा है। संघ की तरफ से तीखे बयान यह इशारा करते हैं कि वे मोदी से, उनकी कार्यशैली से खफा है। ये इशारे भाजपा भीतर उन ताकतों को शक्ति देने का काम कर रहे हैं जो बीते दस वर्षों के दौरान हाशिए पर डाल दिए गए हैं। ऐसों को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मोदी का विकल्प नजर आते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एक तो योगी की छवि देश भर में उन छवि के मध्य मजबूत हुई है जो उग्र हिंदुत्व के पैरोकार हैं। ऐसों की नजर में मोदी का स्थान योगी ही ले सकते हैं। अमित शाह की नजरों में योगी खटकते रहे हैं तो उसका सबसे बड़ा कारण यही है। यह मात्र अटकलें नहीं हैं, राजनीतिक गप्पबाजी नहीं बल्कि सच्चाई है कि योगी और शाह के मध्य संबंध सौहार्दपूर्ण नहीं हैं। ऐसे में मोदी के कमजोर होने चलते राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलने लगे हैं। भाजपा और संघ भीतर मोदी के वारिस का मुद्दा अब गर्मा रहा है जिस चलते पार्टी में तनाव है, उसके बड़े नेताओं मध्य तकरार होने लगी है और मोदी के वारिस की तलाश शुरू हो चुकी है। हालांकि अभी तो शुरुआत भर है, बदलाव की आग सुलगने लगी है लेकिन मंद-मंद। कुछ समय बाद यह विकराल रूप लेगी ही लेगी। यह कहना कठिन है कि इसमें समय कितना लगेगा। होना लेकिन ऐसा तय है।
तनाव, तकरार और तलाश

मेरी बात
