खास-खबर
हरिद्वार के कनखल क्षेत्र स्थित मातृसदन के संत लम्बे समय से गंगा की पवित्रता को बचाने के लिए आंदोलन करते आए हैं। यहां के संत निगमानंद ने 2011 में गंगा में हो रहे अवैध खनन के खिलाफ 115 दिनों तक आमरण-अनशन किया था जिसके बाद उनकी संदेहास्पद परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी। स्मरण रहे तब यह खबर उत्तराखण्ड और समस्त देश को वैश्विक स्तर में शर्मसार करने का कारण बनी थी। देवभूमि में खनन माफिया का तंत्र इतना प्रभावशाली है कि उच्चतम न्यायालय और नैनीताल उच्च न्यायालय द्वारा गंगा के संरक्षण हेतु समय-समय पर जारी किए गए दिशा-निर्देश भी बेअसर रहे हैं। अब एक बार फिर मातृसदन के संत दयानंद की तपस्या के सामने प्रशासन को झुकना पड़ा है और नील धारा के बीचों-बीच प्रारम्भ किए गए खनन पर रोक लग गई है
उत्तराखण्ड में खनन माफिया, सफेदपोशों तथा राजनेताओं की तिकड़ी के सामने राज्य गठन के बाद से ही तमाम सरकारें नतमस्तक रहती आई हैं। हालात इतने विकट हैं कि गंगा को ‘मां’ कह पुकारने वाले देश में इस नदी में भारी पैमाने पर होता आया वैध और अवैध खनन एक गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक मुद्दा बन अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा और चिंता का विषय बना रहता है। गंगा में वैध-अवैध खनन के हालात कितने विकट हैं कि हरिद्वार लोकसभा सीट से संसद सदस्य और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने संसद के शीतकालीन सत्र में ‘आपदा प्रबंधन (संशोधन) विधेयक- 2024’ पर अपनी बात के दौरान विषयांतर कर अपने लोकसभा क्षेत्र में खनन का मुद्दा उठा डाला। त्रिवेंद्र रावत ने कहा ‘मैं समझता हूं जिस पर बहुत गम्भीरता से ध्यान देने की जरूरत है, वह है जो अवैज्ञानिक तरीके से जो माफिया तत्व है वो खनन कर रहे हैं, नदियों को खोदा जा रहा है जिससे हमारे जलस्रोत प्रभावित होते हैं। उनके पानी का तल नीचे जाते जा रहा है।…’
अवैध खनन के दुष्प्रभाव गंगा किनारों और अब तो उसकी मध्य धारा के ठीक बीचों-बीच वैध और अवैध रूप से रेत, पत्थर और खनिजों का खनन गंगा के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित कर नदी का तलछट स्तर बदल रहा है जिस कारण बाढ़, आने का खतरा बढ़ जाता है। इतना ही नहीं इन खनन गतिविधियों चलते गंगा के जलस्तर में भी कमी दर्ज की जा रही है और जल प्रदूषण के कारण इसमें रहने वाले जीव-जंतुओं के विलुप्त होने का खतरा भी बढ़ रहा है।
संतों का विरोध और अनशन
हरिद्वार के कनखल क्षेत्र स्थित मातृसदन के संत लंबे समय से गंगा की पवित्रता को बचाने के लिए आंदोलन करते आए हैं। यहां के संत निगमानंद ने 2011 में गंगा में हो रहे अवैध खनन के खिलाफ 115 दिनों तक आमरण अनशन किया था जिसके बाद उनकी संदेहास्पद परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी। स्मरण रहे तब यह खबर उत्तराखण्ड और समस्त देश को वैश्विक स्तर में शर्मसार करने का कारण बनी थी। देवभूमि में खनन माफिया का तंत्र इतना प्रभावशाली है कि उच्चतम न्यायालय और नैनीताल उच्च न्यायालय द्वारा गंगा के संरक्षण हेतु समय-समय पर जारी किए गए दिशा निर्देश भी बेअसर रहे हैं।
इस बार हद पार
इस बार तीन दशक बाद एकाएक गंगा की नील धारा के बीचांे-बीच खनन प्रारम्भ किए जाने बाद फिर मातृसदन के संतों ने अपनी आवाज बुलंद कर राज्य सरकार को अंततः बैकफुट में लाने का काम कर दिखाया है। हैरानी की बात यह है कि नीलधारा में खनन को लेकर खनन विभाग अपने आदेश को सही साबित करने का पूरा प्रयास करता रहा। जिला प्रशासन द्वारा जिला खान अधिकारी और एसडीएम सदर के माध्यम से खनन के पक्ष में तमाम तर्क बताते हुए बकायदा प्रेस रिलीज जारी की गई इसका मुख्य कारण यह है कि जिस स्थल पर उक्त खनन की अनुमति दी गई, वहां अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौरान हरिद्वार की तत्कालीन जिलाधिकारी रही आईएएस अधिकारी आराधना शुक्ला ने इस क्षेत्र को कुम्भ क्षेत्र मानते हुए गंगा की धारा में खनन को प्रतिबंधित कर दिया था। इसके बाद अचानक से खनन की अनुमति देने के साथ-साथ जिला प्रशासन के दो अधिकारियों का उसके पक्ष में प्रेस नोट जारी करना और वह भी इस तथ्य विहीन जानकारी के साथ की गंगा में बह कर आने वाले सल्ट और बॉल्डर की वजह से हरिद्वार के शहरी क्षेत्र में जल भराव होता है।
दरअसल पूरा विवाद उत्तराखण्ड शासन द्वारा जारी एक आदेश के बाद जिलाधिकारी हरिद्वार के कार्यालय से जारी पत्र संख्या 1364/खनन सहायक 2024/दिनांक 23-11-2024 को लेकर शुरू हुआ। जिसके अनुसार शासन के पत्र संख्या 1933ध्टप्प्.।ध्2024.05;81द्धध्2024 दिनांक 25.10.2024 के द्वारा नील धारा के इस कुम्भक्षेत्र में स्थित सफेद सोने (खनन) को जायज ठहराने के उद्देश्य से राष्ट्रीय परियोजनों के आच्छादित होने के साथ-साथ जनहित से सम्बंधित होने का हवाला देते हुए हरिद्वार नगीना भाग चार लेन के चौड़ीकरण एवं सुदृढ़ीकरण हेतु मल्वा एवं आरबीएम एवं सील्ट की आपूर्ति हेतु जनपद व तहसील हरिद्वार से चण्डीपुल के डाऊन स्ट्रीम में चिन्हित लोट संख्या का उल्लेख करते हुए, अनुमति दिए जाने का आदेश जारी किया गया। शासन के इस पत्र ने ही बड़ा सवाल खड़ा कर दिया क्योंकि जिस स्थल पर खनन की अनुमति रिवर डेªजिंग के नाम पर जारी की गई वह स्थल कुम्भक्षेत्र का हृदय माना जाता है और कुम्भ क्षेत्र में हाईकोर्ट सहित शासन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा भी रोक लगाई गई है। शासन के जिस पत्र का उल्लेख करते हुए हरिद्वार के जिलाधिकारी कमेन्द्र सिंह द्वारा 23 नवम्बर को आदेश जारी किया गया उसमें स्पष्ट उल्लेख था कि उप खनिज उठाने का कार्यालय सूर्योदय से सूर्यास्थ तक ही होगा। बावजूद इसके अनुमति मिलते ही सम्बंधित फर्म मैसर्स वैंकेटेश बालाजी इन्फा ट्रेजिंग सर्विसेज प्रा.लि. भानियावाला द्वारा चौबीस घंटे पोकलैंड मशीनें गंगा में उतारकर खनन का खेल शुरू कर दिया।
कुम्भ मेला क्षेत्र में शासन के आदेश पर गंगा की नील धारा में सफाई और समतलीकरण के नाम पर धारा के बीचों-बीच बड़ी-बड़ी मशीनें उतारकर शुरू किए गए खनन के इस खेल की जानकारी तुरंत ही धर्मनगरी की फिजाओं में तैरने लगी। जिस पर नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना बताते हुए गंगा की अविरलता और स्वच्छता के लिए कार्य करने वाली संस्था मातृसदन के संत स्वामी दयानंद ने एक बार फिर अनशन शुरू कर दिया। वहीं दूसरी ओर मातृसदन ने आरोप लगाया कि कुम्भ मेला क्षेत्र में किसी भी प्रकार के खनन पर उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने रोक लगा रखी है। इसके बाद भी प्रदेश सरकार खनन माफियाओं से गठजोड़ कर हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए गंगा सफाई के नाम पर खनन करवा रही है। हालांकि इस मामले को लेकर मातृसदन और जिला प्रशासन के अधिकारियों के बीच कई दौर की बैठक भी हुई थी, जो बेनतीजा रही थी। आखिरकार नैनीताल हाई कोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन को बैकफुट पर आना पड़ा।
मातृसदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद महाराज कहते हैं कि ‘बैरागी कैंप के आस-पास गंगा के बीचों-बीच कंुभ मेला क्षेत्र के हृदय स्थल में साफ-सफाई के नाम पर खनन किया जा रहा है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी प्रशासन भले ही खनन पर रोक लगाए जाने का दावा करता रहा हो लेकिन गंगा में अभी भी बेरोक-टोक खनन का खेल जारी है।’
स्मरण रहे कि मातृसदन संस्था समय- समय पर गंगा की अविरलता और निर्मलता को बचाने के लिए अनशन करती आई है। इससे पहले भी स्वामी शिवानंद, स्वामी आत्मबोधानंद, साध्वी पद्मावती गंगा की अविरलता और निर्मलता को बनाए रखने के लिए कई बार अनशन कर चुके हैं। अब एक बार फिर मातृसदन के संत दयानंद की तपस्या के सामने प्रशासन को झुकना पड़ा है और नील धारा के बीचों- बीच प्रारंभ किए गए खनन पर रोक लग गई है। 13 दिसम्बर को हाई कोर्ट द्वारा कुुंभ मेला क्षेत्र में खनन पर रोक को लेकर आदेश दिए जाने के बावजूद खनन न रूकने पर ब्रह्माचारी दयानंद का अनशन लगातार जारी रहा था। तब आखिरकार जिला प्रशासन की ओर से जिला खान अधिकारी व एसडीएम सदर 14 दिसम्बर को भारी दलबल के साथ मातृसदन पहंुंचे और एक पत्र मातृसदन के संतों को सौप कर चंडी घाट क्षेत्र के डाऊन स्ट्रीम में रिवर डेªजिंग के कार्य को बंद करने की बात इन अधिकारियों द्वारा कही गई। तब मातृसदन के संतों द्वारा यह कहते हुए कि जिलाधिकारी हरिद्वार द्वारा 23 नवम्बर को जारी प्रशासनिक आदेश रद्द करते हुए मांग की कि उन्हें यह आश्वासन दिया जाए कि भविष्य में गंगा में किसी भी प्रकार के डेªजिंग खनन, चैनलाईजेशन, कैनलाईजेशन, ट्रेनिंग आदि कार्यों का प्रस्ताव व संचालन नहीं होगा।
आखिरकार जिलाधिकारी को मातृसदन के संतों के सामने झुकना पड़ा और एक नया आदेश संख्या 32/खनन सहायक -2024, दिनांक 17 दिसम्बर 2024 जारी करते हुए स्पष्ट किया गया है कि इस कार्यालय द्वारा जारी आदेश संख्या 1362 दिनांक 23 नवम्बर 2024 निरस्त किया जाता है। डीएम के आदेश के बाद मातृसदन के ब्रह्माचारी दयानंद ने भले ही अनशन समाप्त कर दिया हो परन्तु गंगा की अविरलता और स्वच्छता सहित कुम्भक्षेत्र को खनन मुक्त रखे जाने की लम्बी जंग लड़ रहे मातृसदन के संतों के संघर्ष अभी समाप्त होता नजर नहीं आ रहा है। मातृसदन के संतों के सामने प्रशासन द्वारा हथियार डालने के बाद भले ही चंडी घाट के डाऊन स्ट्रीम में खनन पर रोक लग गई हो लेकिन धर्मनगरी में खनन माफिया और सफेद पोश रसूखदारों के लिए तिजोरी भरने का जरिया बना खनन का यह अवैध कारोबार धड़ल्ले से जारी है और खनन माफिया अभी भी रात दिन गंगा का सीना चाक कर गंगा को छलनी करने में जुटे हुए हैं जिसको लेकर मातृसदन जिला प्रशासन के सामने आवाज उठाने के साथ-साथ न्यायालय में भी इस जंग को जारी रखने की बात कर रहा है।
हरिद्वार में गंगा में ही नहीं, बल्कि हिमालय से निकलने वाली लगभग सभी नदियों में अवैज्ञानिक खनन हो रहा है। हम मानते हैं कि खनन होना चाहिए। अगर खनन नहीं होगा तो नदियों का प्रवाह परिवर्तित होगा और उनमें बाढ़ आने की सम्भावना प्रबल होगी, लेकिन तय मापदंड के अनुसार खनन हो तो पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा। नदियों का प्रवाह भी नियंत्रित और निर्बाध रहेगा। वैसे ही बाढ़ से प्रतिवर्ष हरिद्वार के खादर क्षेत्र की हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि और फसल बर्बाद हो जाती है। किसी भी किसान की भूमि जबरन खोद दी जाए, ऐसा नहीं होना चाहिए। चीनी मिलों को पर्याप्त गन्ना नहीं मिलने से वो नुकसान में चल रही हैं, किसानों की आय भी प्रभावित होती है। इसलिए अवैज्ञानिक और असंतुलित खनन से खेती-किसानी पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है।
त्रिवेंद्र सिंह रावत, पूर्व मुख्यमंत्री एवं सांसद हरिद्वार
मैं अभी मुख्यमंत्री जी के कार्यक्रम में व्यस्त हूं, आपसे बात नहीं कर सकता हूं।
कर्मेन्द्र सिंह, जिलाधिकारी, हरिद्वार
यह सरकार तो हाई कोर्ट को कुछ मानती ही नहीं है। सरकार के अपने कानून चलते हैं। यह सरकार बालू, बोल्डर और पत्थर को निचोड़-निचोड़ कर उनको नदियों से निकाल रही है। हरिद्वार ही नहीं हर जगह बेतरतीब ढंग से खनन हो रहा है। कई जगह नहरें तक बेकार हो चुकी हैं। अवैध खनन के चक्कर में उनके तटबंध तक खोद दिए गए हैं। इस सरकार ने खनन माफिया को पूरी छूट दे दी है। मुझे पहली बार खनन माफिया शब्द का प्रयोग करना पड़ रहा है। अब से पहले मैं इन्हें खनन व्यापारी कहता था। स्वामी शिवानंद जी महाराज गंगा के रक्षक हैं। उन्हीं की बदौलत गंगा मां की अविरल धारा बह रही है। हमारे समय में भी गंगा में प्रशासन द्वारा कुछ गलत काम कर दिए गए थे। इसके विरोध में स्वामी शिवानंद जी अनशन पर बैठ गए थे। तब शिवानंद जी ने हमसे कहा तो हमने इसको सुधारा था। यह जो सरकार है, यह मुंह से संतों की बात करती है, लेकिन कर्म से संतों का अपमान करती है। इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं स्वामी शिवानंद जी महाराज।
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड
कुंभ मेला क्षेत्र में किसी भी प्रकार के खनन पर उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने रोक लगा रखी है। इसके बाद भी प्रदेश सरकार खनन माफियाओं से गठजोड़ कर हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए
गंगा सफाई के नाम पर खनन करवा रही थी। हमें इस बाबत अनशन करना पड़ा था। सरकार अपनी मनमानी पर उतारू थी लेकिन कोर्ट के निर्णय के बाद बैकफुट पर आ गई। फिलहाल खनन माफिया गांवों की तरफ चले गए है। बिशनपुर गांव और डाउन स्ट्रीम क्षेत्र में पिछले पांच दिन से बड़े पैमाने पर अवैध खनन किया जा रहा है। अवैध खनन की जानकारी मिलने पर भी जिला प्रशासन इसे गंभीरता से नहीं ले रहा है। कई बार कॉल और व्हाट्सऐप कॉल करने पर भी कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। डीएम और प्रशासन के कई अधिकारियों को हमारे द्वारा कई वीडियो भेजे गए। जिसमें रात-रात भर बड़ी मशीनों से खनन किया जा रहा है लेकिन उस पर भी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। यह प्रशासन की अवैध खनन के प्रति सोच को दर्शाता है।
स्वामी शिवानंद, संस्थापक, मातृ सदन हरिद्वार

