
- श्वेता मासीवाल
सामाजिक कार्यकर्ता
बीते कुछ वर्षों में डिजिटल युग में लोगों ने तप स्थलों को मनोरंजन का स्थल बना दिया है। कोई अपने होने वाले जीवनसाथी को घुटनों के बल प्रोपोज करता रील बनाता, कोई पंजाबी महाराष्ट्रीयन ढोल में नाचता तो कोई ब्रेकिंग न्यूज ट्रेंड की तरह खुलते बंद होते कपाटों को दिखाता। कोई मंदिर मर्यादा को तार-तार करता बेढंगी बात करता। कुछ वर्षों पहले किसी आज के युग के ‘इन्फ्लुएंसर’ की वो रील मुझे आज भी याद है जहां वो व्यवस्थाओं के लिए रो रही थी। किसने कहा साधना की राह आसान होती है? हिमालय के इस ठंडे स्थान पर आप किस किस्म की सुविधा चाह रहे हो? बेसिक सुविधा के सारे प्रावधान सरकार ने निश्चित कर दिए हैं, मेरा निजी तौर पर मानना है कि ऐसे स्थानों पर पयर्टन की दृष्टि से नहीं तीर्थाटन के मानकों के अनुसार ही सुविधा देनी चाहिए
मुझे हमेशा से लगता आया है कि हिमालय सिर्फ आदियोगी का ही निवास नहीं है अपितु ऊं में लीन प्रत्येक साधक में शिव अपने होने का प्रमाण देते हैं। हल्द्वानी में चित्रशिला घाट के समीप स्वामी परमहंस जी महाराज के सानिध्य का आशीर्वाद मुझे और मेरे परिवार को रहा है। एक दफा जब हम सपरिवार केदार बाबा की यात्रा पर थे (ये दूसरी बार था जब हम केदारनाथ जा रहे थे) परमहंस जी महाराज से यात्रा से पूर्व आशीर्वाद लेने गए। महाराज जी घनघोर श्मशान में धूनी में निवास करते थे। वे हर फरियादी को बड़े सहज भाव से कहते थे ‘हमसे नहीं शिवजी से कहो।’ साधक संत का शिव के साथ अंगीकार होकर एक भाषा में बात करना और सिर्फ शिव के स्वरूप को मान्यता देना इस बात का प्रमाण था कि वे अपनी साधना के चरम में थे।
यात्रा से पूर्व आशीर्वाद देते हुए महाराज जी ने एक पांच सौ का नोट और एक दुशाला हमें दी। नोट को वो कागज कहते थे और किसी सांसारिक व्यक्ति के उसको कागज कहने पर टोक दिया करते थे। तो कागज और दुशाला देते हुए महाराज जी ने हमसे कहा कि केदारनाथ से ऊपर भैरव शिला पर एक साधक मिलेंगे उन्हें ये दे देना। ये वो दौर था जब मोबाइल फोन्स नहीं चलते थे। मुझे लगा बड़ी विचित्र बात है क्या वहां एक ही साधक होगा? और होगा भी तो हम कैसे पहचानेंगे की सामग्री सही हाथ में जा रही है।
मैंने सहज भाव से पूछ ही लिया कि महाराज जी हम उन्हें कैसे पहचानेंगे? मुस्कुराते हुए जवाब आया कि वो तुम लोगों को पहचान लेंगे। मां ने सिखाया था संतों के कहे वचन पर टोक नहीं लगानी चाहिए तो कुछ आगे कहने के लिए शेष था नहीं लेकिन यात्रा के उस पड़ाव तक जहां जब हम भैरव शिला नहीं पहुंचे मेरी उत्सुकता बनी रही। हैरत इस बात की थी कि वहां एक ही व्यक्ति बैठे हुए थे और बोले कागज दो। ऊपर काले बादल थे थोड़ी देर में हल्की बर्फ गिरने लगी थी। मुझे आज भी वो चेहरा ठीक से याद है। हमें नीचे आने की जल्दी थी पर वो साधक एक चट्टान पर एक ही मुद्रा में बैठा रहा। धाम की तरफ निहारता हुआ। एकटक। क्या हम ही जीवन के असल मर्म को नहीं समझते? क्या उस स्तर की साधना के बगैर मुक्ति संभव है? बहुत वर्षों बाद हिमालय के सुविख्यात सोमवारी बाबा के एक साधक शिष्य ने जब सतोपंथ में विचरने वाले रहस्यमयी दिव्यात्माओं के विषय में अवगत करवाया तब कुछ भेद अवश्य खुले थे जिनका सार यही है कि हिमालय की दिव्यता मनुष्य के दैहिक नेत्रों की सीमाओं से परे हैं।
केदारनाथ में बाबा के दर्शन के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ में हम ज्योतिर्लिंग के दर्शन तो कर लेते हैं लेकिन अक्सर बहुत-सी शक्तियां नहीं देख पाते जो सहज उस मण्डल में विचरती हैं। जैसे कि कपाट बंद होने पर शिवलिंग के पास एक दीया प्रज्ववलित किया जाता है जो छह माह बाद कपाट खुलने पर भी दीप्तमान मिलता है। मान्यता है कि देव गंधर्व वहां कपाट बंद होने पर शिव की आराधना करते हैं इस बात का साक्षी सिर्फ वो दीया है जो अनवरत जलता है।
मंदिर परिसर के बाहर पर्यटकों की जमात से अलग विभूति धारण किए साधकों का एक कुम्भ दिखता है जो अस्तित्व की विराटता और विभिन्नता को बयां करता है और आपको ये याद दिलाता है कि चिंतन के साथ- साथ सोच की हदों से परे शिव विचरते हैं।
अब आप सोचकर देखिए जिस हाड़ कंपा देने वाली ठंडे स्थान पर एक रात रुकने से पहले आप हजार दफा सोचते हैं और न जाने कितने लोगों से पूछताछ करते हैं उस स्थान में बगैर किसी इंसानी दखलंदाजी के कपाट के भीतर दिया कैसे जलता होगा? ये वो मौसम होता है जब लगातार केदार घाटी में भयानक हिमपात होता रहता है और तापमान शून्य से नीचे जाता है। केदारनाथ में शिव अपने जाग्रत स्वरूप में विराजमान है इसका प्रमाण 2013 में आई त्रासदी में भी देखने को मिला था।
वो त्रासदी का दौर भी अजीब था आज तक वहां मौजूद प्रत्यक्षदर्शी जब बताते हैं उस वक्त क्या-क्या हुआ तो श्रवण करते हुए भी रौंगटे खड़े हो जाते हैं। मुझे नाम ठीक से याद नहीं पर रामनगर राजस्व विभाग में कार्यरत एक सज्जन ने उस दिन की बाबत मुझे बताया था कि वो पूजन के बाद मंदिर से बाहर आ ही रहे थे कि अचानक दिल दहलाने वाली आवाज आई। गर्जन इतनी भयानक थी कि उनका दिल उस गर्जन के बाद ही उन्होंने परिसर में विराजमान नंदी बैल को जोरों से पकड़ लिया और लगातार डेढ़ दिन वैसे ही बैठे रहे। घटना के पांच साल बाद जब वह मुझे यह बात बता रहे थे तब मैंने उनकी आंखों के कोर में पानी देखा था जिसके पार्श्व में शायद परमशक्ति के लिए धन्यवाद करता उनका भावुक हृदय था।
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया था कि कैसे चारों ओर तबाही का मंजर था और अचानक एक शिला मंदिर के पीछे आ खड़ी हुई थी। जिसका नतीजा ये हुआ कि आस -पास सब कुछ नष्ट हो गया सिर्फ मंदिर परिसर रह गया। इससे ज्यादा संकेत और क्या होगा कि देव स्थान पर मानव को कम से कम दखल अंदाजी करनी चाहिए।
वो भीम शिला आज भी मंदिर के पार्श्व में मौजूद है और कई मान्यताओं को स्वयं सिद्ध करती है। आखिर कहां से वो शिला अचानक आई और उसी स्थान पर आकर कैसे ठहर गई? क्या इस घटना के पीछे कोई दिव्य संकेत था या पुरानी तकनीक से बने इस परिसर को पूर्व में सोच कर ही उस नियत स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया था?
बीते कुछ वर्षों में डिजिटल युग में लोगों ने तप स्थलों को मनोरंजन का स्थल बना दिया है। कोई अपने होने वाले जीवनसाथी को घुटनों के बल प्रोपोज करता रील बनाता, कोई पंजाबी महाराष्ट्रीयन ढोल में नाचता तो कोई ब्रेकिंग न्यूज ट्रेंड की तरह खुलते बंद होते कपाटों को दिखाता। कोई मंदिर मर्यादा को तार-तार करता बेढंगी बात करता। कुछ वर्षों पहले किसी आज के युग के ‘इन्फ्लुएंसर’ की वो रील मुझे आज भी याद है जहां वो व्यवस्थाओं के लिए रो रही थी। किसने कहा साधना की राह आसान होती है? हिमालय के इस ठंडे स्थान पर आप किस किस्म की सुविधा चाह रहे हो? बेसिक सुविधा के सारे प्रावधान सरकार ने निश्चित कर दिए हैं, मेरा निजी तौर पर मानना है कि ऐसे स्थानों पर पयर्टन की दृष्टि से नहीं तीर्थाटन के मानकों के अनुसार ही सुविधा देनी चाहिए।
एक दूसरी तस्वीर याद आती है जहां कपाट खुलते ही ढेरों कैमरों का दृश्य जीवित हो उठता था। उस दृश्य को देखकर इतनी पीड़ा पहुंची थी। कितने सौभाग्यशाली थे वो लोग जो उस दिव्य प्रांगण में सशरीर मौजूद थे और कितने अभागे की उस घड़ी भी वो दुनियादारी के लिए सामान जुटा रहे थे। शून्य के नाद से बहुत दूर शायद सिर्फ उनका शरीर ही केदार धाम में था। मन और आत्मा अभी शिव से साक्षात्कार के लिए परिपक्व नहीं हुआ था। यही भाव मुझे उन तस्वीरों को देखकर आ रहा था। क्या अब तीर्थ जाना भी दिखावे के लिए हो गया है। आजकल की पीढ़ी एक शब्द का प्रयोग करती है- Fomo अर्थात fear of missing out। क्योंकि सब केदारनाथ जा रहे हैं तो हम भी जाएंगे। ऐसा लिखते हुए मैं बाबा केदार से प्रार्थना भी करती हूं कि यदि किसी भक्त के भाव को लेकर मेरी लेखनी गलत दिशा में जा रही हो तो बाबा मुझे माफ करें लेकिन ये जरूर कहूंगी कि जो भी व्यक्ति देव भूमि या शिव के महत्व को जरा भी समझेगा वो शायद इस तरह के भौंडे प्रदर्शन से बचेगा। आज हृदय की गहराइयों से मैं सरकार के इस फैसले के लिए भी धन्यवाद ज्ञापित करती हूं कि मंदिर परिसर में अब फोन ले जाने पर पाबंदी है। खैर वापस आते हैं उस त्रासदी वाले साल पर वो साल केदारघाटी ही नहीं पूरे उत्तराखण्ड पर कहर बनकर बरसा था।
बहुत सालों बाद तक भी जब मेरी स्वपोषित संस्था के स्वयंसेवी वहां कम्बल और सामान आदि लेकर जाते थे तो बताते थे कि कैसे पैदल मार्ग में कहीं कहीं पर आज भी कपाल दिख जाते हैं। मैं तो तबसे अब तक वहां जाने का साहस भी नहीं कर पाई हूं। मैंने केदारनाथ के दर्शन सबसे पहले बहुत छोटी उम्र में किए। उस समय भी पहाड़ी परिवार से होने के नाते हम लोग सुबह 4 बजे चढ़ाई शुरू करने के बाद रात्रि 8 बजे तक नीचे गौरीकुंड वापस पहुंच भी गए थे। धुंधली यादों में नीचे कलकल बहती मंदाकिनी का स्वर तब बहुत सुहाया था। रास्ते में सुविधाएं ज्यादा नहीं थी पर जो मिलते थे वो साधक थे। उस दौर में महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान से आए भक्तों के जत्थे भी नियम-कायदे का पालन करने वाले लगते थे। अधिकांश जत्थे स्वयं पालकी थे और मार्ग में जय बाबा केदार का स्वर हर व्यक्ति का एक सा था। उस समय वहां मौजूद हर व्यक्ति वहीं मौजूद होता था। किसी की आंखों में भाव के आंसू, किसी की आंखों में हिमालय को देख विस्मय, कुछ आंखें ऐसी भी दिखती थी जो भय और आस्था का मिश्रण लिए होती थी। उन्हें स्वयं यकीन नहीं होता था कि समुद्र तल से इतना ऊपर हिमालय के इस दुर्गम स्थल पर वो सांस किस तरह से ले रहे हैं। किसी को कहीं पहुंचने की जल्दी नहीं थी। सब आराम-आराम से एक दूसरे से धीमे स्वर में बात करते चलते जा रहे थे। कोई गूगल में जवाब नहीं ढूंढ रहा था, बल्कि प्रकृति से संवाद कर अपने सवालों के जवाब ढूंढ़ता नजर आ रहा था। कई नजरों को मैं आज तक नहीं भूल पाई हूं। उनमें से एक सज्जन मुम्बई के थे। हर साल गौरीकुंड से लौट जाते थे। संयोग से हमें वो मिल गए और कहने लगे वो हर साल एक लम्बा सफर तय करके आते हैं लेकिन जब तक बाबा का आदेश नहीं होगा वो केदारनाथ तक नहीं पहुंच पाएंगे। कलयुग में ऐसी भी भक्ति होती है इस बात पर कई दिनों तक मेरा परिवार चिंतन-मनन करता रहा था। कभी तो वो व्यक्ति निराश हुआ होगा, लेकिन न जाने कितनी दफा वो आंखों में याचना लिए वहां आता रहा था। अपनी भक्ति तो बहुत छोटी बात है। अच्छे- अच्छे साधकों की भक्ति मुझे उनके इस भाव के सामने गौण लगीं थी।
एक दशक से ज्यादा के बाद 2010 में जब मैं पुनः गई तो दूसरों को क्या दोष दूं हम स्वयं गति के रथ पर सवार थे। हेलीकॉप्टर के माध्यम से जाना हमारी मजबूरी भी थी। एक तो साथ 80 वर्षीय नानी मां यानी हम सबकी इजा थी जिन्होंने जानवर या पालकी पर बैठने से इनकार कर दिया था। कारण यह कि तीर्थ पर किसी पर बोझ बनकर नहीं जाया जाता, न ही किसी को कोई कष्ट दिया जाता है। हालांकि एक क्षण बड़ा विचित्र था। वो मुझे बता रही थी पहले के लोग केदारघाटी या चारधाम में जोर से खांसते भी नहीं थे और अब इतना शोर था। वो हेलीकॉप्टर की आवाज से त्रस्त थी। लेकिन उनकी बहुत इच्छा थी एक दफा बाबा के दर्शन करने की। वो निरंतर कहती रही ‘शिव ज्यु माफ कर दिया हमकू’। भक्त की भावना क्या होती है मेरी दूसरी केदारनाथ यात्रा में मुझे सिर्फ उनके इस भाव में दिखाई दी।साम्ब सदाशिव!
क्रमशः

