सैय्यद अली रज़ा उर्फ मंज़र भोपाली साहब से परिचय बहुत देर से हुआ। परिचय से तात्पर्य उनकी शायरी, ग़ज़ल, नज़्म इत्यादि से है। कुछ दिन हुए आभासी संसार में विचरते हुए उनसे परिचय जो हुआ वह अब मोहब्बत में तब्दील हो चुका है। बहरहाल उनकी बाबत बज़रिए उनकी शायरी विस्तार से चर्चा फिर कभी। गत् सप्ताह इस अखबार में प्रकाशित एक खोजी समाचार ‘गरीबों के निवाले पर डाका’ पर उनकी एक नज़्म पूरी तरह सही बैठती है। इस खबर का अपेक्षित असर होता मुझे नज़र नहीं आया। सच तो यह कि अब खबरों के असर का दौर लगभग समाप्त हो चला है। खासकर भ्रष्टाचार की परत उधेड़ती खबरों के प्रति आमजन की उदासीनता चरम पर है क्योंकि उसने भ्रष्टाचार को आत्मसात कर लिया है। किसी भी समाज की ऐसी व्यवस्था उसके मृतप्राय होेने का संकेत है और हर दृष्टि से यह संकेत बेहद घातक है। समाचार उत्तराखण्ड के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग में कोरोनाकाल के दौरान गरीबों को दिए जाने वाले मुफ्त राशन की लूट का है। इस लूट को अंजाम तक पहुंचाने वालों को राज्य सरकार की महिला एवं बाल विकास तथा खाद्य मंत्री रेखा आर्या द्वारा खुला संरक्षण दिया जाना इस बात का प्रमाण है कि मंत्री महोदया स्वयं भ्रष्टाचार के दलदल में गहरी धंसी हुई हैं। प्रश्न लेकिन केवल मंत्री रेखा आर्या जी का नहीं है। उनके भ्रष्टाचार बाबत तो यह अखबार अनगिनत समाचार प्रकाशित कर चुका है और हर ऐसे समाचार के बाद मंत्री महोदया की राजनीतिक जमीन ज्यादा मजबूत हुई है। प्रश्न देवभूमि की पूरी राजनीतिक, प्रशासनिक व्यवस्था का है, प्रश्न यहां की अवाम की समझ का है और प्रश्न है किसी भी प्रकार के नैतिक-आर्थिक अनाचार के प्रति आमजन की उदासीनता का। बीते 24 बरसों के दौरान यहां सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या फिर भाजपा की, राजनीतिक-प्रशासनिक और सामाजिक जीवन में लगातार नैतिक मूल्यों के प्रति गिरावट दर्ज होती चली गई और वर्तमान समय आते-आते इस गिरावट को समाज ने स्वीकार लिया है इसलिए अब हमारे सरीखों के लिखे का असर समाप्त हो चला है। प्रदेश की पहली निर्वाचित सरकार के मुखिया नारायण दत्त तिवारी बने। तिवारी जी विराट व्यक्तित्व के स्वामी थे। उत्तर प्रदेश सरीखे विशाल राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का दायित्व सम्भाल चुके तिवारी जी थे तो खांटी पहाड़ी लेकिन उनकी संवेदनाएं और समझ कभी भी पहाड़ी दुख-दर्द, पहाड़ी संस्कृति और पहाड़ की जरूरतों संग जुड़ी नहीं रही थी। नतीजा अनियोजित विकास के रूप में सामने आया। इसमें कोई संदेह नहीं कि तिवारी जी ने राज्य के मैदानी इलाकों को औद्योगिक केंद्र बनाने का महत्वपूर्ण काम किया और पंतनगर तथा हरिद्वार में ‘सिडकुल’ के माध्यम से देश के बड़े उद्योगपतियों को उत्तराखण्ड की तरफ आकर्षित कियाा। तिवारी लेकिन न तो यशवंत परमार सरीखे पहाड़ी थे और न ही बनना चाहते थे। उनके समयकाल में प्रदेश ने राजनीतिक अस्थिरता का दंश भोगा। तिवारी जी पूरे पांच साल अपनी कुर्सी बचाने में व्यस्त रहे। सत्ता में बने रहने के लिए उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को हर तरह से साधने का प्रयास किया जिसका नतीजा बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की पौंध के मजबूती से अपनी जड़ें जमाने रूप में सामने आया। यह पौंध राज्य की दूसरी निर्वाचित सरकार के कार्यकाल में तेजी से पनपी। इस सरकार की कमान बेहद साफ-सुथरी छवि वाले भाजपा नेता भुवनचंद्र खण्डूड़ी जी के हाथों में थी। छवि लेकिन धारणा मात्र होती है। खण्डूड़ी जी स्वयं भले ही पाक-साफ क्यों रहे हों, उन्होंने तिवारी जी के शासनकाल में बोए गए भ्रष्टाचार रूपी बीज को समाप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया। उल्टा इस बीज को खाद-पानी उपलब्ध कराया गया। फिर खण्डूड़ी जी को हटा भाजपा नेतृत्व ने राज्य की कमान डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को सौंपी। डॉ. निशंक का कार्यकाल नाना प्रकार, कह सकते हैं कि हर प्रकार के घोटालों के नाम रहा। फिर एक ऐसा बड़ा भू-घोटाला इस अखबार ने खोज निकाला जिसने निशंक सरकार की चूलें हिला दी। यह घोटाला था ऋषिकेश स्थित खरबों की सरकारी जमीन की लूट का। निशंक जी ने समाचार प्रकाशित होने के बाद मुझसे एक रात बात की। वे बेहद नाराज थे। उत्तेजित हो उन्होंने मुझे चैलेंज दे डाला कि ऐसे ‘तथ्यहीन’ समाचार उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते। उनकी चुनौती ने मुझे अपनी पहली जनहित याचिका दायर करने का मार्ग सुझाया। शेष इतिहास है। याचिका पर आए फैसले में राज्य की नौकरशाही के पूरी तरह भ्रष्ट होने की बात कही गई और समस्त सम्बंधित जमीन को राज्य सरकार में निहित कर दिया गया। यह समाचार और इस समाचार के बाद उच्च न्यायालय में दायर मेरी पहली जनहित याचिका का असर निशंक जी की रुखसती रूप में भी सामने आया था एवं राज्य की कमान एक बार फिर से जनरल खण्डूड़ी को सौंप दी गई थी। यह वही दौर था जब पूरे देशभर में अन्ना हजारे की धूम मचने लगी थी और ‘लोकपाल बनाओ आंदोलन’ घर-घर दस्तक दे चुका था।
खण्डूड़ी जी को मलाल था कि उनका पिछला कार्यकाल विवादित रहा और उनकी छवि आमजन मध्य खराब हुई है। वे कुछ ऐसा करने को व्याकुल थे जिससे वो अपने पिछले मुख्यमंत्रित्वकाल की कालिमा को साफ कर सकें। दूसरी तरफ टीम अन्ना भी व्याकुल थी कि कोई राज्य तो उनके प्रस्तावित लोकपाल को स्वीकार उसके लिए कानून बना सके। मैं इस टीम का हिस्सा था। खण्डूड़ी जी को मैंने सलाह दी कि यह सुनहरा अवसर है। यदि वे राज्य में एक सशक्त लोकपाल कानून बना सके तो इतिहास उन्हें इसके लिए नायक भांति याद रखेगा। खण्डूड़ी जी ने मौका लपक लिया। कानून बना और इस कानून से पैदा हुई धारणा का लाभ भाजपा को राजनीतिक रूप से खासा मिला। हालांकि दोबारा सरकार बनाने से वे चूक गई किंतु खण्डूड़ी बतौर ईमानदार राजनेता खुद को स्थापित कर पाने में सफल रहे। अगली सरकार कांग्रेस की बनी जिसके मुखिया के शब्दकोष में ज़मीर शब्द था ही नहीं। खण्डूड़ी जी द्वारा लाए गए लोकपाल कानून को बहुगुणा जी ने ठंडे बस्ते में डाल दिया। पौने दो बरस के उनके कार्यकाल में हर तरफ हाहाकार, चौतरफा भ्रष्टाचार पनपा। हालात इस कदर बिगड़े कि देवभूमि में वास करने वाले शिव भगवान तक अपना संयम खो बैठे। 16 जून 2013 को केदारनाथ में सैलाब के साथ आई तबाही ने हजारों की जान ले ली। विजय बहुगुणा इसके कुछ समय बाद हटा दिए गए और हरीश रावत राज्य के नए मुखिया बने। रावत जी आज भले ही अपने तीन वर्ष के मुख्यमंत्रित्वकाल की बाबत कुछ भी लिखें, कुछ भी दावा करें, यह सच है कि उनकी सरकार भी चौतरफा भ्रष्टाचारियों से घिरी सरकार थी। खण्डूड़ी जी के समय मां गंगा में अवैध खनन का विरोध करते एक संत ने शहादत दे दी थी। हरीश रावत आज भले ही पुष्कर सिंह धामी की सरकार पर तंज कसते हुए उन्हें ‘खननप्रेमी’ कह सम्बोधित करें, उनके कार्यकाल के दौरान राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का जमकर अवैध दोहन होते मैंने स्वयं देखा है। रावत जी को मैंने रेखा आर्या जी और उनके पति गिरधारी लाल शाहू के काले कारनामों को नजरअंदाज करते भी देखा है। यह दीगर बात है कि जब रावत जी की सरकार पर संकट आया तो उन्हें छोड़ने वालों में रेखा जी सबसे आगे थीं। गरीबों के राशन की लूट का समाचार सम्भवतः हरीश रावत इसी कारण उठाने से, उसे मुद्दा बनाने से बच रहे हैं क्योंकि अपने मुख्यमंत्रित्वकाल के दौरान उन्होंने रेखा आर्या समेत कइयों की बेज़मीरी को परवान चढ़ाने का काम किया था।
भ्रष्टाचार के लिए केवल रेखा आर्या जी को चिन्हित करना बेइमानी होगी। बीते 24 बरसों के दौरान हरेक सरकार में भ्रष्टमंत्रियों की भरमार रही है। कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत के काले कारनामों की गूंज प्रदेश से बाहर तक पहुंची है। इन दिनों वे केंद्रीय जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। निशंक सरकार में कृषि मंत्री रहते भाजपा नेता त्रिवेंद्र सिंह रावत पर बीज खरीद में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। इस ढैंचा बीच घोटाले की जांच एक आयोग ने की थी और त्रिवेंद्र जी को दोषी करार दिया था लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत जी ने उन्हें दोषमुक्त करार दे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। कालांतर में त्रिवेंद्र जी राज्य के मुख्यमंत्री बने और अब हरिद्वार से सांसद हैं। इससे बड़ी त्रासदी भला क्या हो सकती है कि हमारी देवभूमि में जिस पर भी भ्रष्टाचार अथवा
अनैतिक आचरण के आरोप लगे उनकी राजनीति ज्यादा मजबूत हुई है। नौकरशाही का हाल तो राजनेताओं से भी ज्यादा खराब है। यहां पूरी प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा चुकी है। आए दिन हाईकोर्ट नौकरशाहों पर तल्ख टिप्पणी करती रहती है।
बहरहाल, अब चूंकि अनाचार-भ्रष्टाचार को सामाजिक स्वीकार्यता मिल चुकी है इसलिए यह आशा करना तो निजी मूर्खता होगी कि गरीबों के हक में डाका डालने वालों पर कुछ कार्यवाही अवश्य होगी। हुज़्ाूरों की बेज़मीरी पर केवल अपनी भड़ास ही निकाली जा सकती है और वही मैं कर रहा हूं।

